Class 12 Economics · Chapter 4 · समष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

आय और रोज़गार के निर्धारण

समग्र माँग, उपभोग फलन, MPC और MPS, निवेश, संतुलन आय, निवेश गुणक और मितव्ययिता का विरोधाभास।

NCERT व्यष्टि अर्थशास्त्र + समष्टि अर्थशास्त्रCBSE Class 12 17 min read

1. अध्याय एक नज़र में

किसी देश में एक वर्ष में कितना उत्पादन होगा और कितने लोगों को रोज़गार मिलेगा — यह किस पर निर्भर करता है? प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के अनुसार अर्थव्यवस्था अपने आप पूर्ण रोज़गार पर पहुँच जाती है। पर कीन्स ने दिखाया कि अल्पकाल में उत्पादन और रोज़गार का स्तर मुख्यतः इस पर निर्भर करता है कि अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं पर कुल कितना खर्च करने की योजना है — अर्थात समग्र माँग (Aggregate Demand)।

इस अध्याय में हम कीन्स के सरल मॉडल का अध्ययन करेंगे — इसमें कीमतें स्थिर मानी जाती हैं और उत्पादन पूरी तरह माँग से निर्धारित होता है। हम उपभोग फलन, बचत फलन, निवेश, संतुलन आय का निर्धारण, निवेश गुणक, और अधिमाँग तथा अभावी माँग की समस्याओं को समझेंगे।

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • समग्र माँग और समग्र पूर्ति; प्रत्याशित (Ex-ante) और यथार्थ (Ex-post)।
  • उपभोग फलन: C = C̄ + cY; MPC और APC।
  • बचत फलन: MPS और APS; MPC + MPS = 1।
  • संतुलन आय: AD = AS या S = I।
  • निवेश गुणक: k = 1/(1 − MPC); मितव्ययिता का विरोधाभास।
  • पूर्ण रोज़गार, अधिमाँग और अभावी माँग; सुधार के उपाय।

2. मूल अवधारणाएँ और मान्यताएँ

मान्यताएँ (सरल कीन्सियन मॉडल)

  • द्वि-क्षेत्रक अर्थव्यवस्था — केवल परिवार और फर्में (सरकार और विदेशी क्षेत्र नहीं)।
  • अल्पकाल — कीमत स्तर स्थिर; फर्में बाज़ार कीमत पर जितनी माँग हो, उतना उत्पादन करने को तैयार।
  • निवेश स्वायत्त (Autonomous) है — आय से स्वतंत्र, स्थिर।
  • अर्थव्यवस्था में अप्रयुक्त संसाधन हैं — इसलिए माँग बढ़ने पर उत्पादन बढ़ सकता है।

प्रत्याशित और यथार्थ (Ex-ante और Ex-post)

प्रत्याशित / नियोजित (Ex-ante)यथार्थ / वास्तविक (Ex-post)
किसी अवधि की शुरुआत में लोगों द्वारा योजना बनाई गई मात्रा — नियोजित उपभोग, नियोजित निवेशअवधि के अंत में वास्तव में हुई मात्रा
उदाहरण: फर्म ने ₹100 करोड़ का निवेश करने की योजना बनाईबिक्री कम होने से माल-सूची ₹20 करोड़ बढ़ी — वास्तविक निवेश ₹120 करोड़

संतुलन का निर्धारण प्रत्याशित (नियोजित) मानों से होता है। यथार्थ रूप में बचत और निवेश सदैव बराबर होते हैं (माल-सूची के अनियोजित परिवर्तन के कारण), पर संतुलन तभी है जब नियोजित बचत = नियोजित निवेश।

परिभाषाएँ
  • समग्र माँग (AD): किसी अवधि में अर्थव्यवस्था में अंतिम वस्तुओं और सेवाओं पर कुल नियोजित व्यय। द्वि-क्षेत्रक में AD = C + I।
  • समग्र पूर्ति (AS): अर्थव्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं-सेवाओं का कुल मूल्य — जो राष्ट्रीय आय (Y) के बराबर है। आय या तो उपभोग होती है या बचत: AS = Y = C + S।

4. उपभोग फलन (Consumption Function)

