1. अध्याय एक नज़र में
1964 में नेहरू के निधन के बाद भारतीय राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर गई। उत्तराधिकार का प्रश्न, आर्थिक संकट, खाद्यान्न की कमी और युद्धों ने कांग्रेस के प्रभुत्व को चुनौती दी। 1967 के चुनाव में कांग्रेस को कई राज्यों में हार मिली और 1969 में पार्टी का विभाजन हुआ। पर 1971 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने भारी जीत के साथ वापसी की। इस अध्याय में हम कांग्रेस प्रणाली की चुनौतियों और उसकी पुनर्स्थापना को समझेंगे।
- राजनीतिक उत्तराधिकार की चुनौती — नेहरू से शास्त्री, शास्त्री से इंदिरा।
- 1967 का चौथा आम चुनाव — "राजनीतिक भूकंप"; गैर-कांग्रेसवाद, गठबंधन और दल-बदल।
- 1969 में कांग्रेस का विभाजन — सिंडिकेट बनाम इंदिरा।
- 1971 का चुनाव — "ग़रीबी हटाओ" और कांग्रेस की पुनर्स्थापना।
2. राजनीतिक उत्तराधिकार की चुनौती
मई 1964 में नेहरू का निधन हुआ। कई विदेशी पर्यवेक्षकों को आशंका थी कि भारत में उत्तराधिकार का संकट लोकतंत्र को ख़तरे में डाल देगा, जैसा अन्य नव-स्वतंत्र देशों में हुआ। पर भारत में सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से हुआ।
| नेता | कार्यकाल | प्रमुख बातें |
|---|---|---|
| लाल बहादुर शास्त्री | 1964-66 | कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज की पहल पर सर्वसम्मति से चुने गए; 1965 का पाकिस्तान युद्ध; खाद्य संकट; "जय जवान, जय किसान" का नारा; जनवरी 1966 में ताशकंद में निधन |
| इंदिरा गांधी | 1966 से | कांग्रेस संसदीय दल में मोरारजी देसाई को हराकर प्रधानमंत्री बनीं; पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के समूह "सिंडिकेट" ने यह सोचकर उनका समर्थन किया कि अनुभवहीन होने के कारण वे उन पर निर्भर रहेंगी |
सिंडिकेट कांग्रेस के भीतर प्रभावशाली और ताक़तवर नेताओं का अनौपचारिक समूह था, जिसका पार्टी संगठन पर नियंत्रण था। इसके प्रमुख सदस्य थे — के. कामराज (मद्रास), एस. के. पाटिल (बंबई), अतुल्य घोष (पश्चिम बंगाल), एस. निजलिंगप्पा (मैसूर) और एन. संजीव रेड्डी (आंध्र प्रदेश)। शास्त्री और इंदिरा दोनों के चयन में इसकी निर्णायक भूमिका रही।
3. 1967 का चौथा आम चुनाव — "राजनीतिक भूकंप"
पृष्ठभूमि
- 1962 और 1965 के युद्धों से अर्थव्यवस्था पर दबाव; लगातार सूखा और गंभीर खाद्य संकट; विदेशी सहायता में कमी।
- जून 1966 में अमेरिका के दबाव में रुपये का अवमूल्यन — महँगाई बढ़ी; आम लोगों में असंतोष।
- बेरोज़गारी, हड़तालें और छात्र आंदोलन; कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट दलों ने संघर्ष तेज़ किए।
- गैर-कांग्रेसवाद: समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने तर्क दिया कि कांग्रेस का शासन अलोकतांत्रिक और गरीबों के विरुद्ध है, इसलिए सभी विपक्षी दलों को एकजुट होकर कांग्रेस को हराना चाहिए।
परिणाम
- लोकसभा में कांग्रेस को बहुमत तो मिला, पर सीटें घटकर 283 रह गईं — 1952 के बाद सबसे कम; मत-प्रतिशत भी घटा।
- इंदिरा मंत्रिमंडल के कई मंत्री और कामराज जैसे बड़े नेता हार गए।
- सात राज्यों में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला और दो अन्य राज्यों में दल-बदल के कारण सरकार नहीं बन सकी — कुल 9 राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मद्रास, केरल आदि)।
