Class 11 Political Science · Chapter 6 · भारत का संविधान : सिद्धांत और व्यवहार

न्यायपालिका

न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायाधीशों की नियुक्ति और हटाना, न्यायालयों की संरचना और क्षेत्राधिकार, न्यायिक सक्रियता और न्यायिक पुनरावलोकन।

NCERT भारत का संविधान : सिद्धांत और व्यवहार + राजनीतिक सिद्धांतCBSE Class 11 13 min read

1. अध्याय एक नज़र में

लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति, संस्था या सरकार के बीच विवाद हो सकते हैं। इनका निपटारा एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका (Judiciary) करती है। यह कानून के शासन (Rule of Law) की रक्षा करती है, नागरिकों के अधिकार बचाती है और संविधान की व्याख्या करती है। इस अध्याय में हम न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायाधीशों की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया, भारत की न्यायिक संरचना, सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार, न्यायिक सक्रियता और न्यायिक पुनरावलोकन समझेंगे।

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • स्वतंत्र न्यायपालिका की आवश्यकता और उसे सुनिश्चित करने वाले प्रावधान।
  • न्यायाधीशों की नियुक्ति (कॉलेजियम) और हटाने की प्रक्रिया।
  • न्यायालयों की एकीकृत संरचना और सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार।
  • जनहित याचिका, न्यायिक सक्रियता, न्यायिक पुनरावलोकन और संसद से संबंध।

2. स्वतंत्र न्यायपालिका क्यों?

न्यायपालिका तभी निष्पक्ष निर्णय दे सकती है जब वह विधायिका, कार्यपालिका, राजनीतिक दलों और प्रभावशाली व्यक्तियों के दबाव से मुक्त हो। स्वतंत्रता का अर्थ मनमानी या जवाबदेही से मुक्ति नहीं, बल्कि यह है कि सरकार के दूसरे अंग न्यायपालिका के कामकाज में बाधा न डालें और न्यायाधीश बिना भय या पक्षपात के निर्णय ले सकें।

प्रावधानस्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित होती है
नियुक्तिविधायिका की भूमिका नहीं; वरिष्ठ न्यायाधीशों की निर्णायक भूमिका (कॉलेजियम)
योग्यतान्यायाधीश बनने के लिए कानूनी अनुभव और विशेषज्ञता आवश्यक; राजनीतिक संबद्धता आधार नहीं
कार्यकालसेवानिवृत्ति आयु तक पद सुरक्षित (सर्वोच्च न्यायालय 65 वर्ष, उच्च न्यायालय 62 वर्ष)
हटानाअत्यंत कठिन प्रक्रिया — संसद के दोनों सदनों का विशेष बहुमत
वेतन-भत्तेसंचित निधि (Consolidated Fund) पर भारित; संसद की मंज़ूरी के अधीन नहीं; कार्यकाल में कम नहीं किए जा सकते
आलोचना से संरक्षणन्यायाधीशों के आचरण पर संसद में चर्चा नहीं (केवल हटाने की प्रक्रिया के समय); न्यायालय अवमानना (Contempt of Court) के लिए दंड दे सकता है

3. न्यायाधीशों की नियुक्ति और हटाना

सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश और 33 अन्य न्यायाधीश (कुल 34) हो सकते हैं। औपचारिक रूप से नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। परंपरा से सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को भारत का मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनाया जाता है (1970 के दशक में दो बार यह परंपरा तोड़ी गई, जिस पर विवाद हुआ)।

नियुक्ति में मंत्रिपरिषद् और न्यायपालिका की भूमिका पर लंबा विवाद चला। न्यायिक निर्णयों (1993 और 1998) के बाद कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) विकसित हुई — मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों का समूह नामों की सिफ़ारिश करता है, जिसे सामान्यतः सरकार मानती है। 2014 में संसद ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) बनाया, पर 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने उसे न्यायिक स्वतंत्रता के विरुद्ध मानकर असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसलिए कॉलेजियम व्यवस्था जारी है; इसकी पारदर्शिता पर बहस भी जारी है।

हटाना: सर्वोच्च या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को केवल सिद्ध कदाचार (proven misbehaviour) या अक्षमता (incapacity) के आधार पर हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (कुल सदस्यों का बहुमत और उपस्थित-मतदान करने वालों का दो-तिहाई) से प्रस्ताव पारित होना चाहिए। अब तक सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को इस प्रक्रिया से हटाया नहीं गया है — यह दिखाता है कि प्रक्रिया कितनी कठिन है।

