1. अध्याय एक नज़र में
भारत जैसे विशाल और विविधता भरे देश में सारी शक्ति एक ही सरकार के पास रखना न तो व्यावहारिक है और न ही लोकतांत्रिक। इसलिए संविधान ने शक्तियों को केंद्र (Union) और राज्यों (States) के बीच बाँटा है — इसी व्यवस्था को संघवाद (Federalism) कहते हैं। इस अध्याय में हम संघवाद का अर्थ, भारतीय संविधान में उसकी विशेषताएँ, सशक्त केंद्र वाला संघवाद, केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव और कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधान समझेंगे।
- संघवाद क्या है और उसकी विशेषताएँ।
- भारतीय संविधान में शक्तियों का बँटवारा — तीन सूचियाँ।
- सशक्त केंद्र वाले संघवाद के प्रावधान।
- केंद्र-राज्य टकराव, स्वायत्तता की माँग, अंतर-राज्य विवाद और विशेष प्रावधान।
2. संघवाद क्या है?
संघवाद एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दो स्तरों की सरकारें होती हैं — एक पूरे देश के लिए और दूसरी प्रांतों या राज्यों के लिए। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में स्वायत्त होती हैं और नागरिक दोनों स्तरों की सरकारों के अधीन रहते हैं।
| संघवाद की विशेषता | व्याख्या |
|---|---|
| दोहरी सरकार | केंद्र और इकाइयों की अलग-अलग सरकारें |
| लिखित संविधान | शक्तियों का बँटवारा लिखित रूप में स्पष्ट |
| संविधान की सर्वोच्चता | कोई भी स्तर संविधान से ऊपर नहीं |
| कठोर संशोधन प्रक्रिया | शक्तियों के बँटवारे को एक स्तर अकेले नहीं बदल सकता |
| स्वतंत्र न्यायपालिका | केंद्र-राज्य विवादों का निपटारा करने वाला निष्पक्ष निर्णायक |
संघवाद केवल संस्थाओं का ढाँचा नहीं, बल्कि एक विचार भी है — "विविधता में एकता"। यह दो तरह की पहचानों को साथ रखता है: क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय पहचान। जब संघीय व्यवस्था में किसी क्षेत्र या समुदाय को लगता है कि उसकी अनदेखी हो रही है, तो टकराव पैदा होता है। सोवियत संघ का 1991 में विघटन और नाइजीरिया में क्षेत्रीय-जातीय संघर्ष यह दिखाते हैं कि संघीय ढाँचा तभी सफल होता है जब इकाइयों के बीच भरोसा और सम्मान हो।
3. भारतीय संविधान में संघवाद
संविधान के अनुच्छेद 1 के अनुसार "भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ (Union of States) होगा।" संविधान में "संघ" (federation) शब्द नहीं लिखा, पर इसमें संघीय व्यवस्था की सभी मूल विशेषताएँ हैं। डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि "Union" शब्द इसलिए चुना गया क्योंकि भारतीय संघ राज्यों के किसी समझौते का परिणाम नहीं है और राज्यों को इससे अलग होने का अधिकार नहीं है।
शक्तियों का बँटवारा — सातवीं अनुसूची
| सूची | मूल संविधान में विषय | उदाहरण | कौन कानून बनाता है |
|---|---|---|---|
| संघ सूची | 97 | रक्षा, विदेश मामले, बैंकिंग, मुद्रा, परमाणु ऊर्जा, रेलवे, डाक | केवल संसद |
| राज्य सूची | 66 | पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय शासन, जेल | राज्य विधानमंडल |
| समवर्ती सूची | 47 | शिक्षा, वन, विवाह, श्रमिक संघ, आर्थिक-सामाजिक नियोजन | दोनों; टकराव में संसद का कानून मान्य |
| अवशिष्ट शक्तियाँ | — | जो विषय किसी सूची में नहीं, जैसे साइबर कानून | संसद |
बाद के संशोधनों से विषयों की संख्या बदली है — उदाहरण के लिए 42वें संशोधन (1976) ने शिक्षा और वन को राज्य सूची से समवर्ती सूची में डाला।
4. सशक्त केंद्र वाला संघवाद
