1. अध्याय एक नज़र में
14-15 अगस्त 1947 की आधी रात को भारत स्वतंत्र हुआ। संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू ने अपना प्रसिद्ध भाषण "नियति से साक्षात्कार" (Tryst with Destiny) दिया। पर स्वतंत्रता के साथ ही देश के सामने विशाल चुनौतियाँ थीं — विभाजन की हिंसा, लाखों शरणार्थी, सैकड़ों देशी रियासतों का विलय, और भाषा के आधार पर राज्यों की माँग। यह "स्वतंत्र भारत में राजनीति" पुस्तक का पहला अध्याय है, जिसमें हम राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियों को समझेंगे।
- स्वतंत्र भारत के सामने तीन प्रमुख चुनौतियाँ।
- विभाजन — द्वि-राष्ट्र सिद्धांत, कठिनाइयाँ और परिणाम।
- देशी रियासतों का एकीकरण — सरदार पटेल की भूमिका; हैदराबाद, जूनागढ़, मणिपुर।
- भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन।
2. स्वतंत्र भारत की तीन चुनौतियाँ
| चुनौती | अर्थ |
|---|---|
| 1. एकता और अखंडता | भाषा, धर्म, संस्कृति की अपार विविधता वाले देश को एक राष्ट्र के रूप में बनाए रखना; कई लोगों को संदेह था कि भारत एक देश के रूप में बचा रहेगा |
| 2. लोकतंत्र की स्थापना | संसदीय लोकतंत्र, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और मौलिक अधिकारों के साथ लोकतांत्रिक व्यवहार विकसित करना |
| 3. सबका विकास (समावेशी विकास) | पूरे समाज का कल्याण, विशेषकर सामाजिक रूप से वंचित वर्गों और धार्मिक-सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों का; गरीबी और बेरोज़गारी दूर करना |
3. विभाजन — विस्थापन और पुनर्वास
मुस्लिम लीग ने "द्वि-राष्ट्र सिद्धांत" का प्रतिपादन किया — कि भारत हिंदुओं और मुसलमानों के दो अलग "राष्ट्रों" का देश है, इसलिए मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान बने। कांग्रेस ने इसका विरोध किया, पर 1940 के दशक की राजनीतिक घटनाओं, सांप्रदायिक तनाव और ब्रिटिश नीति के कारण विभाजन स्वीकार करना पड़ा।
विभाजन की प्रक्रिया की कठिनाइयाँ
- भौगोलिक समस्या: मुस्लिम बहुल क्षेत्र दो हिस्सों में थे — पश्चिम (पंजाब, सिंध आदि) और पूर्व (बंगाल)। इसलिए पाकिस्तान के दो हिस्से बने — पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान, जिनके बीच भारत का विशाल भू-भाग था।
- सभी मुस्लिम बहुल क्षेत्र पाकिस्तान नहीं चाहते थे: पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के नेता ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ("सीमांत गांधी") द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के विरोधी थे, फिर भी उनकी आवाज़ अनसुनी कर दी गई।
- पंजाब और बंगाल का विभाजन: इन दोनों प्रांतों में मुस्लिम बहुल और गैर-मुस्लिम बहुल क्षेत्र मिले-जुले थे, इसलिए इनका भी ज़िलों और तहसीलों के स्तर पर विभाजन करना पड़ा।
- अल्पसंख्यकों की समस्या: दोनों ओर बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक रह गए — पाकिस्तान में हिंदू-सिख और भारत में मुसलमान। 14-15 अगस्त 1947 आते-आते वे अपने ही घरों में असुरक्षित हो गए।
विभाजन के परिणाम
- इतिहास के सबसे बड़े, अचानक और त्रासद जनसंख्या-स्थानांतरणों में से एक — लगभग 80 लाख लोगों को अपना घर छोड़कर सीमा पार जाना पड़ा।
- सांप्रदायिक हिंसा में अनुमानतः 5 से 10 लाख लोग मारे गए; महिलाओं पर अत्याचार हुए; परिवार बिछड़ गए।
- शरणार्थियों के पुनर्वास, संपत्ति, कर्मचारियों और वित्तीय संसाधनों के बँटवारे की बड़ी समस्याएँ।