कीन्स ने कहा कि आय बढ़ने पर लोग उपभोग बढ़ाते हैं, पर उतना नहीं जितनी आय बढ़ती है। उपभोग और आय के इस संबंध को उपभोग फलन कहते हैं:

C = C̄ + cY   (C̄ = स्वायत्त उपभोग, c = MPC, 0 < c < 1)
  • स्वायत्त उपभोग (C̄): शून्य आय पर भी होने वाला उपभोग — जीवित रहने के लिए आवश्यक (पिछली बचत या उधार से)।
  • सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC = c): आय में एक इकाई परिवर्तन से उपभोग में होने वाला परिवर्तन। MPC = ΔC ÷ ΔY। इसका मान 0 और 1 के बीच होता है।
  • औसत उपभोग प्रवृत्ति (APC): APC = C ÷ Y — आय का कितना भाग उपभोग पर खर्च हुआ। निम्न आय पर APC > 1 हो सकती है (जब C̄ के कारण उपभोग आय से अधिक हो); आय बढ़ने पर APC घटती है।

5. बचत फलन (Saving Function)

आय का जो भाग उपभोग नहीं होता, वह बचत है: S = Y − C। उपभोग फलन रखने पर:

S = Y − (C̄ + cY) = −C̄ + (1 − c)Y
  • सीमांत बचत प्रवृत्ति (MPS): ΔS ÷ ΔY = 1 − c।
  • औसत बचत प्रवृत्ति (APS): S ÷ Y।
MPC + MPS = 1   |   APC + APS = 1

(क्योंकि आय का हर अतिरिक्त रुपया या तो उपभोग होगा या बचत।)

उदाहरण (अभ्यास हेतु काल्पनिक आँकड़े; ₹ करोड़)

C = 100 + 0.8Y। आय 0, 500, 1000 पर:

YC = 100 + 0.8YS = Y − CAPCAPS
0100−100——
50050001.00
10009001000.90.1

MPC = 0.8 और MPS = 0.2 सभी स्तरों पर स्थिर हैं; APC घट रही है। Y = 500 पर C = Y — इसे समविच्छेद बिंदु (Break-even Point) कहते हैं, जहाँ बचत शून्य है।

उपभोग को प्रभावित करने वाले अन्य कारक

उपभोग फलन में आय को मुख्य कारक माना गया है, पर वास्तविक जीवन में उपभोग कई अन्य बातों से भी प्रभावित होता है। इन कारकों में परिवर्तन से पूरा उपभोग फलन ऊपर या नीचे खिसक जाता है (अर्थात C̄ बदल जाता है):

  • संपत्ति (Wealth): जिन परिवारों के पास मकान, ज़मीन या बचत अधिक है, वे समान आय पर भी अधिक उपभोग करते हैं।
  • ऋण की उपलब्धता और ब्याज दर: आसान और सस्ता ऋण टिकाऊ वस्तुओं (मोटरसाइकिल, फ़्रिज) की खरीद बढ़ाता है।
  • भविष्य की आशाएँ: यदि लोगों को भविष्य में नौकरी जाने या आय घटने का डर हो, तो वे आज कम खर्च करके अधिक बचत करते हैं।
  • आय का वितरण: गरीब परिवारों की MPC प्रायः अमीर परिवारों से अधिक होती है — वे अतिरिक्त आय का बड़ा भाग आवश्यकताओं पर खर्च करते हैं। इसलिए आय का अधिक समान वितरण कुल उपभोग बढ़ा सकता है।
  • सामाजिक रीति-रिवाज और जनसंख्या की आयु-संरचना भी उपभोग प्रतिरूप को प्रभावित करते हैं।

6. निवेश (Investment)

निवेश का अर्थ है उत्पादक पूँजी के भंडार में वृद्धि — नई मशीनें, भवन, औज़ार, और माल-सूची में वृद्धि। (शेयर खरीदना वित्तीय निवेश है, आर्थिक निवेश नहीं।) निवेश के निर्णय ब्याज दर, भविष्य के लाभ की आशा, तकनीक आदि पर निर्भर करते हैं। इस मॉडल में हम निवेश को स्वायत्त — आय से स्वतंत्र, स्थिर — मानते हैं: I = Ī।

