Class 12 Economics · Chapter 3 · समष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

मुद्रा और बैंकिंग

मुद्रा के कार्य, मुद्रा की माँग और पूर्ति, साख सृजन, मुद्रा गुणक और भारतीय रिज़र्व बैंक के नीतिगत उपकरण।

NCERT व्यष्टि अर्थशास्त्र + समष्टि अर्थशास्त्रCBSE Class 12 17 min read

1. अध्याय एक नज़र में

कल्पना कीजिए कि एक किसान को जूते चाहिए और उसके पास बेचने के लिए गेहूँ है। उसे ऐसा मोची ढूँढना होगा जिसे ठीक उसी समय गेहूँ चाहिए — और यह आसान नहीं है। मुद्रा (Money) के आविष्कार ने इस समस्या को हल किया। आज हम दूध, किताबें, बस का टिकट — सब कुछ मुद्रा से खरीदते हैं, और बैंक हमारी बचत रखते हैं तथा व्यवसायों को ऋण देते हैं।

इस अध्याय में हम मुद्रा के कार्य, मुद्रा की माँग और पूर्ति, मुद्रा पूर्ति के माप, व्यावसायिक बैंकों द्वारा साख सृजन (Credit Creation) और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की भूमिका तथा मौद्रिक नीति के उपकरणों का अध्ययन करेंगे।

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • वस्तु-विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ और मुद्रा के कार्य।
  • मुद्रा की माँग: लेन-देन और सट्टा उद्देश्य।
  • मुद्रा पूर्ति: करेंसी, माँग जमाएँ, M1, M3; उच्च शक्तिशाली मुद्रा।
  • व्यावसायिक बैंकों द्वारा साख सृजन; मुद्रा गुणक।
  • केंद्रीय बैंक (RBI) के कार्य।
  • मौद्रिक नीति के उपकरण: CRR, SLR, रेपो दर, रिवर्स रेपो, बैंक दर, खुले बाज़ार की क्रियाएँ।

2. वस्तु-विनिमय से मुद्रा तक

वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) में वस्तुओं का सीधे वस्तुओं से विनिमय होता है। इसकी प्रमुख कठिनाइयाँ:

  • आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का अभाव (Lack of Double Coincidence of Wants): विनिमय तभी संभव है जब दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वस्तु ठीक उसी समय चाहिए हो — जो दुर्लभ है।
  • मूल्य के सामान्य माप का अभाव: 1 गाय = कितने किलो गेहूँ = कितने जोड़ी जूते? हर वस्तु की हर अन्य वस्तु के रूप में कीमत याद रखना असंभव।
  • अविभाज्यता (Indivisibility): गाय को आधा करके बेचना संभव नहीं।
  • मूल्य संचय की कठिनाई: अनाज, फल जैसी वस्तुएँ जल्दी नष्ट होती हैं; संपत्ति को भविष्य के लिए रखना कठिन।
  • स्थगित भुगतान की कठिनाई: ऋण वस्तुओं में लिया-दिया जाए, तो उनकी गुणवत्ता और मूल्य बदल सकते हैं।

मुद्रा के कार्य

कार्यप्रकारअर्थ
विनिमय का माध्यम (Medium of Exchange)प्राथमिकसभी लेन-देन मुद्रा के माध्यम से — दोहरे संयोग की आवश्यकता समाप्त
लेखा की इकाई / मूल्य का माप (Unit of Account)प्राथमिकसभी वस्तुओं का मूल्य एक सामान्य इकाई (₹) में व्यक्त — तुलना आसान
मूल्य का संचय (Store of Value)गौणआज की आय को भविष्य के लिए मुद्रा के रूप में रखा जा सकता है
स्थगित भुगतानों का मान (Standard of Deferred Payments)गौणऋण और भविष्य के भुगतान मुद्रा में तय किए जा सकते हैं
ध्यान दें

मुद्रा मूल्य का संचय तो है, पर पूर्ण नहीं — मुद्रास्फीति के समय मुद्रा की क्रय-शक्ति घटती है। फिर भी इसकी सबसे बड़ी विशेषता है तरलता (Liquidity) — इसे बिना किसी हानि के तुरंत किसी भी वस्तु में बदला जा सकता है।

3. मुद्रा की माँग (Demand for Money)

