Class 11 Political Science · Chapter 2 · भारत का संविधान : सिद्धांत और व्यवहार

भारतीय संविधान में अधिकार

अधिकार-पत्र, मौलिक अधिकार, संवैधानिक उपचार और रिट, राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व और मौलिक कर्तव्य।

NCERT भारत का संविधान : सिद्धांत और व्यवहार + राजनीतिक सिद्धांतCBSE Class 11 12 min read

1. अध्याय एक नज़र में

लोकतंत्र में नागरिक केवल शासित (subject) नहीं होते, बल्कि अधिकारों वाले व्यक्ति होते हैं। अधिकार वे दावे हैं जिन्हें समाज और राज्य उचित मानते हैं और जिनकी रक्षा का वादा करते हैं। भारतीय संविधान के भाग III में मौलिक अधिकार (Fundamental Rights), भाग IV में राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व (DPSP) और भाग IV-क में मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties) दिए गए हैं। इस अध्याय में हम इन तीनों का अर्थ, अंतर और आपसी संबंध समझेंगे।

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • अधिकार-पत्र (Bill of Rights) का अर्थ और महत्त्व।
  • छह मौलिक अधिकार और उनके अनुच्छेद।
  • संवैधानिक उपचार का अधिकार और पाँच रिट (Writs)।
  • नीति-निर्देशक तत्त्व, मौलिक कर्तव्य और अधिकारों से उनका संबंध।

2. अधिकार-पत्र (Bill of Rights)

अधिकांश लोकतांत्रिक संविधानों में नागरिकों के अधिकारों की एक सूची होती है, जिसे अधिकार-पत्र कहते हैं। यह सरकार को इन अधिकारों का उल्लंघन करने से रोकता है और उल्लंघन होने पर उपचार (remedy) की व्यवस्था करता है। अधिकार-पत्र व्यक्ति की रक्षा केवल दूसरे व्यक्तियों से नहीं, बल्कि सरकार से भी करता है।

भारत में अधिकारों की माँग राष्ट्रीय आंदोलन से ही उठती रही — नेहरू रिपोर्ट (1928) ने अधिकारों की सूची माँगी थी। दक्षिण अफ्रीका का संविधान (1996) भी रंगभेद (apartheid) के अनुभव के बाद एक विस्तृत अधिकार-पत्र के साथ बना, जिसमें गरिमा, निजता, आवास और स्वास्थ्य जैसे अधिकार शामिल हैं।

3. मौलिक अधिकार (भाग III, अनुच्छेद 12–35)

मौलिक अधिकार इसलिए "मौलिक" हैं क्योंकि वे व्यक्ति के विकास के लिए आवश्यक हैं और संविधान द्वारा सुरक्षित हैं; साधारण कानून इन्हें नहीं छीन सकता। इन्हें न्यायालय में लागू (justiciable) कराया जा सकता है। मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे; 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा संपत्ति का अधिकार हटाकर अनुच्छेद 300-क के अंतर्गत कानूनी अधिकार बना दिया गया। अब छह मौलिक अधिकार हैं।

मौलिक अधिकारअनुच्छेदमुख्य प्रावधान
समानता का अधिकार14–18कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण (14); धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव निषेध (15); सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता (16); अस्पृश्यता का अंत (17); उपाधियों का अंत (18)
स्वतंत्रता का अधिकार19–22अनुच्छेद 19 की छह स्वतंत्रताएँ — भाषण-अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा, संगठन, देश में भ्रमण, कहीं भी बसना, कोई भी व्यवसाय; अपराध के लिए दोषसिद्धि में संरक्षण (20); प्राण और दैहिक स्वतंत्रता (21); शिक्षा का अधिकार (21-क); गिरफ़्तारी और निरोध से संरक्षण (22)
शोषण के विरुद्ध अधिकार23–24मानव तस्करी, बेगार और बंधुआ मज़दूरी पर रोक (23); 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को ख़तरनाक कामों में लगाने पर रोक (24)
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार25–28अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म को मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता; धार्मिक मामलों का प्रबंधन; सरकारी शिक्षा संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पर रोक
सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार29–30अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति बचाने तथा अपने शिक्षा संस्थान स्थापित करने का अधिकार
संवैधानिक उपचारों का अधिकार32मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे सर्वोच्च न्यायालय (और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय) जाने का अधिकार
अनुच्छेद 21 का विस्तार