स्वतंत्रता के समय देश विभाजन, दंगों और रियासतों के विलय जैसी चुनौतियों से जूझ रहा था। संविधान निर्माता देश की एकता और अखंडता को बचाने तथा सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए एक शक्तिशाली केंद्र चाहते थे। इसलिए भारतीय संघवाद को कई विद्वान "अर्ध-संघात्मक" (quasi-federal) भी कहते हैं।
| प्रावधान | केंद्र की शक्ति |
|---|---|
| अनुच्छेद 3 | संसद नए राज्य बना सकती है, किसी राज्य की सीमा या नाम बदल सकती है — संबंधित राज्य की राय केवल ली जाती है, मानना ज़रूरी नहीं |
| आपातकालीन प्रावधान | राष्ट्रीय आपातकाल (352) में देश लगभग एकात्मक बन जाता है; राष्ट्रपति शासन (356); वित्तीय आपातकाल (360) |
| वित्तीय शक्ति | आय के प्रमुख स्रोत केंद्र के पास; राज्य अनुदान और करों में हिस्से के लिए केंद्र पर निर्भर; वित्त आयोग (अनुच्छेद 280) करों का बँटवारा सुझाता है |
| राज्यपाल | राष्ट्रपति (वास्तव में केंद्र सरकार) द्वारा नियुक्त; राज्य के विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार हेतु आरक्षित कर सकता है; राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश कर सकता है |
| अनुच्छेद 249 और 252 | राज्यसभा के प्रस्ताव पर या राज्यों के अनुरोध पर संसद राज्य-सूची के विषय पर कानून बना सकती है |
| अखिल भारतीय सेवाएँ | IAS, IPS पर अंतिम नियंत्रण केंद्र का |
| एकल नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, एक चुनाव आयोग | पूरे देश में एकरूपता |
101वें संशोधन (2016) से 2017 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू हुआ। इसके लिए केंद्र और सभी राज्यों के वित्त मंत्रियों की GST परिषद बनी, जो करों की दरें मिलकर तय करती है। यह सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का उदाहरण है, हालाँकि राज्यों का यह भी कहना है कि इससे उनकी कर लगाने की स्वतंत्रता घटी है।
5. केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव
- राजनीतिक संदर्भ: 1967 तक केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही दल (कांग्रेस) की सरकार थी, इसलिए तनाव कम दिखे। 1967 के बाद कई राज्यों में विपक्षी दल सत्ता में आए और स्वायत्तता की माँग बढ़ी। 1990 के बाद गठबंधन सरकारों के दौर में क्षेत्रीय दलों का केंद्र में प्रभाव बढ़ा।
- स्वायत्तता की माँगें: अधिक वित्तीय संसाधन, प्रशासनिक स्वतंत्रता, अपनी भाषा और संस्कृति का सम्मान। उदाहरण: तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन की माँगें, पंजाब में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973), पश्चिम बंगाल की वाम सरकार की माँगें।
- राज्यपाल की भूमिका और अनुच्छेद 356: कई बार केंद्र ने विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को बर्खास्त कराया। सरकारिया आयोग (1983 में गठित) ने केंद्र-राज्य संबंधों पर सुझाव दिए — राज्यपाल निष्पक्ष व्यक्ति हो और अनुच्छेद 356 का प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में हो। एस. आर. बोम्मई मामले (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार के बहुमत का परीक्षण विधानसभा में होना चाहिए और राष्ट्रपति शासन की घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
- नए राज्यों की माँग: भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन (1956); बाद में 2000 में छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड तथा 2014 में तेलंगाना बने।
- अंतर-राज्य विवाद: सीमा विवाद (जैसे बेलगाम पर महाराष्ट्र-कर्नाटक) और नदी जल विवाद (जैसे कावेरी पर कर्नाटक-तमिलनाडु)। इनके लिए न्यायाधिकरण बनाए जाते हैं।
6. विशेष प्रावधान
भारतीय संघवाद की विशेषता है असमान (asymmetric) संघवाद — कुछ राज्यों को उनकी विशेष परिस्थितियों के कारण विशेष प्रावधान दिए गए हैं।