वास्तविक जीवन में निवेश समग्र माँग का सबसे अस्थिर घटक है। जब व्यवसायी भविष्य को लेकर आशावादी होते हैं — जैसे उन्हें बिक्री बढ़ने की आशा हो — तो वे नए कारखाने और मशीनों पर अधिक खर्च करते हैं; निराशा के समय निवेश तेज़ी से गिरता है। कीन्स ने व्यवसायियों की इस मनोदशा को "पशु-प्रवृत्ति" (Animal Spirits) कहा था। ब्याज दर भी महत्वपूर्ण है: ऊँची ब्याज दर पर उधार लेकर निवेश करना महँगा होता है, इसलिए निवेश घटता है। नई तकनीक, सरकारी नीतियाँ, कर-छूट और आधारिक संरचना की उपलब्धता भी निवेश के निर्णयों को प्रभावित करती हैं। निवेश में उतार-चढ़ाव गुणक के माध्यम से आय और रोज़गार में कई गुना बड़े उतार-चढ़ाव पैदा कर सकता है — यही व्यापार चक्रों का एक प्रमुख कारण माना जाता है।

7. संतुलन आय का निर्धारण

संतुलन वहाँ होता है जहाँ नियोजित व्यय, उत्पादन के बराबर हो:

AD = AS  ⇒  C̄ + cY + Ī = Y  ⇒  Y* = (C̄ + Ī) ÷ (1 − c)

वैकल्पिक दृष्टिकोण: नियोजित बचत = नियोजित निवेश (S = I)।

हल किया गया उदाहरण (काल्पनिक)

C = 100 + 0.8Y, I = 50। संतुलन आय: Y = (100 + 50)/(1 − 0.8) = 150/0.2 = 750।

जाँच: C = 100 + 0.8 × 750 = 700; AD = 700 + 50 = 750 = Y ✓। S = 750 − 700 = 50 = I ✓।

आय (Y) → AD, AS AS (45°) AD = C + I C E 750 150 100
45° रेखा पर हर बिंदु पर व्यय = आय। AD रेखा इसे बिंदु E (Y = 750) पर काटती है — यही संतुलन आय है। AD और C रेखाओं के बीच की ऊर्ध्वाधर दूरी निवेश (I = 50) है।

संतुलन की ओर समायोजन

  • Y संतुलन से कम (जैसे 600): AD = 100 + 480 + 50 = 630 > 600 — नियोजित व्यय उत्पादन से अधिक; माल-सूची अनियोजित रूप से घटती है; फर्में उत्पादन बढ़ाती हैं → Y बढ़ता है।
  • Y संतुलन से अधिक (जैसे 900): AD = 100 + 720 + 50 = 870 < 900 — बिना बिका माल; माल-सूची अनियोजित रूप से बढ़ती है; फर्में उत्पादन घटाती हैं → Y घटता है।

8. निवेश गुणक (Investment Multiplier)

यदि निवेश ₹20 करोड़ बढ़े, तो संतुलन आय कितनी बढ़ेगी? उत्तर है — ₹20 करोड़ से कहीं अधिक। क्योंकि निवेश पर किया गया व्यय किसी की आय बनता है; वह उसका एक भाग (MPC) उपभोग पर खर्च करता है, जो किसी और की आय बनता है; और यह श्रृंखला चलती रहती है।

गुणक k = ΔY ÷ ΔI = 1 ÷ (1 − MPC) = 1 ÷ MPS
उदाहरण (MPC = 0.8; काल्पनिक)

k = 1/(1 − 0.8) = 5। ΔI = 20 → ΔY = 20 × 5 = 100। नया संतुलन: (100 + 70)/0.2 = 850 = 750 + 100 ✓।

चक्रआय में वृद्धि (ΔY)उपभोग में वृद्धि (0.8 × ΔY)
1 (निवेश)2016
21612.8
312.810.24
………
योग10080
  • MPC जितनी अधिक, गुणक उतना अधिक (MPC = 0.9 → k = 10; MPC = 0.5 → k = 2)।
  • गुणक की न्यूनतम सीमा 1 (MPC = 0) है; MPC = 1 पर सैद्धांतिक रूप से अनंत।
  • गुणक दोनों दिशाओं में काम करता है — निवेश घटने पर आय गुणक गुना घटती है (उलटा गुणक)।

मितव्ययिता का विरोधाभास (Paradox of Thrift)