- 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हुई — उन्होंने सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अंतिम समय तक संघर्ष किया था। उनकी हत्या के बाद सांप्रदायिक संगठनों पर कार्यवाही हुई और देश में सांप्रदायिक हिंसा का ज्वार थमा।
विभाजन के भयानक अनुभव के बावजूद भारत के नेताओं ने धर्म के आधार पर राष्ट्र बनाने का रास्ता नहीं चुना। नेहरू और अन्य नेताओं ने स्पष्ट किया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा, जहाँ सभी धर्मों के नागरिकों को समान अधिकार होंगे। भारत में रहने वाले मुसलमान बराबर के नागरिक हैं।
4. देशी रियासतों का एकीकरण
ब्रिटिश भारत दो भागों में बँटा था — ब्रिटिश प्रांत (सीधे ब्रिटिश शासन) और देशी रियासतें (राजाओं के शासन में, पर ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन)। ऐसी लगभग 565 रियासतें थीं। अंग्रेज़ों ने घोषणा की कि स्वतंत्रता के साथ ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त होगी और रियासतें भारत या पाकिस्तान में मिलने या स्वतंत्र रहने के लिए स्वतंत्र होंगी। इससे देश के टुकड़ों में बँटने का ख़तरा पैदा हो गया — त्रावणकोर, हैदराबाद, भोपाल जैसी रियासतों ने स्वतंत्र रहने की इच्छा जताई।
सरकार की नीति
अंतरिम सरकार में गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने, सचिव वी. पी. मेनन की सहायता से, रियासतों के एकीकरण का ऐतिहासिक काम किया। इसमें तीन बातें महत्त्वपूर्ण थीं:
- अधिकांश रियासतों की जनता भारत में विलय चाहती थी।
- सरकार कुछ क्षेत्रों को स्वायत्तता देने में लचीली थी, ताकि विविधता का सम्मान हो।
- विभाजन की पृष्ठभूमि में देश की क्षेत्रीय अखंडता सबसे महत्त्वपूर्ण थी।
शांतिपूर्ण बातचीत से लगभग सभी रियासतों ने 15 अगस्त 1947 से पहले "विलय-पत्र" (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए। कुछ रियासतों का मामला कठिन रहा:
| रियासत | एकीकरण |
|---|---|
| हैदराबाद | सबसे बड़ी रियासत; शासक निज़ाम स्वतंत्र रहना चाहता था; नवंबर 1947 में "यथास्थिति समझौता"; निज़ाम के अर्धसैनिक बल रज़ाकारों ने जनता पर अत्याचार किए; तेलंगाना क्षेत्र में किसानों का आंदोलन; सितंबर 1948 में भारतीय सेना की कार्यवाही (ऑपरेशन पोलो) के बाद भारत में विलय |
| जूनागढ़ | नवाब पाकिस्तान में मिलना चाहता था, जबकि जनता बहुसंख्यक रूप से भारत के पक्ष में थी; जन असंतोष के बाद फ़रवरी 1948 में जनमत-संग्रह में भारत के पक्ष में भारी बहुमत |
| मणिपुर | महाराजा बोधचंद्र सिंह ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए; जून 1948 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से चुनाव कराकर मणिपुर देश का पहला भाग बना जहाँ इस आधार पर चुनाव हुए; सितंबर 1949 में विधानसभा से परामर्श के बिना महाराजा से विलय-समझौते पर हस्ताक्षर कराए गए, जिससे वहाँ असंतोष पैदा हुआ |
| कश्मीर | अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित क़बायली हमले के बाद महाराजा हरि सिंह ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए (इसका विस्तृत अध्ययन "क्षेत्रीय आकांक्षाएँ" अध्याय में) |
5. राज्यों का पुनर्गठन
स्वतंत्रता के समय राज्यों की सीमाएँ ब्रिटिश प्रशासनिक सुविधा के अनुसार थीं, भाषाई-सांस्कृतिक आधार पर नहीं। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान ही कांग्रेस ने 1920 के नागपुर अधिवेशन में भाषाई आधार पर प्रांतीय कांग्रेस समितियाँ बनाने का निर्णय लिया था। पर स्वतंत्रता के बाद नेताओं को डर था कि भाषाई राज्य विभाजन जैसी विघटनकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देंगे, इसलिए इस माँग को टाला गया।