- अनुच्छेद 371 और उसके उप-अनुच्छेद: नागालैंड, मिज़ोरम, असम, मणिपुर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गोवा आदि के लिए — जैसे जनजातीय रीति-रिवाज़ों और भूमि की सुरक्षा।
- छठी अनुसूची: असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त ज़िला परिषदें।
- जम्मू और कश्मीर: अनुच्छेद 370 के तहत राज्य को विशेष दर्जा था। अगस्त 2019 में यह प्रावधान निष्प्रभावी किया गया और राज्य को दो केंद्र-शासित प्रदेशों — जम्मू-कश्मीर और लद्दाख — में पुनर्गठित किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने दिसंबर 2023 में इस निर्णय को वैध ठहराया।
7. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| संघवाद (Federalism) | केंद्र और राज्यों में शक्तियों का संवैधानिक बँटवारा |
| राज्यों का संघ | अनुच्छेद 1 — भारत का संवैधानिक स्वरूप |
| अर्ध-संघात्मक (Quasi-federal) | संघीय ढाँचा, पर शक्तिशाली केंद्र |
| अवशिष्ट शक्तियाँ | किसी सूची में न दिए गए विषय — केंद्र के पास |
| वित्त आयोग | केंद्र-राज्यों में करों के बँटवारे की सिफ़ारिश (अनुच्छेद 280) |
| राष्ट्रपति शासन | अनुच्छेद 356 — राज्य का शासन केंद्र के हाथ में |
| स्वायत्तता (Autonomy) | अपने मामलों में स्वतंत्र निर्णय की शक्ति |
| सहकारी संघवाद | केंद्र और राज्यों का मिलकर काम करना |
| असमान संघवाद | कुछ राज्यों को विशेष प्रावधान |
| सरकारिया आयोग | केंद्र-राज्य संबंधों पर सुझाव देने वाला आयोग (1983) |
8. मास्टर सारांश तालिका
| संघीय विशेषताएँ | एकात्मक (केंद्र-प्रधान) विशेषताएँ |
|---|---|
| लिखित संविधान और उसकी सर्वोच्चता | अनुच्छेद 3 — राज्यों की सीमा बदलने की संसद की शक्ति |
| दो स्तर की सरकारें | आपातकालीन प्रावधान (352, 356, 360) |
| शक्तियों का बँटवारा (तीन सूचियाँ) | अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास |
| स्वतंत्र न्यायपालिका | राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा |
| द्विसदनीय संसद (राज्यसभा) | एकल नागरिकता, अखिल भारतीय सेवाएँ |
चार्ट — मूल संविधान में सातवीं अनुसूची के विषय:
9. माइंड मैप
- दो स्तर
- विविधता में एकता
- राज्यों का संघ
- तीन सूचियाँ
- Art 3, आपातकाल
- वित्त, राज्यपाल
- स्वायत्तता, 356
- सरकारिया, बोम्मई
- Art 371
- छठी अनुसूची
10. टिप्स और ट्रिक्स
- मूल सूचियाँ "97-66-47" — संघ, राज्य, समवर्ती।
- आपातकाल: 352 राष्ट्रीय, 356 राज्य (राष्ट्रपति शासन), 360 वित्तीय।
- 2000 में तीन नए राज्य "छ-उ-झा": छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड।
- संविधान में "Federation" नहीं, "Union of States" लिखा है।
- समवर्ती सूची पर टकराव में संसद का कानून मान्य होता है।
- अनुच्छेद 3 में राज्य की राय मानना संसद के लिए अनिवार्य नहीं।
11. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर
- अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों का संघ कहता है।
- शक्तियों का बँटवारा सातवीं अनुसूची में है।
- अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास हैं।
- 42वें संशोधन ने शिक्षा को समवर्ती सूची में डाला।
- वित्त आयोग अनुच्छेद 280 के तहत बनता है।
- सरकारिया आयोग 1983 में बना।
- एस. आर. बोम्मई मामला 1994 में आया।
- आनंदपुर साहिब प्रस्ताव 1973 में पारित हुआ।
- GST 2017 में लागू हुआ।
- तेलंगाना 2014 में बना।
- छठी अनुसूची में स्वायत्त ज़िला परिषदें हैं।
12. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
भारत में अवशिष्ट शक्तियाँ किसके पास हैं?