- मद्रास में DMK ने अकेले बहुमत पाया — हिंदी-विरोधी आंदोलन के बाद पहली बार किसी क्षेत्रीय दल की पूर्ण बहुमत सरकार।
- इस परिणाम को "राजनीतिक भूकंप" कहा गया।
गठबंधन और दल-बदल
- कई राज्यों में विपक्षी दलों ने संयुक्त विधायक दल (SVD) के रूप में गठबंधन सरकारें बनाईं — इनमें वामपंथी से दक्षिणपंथी तक विरोधी विचारधाराओं के दल शामिल थे (जैसे बिहार, पंजाब में)। ये सरकारें प्रायः अस्थिर रहीं।
- दल-बदल (Defection): निर्वाचित विधायकों का एक दल छोड़कर दूसरे दल में जाना बढ़ा। हरियाणा के विधायक गया लाल ने 1967 में एक ही पखवाड़े में तीन बार दल बदला — इसी से "आया राम, गया राम" मुहावरा प्रसिद्ध हुआ। बाद में 52वें संशोधन (1985) से दल-बदल विरोधी कानून बना।
4. 1969 — कांग्रेस का विभाजन
1967 के बाद इंदिरा गांधी और सिंडिकेट के बीच संघर्ष बढ़ा। इंदिरा ने स्वयं को स्थापित करने के लिए दो रास्ते अपनाए — सिंडिकेट से स्वतंत्र होना और पार्टी को खोई ज़मीन वापस दिलाना। उन्होंने वामपंथी झुकाव वाली नीतियाँ अपनाईं — कांग्रेस कार्यसमिति ने मई 1967 में दस सूत्री कार्यक्रम अपनाया (बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण, आम बीमा का राष्ट्रीयकरण, शहरी संपत्ति की हदबंदी, खाद्यान्न का सार्वजनिक वितरण, भूमि सुधार, ग्रामीण गरीबों को आवास, राजाओं के विशेषाधिकार समाप्त करना आदि)।
राष्ट्रपति चुनाव (1969) — निर्णायक टकराव
- मई 1969 में राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन के निधन के बाद राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ।
- सिंडिकेट ने इंदिरा की असहमति के बावजूद एन. संजीव रेड्डी को कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार बनाया।
- इंदिरा गांधी ने उप-राष्ट्रपति वी. वी. गिरि को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में खड़ा करवाया और कांग्रेस सांसदों-विधायकों से "अंतरात्मा की आवाज़" (conscience vote) पर मत देने की अपील की।
- इसी बीच जुलाई 1969 में 14 प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और वित्त मंत्री मोरारजी देसाई से वित्त मंत्रालय वापस ले लिया।
- वी. वी. गिरि विजयी हुए और आधिकारिक उम्मीदवार हार गए। नवंबर 1969 में कांग्रेस औपचारिक रूप से टूट गई — सिंडिकेट का गुट कांग्रेस (संगठन) — "कांग्रेस (O)" और इंदिरा का गुट कांग्रेस (आर) — "नई कांग्रेस" कहलाया।
इंदिरा गांधी ने इस संघर्ष को विचारधारा का संघर्ष — समाजवादी बनाम रूढ़िवादी, गरीबों के समर्थक बनाम अमीरों के समर्थक — के रूप में प्रस्तुत किया।
5. 1971 का चुनाव और कांग्रेस की पुनर्स्थापना
- इंदिरा सरकार अल्पमत में थी और CPI तथा DMK जैसे दलों के समर्थन पर टिकी थी। सरकार ने भूमि सुधार कानूनों और राजाओं के प्रिवी पर्स (निजी भत्ते) समाप्त करने के प्रयास किए।
- दिसंबर 1970 में इंदिरा ने लोकसभा भंग कराकर समय से पहले चुनाव कराए — फ़रवरी 1971।
- विपक्ष ने "महागठबंधन" (Grand Alliance) बनाया — कांग्रेस (O), SSP, PSP, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और भारतीय क्रांति दल — जिसका नारा था "इंदिरा हटाओ"।
- इंदिरा गांधी ने सकारात्मक नारा दिया — "ग़रीबी हटाओ" — और सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार, ग्रामीण भूमि व शहरी संपत्ति की हदबंदी, आय-अवसरों की असमानता घटाने और प्रिवी पर्स समाप्त करने का कार्यक्रम रखा।