लोग अपनी संपत्ति का एक भाग नकद या बैंक खाते (मुद्रा) के रूप में क्यों रखते हैं, जबकि बॉन्ड या सावधि जमा में रखने पर ब्याज मिलता? इसके दो मुख्य उद्देश्य हैं:

  • लेन-देन उद्देश्य (Transaction Motive): दैनिक ख़र्चों के लिए — वेतन मिलने और ख़र्च करने के बीच के समय में मुद्रा रखनी पड़ती है। यह माँग आय के साथ बढ़ती है: अधिक आय → अधिक लेन-देन → अधिक मुद्रा की माँग। कुल अर्थव्यवस्था के स्तर पर लेन-देन माँग मौद्रिक GDP के अनुपात में मानी जाती है।
  • सट्टा उद्देश्य (Speculative Motive): लोग बॉन्ड की भविष्य की कीमतों के अनुमान के आधार पर मुद्रा रखते हैं। जब ब्याज दर बहुत ऊँची होती है, तो मुद्रा रखने की अवसर लागत (छोड़ा गया ब्याज) अधिक होती है, इसलिए लोग कम मुद्रा रखते हैं। जब ब्याज दर बहुत नीची होती है, तो लोग अधिक मुद्रा रखते हैं। अतः सट्टा माँग का ब्याज दर से ऋणात्मक संबंध है।
मुद्रा की कुल माँग = लेन-देन माँग (आय पर निर्भर) + सट्टा माँग (ब्याज दर पर ऋणात्मक रूप से निर्भर)

4. मुद्रा की पूर्ति (Supply of Money)

किसी समय-बिंदु पर अर्थव्यवस्था में जनता के पास उपलब्ध मुद्रा का कुल भंडार मुद्रा पूर्ति है — यह एक स्टॉक चर है। इसमें केवल जनता (परिवार, फर्में) के पास की मुद्रा गिनी जाती है; सरकार और बैंकों के पास रखी मुद्रा नहीं।

करेंसी और जमाएँ

  • करेंसी (Currency): सिक्के और करेंसी नोट। भारत में करेंसी नोट RBI जारी करता है और सिक्के भारत सरकार। ये वैध मुद्रा (Legal Tender) हैं — इन्हें भुगतान में स्वीकार करने से कोई मना नहीं कर सकता। ये आदेश मुद्रा (Fiat Money) हैं — इनका मूल्य किसी धातु पर नहीं, सरकार के आदेश और विश्वास पर आधारित है।
  • माँग जमाएँ (Demand Deposits): बचत और चालू खातों की जमाएँ, जिन्हें चेक, डेबिट कार्ड या डिजिटल भुगतान से कभी भी निकाला/स्थानांतरित किया जा सकता है। ये वैध मुद्रा नहीं हैं (चेक स्वीकार करने से मना किया जा सकता है), पर व्यवहार में मुद्रा का काम करती हैं।
  • सावधि जमाएँ (Time Deposits): निश्चित अवधि के लिए जमा; समय से पहले निकालने पर दंड — कम तरल।

मुद्रा पूर्ति के माप

मापसंरचनातरलता
M1 (संकीर्ण मुद्रा — Narrow Money)जनता के पास करेंसी (CU) + बैंकों में निवल माँग जमाएँ (DD) + RBI के पास अन्य जमाएँसबसे अधिक
M3 (व्यापक मुद्रा — Broad Money)M1 + व्यावसायिक बैंकों में निवल सावधि जमाएँकम

(पहले M2 और M4 मापों में डाकघर बचत जमाएँ भी शामिल थीं।) M1 सबसे तरल माप है, और M3 सबसे अधिक प्रयुक्त व्यापक माप है जिसे समग्र मौद्रिक संसाधन भी कहते हैं।

डिजिटल भुगतान और मुद्रा

UPI, डेबिट कार्ड और मोबाइल बैंकिंग से किया गया भुगतान वास्तव में बैंक खातों की माँग जमाओं का एक खाते से दूसरे खाते में हस्तांतरण है। इसलिए डिजिटल भुगतान बढ़ने से मुद्रा का स्वरूप बदलता है — लोग कम नकदी रखते हैं और अधिक लेन-देन जमाओं के माध्यम से होते हैं — पर यह M1 के ही दायरे में आता है।

