1. अध्याय एक नज़र में
स्वतंत्रता के बाद भारत ने लोकतंत्र का रास्ता चुना, जबकि उसी समय कई नव-स्वतंत्र देशों में सैन्य शासन या एकदलीय तानाशाही आ गई। भारत में स्वतंत्रता के बाद लगभग दो दशकों तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का केंद्र और अधिकांश राज्यों में प्रभुत्व रहा। इसे एक दल के प्रभुत्व का दौर कहा जाता है। पर यह प्रभुत्व लोकतांत्रिक चुनावों से आया था। इस अध्याय में हम पहले आम चुनाव, कांग्रेस के प्रभुत्व की प्रकृति और उस समय के विपक्षी दलों को समझेंगे।
- लोकतंत्र स्थापित करने की चुनौती और चुनाव आयोग का गठन।
- पहला आम चुनाव (1951-52) और उसकी कठिनाइयाँ।
- पहले तीन चुनावों में कांग्रेस का प्रभुत्व और उसके कारण।
- कांग्रेस — "सामाजिक और वैचारिक गठबंधन"; गुटों में तालमेल की व्यवस्था।
- विपक्षी दल — सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी।
2. लोकतंत्र स्थापित करने की चुनौती
संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। अब देश के पहले लोकतांत्रिक चुनाव कराने थे। जनवरी 1950 में भारत निर्वाचन आयोग का गठन हुआ और सुकुमार सेन पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने।
- विशाल मतदाता संख्या: लगभग 17 करोड़ मतदाताओं को लगभग 3200 विधानसभा सदस्य और लगभग 489 लोकसभा सदस्य चुनने थे।
- कम साक्षरता: केवल लगभग 15% मतदाता साक्षर थे — इसलिए हर उम्मीदवार / दल के लिए अलग मतपेटी और उस पर चुनाव चिह्न की व्यवस्था की गई; बाद में मतपत्र पर चिह्न छापे गए। आज EVM का प्रयोग होता है।
- सीमाओं का निर्धारण और मतदाता सूची: चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन और मतदाता सूची बनाना बड़ा काम था; कई महिलाओं ने अपना नाम न देकर "अमुक की पत्नी / बेटी" लिखवाया, जिनके नाम सूची से हटाने पड़े।
- चुनाव दो बार स्थगित हुए और अंततः अक्टूबर 1951 से फ़रवरी 1952 के बीच हुए — इसीलिए इसे 1952 का चुनाव भी कहा जाता है।
एक भारतीय संपादक ने इस चुनाव को "इतिहास का सबसे बड़ा जुआ" कहा था, और कई विदेशी पर्यवेक्षकों को संदेह था कि इतने गरीब और निरक्षर देश में लोकतंत्र सफल होगा। पर चुनाव सफल रहे — लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया, परिणाम शांतिपूर्वक स्वीकार हुए और हारने वालों ने भी उन्हें निष्पक्ष माना। इससे सिद्ध हुआ कि दुनिया में कहीं भी लोकतंत्र संभव है।
3. पहले तीन चुनावों में कांग्रेस का प्रभुत्व
| चुनाव | लोकसभा में कांग्रेस की सीटें (लगभग) | विशेष बात |
|---|---|---|
| 1952 | 489 में से 364 | दूसरे स्थान पर कम्युनिस्ट पार्टी — केवल 16 सीटें |
| 1957 | 494 में से 371 | केरल में कम्युनिस्ट पार्टी ने सरकार बनाई — दुनिया में पहली बार कोई कम्युनिस्ट सरकार चुनावों से बनी (मुख्यमंत्री ई. एम. एस. नंबूदिरीपाद); 1959 में केंद्र ने अनुच्छेद 356 के तहत इसे बर्खास्त किया |
| 1962 | 494 में से 361 | कांग्रेस का प्रभुत्व जारी |
भारत की "फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट" (सर्वाधिक मत से जीत) चुनाव प्रणाली ने भी कांग्रेस को उसके मत-प्रतिशत से अधिक सीटें दिलाईं — 1952 में कांग्रेस को लगभग 45% मत मिले, पर उसने लगभग 74% सीटें जीतीं। विपक्षी वोट बँटे होने से उन्हें सीटें कम मिलीं।
4. कांग्रेस के प्रभुत्व की प्रकृति