सर्वोच्च न्यायालय ने "प्राण और दैहिक स्वतंत्रता" की व्याख्या बहुत व्यापक की है। इसके अंतर्गत गरिमा के साथ जीने का अधिकार, आजीविका, स्वच्छ पर्यावरण, आश्रय, त्वरित न्याय और निजता का अधिकार (2017 में नौ न्यायाधीशों की पीठ द्वारा) शामिल माने गए हैं। 86वें संशोधन (2002) ने अनुच्छेद 21-क जोड़कर 6–14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया।

निवारक नज़रबंदी (Preventive Detention): सरकार किसी व्यक्ति को इस आशंका पर हिरासत में ले सकती है कि वह कोई अपराध करने वाला है। यह स्वतंत्रता पर एक अपवाद है, इसलिए संविधान इसके लिए कुछ सुरक्षाएँ देता है, पर इसका दुरुपयोग चिंता का विषय रहा है।

4. संवैधानिक उपचार और रिट

डॉ. आंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का "हृदय और आत्मा" कहा, क्योंकि इसके बिना बाकी अधिकार केवल कागज़ पर रह जाते। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय अधिकारों की रक्षा के लिए रिट (Writs) जारी कर सकते हैं:

रिटशाब्दिक अर्थकब जारी होती है
बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)"शरीर प्रस्तुत करो"गिरफ़्तार व्यक्ति को न्यायालय में पेश करने का आदेश; गिरफ़्तारी अवैध हो तो रिहाई
परमादेश (Mandamus)"हम आदेश देते हैं"किसी अधिकारी को अपना कानूनी कर्तव्य निभाने का आदेश
प्रतिषेध (Prohibition)"रोकना"उच्च न्यायालय निचले न्यायालय को अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाने से रोकता है
उत्प्रेषण (Certiorari)"प्रमाणित करना / सूचित होना"निचले न्यायालय का मामला उच्च न्यायालय को सौंपना
अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto)"किस अधिकार से?"कोई अयोग्य व्यक्ति किसी पद पर बैठा हो, तो उसे पद पर रहने से रोकना

इसके अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की स्थापना 1993 में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत हुई। यह शिकायतों की जाँच करता है और सरकार को सिफ़ारिश करता है, पर स्वयं दंड नहीं दे सकता।

5. राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व (भाग IV, अनुच्छेद 36–51)

संविधान निर्माता जानते थे कि आज़ादी के समय सबको भोजन, शिक्षा, काम और स्वास्थ्य तुरंत देना संभव नहीं। इसलिए उन्होंने कुछ लक्ष्य सरकार के लिए निर्देश के रूप में रखे। ये न्यायालय में लागू नहीं कराए जा सकते (non-justiciable), पर शासन के लिए मौलिक हैं।

प्रकारउदाहरण
लक्ष्य और उद्देश्यलोगों का कल्याण; आजीविका के पर्याप्त साधन; संपत्ति का केंद्रीकरण रोकना; समान काम के लिए समान वेतन; अंतर्राष्ट्रीय शांति
नीतियाँसमान नागरिक संहिता (44); मद्यनिषेध; ग्राम पंचायतें (40); कुटीर उद्योग; पर्यावरण और वन्य जीवों की रक्षा (48-क)
नागरिकों के गैर-न्यायिक अधिकारकाम का अधिकार; बीमारी, बुढ़ापे में सहायता; मज़दूरों के लिए उचित वेतन

मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्त्वों में संबंध

मौलिक अधिकार सरकार पर रोक (negative) लगाते हैं, जबकि नीति-निर्देशक तत्त्व सरकार से कुछ करने (positive) की अपेक्षा रखते हैं। कभी-कभी दोनों में टकराव हुआ — जैसे भूमि सुधार और संपत्ति के अधिकार के बीच। गोलकनाथ (1967), केशवानंद भारती (1973) और मिनर्वा मिल्स (1980) जैसे मामलों के बाद न्यायालय ने माना कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों में संतुलन संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा है।