उच्च शक्तिशाली मुद्रा (High-Powered Money / Reserve Money, M0)

RBI की कुल मौद्रिक देयता — जनता के पास करेंसी + बैंकों के पास नकद रिज़र्व (RBI में जमा और तिजोरी में नकद)। इसे "उच्च शक्तिशाली" इसलिए कहते हैं क्योंकि बैंक इसी आधार पर कई गुना साख (माँग जमाएँ) सृजित करते हैं।

5. व्यावसायिक बैंकों द्वारा साख सृजन

व्यावसायिक बैंक लोगों से जमाएँ स्वीकार करते हैं और ऋण देते हैं। वे जानते हैं कि सभी जमाकर्ता एक साथ पूरी राशि नहीं निकालेंगे, इसलिए वे जमा का केवल एक भाग रिज़र्व (नकद) के रूप में रखते हैं और शेष ऋण के रूप में देते हैं। ऋण लेने वाला यह राशि खर्च करता है, जो किसी अन्य के बैंक खाते में फिर जमा हो जाती है — और यह प्रक्रिया चलती रहती है। इस प्रकार बैंक प्रारंभिक जमा से कई गुना अधिक जमाएँ (साख) सृजित करते हैं।

नकद रिज़र्व अनुपात / आरक्षित अनुपात

जमाओं का वह भाग जिसे बैंकों को रिज़र्व के रूप में रखना अनिवार्य है — वैधानिक तरलता आवश्यकता (LRR), जिसमें नकद आरक्षित अनुपात (CRR) — RBI के पास नकद के रूप में — और सांविधिक तरलता अनुपात (SLR) — बैंक के पास सरकारी प्रतिभूतियों, सोने या नकद के रूप में — शामिल हैं।

मुद्रा / साख गुणक = 1 ÷ आरक्षित अनुपात (rr)   |   कुल जमाएँ = प्रारंभिक जमा × (1 ÷ rr)
उदाहरण (अभ्यास हेतु काल्पनिक आँकड़े)

प्रारंभिक जमा = ₹1,000; आरक्षित अनुपात = 20% (0.2)।

चरणजमा (₹)रिज़र्व 20% (₹)ऋण 80% (₹)
11,000200800
2800160640
3640128512
4512102.4409.6
…………
योग5,0001,0004,000

मुद्रा गुणक = 1/0.2 = 5। कुल जमाएँ = 1,000 × 5 = ₹5,000; कुल साख (ऋण) सृजन = 5,000 − 1,000 = ₹4,000। प्रक्रिया तब रुकती है जब कुल रिज़र्व प्रारंभिक जमा (₹1,000) के बराबर हो जाता है।

1000 800 640 512 410 328 … 123456 कुल जमाएँ = 1000 × 5 = 5000
आरक्षित अनुपात 20% पर हर चरण में जमा पिछली का 80% रह जाती है; अनंत चरणों का योग ₹5,000 (काल्पनिक आँकड़े)।
साख सृजन की सीमाएँ
  • आरक्षित अनुपात जितना अधिक, गुणक उतना कम।
  • यदि लोग ऋण की राशि का कुछ भाग नकद के रूप में अपने पास रखें (बैंक में वापस जमा न करें), तो साख सृजन कम होगा।
  • ऋण की माँग पर्याप्त न हो, या बैंक स्वयं अतिरिक्त रिज़र्व रखें, तो भी साख सृजन घटता है।

6. केंद्रीय बैंक : भारतीय रिज़र्व बैंक

भारत का केंद्रीय बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) है, जिसकी स्थापना 1935 में हुई और जिसका 1949 में राष्ट्रीयकरण किया गया। इसके प्रमुख कार्य:

  1. करेंसी जारी करना (Bank of Issue): ₹1 के नोट और सिक्कों को छोड़कर (जो भारत सरकार जारी करती है) सभी करेंसी नोट जारी करने का एकाधिकार।
  2. सरकार का बैंकर (Banker to the Government): सरकार के खाते रखना, भुगतान करना, सरकार को ऋण देना और उसके ऋण का प्रबंधन करना, सलाह देना।
  3. बैंकों का बैंक (Banker's Bank): व्यावसायिक बैंक RBI में खाते रखते हैं और अपने रिज़र्व (CRR) वहाँ जमा करते हैं; RBI उनके बीच भुगतान निपटान (Clearing) की सुविधा देता है।
  4. अंतिम ऋणदाता (Lender of Last Resort): जब किसी बैंक को अचानक नकदी की कमी हो और कहीं से ऋण न मिले, तो RBI उसे ऋण देकर बैंकिंग प्रणाली को संकट से बचाता है।
  5. साख का नियंत्रक (Controller of Credit): मौद्रिक नीति द्वारा मुद्रा पूर्ति, ब्याज दरों और साख को नियंत्रित करना — मुद्रास्फीति पर नियंत्रण और संवृद्धि को सहायता।
  6. विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षक: विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन और विनिमय दर की स्थिरता।

7. मौद्रिक नीति के उपकरण

(क) परिमाणात्मक (Quantitative) उपकरण

उपकरणअर्थमुद्रास्फीति रोकने के लिएमंदी/कम माँग में
नकद आरक्षित अनुपात (CRR)जमाओं का वह प्रतिशत जो बैंक को RBI के पास नकद रखना अनिवार्य हैबढ़ाएँ → गुणक घटे → साख घटेघटाएँ
सांविधिक तरलता अनुपात (SLR)जमाओं का वह प्रतिशत जो बैंक को स्वयं तरल परिसंपत्तियों (सरकारी प्रतिभूतियाँ, सोना, नकद) में रखना होता हैबढ़ाएँघटाएँ
रेपो दर (Repo Rate)वह दर जिस पर RBI व्यावसायिक बैंकों को सरकारी प्रतिभूतियों की ज़मानत पर अल्पकालीन ऋण देता है (पुनर्खरीद समझौते के तहत)बढ़ाएँ → बैंकों का उधार महँगा → ऋण दरें बढ़ेंघटाएँ
रिवर्स रेपो दर (Reverse Repo Rate)वह दर जिस पर RBI बैंकों से उनकी अतिरिक्त राशि उधार लेता हैबढ़ाएँ → बैंक RBI में अधिक राशि रखें, कम ऋण देंघटाएँ
बैंक दर (Bank Rate)वह दर जिस पर RBI बैंकों को दीर्घकालीन ऋण देता है / बिल पुनर्भुनाता हैबढ़ाएँघटाएँ
खुले बाज़ार की क्रियाएँ (Open Market Operations — OMO)RBI द्वारा खुले बाज़ार में सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रयप्रतिभूतियाँ बेचे → जनता/बैंकों से मुद्रा RBI के पास → मुद्रा पूर्ति घटेप्रतिभूतियाँ खरीदे → मुद्रा पूर्ति बढ़े

(ख) गुणात्मक / चयनात्मक (Qualitative) उपकरण

  • मार्जिन आवश्यकता (Margin Requirement): किसी परिसंपत्ति की ज़मानत पर दिए जाने वाले ऋण और उसके मूल्य का अंतर। मार्जिन बढ़ाने से उस क्षेत्र में ऋण घटता है — जैसे सट्टेबाज़ी वाले क्षेत्रों में।
  • नैतिक दबाव (Moral Suasion): RBI सलाह, बैठकों और परिपत्रों द्वारा बैंकों को किसी विशेष दिशा में ऋण देने के लिए प्रेरित करता है।
  • चयनात्मक साख नियंत्रण: विशेष क्षेत्रों (जैसे कृषि, लघु उद्योग) को प्राथमिकता या अन्य क्षेत्रों पर सीमा।
उदाहरण — CRR परिवर्तन का प्रभाव (काल्पनिक)

बैंकिंग प्रणाली में नई जमा ₹10,000 करोड़ है। यदि आरक्षित अनुपात 10% है, तो अधिकतम कुल जमाएँ = 10,000 × (1/0.1) = ₹1,00,000 करोड़। यदि RBI अनुपात बढ़ाकर 12.5% कर दे, तो = 10,000 × 8 = ₹80,000 करोड़ — साख सृजन की क्षमता ₹20,000 करोड़ घट गई। यही मुद्रास्फीति रोकने का तंत्र है।

मौद्रिक नीति समिति (MPC): भारत में 2016 से रेपो दर का निर्धारण RBI की मौद्रिक नीति समिति करती है, जिसका प्रमुख उद्देश्य उपभोक्ता कीमत सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति को एक निर्धारित लक्ष्य-सीमा के भीतर रखना है, साथ ही संवृद्धि का ध्यान रखना।