- विशाल आंध्र आंदोलन: मद्रास प्रांत के तेलुगु भाषी क्षेत्रों में अलग राज्य की माँग। गांधीवादी नेता पोट्टी श्रीरामुलु 56 दिन के अनशन के बाद दिसंबर 1952 में दिवंगत हुए। इसके बाद व्यापक आंदोलन हुआ और अक्टूबर 1953 में आंध्र प्रदेश भाषाई आधार पर बनने वाला पहला राज्य बना।
- राज्य पुनर्गठन आयोग (1953): न्यायमूर्ति फ़ज़ल अली की अध्यक्षता में; अन्य सदस्य के. एम. पणिक्कर और एच. एन. कुंज़रू। आयोग ने स्वीकार किया कि राज्यों की सीमाएँ उस राज्य में बोली जाने वाली भाषा पर आधारित होनी चाहिए।
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956: 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश बने।
| वर्ष | नए राज्य |
|---|---|
| 1960 | बंबई राज्य से महाराष्ट्र और गुजरात |
| 1963 | नगालैंड |
| 1966 | पंजाब से हरियाणा बना; पंजाब के पहाड़ी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश (तब केंद्र-शासित) में मिले; हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा 1971 में |
| 1972 | मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा |
| 1987 | मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश (गोवा भी 1987 में राज्य बना) |
| 2000 | छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड |
| 2014 | तेलंगाना |
भाषाई राज्यों के गठन से देश टूटा नहीं, बल्कि लोकतंत्र और एकता मज़बूत हुई — क्षेत्रीय भाषाओं में शासन होने से आम लोग राजनीति से जुड़े, और यह सिद्ध हुआ कि विविधता को स्वीकार करना ही एकता का आधार है।
6. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| नियति से साक्षात्कार | 14-15 अगस्त 1947 की रात नेहरू का भाषण |
| द्वि-राष्ट्र सिद्धांत | हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र — मुस्लिम लीग का दावा |
| देशी रियासत | राजाओं द्वारा शासित, ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन क्षेत्र |
| विलय-पत्र | रियासत के भारत में मिलने का औपचारिक दस्तावेज़ |
| रज़ाकार | हैदराबाद के निज़ाम का अर्धसैनिक बल |
| ऑपरेशन पोलो | सितंबर 1948 में हैदराबाद में भारतीय सेना की कार्यवाही |
| जनमत-संग्रह | जनता से सीधे मत लेकर निर्णय (जूनागढ़, 1948) |
| भाषाई राज्य | भाषा के आधार पर गठित राज्य |
| राज्य पुनर्गठन आयोग | 1953 — फ़ज़ल अली, पणिक्कर, कुंज़रू |
7. मास्टर सारांश तालिका
| प्रक्रिया | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| चुनौतियाँ | एकता-अखंडता, लोकतंत्र, समावेशी विकास |
| विभाजन | द्वि-राष्ट्र सिद्धांत; पूर्वी व पश्चिमी पाकिस्तान; ~80 लाख विस्थापित; 5-10 लाख मृत; गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 |
| रियासतें | ~565; पटेल व वी. पी. मेनन; विलय-पत्र; हैदराबाद (सितंबर 1948), जूनागढ़ (फ़रवरी 1948 जनमत), मणिपुर (सितंबर 1949) |
| पुनर्गठन | पोट्टी श्रीरामुलु (1952) → आंध्र (1953) → आयोग (1953) → अधिनियम 1956 (14 राज्य, 6 UT) |
| बाद के राज्य | 1960 महाराष्ट्र-गुजरात … 2000 तीन राज्य, 2014 तेलंगाना |
चार्ट — राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों की संख्या:
8. माइंड मैप
- एकता
- लोकतंत्र, विकास
- द्वि-राष्ट्र सिद्धांत
- शरणार्थी
- पटेल
- हैदराबाद, मणिपुर
- श्रीरामुलु
- 1956 अधिनियम
- धर्मनिरपेक्ष भारत
- विविधता में एकता
9. टिप्स और ट्रिक्स
- तीन चुनौतियाँ "ए-लो-वि": एकता, लोकतंत्र, विकास।