यदि सभी लोग बचत बढ़ाना चाहें (MPS बढ़े, MPC घटे), तो उपभोग घटेगा, समग्र माँग घटेगी, और गुणक प्रक्रिया से आय घटेगी। चूँकि संतुलन पर S = I और निवेश स्थिर है, कुल बचत अंततः वही रहती है — पर आय कम हो जाती है। उदाहरण (काल्पनिक): C = 100 + 0.8Y, I = 50 → Y = 750, S = 50। यदि MPC 0.75 हो जाए: Y = 150/0.25 = 600, S = 600 − (100 + 450) = 50 — बचत वही, आय 150 घटी।

9. पूर्ण रोज़गार, अधिमाँग और अभावी माँग

पूर्ण रोज़गार (Full Employment) वह स्थिति है जिसमें प्रचलित मज़दूरी पर काम करने के इच्छुक सभी लोगों को काम मिल जाता है। कीन्स के अनुसार संतुलन आय पूर्ण रोज़गार से कम भी हो सकती है।

आधारअभावी माँग (Deficient Demand)अधिमाँग (Excess Demand)
अर्थपूर्ण रोज़गार स्तर पर AD, AS से कमपूर्ण रोज़गार स्तर पर AD, AS से अधिक
अंतरालअवस्फीतिक अंतराल (Deflationary Gap)स्फीतिक अंतराल (Inflationary Gap)
प्रभावउत्पादन और रोज़गार घटते हैं — अनैच्छिक बेरोज़गारी; कीमतें गिरने की प्रवृत्तिउत्पादन और नहीं बढ़ सकता (पूर्ण रोज़गार), इसलिए कीमतें बढ़ती हैं — मुद्रास्फीति
राजकोषीय उपायसरकारी व्यय बढ़ाना, कर घटानासरकारी व्यय घटाना, कर बढ़ाना
मौद्रिक उपायCRR, रेपो दर घटाना; प्रतिभूतियाँ खरीदना; मार्जिन घटानाCRR, रेपो दर बढ़ाना; प्रतिभूतियाँ बेचना; मार्जिन बढ़ाना
उदाहरण (काल्पनिक)

पूर्ण रोज़गार आय = 1,000 करोड़। C = 100 + 0.8Y, I = 50। पूर्ण रोज़गार पर AD = 100 + 800 + 50 = 950 → AD, AS (1,000) से 50 कम — अवस्फीतिक अंतराल = 50। इसे भरने के लिए स्वायत्त व्यय 50 बढ़ाना होगा; गुणक (5) से आय 750 से 250 बढ़कर 1,000 हो जाएगी।

10. आय, उत्पादन और रोज़गार का संबंध

इस अध्याय का शीर्षक "आय और रोज़गार" का निर्धारण है — पर हमने अब तक मुख्यतः आय (उत्पादन) की बात की। दोनों का संबंध सीधा है: अल्पकाल में पूँजी और तकनीक लगभग स्थिर रहते हैं, इसलिए अधिक उत्पादन के लिए फर्मों को अधिक श्रमिक रखने पड़ते हैं। अतः जो कारक संतुलन आय बढ़ाते हैं — जैसे निवेश या सरकारी व्यय में वृद्धि — वही रोज़गार भी बढ़ाते हैं; और जो कारक समग्र माँग घटाते हैं, वे रोज़गार घटाते हैं।

कीन्स के मॉडल का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष है कि अनैच्छिक बेरोज़गारी (Involuntary Unemployment) — जब लोग प्रचलित मज़दूरी पर काम करने को तैयार हों, फिर भी उन्हें काम न मिले — अपर्याप्त समग्र माँग के कारण लंबे समय तक बनी रह सकती है। ऐसी स्थिति में केवल मज़दूरी घटाने से समस्या हल नहीं होती, क्योंकि मज़दूरी घटने से श्रमिकों की आय और उपभोग भी घटेंगे, जिससे माँग और कम हो सकती है। इसलिए कीन्स ने माँग बढ़ाने के लिए सरकारी हस्तक्षेप का सुझाव दिया।