4. न्यायपालिका की संरचना

भारत में एकीकृत न्यायपालिका (Integrated Judiciary) है — अमेरिका की तरह संघ और राज्यों के अलग-अलग न्यायालय नहीं, बल्कि एक ही पिरामिड। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय देश के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी हैं।

स्तरन्यायालयमुख्य कार्य
शीर्षसर्वोच्च न्यायालय (नई दिल्ली)अंतिम अपील, संविधान की व्याख्या, मौलिक अधिकारों की रक्षा, केंद्र-राज्य विवाद
राज्यउच्च न्यायालय (25 उच्च न्यायालय; कुछ एक से अधिक राज्यों/UTs के लिए)निचले न्यायालयों से अपील, अनुच्छेद 226 के तहत रिट, अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण
ज़िलाज़िला न्यायालयज़िले के दीवानी और फ़ौजदारी मामले, निचली अदालतों से अपील
स्थानीयअधीनस्थ न्यायालय — सिविल जज, मजिस्ट्रेट आदिप्रारंभिक स्तर पर मुकदमे

5. सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार

क्षेत्राधिकारअर्थ
मौलिक (Original)कुछ मामले सीधे सर्वोच्च न्यायालय में शुरू होते हैं — विशेषकर केंद्र और राज्यों के बीच या राज्यों के आपसी विवाद (अनुच्छेद 131)
रिट (Writ)मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर अनुच्छेद 32 के तहत रिट जारी करना; उच्च न्यायालय भी अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी कर सकते हैं
अपीलीय (Appellate)उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध दीवानी, फ़ौजदारी और संवैधानिक मामलों में अपील; अनुच्छेद 136 के तहत विशेष अनुमति से किसी भी न्यायालय के निर्णय पर अपील
सलाहकारी (Advisory)अनुच्छेद 143 — राष्ट्रपति किसी कानूनी या सार्वजनिक महत्त्व के प्रश्न पर सलाह माँग सकते हैं; न्यायालय सलाह देने के लिए बाध्य नहीं और सलाह मानना सरकार के लिए अनिवार्य नहीं
पुनरावलोकन (Review)सर्वोच्च न्यायालय अपने ही निर्णय की समीक्षा कर सकता है

6. न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका

सामान्यतः न्यायालय तभी सुनवाई करता है जब पीड़ित व्यक्ति स्वयं याचिका दायर करे। 1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय ने यह नियम ढीला किया — अब कोई भी व्यक्ति या संगठन जनहित में उन लोगों की ओर से याचिका दायर कर सकता है जो स्वयं न्यायालय नहीं पहुँच सकते। इसे जनहित याचिका (Public Interest Litigation — PIL) कहते हैं।

  • हुसैनारा ख़ातून मामला (1979): बिहार की जेलों में लंबे समय से बंद विचाराधीन कैदियों के बारे में अख़बार की रिपोर्ट के आधार पर याचिका — इसमें त्वरित न्याय को अनुच्छेद 21 का हिस्सा माना गया और हज़ारों कैदी रिहा हुए।
  • न्यायालय ने कुछ मामलों में साधारण पत्रों और अख़बारी रिपोर्टों को भी याचिका मान लिया।
  • PIL के माध्यम से बंधुआ मज़दूरी, पर्यावरण प्रदूषण, जेल सुधार, भोजन का अधिकार जैसे विषयों पर बड़े निर्णय हुए।

इसे न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) कहते हैं। इससे न्याय गरीबों तक पहुँचा और सरकारें अधिक जवाबदेह बनीं। पर आलोचना भी है: (1) न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ बढ़ा; (2) न्यायपालिका कई बार कार्यपालिका का काम (नीति बनाना, प्रशासनिक निर्देश) करने लगी, जिससे शक्तियों के पृथक्करण का संतुलन बिगड़ने का ख़तरा है।

7. न्यायिक पुनरावलोकन और संसद

न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) का अर्थ है — सर्वोच्च न्यायालय (और उच्च न्यायालय) किसी कानून या कार्यपालिका के आदेश की संवैधानिकता की जाँच कर सकते हैं और संविधान के विरुद्ध होने पर उसे अवैध घोषित कर सकते हैं। संविधान में यह शब्द नहीं है, पर अनुच्छेद 13 (मौलिक अधिकारों से असंगत कानून शून्य), 32 और 226 इसके आधार हैं।