- परिणाम: कांग्रेस (R) और CPI गठबंधन को भारी जीत — कांग्रेस (R) को अकेले 352 सीटें; महागठबंधन को 40 से भी कम सीटें।
- दिसंबर 1971 में बांग्लादेश युद्ध की जीत के बाद इंदिरा की लोकप्रियता और बढ़ी; 1972 के राज्य विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस को बड़ी सफलता मिली। 26वें संशोधन (1971) से प्रिवी पर्स समाप्त हुए।
1971 के बाद कांग्रेस फिर प्रभुत्वशाली बनी, पर यह पुरानी कांग्रेस प्रणाली की वापसी नहीं थी। (1) अब पार्टी गुटों के तालमेल पर नहीं, बल्कि एक लोकप्रिय नेता — इंदिरा गांधी — के करिश्मे पर निर्भर थी; (2) पार्टी संगठन कमज़ोर हुआ, आंतरिक लोकतंत्र और गुटों के बीच बहस की गुंजाइश घटी; (3) कांग्रेस ने गरीबों, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और बेरोज़गार युवाओं के बीच नया सामाजिक आधार बनाया। इसलिए इसे "पुनर्स्थापना" के साथ-साथ "पुनर्निर्माण" भी कहा जाता है।
6. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सिंडिकेट | कांग्रेस संगठन पर नियंत्रण रखने वाले वरिष्ठ नेताओं का समूह |
| गैर-कांग्रेसवाद | लोहिया का विचार — सभी विपक्षी दल मिलकर कांग्रेस को हराएँ |
| राजनीतिक भूकंप | 1967 के चुनाव परिणाम — कांग्रेस की बड़ी हार |
| संयुक्त विधायक दल (SVD) | 1967 के बाद राज्यों में बने विपक्षी गठबंधन |
| दल-बदल | निर्वाचित प्रतिनिधि का दल बदलना |
| आया राम, गया राम | बार-बार दल-बदल का प्रतीक मुहावरा (गया लाल, हरियाणा) |
| अंतरात्मा की आवाज़ | 1969 राष्ट्रपति चुनाव में इंदिरा की अपील |
| प्रिवी पर्स | पूर्व राजाओं को मिलने वाले निजी भत्ते — 1971 में समाप्त |
| महागठबंधन | 1971 में विपक्षी दलों का गठबंधन — "इंदिरा हटाओ" |
| ग़रीबी हटाओ | 1971 में इंदिरा गांधी का चुनावी नारा |
7. मास्टर सारांश तालिका
| घटना | वर्ष | महत्त्व |
|---|---|---|
| नेहरू का निधन, शास्त्री PM | 1964 | शांतिपूर्ण उत्तराधिकार |
| शास्त्री का निधन, इंदिरा PM | 1966 | मोरारजी को हराया; सिंडिकेट का समर्थन |
| रुपये का अवमूल्यन | 1966 | महँगाई, असंतोष |
| चौथा आम चुनाव | 1967 | लोकसभा में 283 सीटें; 9 राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें |
| राष्ट्रपति चुनाव, बैंक राष्ट्रीयकरण, विभाजन | 1969 | वी. वी. गिरि जीते; कांग्रेस (O) बनाम कांग्रेस (R) |
| पाँचवाँ आम चुनाव | 1971 | ग़रीबी हटाओ; कांग्रेस (R) को 352 सीटें |
चार्ट — लोकसभा में कांग्रेस की सीटें (कुल 520 के आसपास सीटों में):
8. माइंड मैप
- शास्त्री 1964
- इंदिरा 1966
- राजनीतिक भूकंप
- आया राम गया राम
- सिंडिकेट बनाम इंदिरा
- वी. वी. गिरि
- ग़रीबी हटाओ
- 352 सीटें
- नेता-केंद्रित
- नया सामाजिक आधार
9. टिप्स और ट्रिक्स
- सिंडिकेट के 5 नेता "का-पा-घो-नि-रे": कामराज, पाटिल, घोष, निजलिंगप्पा, रेड्डी।
- सीटें "361 → 283 → 352" — 1962, 1967, 1971।
- नारे जोड़ें: विपक्ष — "इंदिरा हटाओ", इंदिरा — "ग़रीबी हटाओ"।
- 1969 में सिंडिकेट के उम्मीदवार संजीव रेड्डी हारे थे; वे बाद में 1977 में राष्ट्रपति बने।
- 1967 में कांग्रेस लोकसभा में हारी नहीं थी — बहुमत मिला, पर सीटें घटीं; हार राज्यों में हुई।