भारत का एकदलीय प्रभुत्व लोकतांत्रिक था — इसमें दूसरे दलों पर प्रतिबंध नहीं था, चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होते थे। यह मैक्सिको के PRI (जिसने लगभग सात दशक शासन किया पर चुनावों में धाँधली के आरोप थे) या साम्यवादी देशों के एकदलीय शासन से अलग था।
कांग्रेस के प्रभुत्व के कारण
- स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत: कांग्रेस को राष्ट्रीय आंदोलन का उत्तराधिकारी माना गया; गांधी, नेहरू, पटेल जैसे लोकप्रिय नेता।
- देशव्यापी संगठन: एकमात्र दल जिसका पूरे देश में, गाँव-गाँव तक संगठन था।
- सामाजिक और वैचारिक गठबंधन: कांग्रेस एक "छतरी" जैसी थी — इसमें किसान और उद्योगपति, शहरी और ग्रामीण, मज़दूर और मालिक, उच्च, निम्न और मध्यम जातियाँ, धार्मिक अल्पसंख्यक — सभी शामिल थे।
- वैचारिक विविधता: इसमें क्रांतिकारी और शांतिवादी, रूढ़िवादी और प्रगतिशील, वामपंथी, दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी — सब विचारों के लोग थे।
- गुटों में तालमेल की व्यवस्था: कांग्रेस के भीतर विभिन्न गुट (factions) थे, जो विचारधारा या व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा पर आधारित थे। ये गुट पार्टी के भीतर रहकर ही अपनी बात रखते थे। इसलिए कांग्रेस के भीतर ही "सत्ताधारी" और "विपक्ष" दोनों थे — इसे "कांग्रेस प्रणाली" कहा गया (राजनीति विज्ञानी रजनी कोठारी)।
5. विपक्षी दलों का उदय
इस दौर में विपक्षी दलों को लोकसभा में बहुत कम सीटें मिलीं, पर उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण थी — उन्होंने कांग्रेस की नीतियों की सैद्धांतिक आलोचना की, लोकतंत्र को जीवित रखा और भविष्य के नेतृत्व को तैयार किया। प्रारंभिक वर्षों में विपक्ष और सरकार के बीच सम्मान का संबंध था — नेहरू ने पहली सरकार में डॉ. आंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे गैर-कांग्रेसी नेताओं को भी शामिल किया।
| दल | स्थापना / नेता | विचारधारा |
|---|---|---|
| सोशलिस्ट पार्टी | कांग्रेस के भीतर 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी; 1948 में अलग दल; जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया | लोकतांत्रिक समाजवाद; कांग्रेस पर पूँजीपतियों और ज़मींदारों का पक्ष लेने का आरोप; बाद में कई दलों में बँटी (किसान मज़दूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) | 1920 के दशक में; ए. के. गोपालन, एस. ए. डांगे, ई. एम. एस. नंबूदिरीपाद, पी. सी. जोशी | मार्क्सवाद-लेनिनवाद; 1947 की सत्ता-हस्तांतरण को वास्तविक स्वतंत्रता न मानकर तेलंगाना में हिंसक विद्रोह का समर्थन, फिर संसदीय राजनीति; 1964 में CPI और CPI(M) में विभाजन |
| भारतीय जनसंघ | 1951; संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी; दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक | "एक देश, एक संस्कृति, एक राष्ट्र"; भारतीय संस्कृति व परंपरा पर आधारित; अखंड भारत; हिंदी को राजभाषा बनाने का समर्थन; धार्मिक-सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को रियायतों का विरोध; परमाणु हथियार विकसित करने का समर्थन; यही बाद में भारतीय जनता पार्टी (1980) की नींव बना |
| स्वतंत्र पार्टी | 1959; सी. राजगोपालाचारी, के. एम. मुंशी, एन. जी. रंगा, मीनू मसानी | कांग्रेस के नागपुर प्रस्ताव (1959 — भूमि हदबंदी, सहकारी खेती, खाद्यान्न व्यापार पर राज्य नियंत्रण) के विरोध में; अर्थव्यवस्था में सरकार का कम हस्तक्षेप, निजी क्षेत्र को बढ़ावा, केंद्रीकृत नियोजन व राष्ट्रीयकरण का विरोध; अमेरिका से निकट संबंधों का समर्थन |
6. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| एक दल का प्रभुत्व | लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा के बीच एक दल का लगातार बहुमत |
| भारत निर्वाचन आयोग | जनवरी 1950 में गठित; पहले मुख्य आयुक्त सुकुमार सेन |
| चुनाव चिह्न | निरक्षर मतदाताओं के लिए दल / उम्मीदवार की पहचान |
| फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट | सबसे अधिक मत पाने वाला उम्मीदवार विजयी |
| कांग्रेस प्रणाली | कांग्रेस के भीतर ही सत्ता और विपक्ष — रजनी कोठारी |
| गुट (Faction) | दल के भीतर विचार या व्यक्ति आधारित समूह |
| सामाजिक गठबंधन | विभिन्न वर्गों, जातियों, धर्मों का एक दल में मेल |
| PRI | मैक्सिको का लंबे समय तक शासन करने वाला दल |
| नागपुर प्रस्ताव | 1959 — कांग्रेस का भूमि सुधार व सहकारी खेती का प्रस्ताव |
7. मास्टर सारांश तालिका
| विषय | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| पहला चुनाव | अक्टूबर 1951 – फ़रवरी 1952; ~17 करोड़ मतदाता; ~15% साक्षर; सुकुमार सेन |
| कांग्रेस की जीत | 1952: 364, 1957: 371, 1962: 361 सीटें |
| केरल 1957 | नंबूदिरीपाद — चुनाव से बनी पहली कम्युनिस्ट सरकार; 1959 में बर्खास्त |
| प्रभुत्व के कारण | आंदोलन की विरासत, संगठन, सामाजिक-वैचारिक गठबंधन, गुटों का तालमेल |
| विपक्ष | सोशलिस्ट, CPI, जनसंघ (1951), स्वतंत्र पार्टी (1959) |
चार्ट — 1952 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन (FPTP का प्रभाव):
8. माइंड मैप
- 1951-52
- सुकुमार सेन
- 1952, 57, 62
- FPTP
- आंदोलन की विरासत
- छतरी दल
- कांग्रेस प्रणाली
- भीतर विपक्ष
- सोशलिस्ट, CPI
- जनसंघ, स्वतंत्र
9. टिप्स और ट्रिक्स
- दलों की स्थापना "51 जनसंघ, 59 स्वतंत्र"; सोशलिस्ट 1934 (कांग्रेस के भीतर)।
- कांग्रेस की सीटें "364-371-361" — 1952, 1957, 1962।
- स्वतंत्र पार्टी = "स्वतंत्र बाज़ार"; जनसंघ = "एक राष्ट्र, एक संस्कृति"।
- पहला आम चुनाव केवल 1952 में नहीं — अक्टूबर 1951 से फ़रवरी 1952 तक चला।
- भारत का एकदलीय प्रभुत्व तानाशाही नहीं था; चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष थे।
- केरल की कम्युनिस्ट सरकार 1957 में बनी, 1952 में नहीं।
10. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर
- भारत निर्वाचन आयोग का गठन जनवरी 1950 में हुआ।
- सुकुमार सेन पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे।
- पहले आम चुनाव में लगभग 17 करोड़ मतदाता थे।
- 1952 में कम्युनिस्ट पार्टी 16 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही।
- 1957 में केरल में नंबूदिरीपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार बनी।
- "कांग्रेस प्रणाली" की अवधारणा रजनी कोठारी ने दी।
- कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी 1934 में बनी।
- भारतीय जनसंघ की स्थापना 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की।
- स्वतंत्र पार्टी 1959 में सी. राजगोपालाचारी ने बनाई।
- CPI का विभाजन 1964 में हुआ।
- मैक्सिको में PRI ने लगभग सात दशक शासन किया।
11. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
भारत के पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त कौन थे?