- आयोग के सदस्य "फ़-प-कु": फ़ज़ल अली, पणिक्कर, कुंज़रू।
- "52 अनशन, 53 आंध्र, 56 अधिनियम"।
- हैदराबाद का विलय 1947 में नहीं, सितंबर 1948 में हुआ।
- पहला भाषाई राज्य आंध्र प्रदेश (1953) है, केरल या तमिलनाडु नहीं।
- मणिपुर में 1948 के चुनाव देश में सार्वभौमिक मताधिकार पर हुए पहले चुनाव थे — राष्ट्रीय पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ।
10. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर
- "नियति से साक्षात्कार" भाषण नेहरू ने दिया।
- द्वि-राष्ट्र सिद्धांत मुस्लिम लीग ने दिया।
- ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को सीमांत गांधी कहा जाता है।
- महात्मा गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई।
- रियासतों के एकीकरण का श्रेय सरदार पटेल को है।
- हैदराबाद का विलय सितंबर 1948 में हुआ।
- जूनागढ़ में जनमत-संग्रह फ़रवरी 1948 में हुआ।
- मणिपुर में जून 1948 में सार्वभौमिक मताधिकार से चुनाव हुए।
- पोट्टी श्रीरामुलु दिसंबर 1952 में दिवंगत हुए।
- आंध्र प्रदेश अक्टूबर 1953 में बना।
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 में पारित हुआ।
- महाराष्ट्र और गुजरात 1960 में बने।
11. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
भाषाई आधार पर बनने वाला पहला राज्य कौन-सा था?
- केरल
- आंध्र प्रदेश
- गुजरात
- पंजाब
उत्तर देखें
पोट्टी श्रीरामुलु के बलिदान के बाद अक्टूबर 1953 में आंध्र प्रदेश बना।
उत्तर: (ख) आंध्र प्रदेश
राज्य पुनर्गठन आयोग के अध्यक्ष कौन थे?
- के. एम. पणिक्कर
- फ़ज़ल अली
- एच. एन. कुंज़रू
- वी. पी. मेनन
उत्तर देखें
1953 में गठित आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति फ़ज़ल अली थे; पणिक्कर और कुंज़रू सदस्य थे।
उत्तर: (ख) फ़ज़ल अली
विलय-पत्र (Instrument of Accession) क्या था?
उत्तर देखें
विलय-पत्र वह औपचारिक दस्तावेज़ था जिस पर हस्ताक्षर करके देशी रियासतों के शासकों ने अपनी रियासत को भारत संघ में शामिल करने पर सहमति दी। प्रारंभ में इसमें रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय केंद्र को सौंपे गए थे।
उत्तर: रियासत के भारत में शामिल होने का औपचारिक दस्तावेज़
स्वतंत्र भारत के सामने आई तीन चुनौतियों को समझाइए।
उत्तर देखें
(1) एकता और अखंडता: अपार भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के बीच देश को एक रखना, विशेषकर विभाजन और रियासतों की समस्या के संदर्भ में। (2) लोकतंत्र: संसदीय शासन, सार्वभौमिक मताधिकार और मौलिक अधिकारों पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था विकसित करना। (3) समावेशी विकास: गरीबी, बेरोज़गारी दूर करना और वंचित वर्गों तथा अल्पसंख्यकों सहित सभी का कल्याण सुनिश्चित करना।
उत्तर: एकता-अखंडता, लोकतंत्र, समावेशी विकास
विभाजन की प्रक्रिया में आई कठिनाइयाँ बताइए।
उत्तर देखें
(1) मुस्लिम बहुल क्षेत्र एक जगह नहीं थे — पश्चिम और पूर्व में बँटे थे, इसलिए पाकिस्तान दो हिस्सों में बना। (2) सभी मुस्लिम बहुल क्षेत्र पाकिस्तान नहीं चाहते थे — जैसे पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का विरोध। (3) पंजाब और बंगाल में मिश्रित आबादी के कारण इन प्रांतों का भी विभाजन करना पड़ा। (4) दोनों ओर बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक रह गए, जो असुरक्षित हो गए।
उत्तर: भौगोलिक बिखराव, असहमति, पंजाब-बंगाल विभाजन, अल्पसंख्यक समस्या
हैदराबाद रियासत का भारत में विलय कैसे हुआ?