8. मास्टर तालिका : सूत्र और तथ्य

अवधारणासूत्र / तथ्य
M1CU + DD + RBI के पास अन्य जमाएँ
M3M1 + सावधि जमाएँ
उच्च शक्तिशाली मुद्रा (M0)जनता के पास करेंसी + बैंकों के रिज़र्व
मुद्रा गुणक1 / rr
कुल जमाएँप्रारंभिक जमा × 1/rr
साख सृजनकुल जमाएँ − प्रारंभिक जमा
RBIस्थापना 1935, राष्ट्रीयकरण 1949
MPC2016 से रेपो दर का निर्धारण
मुद्रा की माँगलेन-देन (आय ↑) + सट्टा (ब्याज दर ↓)

9. मास्टर सारांश तालिका

विषयमुख्य बिंदु
मुद्रा के कार्यविनिमय माध्यम, लेखा इकाई (प्राथमिक); मूल्य संचय, स्थगित भुगतान (गौण)
मुद्रा पूर्तिजनता के पास करेंसी + जमाएँ; M1, M3
साख सृजनगुणक = 1/rr; रिज़र्व = प्रारंभिक जमा पर प्रक्रिया रुकती है
RBIकरेंसी, सरकार का बैंक, बैंकों का बैंक, अंतिम ऋणदाता, साख नियंत्रक
मौद्रिक नीतिमहँगाई रोकने को: CRR/SLR/रेपो ↑, प्रतिभूतियाँ बेचें; उलटा मंदी में

10. माइंड मैप

मुद्रा और बैंकिंग
मुद्रा
  • वस्तु-विनिमय की कठिनाई
  • चार कार्य
माँग व पूर्ति
  • लेन-देन, सट्टा
  • M1, M3, M0
बैंक
  • साख सृजन
  • गुणक 1/rr
RBI
  • कार्य
  • CRR, रेपो, OMO

11. टिप्स और ट्रिक्स

स्मार्ट तरीके
  • मौद्रिक नीति का नियम: "महँगाई में कस दो" — सभी दरें और अनुपात बढ़ाओ, प्रतिभूतियाँ बेचो; "मंदी में ढील दो" — उलटा।
  • रेपो = RBI देता है; रिवर्स रेपो = RBI लेता है।
  • गुणक प्रश्न में प्रतिशत को दशमलव में बदलें — 20% = 0.2 → गुणक 5।
आम गलतियाँ
  • मुद्रा पूर्ति में बैंकों और सरकार के पास रखी नकदी जोड़ना — केवल जनता के पास वाली गिनी जाती है।
  • OMO में दिशा उलट देना — मुद्रा पूर्ति घटाने के लिए RBI प्रतिभूतियाँ बेचता है।
  • माँग जमाओं को वैध मुद्रा कहना — वे वैध मुद्रा नहीं हैं।

12. महत्वपूर्ण वन-लाइनर

  • वस्तु-विनिमय की मुख्य कठिनाई आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का अभाव है।
  • विनिमय का माध्यम मुद्रा का प्राथमिक कार्य है।
  • मुद्रा पूर्ति एक स्टॉक चर है।
  • M1 मुद्रा पूर्ति का सबसे तरल माप है।
  • मुद्रा गुणक आरक्षित अनुपात का व्युत्क्रम है।
  • RBI की स्थापना 1935 में हुई।
  • अंतिम ऋणदाता का कार्य केंद्रीय बैंक करता है।
  • सट्टा उद्देश्य से मुद्रा की माँग ब्याज दर से ऋणात्मक रूप से संबंधित है।

13. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)

प्र1आसान

यदि आरक्षित अनुपात 25% है, तो मुद्रा गुणक कितना होगा?

  1. 2
  2. 4
  3. 5
  4. 25
उत्तर देखें

गुणक = 1/0.25 = 4।

उत्तर: (ख) 4

प्र2आसान

मुद्रा के दो प्राथमिक कार्य बताइए।

उत्तर देखें

विनिमय का माध्यम और लेखा की इकाई (मूल्य का माप)।

उत्तर: विनिमय का माध्यम, लेखा की इकाई

प्र3आसान

रेपो दर से क्या अभिप्राय है?

