Class 11 Political Science · Chapter 9 · भारत का संविधान : सिद्धांत और व्यवहार

संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

संविधान में संशोधन की प्रक्रिया, संशोधनों के प्रकार, मूल ढाँचे का सिद्धांत और न्यायपालिका की भूमिका।

NCERT भारत का संविधान : सिद्धांत और व्यवहार + राजनीतिक सिद्धांतCBSE Class 11 13 min read

1. अध्याय एक नज़र में

भारत का संविधान 1950 में लागू हुआ और आज भी उसी मूल ढाँचे के साथ चल रहा है, जबकि इस बीच समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति बहुत बदल गई। यह कैसे संभव हुआ? उत्तर है — हमारा संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ (Living Document) है। यह बदलती परिस्थितियों के अनुसार संशोधन और न्यायिक व्याख्या के माध्यम से विकसित होता रहता है, पर इसकी मूल आत्मा — मूल ढाँचा (Basic Structure) — सुरक्षित रहती है।

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • संविधान को जीवंत दस्तावेज़ क्यों कहा जाता है।
  • संविधान संशोधन की प्रक्रिया — अनुच्छेद 368 और तीन प्रकार के बहुमत।
  • इतने अधिक संशोधन क्यों हुए — उनकी प्रकृति।
  • मूल ढाँचे का सिद्धांत — केशवानंद भारती मामला।
  • संविधान के विकास में न्यायपालिका और संसद की भूमिका।

2. संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ क्यों?

कोई भी संविधान अपने समय की परिस्थितियों में लिखा जाता है। यदि वह बिल्कुल न बदले तो पुराना पड़ जाएगा, और यदि बहुत आसानी से बदल जाए तो उसकी पवित्रता और स्थिरता ख़त्म हो जाएगी। भारत के संविधान निर्माताओं ने इन दोनों के बीच संतुलन बनाया — यह न बहुत कठोर, न बहुत लचीला है।

  • संविधान को लोगों की नई आकांक्षाओं, नई समस्याओं (जैसे पर्यावरण, डिजिटल गोपनीयता) और नए विचारों के अनुसार ढलना चाहिए।
  • पर कुछ मूल्य — लोकतंत्र, मौलिक अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, न्यायिक स्वतंत्रता — स्थायी रहने चाहिए।
  • संविधान का विकास तीन तरीक़ों से होता है: औपचारिक संशोधन, न्यायिक व्याख्या और राजनीतिक परंपराएँ (conventions)।
नेहरू का दृष्टिकोण

संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि संविधान इतना कठोर नहीं होना चाहिए कि वह बदलते समय के साथ न चल सके; एक जीवंत राष्ट्र की संस्थाएँ भी जीवंत और विकासशील होनी चाहिए। यही विचार संशोधन प्रक्रिया के लचीलेपन में दिखता है।

3. संशोधन की प्रक्रिया — अनुच्छेद 368

संविधान के भाग XX, अनुच्छेद 368 में संशोधन की प्रक्रिया दी गई है। संशोधन विधेयक केवल संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है, राज्य विधानमंडल में नहीं। दोनों सदनों को इसे अलग-अलग पारित करना होता है — इसके लिए संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।

प्रकारआवश्यक बहुमतउदाहरण विषय
1. साधारण बहुमतउपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत (यह अनुच्छेद 368 के दायरे से बाहर माना जाता है)नए राज्य बनाना (अनु. 3), नागरिकता, संसद की गणपूर्ति
2. विशेष बहुमतप्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत + उपस्थित व मतदान करने वालों का दो-तिहाईमौलिक अधिकार, नीति-निदेशक तत्त्व आदि अधिकांश प्रावधान
3. विशेष बहुमत + राज्यों का अनुसमर्थनविशेष बहुमत + कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की सहमतिसंघीय ढाँचे से जुड़े विषय — राष्ट्रपति का चुनाव, सर्वोच्च व उच्च न्यायालय, केंद्र-राज्य शक्ति-विभाजन, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व

संसद से पारित संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति को स्वीकृति देनी ही होती है — वह इसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकते (24वाँ संशोधन, 1971)। इस प्रक्रिया में जनमत-संग्रह (referendum) या अलग संविधान सभा की आवश्यकता नहीं होती।

संसद में संशोधन विधेयक लोकसभा + राज्यसभा: विशेष बहुमत संघीय विषय हो तो → आधे राज्यों की विधानसभाओं का अनुसमर्थन राष्ट्रपति की अनिवार्य स्वीकृति
अनुच्छेद 368 के अनुसार संशोधन की प्रक्रिया (विचार-चित्र)।

4. इतने संशोधन क्यों?