न्यायपालिका और संसद का टकराव

स्वतंत्रता के बाद संपत्ति के अधिकार और संसद की संशोधन शक्ति पर दोनों में टकराव हुआ। केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल ढाँचे का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) दिया — संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, पर उसकी मूल संरचना (जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, न्यायिक पुनरावलोकन, मौलिक अधिकारों का सार) नहीं बदल सकती। यह संतुलन आज भी संसद और न्यायपालिका के संबंधों का आधार है।

सर्वोच्च उच्च न्यायालय ज़िला न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय निर्णय नीचे तक बाध्यकारी अपील ऊपर की ओर
एकीकृत न्यायिक संरचना (विचार-चित्र)।

8. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली

शब्दअर्थ
न्यायिक स्वतंत्रतान्यायपालिका का अन्य अंगों के दबाव से मुक्त होना
कॉलेजियमCJI और वरिष्ठ न्यायाधीशों का समूह जो नियुक्ति की सिफ़ारिश करता है
NJACराष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग — 2015 में रद्द
न्यायालय की अवमाननान्यायालय के आदेश या गरिमा का अपमान — दंडनीय
एकीकृत न्यायपालिकापूरे देश के लिए एक ही न्यायिक पिरामिड
मौलिक क्षेत्राधिकारमामला सीधे सर्वोच्च न्यायालय में शुरू होना
विशेष अनुमति याचिकाअनुच्छेद 136 के तहत अपील की अनुमति
सलाहकारी क्षेत्राधिकारअनुच्छेद 143 — राष्ट्रपति को सलाह
जनहित याचिका (PIL)जनहित में किसी और द्वारा दायर याचिका
न्यायिक पुनरावलोकनकानूनों की संवैधानिकता की जाँच
मूल ढाँचासंविधान की वह संरचना जिसे संशोधन से नहीं बदला जा सकता

9. मास्टर सारांश तालिका

पक्षसर्वोच्च न्यायालयउच्च न्यायालय
सेवानिवृत्ति आयु65 वर्ष62 वर्ष
रिटअनुच्छेद 32 (केवल मौलिक अधिकार)अनुच्छेद 226 (मौलिक और अन्य कानूनी अधिकार)
नियुक्तिराष्ट्रपति, कॉलेजियम की सिफ़ारिश परराष्ट्रपति, कॉलेजियम की सिफ़ारिश पर
हटानासंसद का विशेष बहुमतसंसद का विशेष बहुमत
निर्णय बाध्यकारीपूरे देश मेंअपने क्षेत्र के अधीनस्थ न्यायालयों पर

चार्ट — सेवानिवृत्ति आयु (वर्ष):

सर्वोच्च न्यायालय65
उच्च न्यायालय62

10. माइंड मैप

न्यायपालिका
स्वतंत्रता
  • नियुक्ति, कार्यकाल
  • वेतन, अवमानना
नियुक्ति
  • कॉलेजियम
  • NJAC रद्द (2015)
संरचना
  • एकीकृत पिरामिड
  • SC, HC, ज़िला
क्षेत्राधिकार
  • मौलिक, रिट, अपील
  • सलाह (143)
सक्रियता
  • PIL, हुसैनारा
  • मूल ढाँचा

11. टिप्स और ट्रिक्स

याद रखने के सूत्र
  • अनुच्छेद: 32 SC रिट, 131 मौलिक, 136 विशेष अनुमति, 143 सलाह, 226 HC रिट।
  • आयु: "SC-65, HC-62"।
  • मूल ढाँचा = केशवानंद 1973; NJAC रद्द = 2015।
आम गलतियाँ
  • उच्च न्यायालय की रिट-शक्ति सर्वोच्च न्यायालय से व्यापक है — वह अन्य कानूनी अधिकारों के लिए भी रिट दे सकता है।
  • सलाहकारी क्षेत्राधिकार में दी गई सलाह सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं है।
  • "न्यायिक पुनरावलोकन" शब्द संविधान में लिखा नहीं है; यह अनुच्छेद 13, 32, 226 से निकलता है।

12. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर

  • भारत में एकीकृत न्यायपालिका है।
  • सर्वोच्च न्यायालय में अधिकतम 34 न्यायाधीश हो सकते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं।
  • न्यायाधीशों के वेतन संचित निधि पर भारित हैं।
  • NJAC को 2015 में असंवैधानिक घोषित किया गया।
  • केंद्र-राज्य विवाद सर्वोच्च न्यायालय के मौलिक क्षेत्राधिकार में हैं।
  • अनुच्छेद 143 सलाहकारी क्षेत्राधिकार देता है।
  • जनहित याचिका 1970 के दशक के अंत से विकसित हुई।
  • हुसैनारा ख़ातून मामला विचाराधीन कैदियों से संबंधित था।
  • मूल ढाँचे का सिद्धांत केशवानंद भारती मामले (1973) से आया।
  • सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय की समीक्षा कर सकता है।

13. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)

प्र1आसान

केंद्र और राज्य के बीच विवाद सर्वोच्च न्यायालय के किस क्षेत्राधिकार में आते हैं?

  1. अपीलीय
  2. सलाहकारी
  3. मौलिक
  4. रिट
उत्तर देखें

अनुच्छेद 131 के तहत ऐसे विवाद सीधे सर्वोच्च न्यायालय में शुरू होते हैं — यह मौलिक क्षेत्राधिकार है।

उत्तर: (ग) मौलिक

प्र2आसान

मूल ढाँचे का सिद्धांत किस मामले से संबंधित है?

  1. गोलकनाथ
  2. केशवानंद भारती
  3. हुसैनारा ख़ातून
  4. मिनर्वा मिल्स
उत्तर देखें

केशवानंद भारती (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान का मूल ढाँचा नहीं बदल सकती। मिनर्वा मिल्स ने इसे आगे बढ़ाया; हुसैनारा PIL से जुड़ा है।

उत्तर: (ख) केशवानंद भारती

प्र3आसान

जनहित याचिका (PIL) क्या है?

उत्तर देखें

ऐसी याचिका जिसे कोई व्यक्ति या संगठन जनहित में, उन लोगों की ओर से दायर करता है जो स्वयं न्यायालय नहीं जा सकते — जैसे गरीब, बंदी या बंधुआ मज़दूर।

उत्तर: जनहित में किसी अन्य द्वारा दायर याचिका

प्र4मध्यम

न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने वाले चार प्रावधान बताइए।

उत्तर देखें

(1) नियुक्ति में न्यायपालिका की निर्णायक भूमिका (कॉलेजियम); (2) सेवानिवृत्ति तक सुरक्षित कार्यकाल और कठिन हटाने की प्रक्रिया; (3) वेतन-भत्ते संचित निधि पर भारित, कार्यकाल में घटाए नहीं जा सकते; (4) न्यायाधीशों के आचरण पर संसद में चर्चा पर रोक और अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति।

उत्तर: नियुक्ति, कार्यकाल, वित्तीय सुरक्षा, आलोचना से संरक्षण

प्र5मध्यम

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को कैसे हटाया जाता है?

उत्तर देखें

केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर। संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वालों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए; तब राष्ट्रपति आदेश जारी करते हैं। यह प्रक्रिया इतनी कठिन है कि अब तक कोई SC न्यायाधीश इससे हटाया नहीं गया।

उत्तर: कदाचार/अक्षमता पर संसद के विशेष बहुमत से

प्र6मध्यम

सर्वोच्च न्यायालय का सलाहकारी क्षेत्राधिकार क्या है? इसकी उपयोगिता बताइए।

उत्तर देखें

अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति किसी कानूनी या सार्वजनिक महत्त्व के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से सलाह माँग सकते हैं। न्यायालय सलाह देने के लिए बाध्य नहीं और सरकार उसे मानने के लिए बाध्य नहीं। उपयोगिता: सरकार किसी विवादास्पद कदम से पहले उसकी कानूनी स्थिति जान सकती है और बाद के मुकदमों से बच सकती है।

उत्तर: अनुच्छेद 143 — पहले से कानूनी स्थिति जानने का साधन

प्र7मध्यम

भारत की न्यायपालिका को "एकीकृत" क्यों कहा जाता है?