- टी. एन. शेषन
- सुकुमार सेन
- वी. पी. मेनन
- के. एम. मुंशी
उत्तर देखें
सुकुमार सेन ने पहले आम चुनाव (1951-52) का सफल संचालन किया।
उत्तर: (ख) सुकुमार सेन
स्वतंत्र पार्टी की स्थापना किसने की?
- श्यामा प्रसाद मुखर्जी
- सी. राजगोपालाचारी
- राम मनोहर लोहिया
- ए. के. गोपालन
उत्तर देखें
1959 में कांग्रेस के नागपुर प्रस्ताव के विरोध में सी. राजगोपालाचारी ने स्वतंत्र पार्टी बनाई।
उत्तर: (ख) सी. राजगोपालाचारी
1957 में केरल में बनी सरकार क्यों महत्त्वपूर्ण थी?
उत्तर देखें
1957 में केरल में ई. एम. एस. नंबूदिरीपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी — यह दुनिया में पहली बार था जब कोई कम्युनिस्ट दल लोकतांत्रिक चुनाव जीतकर सत्ता में आया। 1959 में केंद्र ने अनुच्छेद 356 के तहत इसे बर्खास्त कर दिया।
उत्तर: चुनाव से बनी दुनिया की पहली कम्युनिस्ट सरकार
पहले आम चुनाव की प्रमुख कठिनाइयाँ बताइए।
उत्तर देखें
(1) लगभग 17 करोड़ मतदाताओं वाला विशाल देश; (2) केवल लगभग 15% साक्षरता — इसलिए चुनाव चिह्नों और अलग मतपेटियों की व्यवस्था; (3) चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन और मतदाता सूची तैयार करना; (4) लाखों मतदान अधिकारियों का प्रशिक्षण; (5) कई महिलाओं ने अपना नाम दर्ज न कराकर रिश्ते से पहचान बताई। इन कठिनाइयों के कारण चुनाव दो बार टले और अक्टूबर 1951 से फ़रवरी 1952 तक चले।
उत्तर: विशाल संख्या, कम साक्षरता, परिसीमन व सूची, प्रशिक्षण
कांग्रेस को "सामाजिक और वैचारिक गठबंधन" क्यों कहा जाता है?
उत्तर देखें
सामाजिक गठबंधन: कांग्रेस में किसान और उद्योगपति, शहरी और ग्रामीण, मज़दूर और मालिक, उच्च, मध्यम और निम्न जातियाँ, धार्मिक अल्पसंख्यक — सभी वर्गों के लोग शामिल थे। वैचारिक गठबंधन: इसमें क्रांतिकारी और शांतिवादी, रूढ़िवादी और प्रगतिशील, वामपंथी, दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी — सभी विचारधाराओं के लोग थे। इसलिए कांग्रेस एक "छतरी" जैसी थी जिसके नीचे सब समा जाते थे।
उत्तर: सभी वर्गों और विचारधाराओं को समेटने वाला "छतरी" दल
भारतीय जनसंघ की विचारधारा बताइए।
उत्तर देखें
1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित जनसंघ "एक देश, एक संस्कृति, एक राष्ट्र" के विचार पर आधारित था। इसका मानना था कि भारत भारतीय संस्कृति और परंपराओं के आधार पर आधुनिक, प्रगतिशील और शक्तिशाली बन सकता है। इसने अखंड भारत, अंग्रेज़ी के स्थान पर हिंदी को राजभाषा बनाने, धार्मिक-सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को विशेष रियायतों के विरोध और भारत द्वारा परमाणु हथियार विकसित करने का समर्थन किया। 1980 में इसी परंपरा से भारतीय जनता पार्टी बनी।
उत्तर: एक देश-एक संस्कृति-एक राष्ट्र; हिंदी, अखंड भारत, परमाणु शक्ति
स्वतंत्र पार्टी की नीतियाँ कांग्रेस से कैसे भिन्न थीं?