मॉडल की सीमाएँ

  • स्थिर कीमतों की मान्यता: वास्तव में माँग बढ़ने पर कीमतें भी कुछ बढ़ती हैं, विशेषकर पूर्ण रोज़गार के निकट — इससे गुणक का वास्तविक प्रभाव कम हो जाता है।
  • स्वायत्त निवेश की मान्यता: वास्तव में निवेश ब्याज दर और आय पर भी निर्भर करता है।
  • बंद अर्थव्यवस्था और सरकार का अभाव: वास्तविक अर्थव्यवस्था में कर और आयात भी रिसाव हैं, जो गुणक को छोटा करते हैं। (सरकार और विदेशी क्षेत्र को जोड़कर मॉडल का विस्तार किया जा सकता है — अगले अध्यायों में।)
  • समय-अंतराल: गुणक प्रक्रिया तुरंत नहीं होती; आय के प्रत्येक चक्र में समय लगता है।

इन सीमाओं के बावजूद यह मॉडल यह समझने में अत्यंत उपयोगी है कि मंदी के समय उत्पादन और रोज़गार क्यों गिरते हैं और सरकारी नीतियाँ उन्हें कैसे पुनर्जीवित कर सकती हैं।

11. मास्टर तालिका : सभी सूत्र

अवधारणासूत्र
उपभोग फलनC = C̄ + cY
बचत फलनS = −C̄ + (1 − c)Y
MPC, MPSΔC/ΔY, ΔS/ΔY; MPC + MPS = 1
APC, APSC/Y, S/Y; APC + APS = 1
समग्र माँगAD = C + I
संतुलन शर्तAD = AS या S = I
संतुलन आयY* = (C̄ + Ī)/(1 − c)
गुणकk = 1/(1 − MPC) = 1/MPS = ΔY/ΔI
अंतरालपूर्ण रोज़गार पर AD − AS (धनात्मक = स्फीतिक, ऋणात्मक = अवस्फीतिक)

12. मास्टर सारांश तालिका

विषयमुख्य बिंदु
सरल कीन्सियन मॉडलकीमतें स्थिर; उत्पादन माँग से निर्धारित
उपभोग-बचतMPC (0–1), APC घटती; MPC + MPS = 1
संतुलनAD = AS; S = I; माल-सूची समायोजन
गुणक1/MPS; MPC ↑ → k ↑; दोनों दिशाओं में
अंतरालअभावी माँग (बेरोज़गारी) बनाम अधिमाँग (मुद्रास्फीति)

13. माइंड मैप

आय और रोज़गार का निर्धारण
फलन
  • C = C̄ + cY
  • S = −C̄ + (1−c)Y
संतुलन
  • AD = AS
  • S = I
गुणक
  • k = 1/MPS
  • मितव्ययिता का विरोधाभास
अंतराल
  • अभावी माँग
  • अधिमाँग, उपाय

14. टिप्स और ट्रिक्स

स्मार्ट तरीके
  • संतुलन आय का शॉर्टकट: Y = (स्वायत्त व्यय) × गुणक = (C̄ + Ī) × 1/(1 − c)।
  • उत्तर की जाँच हमेशा S = I से करें।
  • गुणक के प्रश्न में MPS दी हो तो सीधे k = 1/MPS।
आम गलतियाँ
  • MPC और APC को एक समझना — सरल रेखीय उपभोग फलन में MPC स्थिर है, APC घटती है।
  • अवस्फीतिक अंतराल को "संतुलन आय और पूर्ण रोज़गार आय का अंतर" लिखना — अंतराल AD में कमी है (उदाहरण में 50), आय का अंतर (250) नहीं।
  • यथार्थ बचत-निवेश की समानता को संतुलन मान लेना।

15. महत्वपूर्ण वन-लाइनर

  • सरल कीन्सियन मॉडल में कीमतें स्थिर मानी जाती हैं।
  • MPC का मान 0 और 1 के बीच होता है।
  • MPC + MPS = 1।
  • संतुलन पर नियोजित बचत = नियोजित निवेश।
  • गुणक = 1/MPS।
  • MPC बढ़ने पर गुणक बढ़ता है।
  • अधिमाँग से मुद्रास्फीति होती है।
  • अभावी माँग से अनैच्छिक बेरोज़गारी होती है।
  • निवेश समग्र माँग का सबसे अस्थिर घटक है और व्यवसायियों की आशाओं पर बहुत निर्भर करता है।
  • गरीब परिवारों की सीमांत उपभोग प्रवृत्ति प्रायः अमीर परिवारों से अधिक होती है।
  • समविच्छेद बिंदु पर उपभोग आय के बराबर होता है और बचत शून्य होती है।
  • कर और आयात जैसे अतिरिक्त रिसाव वास्तविक अर्थव्यवस्था में गुणक का आकार छोटा कर देते हैं।
  • कीन्स के अनुसार अपर्याप्त समग्र माँग के कारण अनैच्छिक बेरोज़गारी लंबे समय तक बनी रह सकती है।
  • उलटा गुणक बताता है कि निवेश घटने पर आय उससे कई गुना अधिक घटती है।

16. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)

प्र1आसान

यदि MPC = 0.75 है, तो निवेश गुणक कितना होगा?

  1. 2
  2. 3
  3. 4
  4. 7.5
उत्तर देखें

k = 1/(1 − 0.75) = 1/0.25 = 4।

उत्तर: (ग) 4

प्र2आसान

MPS = 0.3 है। MPC ज्ञात कीजिए।

उत्तर देखें

MPC = 1 − MPS = 0.7।

उत्तर: 0.7

प्र3आसान

स्वायत्त उपभोग से क्या अभिप्राय है?

उत्तर देखें

उपभोग का वह स्तर जो आय शून्य होने पर भी होता है (उपभोग फलन में C̄) — जीवित रहने के लिए न्यूनतम उपभोग।

उत्तर: शून्य आय पर उपभोग (C̄)

प्र4मध्यम

C = 50 + 0.75Y और I = 100 (₹ करोड़; काल्पनिक)। संतुलन आय, उपभोग और बचत ज्ञात कीजिए।

उत्तर देखें

Y = (50 + 100)/(1 − 0.75) = 150/0.25 = 600। C = 50 + 450 = 500। S = 600 − 500 = 100 = I ✓।

उत्तर: Y = 600, C = 500, S = 100

प्र5मध्यम

निवेश में ₹50 करोड़ की वृद्धि से आय में ₹250 करोड़ की वृद्धि हुई। MPC ज्ञात कीजिए।

उत्तर देखें

k = ΔY/ΔI = 250/50 = 5। k = 1/(1 − MPC) → 1 − MPC = 0.2 → MPC = 0.8।

उत्तर: MPC = 0.8

प्र6मध्यम

यदि नियोजित निवेश नियोजित बचत से अधिक हो, तो अर्थव्यवस्था में क्या होगा?

उत्तर देखें

I > S का अर्थ है AD > AS — नियोजित व्यय उत्पादन से अधिक। माल-सूची अनियोजित रूप से घटेगी; फर्में उत्पादन बढ़ाएँगी; आय बढ़ेगी; आय बढ़ने से बचत बढ़ेगी, जब तक S = I न हो जाए।

उत्तर: माल-सूची घटेगी, उत्पादन और आय बढ़ेगी

प्र7मध्यम

प्रत्याशित और यथार्थ बचत-निवेश में अंतर बताइए। यथार्थ रूप में दोनों सदैव बराबर क्यों होते हैं?

उत्तर देखें

प्रत्याशित = योजना बनाई गई मात्रा (अवधि की शुरुआत में); यथार्थ = वास्तव में हुई मात्रा (अंत में)। यथार्थ रूप में बराबर क्योंकि यदि नियोजित बचत > नियोजित निवेश, तो बिना बिका माल माल-सूची में जुड़ जाता है — जो अनियोजित निवेश है; इससे वास्तविक निवेश बढ़कर बचत के बराबर हो जाता है (उलटी स्थिति में माल-सूची घटती है)।

उत्तर: अनियोजित माल-सूची परिवर्तन से यथार्थ S = I

प्र8मध्यम

APC आय बढ़ने के साथ क्यों घटती है, जबकि MPC स्थिर रह सकती है?