- राज्यों के पास
- केंद्र के पास
- दोनों के पास
- न्यायपालिका के पास
उत्तर देखें
जो विषय किसी सूची में नहीं, उन पर कानून बनाने का अधिकार संसद (केंद्र) को है — यह कनाडा से प्रेरित प्रावधान है।
उत्तर: (ख) केंद्र के पास
शिक्षा किस सूची का विषय है?
- संघ सूची
- राज्य सूची
- समवर्ती सूची
- अवशिष्ट
उत्तर देखें
42वें संशोधन (1976) के बाद शिक्षा समवर्ती सूची में है; केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
उत्तर: (ग) समवर्ती सूची
संघवाद की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर देखें
(1) दो स्तर की सरकारें, जो अपने क्षेत्र में स्वायत्त हों। (2) शक्तियों का लिखित संविधान द्वारा बँटवारा, जिसे कोई एक स्तर अकेले नहीं बदल सकता; विवादों का निपटारा स्वतंत्र न्यायपालिका करती है।
उत्तर: दो स्तर की सरकार; संवैधानिक बँटवारा व स्वतंत्र न्यायपालिका
संविधान निर्माताओं ने सशक्त केंद्र क्यों चाहा?
उत्तर देखें
विभाजन की हिंसा, सैकड़ों रियासतों का विलय, क्षेत्रीय और भाषाई विविधता के बीच देश की एकता और अखंडता बनाए रखना; गरीबी और पिछड़ेपन से लड़ने के लिए नियोजित आर्थिक विकास; और बाहरी ख़तरों से सुरक्षा — इन सबके लिए एक शक्तिशाली केंद्र आवश्यक माना गया।
उत्तर: एकता-अखंडता, विकास और सुरक्षा के लिए
राज्यपाल की भूमिका केंद्र-राज्य विवाद का कारण क्यों बनती है?
उत्तर देखें
राज्यपाल केंद्र सरकार की सलाह पर नियुक्त होते हैं, इसलिए राज्य सरकारें उन्हें केंद्र का प्रतिनिधि मानती हैं। वे राज्य के विधेयकों को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित कर सकते हैं, त्रिशंकु विधानसभा में मुख्यमंत्री चुन सकते हैं और राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश कर सकते हैं। विपक्षी दल की राज्य सरकार होने पर इन शक्तियों के पक्षपातपूर्ण प्रयोग के आरोप लगते हैं।
उत्तर: केंद्र द्वारा नियुक्ति और विवेकाधीन शक्तियों के कारण
अंतर-राज्य विवादों के दो प्रकार उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर देखें
(1) सीमा विवाद — बेलगाम क्षेत्र पर महाराष्ट्र और कर्नाटक के दावे। (2) नदी जल विवाद — कावेरी जल पर कर्नाटक और तमिलनाडु। ऐसे विवादों के लिए न्यायाधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय निर्णय करते हैं।
उत्तर: सीमा विवाद और नदी जल विवाद
भारत को "अर्ध-संघात्मक" क्यों कहा जाता है?