6. मौलिक कर्तव्य (भाग IV-क, अनुच्छेद 51-क)

42वें संशोधन (1976) द्वारा दस मौलिक कर्तव्य जोड़े गए; 86वें संशोधन (2002) ने ग्यारहवाँ कर्तव्य जोड़ा — माता-पिता या अभिभावक 6–14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा के अवसर दें। अन्य कर्तव्य हैं: संविधान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान; देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा; भाईचारा बढ़ाना और स्त्रियों की गरिमा का सम्मान; पर्यावरण की रक्षा; वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास; सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा। ये भी न्यायालय में सीधे लागू नहीं होते। ध्यान रहे, संविधान अधिकारों को कर्तव्यों पर निर्भर नहीं बनाता।

भाग III मौलिक अधिकार Art 12–35 न्यायालय में लागू सरकार पर रोक भाग IV नीति-निर्देशक Art 36–51 लागू नहीं सरकार को निर्देश भाग IV-क मौलिक कर्तव्य Art 51A 42वाँ संशोधन नागरिकों के लिए तीनों मिलकर कल्याणकारी लोकतंत्र का ढाँचा बनाते हैं
अधिकार, निर्देशक तत्त्व और कर्तव्य — तुलना (विचार-चित्र)।

7. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली

शब्दअर्थ
अधिकार-पत्र (Bill of Rights)संविधान में दर्ज नागरिक अधिकारों की सूची
न्याय-योग्य (Justiciable)जिसे न्यायालय में लागू कराया जा सके
रिट (Writ)न्यायालय का विशेष आदेश
बंदी प्रत्यक्षीकरणहिरासत में लिए व्यक्ति को अदालत में पेश करने की रिट
निवारक नज़रबंदीअपराध की आशंका पर पहले से हिरासत
अस्पृश्यता (Untouchability)जाति आधारित छुआछूत — अनुच्छेद 17 से समाप्त
नीति-निर्देशक तत्त्व (DPSP)सरकार के लिए कल्याणकारी लक्ष्य, गैर-न्यायिक
मौलिक कर्तव्यनागरिकों के नैतिक-संवैधानिक दायित्व
NHRCराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (1993)
अनुच्छेद 300-कसंपत्ति का कानूनी (मौलिक नहीं) अधिकार

8. मास्टर सारांश तालिका

पक्षमौलिक अधिकारनीति-निर्देशक तत्त्वमौलिक कर्तव्य
भागIIIIVIV-क
न्यायालय में लागूहाँनहींनहीं (सीधे)
किसके लिएनागरिक/व्यक्ति के अधिकारसरकार के लिए निर्देशनागरिकों के दायित्व
प्रकृतिसरकार पर सीमासरकार से अपेक्षानागरिक से अपेक्षा
स्रोत-प्रेरणाअमेरिकाआयरलैंडपूर्व सोवियत संघ

चार्ट — प्रत्येक मौलिक अधिकार में अनुच्छेदों की संख्या:

समानता (14–18)5
स्वतंत्रता (19–22)4
धार्मिक स्वतंत्रता (25–28)4
शोषण के विरुद्ध (23–24)2
सांस्कृतिक-शैक्षिक (29–30)2
संवैधानिक उपचार (32)1

9. माइंड मैप

संविधान में अधिकार
मौलिक अधिकार
  • छह अधिकार
  • Art 12–35
उपचार
  • Art 32, 226
  • पाँच रिट
DPSP
  • Art 36–51
  • गैर-न्यायिक
कर्तव्य
  • Art 51A
  • 42वाँ, 86वाँ संशोधन
मामले
  • गोलकनाथ, केशवानंद
  • मिनर्वा मिल्स

10. टिप्स और ट्रिक्स

याद रखने के सूत्र
  • अनुच्छेद क्रम: 14-18 समानता, 19-22 स्वतंत्रता, 23-24 शोषण, 25-28 धर्म, 29-30 संस्कृति, 32 उपचार।
  • पाँच रिट "बं-प-प्र-उ-अ": बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार-पृच्छा।
  • संपत्ति का अधिकार: 44वाँ संशोधन → अनुच्छेद 300-क।
आम गलतियाँ
  • संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं, केवल कानूनी अधिकार है।
  • प्रतिषेध और उत्प्रेषण न्यायालयों के विरुद्ध जारी होते हैं, व्यक्तियों के विरुद्ध नहीं।
  • NHRC दंड नहीं दे सकता; वह केवल जाँच और सिफ़ारिश करता है।

11. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर

  • मौलिक अधिकार संविधान के भाग III में हैं।
  • अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है।
  • अनुच्छेद 19 छह स्वतंत्रताएँ देता है।
  • अनुच्छेद 21-क शिक्षा का अधिकार देता है।
  • आंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का हृदय और आत्मा कहा।
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण का अर्थ है "शरीर प्रस्तुत करो"।
  • नीति-निर्देशक तत्त्व न्यायालय में लागू नहीं होते।
  • समान नागरिक संहिता अनुच्छेद 44 में है।
  • मौलिक कर्तव्य 42वें संशोधन (1976) से जुड़े।
  • वर्तमान में 11 मौलिक कर्तव्य हैं।
  • NHRC की स्थापना 1993 में हुई।

12. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)

प्र1आसान

किस संशोधन ने संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों से हटाया?

  1. 42वाँ
  2. 44वाँ
  3. 73वाँ
  4. 86वाँ
उत्तर देखें

44वें संशोधन (1978) ने संपत्ति के अधिकार को भाग III से हटाकर अनुच्छेद 300-क में कानूनी अधिकार बनाया। 42वें ने मौलिक कर्तव्य जोड़े, 73वें ने पंचायतें और 86वें ने शिक्षा का अधिकार।

उत्तर: (ख) 44वाँ

प्र2आसान

किसी अयोग्य व्यक्ति को सार्वजनिक पद से हटाने के लिए कौन-सी रिट जारी होती है?

  1. परमादेश
  2. अधिकार-पृच्छा
  3. प्रतिषेध
  4. बंदी प्रत्यक्षीकरण
उत्तर देखें

अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) पूछती है — "किस अधिकार से आप इस पद पर हैं?" अयोग्य होने पर व्यक्ति पद पर नहीं रह सकता।

उत्तर: (ख) अधिकार-पृच्छा

प्र3आसान

अधिकार-पत्र (Bill of Rights) किससे व्यक्ति की रक्षा करता है?

उत्तर देखें

यह दूसरे व्यक्तियों के साथ-साथ सरकार से भी व्यक्ति की रक्षा करता है — सरकार उसके अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकती और उल्लंघन पर उपचार मिलता है।

उत्तर: सरकार और अन्य व्यक्तियों दोनों से

प्र4मध्यम

समानता के अधिकार के अंतर्गत आने वाले प्रावधान बताइए।

उत्तर देखें

अनुच्छेद 14 — कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण; 15 — धर्म, जाति, लिंग, नस्ल, जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव निषेध; 16 — सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता; 17 — अस्पृश्यता का अंत; 18 — उपाधियों (सैनिक और शैक्षिक को छोड़कर) का अंत।

उत्तर: अनुच्छेद 14 से 18

प्र5मध्यम

आंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का "हृदय और आत्मा" क्यों कहा?

उत्तर देखें

क्योंकि यह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। न्यायालय रिट जारी कर अधिकार लागू कराता है। इस उपचार के बिना बाकी अधिकार प्रभावहीन होते — इसलिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण है।

उत्तर: यह अन्य सभी अधिकारों को लागू कराने का साधन है

प्र6मध्यम

मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्त्वों में तीन अंतर लिखिए।

उत्तर देखें

(1) मौलिक अधिकार न्यायालय में लागू हैं; निर्देशक तत्त्व नहीं। (2) अधिकार सरकार पर रोक लगाते हैं (नकारात्मक); निर्देशक तत्त्व सरकार से सकारात्मक कदम चाहते हैं। (3) अधिकार व्यक्ति के लिए हैं; निर्देशक तत्त्व पूरे समाज के कल्याण के लक्ष्य हैं।

उत्तर: न्याय-योग्यता, प्रकृति और उद्देश्य में अंतर

प्र7मध्यम

अनुच्छेद 21 का दायरा न्यायालयों ने कैसे बढ़ाया है? उदाहरण दीजिए।

उत्तर देखें

"प्राण और दैहिक स्वतंत्रता" को केवल जीवित रहने तक सीमित न मानकर गरिमापूर्ण जीवन माना गया। इसके अंतर्गत आजीविका, आश्रय, स्वच्छ पर्यावरण, स्वास्थ्य, त्वरित न्याय और निजता (2017) जैसे अधिकार शामिल किए गए।

उत्तर: गरिमा, आजीविका, पर्यावरण, निजता आदि जोड़कर

प्र8कठिन

नीति-निर्देशक तत्त्व न्यायालय में लागू नहीं होते, फिर भी वे महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?