उत्तर देखें
कांग्रेस ने 1959 के नागपुर अधिवेशन में भूमि हदबंदी, सहकारी खेती और खाद्यान्न व्यापार पर सरकारी नियंत्रण का प्रस्ताव पारित किया। स्वतंत्र पार्टी ने इसका विरोध किया और (1) अर्थव्यवस्था में सरकार के कम हस्तक्षेप, (2) निजी क्षेत्र को खुली छूट, (3) केंद्रीकृत नियोजन, राष्ट्रीयकरण और भारी करों के विरोध, (4) कृषि भूमि हदबंदी के विरोध और (5) गुटनिरपेक्षता के बजाय अमेरिका से निकट संबंधों का समर्थन किया। उद्योगपतियों, ज़मींदारों और राजाओं का इसे समर्थन मिला।
उत्तर: मुक्त बाज़ार व निजी क्षेत्र समर्थक; नियोजन व हदबंदी विरोधी
भारत में एक दल का प्रभुत्व अन्य देशों के एकदलीय शासन से कैसे भिन्न था?
उत्तर देखें
(1) लोकतांत्रिक आधार: भारत में कांग्रेस का प्रभुत्व स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में जनता के समर्थन से आया; दूसरे दलों पर कोई प्रतिबंध नहीं था। (2) साम्यवादी देश (जैसे चीन, सोवियत संघ) में संविधान केवल एक दल को अनुमति देता है। (3) मैक्सिको का PRI लगभग सात दशक सत्ता में रहा, पर चुनावों में धाँधली और विपक्ष के दमन के आरोप थे। (4) नव-स्वतंत्र देशों (जैसे म्यांमार, मिस्र, घाना) में सैन्य शासन या तानाशाही आई। (5) भारत में कांग्रेस के भीतर गुटों के रूप में विपक्ष था, और बाहर विपक्षी दलों ने आलोचना जारी रखी; प्रेस स्वतंत्र था। अतः भारत का एकदलीय प्रभुत्व लोकतंत्र के भीतर था।
उत्तर: चुनावी, प्रतिस्पर्धी और स्वतंत्र — साम्यवादी, PRI और सैन्य शासन से भिन्न
कांग्रेस के भीतर गुटों की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर देखें
कांग्रेस के भीतर विचारधारा, क्षेत्र और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा के आधार पर अनेक गुट थे। सकारात्मक भूमिका: (1) विभिन्न विचारों को दल के भीतर ही अभिव्यक्ति मिली, जिससे दल बहुत व्यापक बना रहा; (2) गुट एक-दूसरे पर नियंत्रण रखते थे — कांग्रेस के भीतर ही "विपक्ष" की भूमिका निभाई जाती थी (रजनी कोठारी की "कांग्रेस प्रणाली"); (3) असंतुष्ट नेता पार्टी छोड़ने के बजाय भीतर रहकर संघर्ष करते थे, जिससे दल टूटने से बचा; (4) विपक्षी दल भी कांग्रेस के गुटों को प्रभावित कर नीतियाँ बदलवा सकते थे। नकारात्मक पक्ष: गुटबाज़ी से कई बार निर्णय धीमे हुए और व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा बढ़ी। 1960 के दशक के अंत तक गुटों का तालमेल टूटने लगा, जिससे 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ।
उत्तर: भीतर विपक्ष व संतुलन; बाद में तालमेल टूटा
इस दौर में विपक्षी दलों की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर देखें