1950 से 2023 तक संविधान में 106 संशोधन हो चुके हैं (106वाँ — नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023, लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण)। पर इतनी संख्या का अर्थ यह नहीं कि संविधान अस्थिर है। अधिकांश संशोधन तीन श्रेणियों में आते हैं:

श्रेणीअर्थउदाहरण
तकनीकी / प्रशासनिकमूल प्रावधानों में छोटे स्पष्टीकरण या बदलावउच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से 62 (15वाँ, 1963); SC/ST आरक्षण की अवधि बढ़ाना
व्याख्या में मतभेदन्यायपालिका और संसद के बीच संविधान की व्याख्या पर टकरावपहला संशोधन (1951) — भूमि सुधार कानूनों की रक्षा के लिए नौवीं अनुसूची; 24वाँ, 25वाँ संशोधन
राजनीतिक सहमति सेसभी दलों की सहमति से बड़े बदलावदल-बदल विरोधी कानून (52वाँ, 1985); मतदान आयु 21 से 18 (61वाँ, 1988); पंचायती राज (73वाँ-74वाँ); GST (101वाँ, 2016)

विवादास्पद संशोधन — 42वाँ और 44वाँ

आपातकाल (1975-77) के दौरान 42वें संशोधन (1976) ने बहुत बड़े बदलाव किए — प्रस्तावना में "समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता" जोड़े, मौलिक कर्तव्य जोड़े, पर न्यायिक समीक्षा को सीमित किया और संसद का कार्यकाल 5 से 6 वर्ष किया। इसे "लघु संविधान" (Mini Constitution) भी कहा जाता है। 1977 में आई जनता सरकार ने 44वें संशोधन (1978) से इनमें से कई बदलाव पलट दिए — लोकसभा का कार्यकाल फिर 5 वर्ष, राष्ट्रीय आपातकाल के लिए "आंतरिक अशांति" की जगह "सशस्त्र विद्रोह" और संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार (अनु. 300A) बनाया।

5. मूल ढाँचे का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)

प्रश्न था — क्या संसद संविधान के किसी भी हिस्से को, यहाँ तक कि मौलिक अधिकारों को भी, संशोधित कर सकती है? इस पर कई प्रमुख मामले आए:

मामलावर्षनिर्णय
शंकरी प्रसाद1951संसद मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर सकती है
गोलकनाथ196711 न्यायाधीश, 6-5 बहुमत: संसद मौलिक अधिकारों को कम नहीं कर सकती
केशवानंद भारती197313 न्यायाधीश, 7-6 बहुमत: संसद किसी भी भाग को संशोधित कर सकती है, पर मूल ढाँचे को नष्ट या बदल नहीं सकती
इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण1975स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव मूल ढाँचे का भाग
मिनर्वा मिल्स1980सीमित संशोधन शक्ति और न्यायिक समीक्षा भी मूल ढाँचे का भाग; 42वें संशोधन के कुछ अंश रद्द

न्यायालय ने मूल ढाँचे की कोई बंद सूची नहीं दी, पर विभिन्न निर्णयों में इसमें शामिल माने गए तत्त्व हैं — संविधान की सर्वोच्चता, लोकतांत्रिक और गणतंत्रात्मक शासन, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, शक्तियों का पृथक्करण, न्यायिक समीक्षा, स्वतंत्र न्यायपालिका, विधि का शासन, स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव।

मूल ढाँचे का महत्त्व

इस सिद्धांत ने संसद की संशोधन शक्ति और संविधान की मूल आत्मा के बीच संतुलन बनाया। अब बहुमत वाली कोई भी सरकार संविधान को पूरी तरह बदलकर लोकतंत्र को ख़त्म नहीं कर सकती। आज यह सिद्धांत भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का स्वीकृत अंग है।

6. न्यायिक व्याख्या और संविधान का विकास

संविधान केवल संशोधनों से नहीं, न्यायालय की व्याख्याओं से भी विकसित हुआ है। उदाहरण के लिए अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) की व्याख्या करते हुए न्यायालय ने इसमें गरिमापूर्ण जीवन, स्वच्छ पर्यावरण, आजीविका, निःशुल्क क़ानूनी सहायता, त्वरित न्याय और निजता के अधिकार (पुट्टास्वामी, 2017) को शामिल किया। संसद, न्यायपालिका और जनता — तीनों ने मिलकर संविधान को जीवंत रखा है।

7. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली

शब्दअर्थ
जीवंत दस्तावेज़समय के साथ विकसित होने वाला संविधान
अनुच्छेद 368संविधान संशोधन की शक्ति और प्रक्रिया
विशेष बहुमतकुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित-मतदान करने वालों का 2/3
अनुसमर्थन (Ratification)कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की सहमति
मूल ढाँचासंविधान की वे मूल विशेषताएँ जिन्हें संशोधन से नष्ट नहीं किया जा सकता
न्यायिक समीक्षाकानूनों / संशोधनों की संवैधानिकता जाँचने की न्यायालय की शक्ति
नौवीं अनुसूचीपहले संशोधन से जुड़ी; भूमि सुधार कानूनों को संरक्षण
लघु संविधान42वाँ संशोधन (1976)
परंपरा (Convention)अलिखित, पर पालन की जाने वाली संवैधानिक प्रथा

8. मास्टर सारांश तालिका

संशोधनवर्षमुख्य विषय
पहला1951नौवीं अनुसूची, भूमि सुधार
42वाँ1976प्रस्तावना में 3 शब्द, मौलिक कर्तव्य; "लघु संविधान"
44वाँ197842वें के कई बदलाव पलटे; संपत्ति का अधिकार कानूनी अधिकार बना
52वाँ1985दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची)
61वाँ1988मतदान आयु 21 से 18
73वाँ / 74वाँ1992पंचायती राज / नगर निकाय
86वाँ2002शिक्षा का अधिकार (अनु. 21A)
101वाँ2016GST
106वाँ2023लोकसभा-विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 1/3 आरक्षण

चार्ट — ऐतिहासिक पीठों में निर्णय का मत-विभाजन:

केशवानंद भारती (1973) — 13 न्यायाधीश7 : 6
गोलकनाथ (1967) — 11 न्यायाधीश6 : 5

9. माइंड मैप

जीवंत संविधान
संशोधन
  • अनु. 368
  • 3 प्रकार बहुमत
प्रकृति
  • तकनीकी
  • व्याख्या, सहमति
मूल ढाँचा
  • केशवानंद 1973
  • मिनर्वा 1980
विवाद
  • 42वाँ
  • 44वाँ
व्याख्या
  • अनु. 21
  • निजता 2017

10. टिप्स और ट्रिक्स

याद रखने के सूत्र
  • मामलों का क्रम "शं-गो-के-मि": शंकरी प्रसाद 1951 → गोलकनाथ 1967 → केशवानंद 1973 → मिनर्वा 1980।
  • केशवानंद में 13 जज, 7-6 — "13 का 7"।
  • 42 ने लिया, 44 ने लौटाया — 42वें के बदलाव 44वें ने पलटे।
आम गलतियाँ
  • संशोधन विधेयक पर संयुक्त बैठक नहीं होती; दोनों सदनों में अलग-अलग पारित होना ज़रूरी।
  • संशोधन विधेयक राज्य विधानमंडल में प्रस्तुत नहीं हो सकता।
  • मूल ढाँचा शब्द संविधान में लिखा नहीं; यह न्यायालय का सिद्धांत है।

11. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर

  • संविधान संशोधन की प्रक्रिया अनुच्छेद 368 में है।
  • संशोधन के लिए तीन प्रकार के बहुमत का प्रावधान है।
  • संघीय विषयों के संशोधन में आधे राज्यों का अनुसमर्थन ज़रूरी है।
  • संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति की स्वीकृति अनिवार्य है।
  • पहले संशोधन ने नौवीं अनुसूची जोड़ी।
  • मूल ढाँचे का सिद्धांत केशवानंद भारती मामले (1973) में आया।
  • 42वें संशोधन को लघु संविधान कहा जाता है।
  • 44वें संशोधन ने संपत्ति के अधिकार को कानूनी अधिकार बनाया।
  • 61वें संशोधन से मतदान आयु 18 वर्ष हुई।
  • 106वाँ संशोधन नारी शक्ति वंदन अधिनियम है।
  • पुट्टास्वामी (2017) में निजता को मौलिक अधिकार माना गया।

12. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)

प्र1आसान

मूल ढाँचे का सिद्धांत किस मामले में प्रतिपादित हुआ?

  1. गोलकनाथ
  2. केशवानंद भारती
  3. मिनर्वा मिल्स
  4. शंकरी प्रसाद
उत्तर देखें

1973 में 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 7-6 के बहुमत से कहा कि संसद मूल ढाँचे को नहीं बदल सकती।

उत्तर: (ख) केशवानंद भारती

प्र2आसान

मतदान की आयु 21 से 18 वर्ष किस संशोधन से हुई?