उत्तर देखें

वह दर जिस पर RBI व्यावसायिक बैंकों को सरकारी प्रतिभूतियों की ज़मानत पर अल्पकालीन ऋण देता है।

उत्तर: RBI द्वारा बैंकों को अल्पकालीन ऋण की दर

प्र4मध्यम

वस्तु-विनिमय प्रणाली की तीन कठिनाइयाँ बताइए और मुद्रा ने इन्हें कैसे दूर किया?

उत्तर देखें

(1) दोहरे संयोग का अभाव → मुद्रा विनिमय का माध्यम बनी; हर कोई मुद्रा स्वीकार करता है। (2) मूल्य के सामान्य माप का अभाव → मुद्रा लेखा की इकाई बनी; सब कीमतें ₹ में। (3) मूल्य संचय की कठिनाई → मुद्रा को भविष्य के लिए रखा जा सकता है। (अविभाज्यता और स्थगित भुगतान की कठिनाई भी।)

उत्तर: दोहरा संयोग, सामान्य माप, मूल्य संचय — मुद्रा के कार्यों से समाधान

प्र5मध्यम

प्रारंभिक जमा ₹2,000 और आरक्षित अनुपात 10% है। कुल जमाएँ और सृजित साख ज्ञात कीजिए।

उत्तर देखें

गुणक = 1/0.1 = 10। कुल जमाएँ = 2,000 × 10 = ₹20,000। सृजित साख = 20,000 − 2,000 = ₹18,000।

उत्तर: कुल जमाएँ ₹20,000; साख ₹18,000

प्र6मध्यम

M1 और M3 में अंतर बताइए।

उत्तर देखें

M1 = जनता के पास करेंसी + बैंकों की माँग जमाएँ + RBI के पास अन्य जमाएँ — संकीर्ण मुद्रा, सर्वाधिक तरल। M3 = M1 + व्यावसायिक बैंकों की सावधि जमाएँ — व्यापक मुद्रा, कम तरल।

उत्तर: M3 में सावधि जमाएँ भी शामिल; M1 अधिक तरल

प्र7मध्यम

RBI को "अंतिम ऋणदाता" क्यों कहा जाता है?

उत्तर देखें

जब किसी व्यावसायिक बैंक को अचानक नकदी की कमी हो (जैसे जमाकर्ताओं की भारी निकासी) और उसे अन्य स्रोतों से ऋण न मिले, तो RBI अंतिम उपाय के रूप में उसे ऋण देता है। इससे बैंक विफल नहीं होता, जमाकर्ताओं का विश्वास बना रहता है और पूरी बैंकिंग प्रणाली संकट से बचती है।

उत्तर: संकट में बैंकों को अंतिम सहारे के रूप में ऋण देने के कारण

प्र8मध्यम

मुद्रा की सट्टा माँग ब्याज दर से ऋणात्मक रूप से क्यों संबंधित है?

उत्तर देखें

मुद्रा रखने की अवसर लागत छोड़ा गया ब्याज है। ब्याज दर ऊँची होने पर मुद्रा रखना महँगा है (अधिक ब्याज छूटता है) और लोग बॉन्ड खरीदना पसंद करते हैं — मुद्रा की माँग घटती है। ब्याज दर नीची होने पर अवसर लागत कम है, और लोग भविष्य में ब्याज दर बढ़ने (बॉन्ड कीमतें गिरने) की आशंका से मुद्रा रखते हैं — माँग बढ़ती है।

उत्तर: ऊँची ब्याज दर = मुद्रा रखने की ऊँची अवसर लागत

प्र9कठिन

व्यावसायिक बैंकों द्वारा साख सृजन की प्रक्रिया उदाहरण सहित समझाइए। इसकी सीमाएँ क्या हैं?