उत्तर देखें

क्योंकि पूरे देश में न्यायालयों का एक ही पिरामिड है — शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय, फिर उच्च न्यायालय, ज़िला और अधीनस्थ न्यायालय। केंद्र और राज्य के अलग न्यायालय नहीं हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय सभी पर बाध्यकारी हैं और अपील नीचे से ऊपर जाती है।

उत्तर: पूरे देश के लिए एक ही न्यायिक पदानुक्रम

प्र8कठिन

न्यायिक सक्रियता के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों की चर्चा कीजिए।

उत्तर देखें

सकारात्मक: गरीबों और वंचितों को न्याय मिला (हुसैनारा, बंधुआ मज़दूरी), पर्यावरण और मानवाधिकारों की रक्षा हुई, सरकारें अधिक जवाबदेह बनीं, लोकतंत्र अधिक सहभागी बना। नकारात्मक: न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ बढ़ा; न्यायपालिका ने कई बार नीति-निर्माण और प्रशासन जैसे कार्यपालिका के कार्य किए, जिससे शक्तियों का संतुलन बिगड़ने का ख़तरा है; निर्णयों को लागू करना भी कठिन रहा।

उत्तर: न्याय की पहुँच बढ़ी, पर शक्तियों के संतुलन और बोझ की समस्या

प्र9कठिन

न्यायाधीशों की नियुक्ति में कॉलेजियम प्रणाली का विकास और विवाद समझाइए।

उत्तर देखें

संविधान के अनुसार राष्ट्रपति न्यायाधीशों से "परामर्श" के बाद नियुक्ति करते हैं। 1993 और 1998 के निर्णयों में न्यायालय ने परामर्श को "सहमति" माना और कॉलेजियम (CJI + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश) की सिफ़ारिश को निर्णायक बनाया। 2014 में संसद ने NJAC बनाया जिसमें सरकार की भूमिका थी, पर 2015 में न्यायालय ने इसे न्यायिक स्वतंत्रता (मूल ढाँचे) के विरुद्ध मानकर रद्द कर दिया। आलोचक कॉलेजियम को अपारदर्शी कहते हैं, समर्थक इसे स्वतंत्रता की गारंटी मानते हैं।

उत्तर: न्यायिक निर्णयों से विकसित; NJAC रद्द; पारदर्शिता पर बहस जारी

प्र10कठिन

न्यायिक पुनरावलोकन लोकतंत्र और संविधान की रक्षा कैसे करता है?

उत्तर देखें

विधायिका बहुमत के बल पर ऐसे कानून बना सकती है जो मौलिक अधिकारों या संघीय ढाँचे का उल्लंघन करें। न्यायिक पुनरावलोकन के द्वारा न्यायालय ऐसे कानूनों और कार्यकारी आदेशों को अवैध घोषित कर सकते हैं। इससे संविधान की सर्वोच्चता, अल्पसंख्यकों और व्यक्तियों के अधिकार, तथा केंद्र-राज्य संतुलन सुरक्षित रहता है। मूल ढाँचे का सिद्धांत संसद की संशोधन शक्ति पर भी सीमा लगाता है।

उत्तर: असंवैधानिक कानूनों को रद्द कर संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखता है

प्र11कठिन

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार की तुलना कीजिए।

उत्तर देखें

सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 के तहत केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर रिट जारी करता है, पर यह स्वयं एक मौलिक अधिकार है। उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य कानूनी अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है, इसलिए उसका रिट क्षेत्र व्यापक है; पर यह मौलिक अधिकार नहीं, विवेकाधीन है।

उत्तर: SC — केवल मौलिक अधिकार; HC — मौलिक और अन्य कानूनी अधिकार भी

14. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश

2 मिनट में दोहराएँ
  • स्वतंत्रता: नियुक्ति, सुरक्षित कार्यकाल (65/62), संचित निधि से वेतन, अवमानना की शक्ति।
  • नियुक्ति: कॉलेजियम (1993, 1998); NJAC 2015 में रद्द। हटाना: कदाचार/अक्षमता पर विशेष बहुमत।
  • एकीकृत संरचना: SC → HC → ज़िला → अधीनस्थ।
  • क्षेत्राधिकार: मौलिक (131), रिट (32, 226), अपीलीय (136), सलाह (143), पुनरावलोकन।
  • PIL और न्यायिक सक्रियता (हुसैनारा 1979); न्यायिक पुनरावलोकन; केशवानंद 1973 का मूल ढाँचा।