  1. 42वाँ
  2. 52वाँ
  3. 61वाँ
  4. 73वाँ
उत्तर देखें

61वें संशोधन (1988) ने अनुच्छेद 326 में बदलाव कर मतदान आयु 18 वर्ष की; यह 1989 से लागू हुआ।

उत्तर: (ग) 61वाँ

प्र3आसान

विशेष बहुमत का क्या अर्थ है?

उत्तर देखें

संसद के प्रत्येक सदन में (1) सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत, और (2) उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत — दोनों शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए।

उत्तर: कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित-मतदान करने वालों का 2/3

प्र4मध्यम

किन प्रावधानों के संशोधन के लिए राज्यों का अनुसमर्थन आवश्यक है? क्यों?

उत्तर देखें

जो प्रावधान संघीय ढाँचे से जुड़े हैं — राष्ट्रपति का निर्वाचन, सर्वोच्च और उच्च न्यायालय, केंद्र-राज्य विधायी शक्तियों का बँटवारा (सातवीं अनुसूची), संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व और स्वयं अनुच्छेद 368। क्योंकि ये राज्यों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं, इसलिए केवल संसद अकेले इन्हें नहीं बदल सकती — यह संघवाद की रक्षा का उपाय है।

उत्तर: संघीय प्रावधान; राज्यों के अधिकारों की रक्षा के लिए

प्र5मध्यम

"इतने संशोधन होने के बावजूद संविधान स्थिर है।" कैसे?

उत्तर देखें

अधिकांश संशोधन तकनीकी या प्रशासनिक प्रकृति के हैं (जैसे न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु, आरक्षण की अवधि बढ़ाना), जो मूल ढाँचे को नहीं छूते। कई संशोधन सभी दलों की सहमति से हुए। मूल ढाँचे का सिद्धांत संविधान की आत्मा की रक्षा करता है। इसलिए संख्या अधिक होने पर भी लोकतंत्र, संघवाद, अधिकार जैसी मूल विशेषताएँ 1950 से आज तक बनी हुई हैं।

उत्तर: संशोधन मुख्यतः तकनीकी व सहमति-आधारित; मूल ढाँचा सुरक्षित

प्र6मध्यम

42वें और 44वें संशोधन की तुलना कीजिए।

उत्तर देखें

42वाँ (1976, आपातकाल में): प्रस्तावना में "समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता" जोड़े, मौलिक कर्तव्य (भाग IVA) जोड़े, लोकसभा का कार्यकाल 6 वर्ष किया, न्यायिक समीक्षा सीमित की। 44वाँ (1978, जनता सरकार): लोकसभा का कार्यकाल फिर 5 वर्ष, आपातकाल का आधार "सशस्त्र विद्रोह" किया, अनु. 20-21 आपातकाल में भी निलंबित नहीं हो सकते, संपत्ति का अधिकार कानूनी अधिकार बनाया। प्रस्तावना के शब्द और मौलिक कर्तव्य बने रहे।

उत्तर: 42वें ने सत्ता केंद्रित की, 44वें ने संतुलन लौटाया

प्र7मध्यम

न्यायिक व्याख्या संविधान को जीवंत कैसे बनाती है? उदाहरण दीजिए।

उत्तर देखें

न्यायालय संविधान के शब्दों की व्याख्या नई परिस्थितियों के अनुसार करता है, जिससे बिना संशोधन के अधिकारों का दायरा बढ़ता है। उदाहरण: अनुच्छेद 21 में गरिमापूर्ण जीवन, स्वच्छ पर्यावरण, निःशुल्क क़ानूनी सहायता, त्वरित सुनवाई और पुट्टास्वामी (2017) में निजता का अधिकार शामिल किया गया। जनहित याचिका ने भी न्याय तक पहुँच बढ़ाई।