उत्तर देखें

C = C̄ + cY में APC = C/Y = C̄/Y + c। आय बढ़ने पर C̄/Y घटता है, इसलिए APC घटती है और c (MPC) की ओर आती है। MPC = c स्थिर है, क्योंकि हर अतिरिक्त रुपये का समान भाग उपभोग होता है।

उत्तर: APC = C̄/Y + c; C̄/Y घटता है

प्र9कठिन

निवेश गुणक की प्रक्रिया MPC = 0.6 और ΔI = ₹100 करोड़ के उदाहरण से समझाइए (पहले तीन चक्र दिखाइए)।

उत्तर देखें

k = 1/0.4 = 2.5; कुल ΔY = 250। चक्र 1: निवेश व्यय 100 → किसी की आय 100; वह 60 उपभोग पर खर्च करता है। चक्र 2: 60 किसी की आय → 36 उपभोग। चक्र 3: 36 आय → 21.6 उपभोग। श्रृंखला: 100 + 60 + 36 + 21.6 + … = 100/(1 − 0.6) = 250। प्रत्येक चक्र में आय का 40% बचत में रिसता है, इसलिए वृद्धि घटती जाती है।

उत्तर: ΔY = 250 करोड़ (100 + 60 + 36 + …)

प्र10कठिन

पूर्ण रोज़गार आय ₹2,000 करोड़ है; C = 200 + 0.75Y; I = 200 (काल्पनिक)। (क) संतुलन आय (ख) अंतराल की प्रकृति और मात्रा (ग) अंतराल दूर करने के लिए आवश्यक निवेश वृद्धि ज्ञात कीजिए।

उत्तर देखें

(क) Y = 400/0.25 = 1,600। (ख) पूर्ण रोज़गार (2,000) पर AD = 200 + 1,500 + 200 = 1,900 < 2,000 → अवस्फीतिक अंतराल = 100। (ग) k = 4; आवश्यक ΔY = 400 → ΔI = 400/4 = 100 (अंतराल के बराबर)।

उत्तर: (क) 1,600 (ख) अवस्फीतिक अंतराल 100 (ग) ΔI = 100

प्र11कठिन

स्फीतिक अंतराल क्या है? इसे दूर करने के लिए दो राजकोषीय और दो मौद्रिक उपाय बताइए।

उत्तर देखें

पूर्ण रोज़गार स्तर पर AD का AS से अधिक होना — अधिमाँग की माप। चूँकि संसाधन पूर्णतः प्रयुक्त हैं, उत्पादन नहीं बढ़ सकता, इसलिए कीमतें बढ़ती हैं। राजकोषीय: सरकारी व्यय घटाना; कर बढ़ाना। मौद्रिक: रेपो दर/बैंक दर बढ़ाना; CRR बढ़ाना; खुले बाज़ार में प्रतिभूतियाँ बेचना; मार्जिन बढ़ाना।

उत्तर: पूर्ण रोज़गार पर AD > AS; व्यय ↓, कर ↑; रेपो/CRR ↑, प्रतिभूतियाँ बेचना

प्र12कठिन

मितव्ययिता का विरोधाभास गणितीय उदाहरण से समझाइए: C = 40 + 0.8Y, I = 60; फिर MPC घटकर 0.75 हो जाती है (काल्पनिक)।

उत्तर देखें

पहले: Y = 100/0.2 = 500; S = 500 − (40 + 400) = 60 = I। बाद में: Y = 100/0.25 = 400; S = 400 − (40 + 300) = 60 = I। लोगों ने बचत की प्रवृत्ति बढ़ाई (MPS 0.2 से 0.25), पर कुल बचत 60 ही रही, जबकि आय 500 से घटकर 400 हो गई। व्यक्तिगत रूप से अधिक बचत लाभदायक है, पर सामूहिक रूप से इससे माँग और आय घटती है — यही विरोधाभास है।

उत्तर: आय 500 → 400; कुल बचत 60 ही

17. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश

2 मिनट में दोहराएँ
  • सरल कीन्सियन मॉडल: कीमतें स्थिर, उत्पादन माँग से निर्धारित; AD = C + I।
  • C = C̄ + cY; S = −C̄ + (1 − c)Y; MPC + MPS = 1; APC घटती है।
  • संतुलन: AD = AS, S = I; Y* = (C̄ + Ī)/(1 − c)।
  • गुणक k = 1/MPS; ΔY = k × ΔI; मितव्ययिता का विरोधाभास।
  • अभावी माँग → अवस्फीतिक अंतराल → बेरोज़गारी; अधिमाँग → स्फीतिक अंतराल → मुद्रास्फीति।
  • उपाय: राजकोषीय (व्यय, कर) और मौद्रिक (रेपो, CRR, OMO)।