लोकसभा में विपक्षी दलों की सीटें कम थीं (1952 में सबसे बड़े विपक्षी दल CPI को केवल 16), फिर भी (1) उन्होंने कांग्रेस की नीतियों की सैद्धांतिक आलोचना की — सोशलिस्टों ने गरीबों के पक्ष में, स्वतंत्र पार्टी ने मुक्त बाज़ार के पक्ष में, जनसंघ ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्ष में; (2) उन्होंने लोकतंत्र को जीवित रखा और सत्ताधारी दल को निरंकुश होने से रोका; (3) कांग्रेस के भीतर के गुटों को प्रभावित कर नीतियों पर दबाव डाला; (4) भविष्य के नेतृत्व को तैयार किया — इन्हीं दलों से बाद में जयप्रकाश नारायण, लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता उभरे और 1967 तथा 1977 में कांग्रेस को चुनौती दी गई; (5) प्रारंभिक वर्षों में विपक्ष और सरकार के बीच परस्पर सम्मान था। अतः संख्या कम होने पर भी उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण थी।
उत्तर: सैद्धांतिक आलोचना, लोकतंत्र की रक्षा, नीतियों पर दबाव, भावी नेतृत्व
"पहले आम चुनाव ने सिद्ध किया कि दुनिया में कहीं भी लोकतंत्र संभव है।" विवेचना कीजिए।
उत्तर देखें
1951-52 में भारत एक गरीब, अधिकतर निरक्षर (लगभग 15% साक्षरता), विभाजन की हिंसा से उबरता हुआ और अपार सामाजिक विविधता वाला देश था। कई पश्चिमी विद्वानों का मानना था कि लोकतंत्र केवल समृद्ध और शिक्षित समाजों में ही सफल हो सकता है। एक भारतीय संपादक ने इस चुनाव को "इतिहास का सबसे बड़ा जुआ" कहा था। पर (1) लगभग 17 करोड़ मतदाताओं में से बड़ी संख्या ने उत्साह से मतदान किया; (2) चुनाव चिह्न और मतपेटियों जैसी नवीन व्यवस्था से निरक्षर मतदाता भी भाग ले सके; (3) चुनाव निष्पक्ष रहे और परिणाम हारने वालों ने भी स्वीकार किए; (4) सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण और नियमित चुनावों की परंपरा बनी। इसने दिखाया कि लोकतंत्र के लिए समृद्धि या साक्षरता पूर्व-शर्त नहीं; जनता की इच्छाशक्ति और निष्पक्ष संस्थाएँ ही आधार हैं।
उत्तर: गरीबी, निरक्षरता के बावजूद सफल, निष्पक्ष, स्वीकृत चुनाव
12. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- निर्वाचन आयोग जनवरी 1950, सुकुमार सेन; पहला चुनाव अक्टूबर 1951 – फ़रवरी 1952; ~17 करोड़ मतदाता, ~15% साक्षर; चुनाव चिह्न।
- कांग्रेस की सीटें: 1952 — 364, 1957 — 371, 1962 — 361; FPTP से मत (~45%) से अधिक सीटें (~74%)।
- केरल 1957: नंबूदिरीपाद — चुनाव से बनी पहली कम्युनिस्ट सरकार (1959 में बर्खास्त)।
- प्रभुत्व के कारण: आंदोलन की विरासत, देशव्यापी संगठन, सामाजिक-वैचारिक गठबंधन, गुटों का तालमेल ("कांग्रेस प्रणाली" — रजनी कोठारी); लोकतांत्रिक प्रभुत्व, PRI जैसा नहीं।
- विपक्ष: सोशलिस्ट (1934/1948), CPI (1964 में विभाजन), जनसंघ (1951, मुखर्जी), स्वतंत्र पार्टी (1959, राजगोपालाचारी)।