उत्तर देखें

बैंक जमा का केवल आरक्षित भाग रखकर शेष ऋण देते हैं; ऋण की राशि खर्च होकर फिर बैंकों में जमा हो जाती है; यह चक्र चलता रहता है। उदाहरण: जमा ₹1,000, rr = 20% → चरण: 1000, 800, 640, 512 … योग = 1000 × 1/0.2 = ₹5,000; साख = ₹4,000। प्रक्रिया तब रुकती है जब कुल रिज़र्व प्रारंभिक जमा के बराबर हो जाए। सीमाएँ: ऊँचा आरक्षित अनुपात; जनता द्वारा नकद रखना (रिसाव); ऋण की पर्याप्त माँग न होना; बैंकों द्वारा अतिरिक्त रिज़र्व रखना; RBI के नियंत्रण।

उत्तर: कुल जमाएँ = प्रारंभिक जमा × 1/rr; सीमाएँ — rr, नकद रिसाव, ऋण माँग

प्र10कठिन

अर्थव्यवस्था में अत्यधिक माँग से मुद्रास्फीति हो रही है। RBI कौन-से चार उपाय कर सकता है? प्रत्येक की कार्य-प्रणाली समझाइए।

उत्तर देखें

(1) CRR बढ़ाना — बैंकों को अधिक नकद RBI में रखना पड़ेगा, गुणक घटेगा, ऋण घटेंगे। (2) रेपो दर बढ़ाना — बैंकों का उधार महँगा, वे ऋण दरें बढ़ाएँगे, ऋण की माँग घटेगी। (3) खुले बाज़ार में प्रतिभूतियाँ बेचना — खरीदारों की मुद्रा RBI के पास चली जाएगी, बैंकों के रिज़र्व और साख क्षमता घटेगी। (4) SLR बढ़ाना — बैंकों को अधिक राशि प्रतिभूतियों में रखनी होगी, ऋण के लिए कम बचेगा। (गुणात्मक: मार्जिन बढ़ाना, नैतिक दबाव।) परिणाम: मुद्रा पूर्ति और समग्र माँग घटेगी, कीमतों पर दबाव कम होगा।

उत्तर: CRR ↑, रेपो ↑, प्रतिभूतियाँ बेचना, SLR ↑

प्र11कठिन

बैंकिंग प्रणाली में ₹5,000 करोड़ की नई जमा आती है। आरक्षित अनुपात 20% से घटाकर 16% करने पर अधिकतम कुल जमाओं में कितना परिवर्तन होगा? (काल्पनिक आँकड़े)

उत्तर देखें

20% पर: गुणक = 5 → कुल जमाएँ = ₹25,000 करोड़। 16% पर: गुणक = 1/0.16 = 6.25 → कुल जमाएँ = ₹31,250 करोड़। वृद्धि = ₹6,250 करोड़। यह विस्तारवादी (सस्ती मुद्रा) नीति है, जो मंदी में उपयुक्त है।

उत्तर: ₹6,250 करोड़ की वृद्धि

प्र12कठिन

केंद्रीय बैंक के रूप में RBI के कार्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर देखें

(1) करेंसी जारी करना — ₹1 के नोट और सिक्कों को छोड़कर नोट जारी करने का एकाधिकार; (2) सरकार का बैंकर — खाते, भुगतान, ऋण प्रबंधन, सलाह; (3) बैंकों का बैंक — बैंकों के खाते और रिज़र्व रखना, समाशोधन; (4) अंतिम ऋणदाता — संकट में बैंकों को ऋण; (5) साख नियंत्रक — CRR, SLR, रेपो, OMO आदि से मुद्रा पूर्ति और ब्याज दरों का नियमन; (6) विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षक और विनिमय दर की स्थिरता।

उत्तर: करेंसी, सरकार का बैंक, बैंकों का बैंक, अंतिम ऋणदाता, साख नियंत्रण, विदेशी मुद्रा

14. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश

2 मिनट में दोहराएँ
  • वस्तु-विनिमय: दोहरा संयोग नहीं → मुद्रा: विनिमय माध्यम, लेखा इकाई, मूल्य संचय, स्थगित भुगतान।
  • मुद्रा की माँग: लेन-देन (आय) + सट्टा (ब्याज दर, ऋणात्मक)।
  • मुद्रा पूर्ति (जनता के पास): M1 = CU + DD + अन्य; M3 = M1 + सावधि जमाएँ; M0 = उच्च शक्तिशाली मुद्रा।
  • साख सृजन: कुल जमाएँ = प्रारंभिक × 1/rr।
  • RBI (1935): करेंसी, सरकार/बैंकों का बैंक, अंतिम ऋणदाता, साख नियंत्रक।
  • महँगाई में: CRR, SLR, रेपो ↑, प्रतिभूतियाँ बेचें; मंदी में उलटा।