उत्तर देखें
हैदराबाद सबसे बड़ी रियासत थी; उसका शासक निज़ाम स्वतंत्र रहना चाहता था और नवंबर 1947 में भारत से एक वर्ष का "यथास्थिति समझौता" किया। इस बीच निज़ाम के अर्धसैनिक बल रज़ाकारों ने जनता, विशेषकर गैर-मुसलमानों और आंदोलनकारी किसानों पर अत्याचार किए; तेलंगाना क्षेत्र में किसानों और कम्युनिस्टों का आंदोलन चल रहा था, और जनता भारत में विलय चाहती थी। स्थिति बिगड़ने पर सितंबर 1948 में भारतीय सेना ने कार्यवाही (ऑपरेशन पोलो) की और कुछ ही दिनों में निज़ाम ने आत्मसमर्पण किया; हैदराबाद भारत का हिस्सा बना।
उत्तर: यथास्थिति समझौता → रज़ाकारों के अत्याचार → सितंबर 1948 सैन्य कार्यवाही
मणिपुर के विलय से जुड़े विवाद को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखें
स्वतंत्रता से पहले महाराजा बोधचंद्र सिंह ने आंतरिक स्वायत्तता के आश्वासन पर विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए। जनता के दबाव में जून 1948 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से चुनाव हुए और संवैधानिक राजतंत्र बना — मणिपुर देश का पहला भाग था जहाँ इस आधार पर चुनाव हुए। पर भारत सरकार ने सितंबर 1949 में मणिपुर की निर्वाचित विधानसभा से परामर्श किए बिना महाराजा से विलय-समझौते पर हस्ताक्षर करा लिए। इससे मणिपुर में असंतोष पैदा हुआ, जिसके परिणाम लंबे समय तक दिखते रहे।
उत्तर: निर्वाचित विधानसभा से परामर्श बिना 1949 का विलय — असंतोष
देशी रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर देखें
स्वतंत्रता के समय लगभग 565 रियासतों के सामने भारत, पाकिस्तान या स्वतंत्रता का विकल्प था, जिससे देश के टुकड़े होने का ख़तरा था। गृह मंत्री सरदार पटेल ने वी. पी. मेनन की सहायता से (1) अधिकांश रियासतों को कूटनीति और समझाने-बुझाने से 15 अगस्त 1947 से पहले विलय-पत्र पर हस्ताक्षर के लिए तैयार किया; (2) शासकों को प्रिवी पर्स (निजी भत्ते) और कुछ विशेषाधिकार दिए; (3) जहाँ आवश्यक हुआ, दृढ़ता दिखाई — जूनागढ़ में जनमत-संग्रह और हैदराबाद में सैन्य कार्यवाही; (4) रियासतों की जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का समर्थन किया। इसलिए उन्हें "भारत का लौह पुरुष" कहा जाता है। आलोचनात्मक दृष्टि से मणिपुर जैसे मामलों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अनदेखी के उदाहरण भी हैं।
उत्तर: कूटनीति + दृढ़ता से लगभग सभी रियासतों का शांतिपूर्ण विलय
"भाषाई राज्यों के गठन से भारत की एकता मज़बूत हुई।" विवेचना कीजिए।
उत्तर देखें
प्रारंभिक आशंका: नेहरू सहित कई नेताओं को डर था कि भाषाई राज्य विभाजन जैसी अलगाववादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देंगे और राष्ट्रीय एकता कमज़ोर होगी। वास्तविक परिणाम: (1) राज्यों की भाषा में प्रशासन और शिक्षा होने से आम लोग शासन से जुड़े; लोकतंत्र अधिक भागीदारीपूर्ण बना; (2) क्षेत्रीय पहचान का सम्मान होने से अलगाव की भावना घटी; (3) राजनीति में स्थानीय और विभिन्न सामाजिक वर्गों के नेता उभरे; (4) यह सिद्ध हुआ कि विविधता को स्वीकार करना ही एकता का आधार है। सीमाएँ: कुछ अंतर-राज्य सीमा विवाद (जैसे बेलगाम) और जल विवाद पैदा हुए। फिर भी कुल मिलाकर भाषाई पुनर्गठन भारतीय लोकतंत्र की सफलता माना जाता है।
उत्तर: आशंका के विपरीत लोकतंत्र और एकता मज़बूत; कुछ सीमा विवाद
विभाजन के परिणामों का विश्लेषण कीजिए। विभाजन के बावजूद भारत ने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का मार्ग क्यों चुना?