उत्तर देखें
क्योंकि इसमें संघ की मूल विशेषताएँ (दो स्तर, लिखित संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका) हैं, पर साथ ही कई एकात्मक विशेषताएँ भी — अनुच्छेद 3, आपातकाल में एकात्मक बनना, अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास, राज्यपाल की नियुक्ति, एकल नागरिकता, अखिल भारतीय सेवाएँ। इसलिए इसे सशक्त केंद्र वाला संघ कहा जाता है।
उत्तर: संघीय ढाँचे में एकात्मक झुकाव
अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर सरकारिया आयोग और बोम्मई निर्णय का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर देखें
1950 से 1990 के दशक तक कई बार विपक्षी दलों की राज्य सरकारें राजनीतिक कारणों से बर्खास्त की गईं। सरकारिया आयोग ने सुझाव दिया कि अनुच्छेद 356 का प्रयोग केवल अंतिम उपाय के रूप में हो और राज्यपाल निष्पक्ष हो। एस. आर. बोम्मई (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि बहुमत का परीक्षण विधानसभा के पटल पर हो और राष्ट्रपति शासन न्यायिक समीक्षा के अधीन है। इसके बाद इस शक्ति का मनमाना प्रयोग काफ़ी घटा।
उत्तर: मनमाने प्रयोग पर रोक लगी; न्यायिक समीक्षा और सदन में परीक्षण अनिवार्य
स्वायत्तता की माँगें संघवाद को कमज़ोर करती हैं या मज़बूत? चर्चा कीजिए।
उत्तर देखें
स्वायत्तता की माँगें — अधिक वित्तीय संसाधन, प्रशासनिक स्वतंत्रता, भाषा-संस्कृति का सम्मान — संघवाद की स्वाभाविक अभिव्यक्ति हैं। जब इन्हें लोकतांत्रिक बातचीत से समायोजित किया जाता है (जैसे भाषाई राज्य, वित्त आयोग में अधिक हिस्सा, GST परिषद), तो संघ मज़बूत होता है। केवल जब माँगें अलगाववादी रूप लें या उन्हें बलपूर्वक दबाया जाए, तब संकट पैदा होता है। इसलिए संवाद और समायोजन ही समाधान है।
उत्तर: लोकतांत्रिक समायोजन से संघ मज़बूत होता है
"भारतीय संघवाद असमान संघवाद है।" स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखें
सभी राज्यों की स्थिति एक जैसी नहीं: अनुच्छेद 371 और उसके उप-अनुच्छेद नागालैंड, मिज़ोरम, सिक्किम आदि को जनजातीय परंपराओं और भूमि की सुरक्षा देते हैं; छठी अनुसूची में स्वायत्त ज़िला परिषदें हैं; राज्यसभा में प्रतिनिधित्व जनसंख्या पर आधारित है; जम्मू-कश्मीर को पहले अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा था (2019 में निष्प्रभावी)। यह असमानता विविध क्षेत्रों की विशेष ज़रूरतों को समायोजित करती है।
उत्तर: विशेष परिस्थितियों वाले राज्यों को विशेष प्रावधान
केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध तनाव का स्रोत क्यों हैं? सहकारी संघवाद के उदाहरण दीजिए।
उत्तर देखें
आय के बड़े स्रोत (आयकर, सीमा शुल्क आदि) केंद्र के पास हैं, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, कृषि जैसे खर्चीले काम राज्यों के पास। इसलिए राज्य केंद्र के अनुदान और करों के हिस्से पर निर्भर रहते हैं और अधिक हिस्सा माँगते हैं। सहकारी संघवाद के उदाहरण: वित्त आयोग द्वारा करों का बँटवारा, GST परिषद में केंद्र और राज्यों का साझा निर्णय, NITI आयोग की गवर्निंग काउंसिल में मुख्यमंत्रियों की भागीदारी।
उत्तर: संसाधन केंद्र के पास, ज़िम्मेदारियाँ राज्यों पर; वित्त आयोग, GST परिषद सहयोग के साधन
13. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- संघवाद: दो स्तर, लिखित संविधान, कठोर संशोधन, स्वतंत्र न्यायपालिका; विविधता में एकता।
- भारत = राज्यों का संघ (अनु. 1); सातवीं अनुसूची — संघ 97, राज्य 66, समवर्ती 47 (मूल); अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र।
- सशक्त केंद्र: अनु. 3, आपातकाल, वित्त, राज्यपाल, 249/252, अखिल भारतीय सेवाएँ।
- तनाव: स्वायत्तता (आनंदपुर साहिब 1973), अनु. 356 — सरकारिया आयोग, बोम्मई 1994; अंतर-राज्य विवाद।
- विशेष प्रावधान: अनु. 371, छठी अनुसूची; अनु. 370 (2019 में निष्प्रभावी); GST — सहकारी संघवाद।