उत्तर देखें

वे सरकार के लिए नैतिक और राजनीतिक दिशा-निर्देश हैं। चुनावों में जनता सरकारों को इन्हीं के आधार पर परखती है। कई कानून इन्हीं से निकले — पंचायती राज, न्यूनतम मज़दूरी, शिक्षा का अधिकार, वन्य जीव संरक्षण। न्यायालय भी कानूनों की व्याख्या करते समय इन्हें ध्यान में रखते हैं। ये कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य स्पष्ट करते हैं।

उत्तर: शासन की नैतिक दिशा, कानूनों के स्रोत और जनमत की कसौटी

प्र9कठिन

अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार लोकतंत्र के लिए क्यों आवश्यक हैं?

उत्तर देखें

लोकतंत्र में बहुमत की संस्कृति हावी हो सकती है। अनुच्छेद 29–30 धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति बचाने तथा अपने शिक्षा संस्थान चलाने का अधिकार देते हैं। इससे वे बिना भय के अपनी पहचान बनाए रख सकते हैं और राष्ट्र की विविधता सुरक्षित रहती है।

उत्तर: बहुमत के प्रभुत्व से पहचान और विविधता की रक्षा

प्र10कठिन

मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्त्वों के बीच टकराव का समाधान कैसे हुआ?

उत्तर देखें

भूमि सुधार जैसे कानून (DPSP) संपत्ति के अधिकार से टकराए। गोलकनाथ (1967) में न्यायालय ने कहा कि संसद मौलिक अधिकार नहीं घटा सकती। केशवानंद भारती (1973) में संसद को संशोधन की शक्ति मानी गई, पर मूल ढाँचा बदलने की नहीं। मिनर्वा मिल्स (1980) में कहा गया कि अधिकार और निर्देशक तत्त्वों का संतुलन ही मूल ढाँचा है। संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों से हटाना (1978) भी इसका हल बना।

उत्तर: न्यायिक निर्णयों और 44वें संशोधन से — दोनों पूरक माने गए

प्र11कठिन

निवारक नज़रबंदी को स्वतंत्रता के अधिकार पर एक अपवाद क्यों माना जाता है?

उत्तर देखें

सामान्यतः किसी को अपराध करने के बाद ही दंड मिलता है, पर निवारक नज़रबंदी में अपराध की आशंका पर ही व्यक्ति को हिरासत में लिया जा सकता है। इसलिए यह स्वतंत्रता को सीमित करती है। संविधान (अनुच्छेद 22) कुछ सुरक्षाएँ देता है — जैसे निश्चित अवधि के बाद सलाहकार बोर्ड द्वारा समीक्षा — फिर भी दुरुपयोग की आशंका रहती है।

उत्तर: अपराध से पहले ही स्वतंत्रता छीनी जा सकती है

13. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश

2 मिनट में दोहराएँ
  • अधिकार-पत्र सरकार से भी रक्षा करता है; प्रेरणा नेहरू रिपोर्ट 1928।
  • छह मौलिक अधिकार: समानता (14-18), स्वतंत्रता (19-22), शोषण विरोध (23-24), धर्म (25-28), संस्कृति-शिक्षा (29-30), उपचार (32)।
  • संपत्ति: 44वाँ संशोधन → 300-क; शिक्षा: 86वाँ → 21-क; निजता: 2017।
  • पाँच रिट; NHRC 1993।
  • DPSP (36-51) गैर-न्यायिक पर मौलिक; टकराव पर गोलकनाथ, केशवानंद, मिनर्वा मिल्स।
  • मौलिक कर्तव्य (51-क): 42वाँ संशोधन, अब 11।