उत्तर देखें
परिणाम: (1) लगभग 80 लाख लोगों का विस्थापन — इतिहास के सबसे बड़े जनसंख्या-स्थानांतरणों में से एक; (2) सांप्रदायिक हिंसा में अनुमानतः 5 से 10 लाख मौतें; महिलाओं पर अत्याचार; (3) शरणार्थियों के पुनर्वास, संपत्ति और संसाधनों के बँटवारे की समस्या; (4) भारत-पाकिस्तान के बीच स्थायी कटुता और कश्मीर विवाद; (5) गांधीजी की हत्या। धर्मनिरपेक्षता का चुनाव: राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्यों — सभी धर्मों के लोगों की समान भागीदारी — के अनुरूप; भारत में बड़ी संख्या में मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक रह गए थे जिन्हें समान नागरिकता देना आवश्यक था; नेहरू, पटेल, आंबेडकर, मौलाना आज़ाद जैसे नेताओं ने धर्म-आधारित राष्ट्र को लोकतंत्र और एकता के लिए घातक माना। इसलिए भारत ने धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक संविधान अपनाया।
उत्तर: विस्थापन, हिंसा, कटुता; राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्यों और समान नागरिकता हेतु धर्मनिरपेक्षता
भाषाई राज्यों की माँग को सरकार ने शुरू में क्यों टाला और बाद में क्यों स्वीकार किया?
उत्तर देखें
टालने के कारण: राष्ट्रीय आंदोलन के समय (1920 नागपुर अधिवेशन) कांग्रेस ने भाषाई आधार पर प्रांतीय समितियाँ बनाई थीं, पर स्वतंत्रता के बाद विभाजन की त्रासदी के कारण नेताओं को डर था कि भाषा के आधार पर राज्य बनाने से और विघटन होगा; प्राथमिकता देश की एकता, रियासतों के एकीकरण और आर्थिक विकास को दी गई। स्वीकार करने के कारण: तेलुगु भाषी क्षेत्रों में विशाल आंध्र आंदोलन, पोट्टी श्रीरामुलु का 56 दिन का अनशन और दिसंबर 1952 में उनका निधन, जिसके बाद व्यापक हिंसक आंदोलन हुआ; इसके दबाव में 1953 में आंध्र प्रदेश बनाया गया। फिर अन्य क्षेत्रों से भी माँग उठी, इसलिए 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना और 1956 में अधिनियम पारित हुआ। यह जन आंदोलन के प्रति लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया का उदाहरण है।
उत्तर: विघटन का डर → जन आंदोलन (श्रीरामुलु) का दबाव → आयोग और 1956 अधिनियम
12. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- तीन चुनौतियाँ: एकता-अखंडता, लोकतंत्र, समावेशी विकास; नेहरू — "नियति से साक्षात्कार"।
- विभाजन: द्वि-राष्ट्र सिद्धांत; पाकिस्तान के दो भाग; सीमांत गांधी का विरोध; पंजाब-बंगाल का बँटवारा; ~80 लाख विस्थापित, 5-10 लाख मृत; गांधी हत्या 30 जनवरी 1948; भारत धर्मनिरपेक्ष।
- रियासतें: ~565; पटेल व वी. पी. मेनन; विलय-पत्र; हैदराबाद (ऑपरेशन पोलो, सितंबर 1948), जूनागढ़ (जनमत, फ़रवरी 1948), मणिपुर (चुनाव 1948, विलय सितंबर 1949)।
- पुनर्गठन: श्रीरामुलु (1952) → आंध्र (1953) → आयोग (फ़ज़ल अली, 1953) → अधिनियम 1956 (14 राज्य, 6 UT)।
- बाद में: 1960 महाराष्ट्र-गुजरात, 1966 हरियाणा, 1972 पूर्वोत्तर राज्य, 1987 मिज़ोरम-अरुणाचल-गोवा, 2000 तीन राज्य, 2014 तेलंगाना।