उत्तर: अनुच्छेद 21 का विस्तार, निजता का अधिकार

प्र8कठिन

संसद और न्यायपालिका के बीच संशोधन शक्ति को लेकर टकराव का विकास समझाइए।

उत्तर देखें

शंकरी प्रसाद (1951) में न्यायालय ने कहा कि संसद मौलिक अधिकारों को भी संशोधित कर सकती है। गोलकनाथ (1967) में 6-5 के बहुमत से निर्णय बदला — संसद मौलिक अधिकार कम नहीं कर सकती। इसके जवाब में संसद ने 24वाँ संशोधन (1971) पारित कर अपनी संशोधन शक्ति स्पष्ट की। केशवानंद भारती (1973) में न्यायालय ने बीच का रास्ता निकाला — संसद कोई भी भाग संशोधित कर सकती है पर मूल ढाँचे को नहीं। 42वें संशोधन ने संशोधनों को न्यायिक समीक्षा से बाहर करने की कोशिश की, जिसे मिनर्वा मिल्स (1980) में रद्द कर दिया गया। इस तरह टकराव से एक संतुलित सिद्धांत निकला।

उत्तर: शंकरी प्रसाद → गोलकनाथ → 24वाँ → केशवानंद → मिनर्वा; संतुलन स्थापित

प्र9कठिन

मूल ढाँचे के सिद्धांत की आलोचना और समर्थन में तर्क दीजिए।

उत्तर देखें

आलोचना: यह संविधान में लिखा नहीं है; मूल ढाँचे की कोई निश्चित सूची न होने से न्यायाधीशों को बहुत विवेकाधिकार मिलता है; यह निर्वाचित संसद की शक्ति पर अनिर्वाचित न्यायपालिका की रोक है। समर्थन: यह अस्थायी बहुमत को लोकतंत्र, अधिकार और न्यायिक स्वतंत्रता जैसे मूल्यों को नष्ट करने से रोकता है; आपातकाल के अनुभव ने इसकी आवश्यकता दिखाई; समय के साथ इसे राजनीतिक और जनस्वीकृति मिली है। संतुलित दृष्टि से यह संविधान को स्थिरता और लचीलापन दोनों देता है।

उत्तर: अलिखित व अनिश्चित होने की आलोचना; लोकतंत्र की रक्षा में उपयोगी

प्र10कठिन

भारतीय संविधान "न अधिक कठोर, न अधिक लचीला" है — स्पष्ट कीजिए।

उत्तर देखें

लचीलापन: कई प्रावधान साधारण बहुमत से और अधिकांश विशेष बहुमत से संसद ही बदल सकती है; जनमत-संग्रह या अलग संविधान सभा की ज़रूरत नहीं — इसलिए अमेरिका (27 संशोधन) की तुलना में भारत में संशोधन आसान रहे। कठोरता: विशेष बहुमत की दोहरी शर्त, संघीय विषयों पर आधे राज्यों का अनुसमर्थन, संयुक्त बैठक का अभाव और मूल ढाँचे की सीमा — ये मनमाने बदलाव रोकते हैं। यही संतुलन संविधान को जीवंत और स्थिर दोनों बनाता है।

उत्तर: तीन स्तर की प्रक्रिया व मूल ढाँचे से संतुलन

प्र11कठिन

राजनीतिक सहमति से हुए संशोधनों के दो उदाहरण देकर उनका महत्त्व बताइए।

उत्तर देखें

(1) 52वाँ संशोधन (1985) — दसवीं अनुसूची जोड़कर दल-बदल पर रोक लगाई, जिससे सरकारों की अस्थिरता और "आया राम, गया राम" की राजनीति पर नियंत्रण हुआ। (2) 73वाँ-74वाँ (1992) — स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा देकर लोकतंत्र को गाँव और शहर तक पहुँचाया। इसी प्रकार 61वाँ (मतदान आयु 18) और 101वाँ (GST) भी व्यापक सहमति से हुए। ये दिखाते हैं कि संशोधन लोकतंत्र को गहरा करने के साधन भी हैं।

उत्तर: 52वाँ (दल-बदल), 73वाँ-74वाँ (स्थानीय शासन) — लोकतंत्र का विस्तार

13. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश

2 मिनट में दोहराएँ
  • संविधान जीवंत दस्तावेज़ — संशोधन, न्यायिक व्याख्या और परंपराओं से विकसित; न अधिक कठोर, न अधिक लचीला।
  • अनु. 368: साधारण बहुमत, विशेष बहुमत, विशेष बहुमत + आधे राज्यों का अनुसमर्थन; राष्ट्रपति की स्वीकृति अनिवार्य।
  • 2023 तक 106 संशोधन — तकनीकी, व्याख्या-मतभेद और राजनीतिक सहमति वाले।
  • 42वाँ (1976) "लघु संविधान"; 44वाँ (1978) ने संतुलन लौटाया।
  • मूल ढाँचा: केशवानंद 1973 (7-6), मिनर्वा 1980; अनु. 21 का विस्तार — निजता 2017।