- 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण 1969 में हुआ, 1971 में नहीं।
10. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर
- नेहरू का निधन मई 1964 में हुआ।
- शास्त्री के चयन में कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज की प्रमुख भूमिका रही।
- शास्त्री का निधन जनवरी 1966 में ताशकंद में हुआ।
- इंदिरा गांधी ने 1966 में मोरारजी देसाई को हराकर नेतृत्व पाया।
- रुपये का अवमूल्यन जून 1966 में हुआ।
- 1967 के चुनाव को राजनीतिक भूकंप कहा गया।
- गैर-कांग्रेसवाद की रणनीति राम मनोहर लोहिया ने दी।
- "आया राम, गया राम" हरियाणा के गया लाल से जुड़ा है।
- 1969 में वी. वी. गिरि राष्ट्रपति चुने गए।
- जुलाई 1969 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ।
- कांग्रेस का औपचारिक विभाजन नवंबर 1969 में हुआ।
- 1971 में कांग्रेस (R) को 352 लोकसभा सीटें मिलीं।
11. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
"ग़रीबी हटाओ" का नारा किसने दिया?
- लाल बहादुर शास्त्री
- इंदिरा गांधी
- राम मनोहर लोहिया
- मोरारजी देसाई
उत्तर देखें
1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने "ग़रीबी हटाओ" का नारा दिया, जबकि विपक्षी महागठबंधन का नारा "इंदिरा हटाओ" था।
उत्तर: (ख) इंदिरा गांधी
1969 के राष्ट्रपति चुनाव में कौन विजयी हुआ?
- एन. संजीव रेड्डी
- वी. वी. गिरि
- ज़ाकिर हुसैन
- फ़ख़रुद्दीन अली अहमद
उत्तर देखें
इंदिरा गांधी के समर्थन और "अंतरात्मा की आवाज़" की अपील से वी. वी. गिरि जीते; सिंडिकेट समर्थित आधिकारिक उम्मीदवार संजीव रेड्डी हारे।
उत्तर: (ख) वी. वी. गिरि
"आया राम, गया राम" मुहावरा किससे संबंधित है?
उत्तर देखें
यह दल-बदल से संबंधित है। 1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल ने एक ही पखवाड़े में तीन बार दल बदला, जिससे यह मुहावरा प्रसिद्ध हुआ। बाद में 52वें संशोधन (1985) से दल-बदल विरोधी कानून बना।
उत्तर: दल-बदल (गया लाल, हरियाणा, 1967)
1967 के चुनावों को "राजनीतिक भूकंप" क्यों कहा गया?
उत्तर देखें
(1) लोकसभा में कांग्रेस की सीटें घटकर 283 रह गईं — 1952 के बाद सबसे कम; (2) इंदिरा मंत्रिमंडल के कई मंत्री और कामराज जैसे दिग्गज नेता हार गए; (3) सात राज्यों में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला और दो राज्यों में दल-बदल से सरकार नहीं बनी — कुल 9 राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें; (4) मद्रास में DMK ने अकेले बहुमत पाया। पहली बार कांग्रेस का प्रभुत्व गंभीर रूप से टूटा, इसलिए इसे राजनीतिक भूकंप कहा गया।
उत्तर: कांग्रेस की सीटें घटीं, दिग्गज हारे, 9 राज्यों में हार
गैर-कांग्रेसवाद की रणनीति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखें
समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने गैर-कांग्रेसवाद की रणनीति दी। उनका तर्क था कि कांग्रेस का शासन अलोकतांत्रिक है और गरीबों के हितों के विरुद्ध है; कांग्रेस इसलिए जीतती है क्योंकि विपक्ष के वोट बँट जाते हैं। इसलिए सभी गैर-कांग्रेसी दलों — वामपंथी से दक्षिणपंथी तक — को एकजुट होकर कांग्रेस के विरुद्ध एक उम्मीदवार खड़ा करना चाहिए, ताकि लोकतंत्र में वास्तविक विकल्प बने। 1967 के चुनावों में इसका असर दिखा।
उत्तर: विपक्ष का एकजुट होकर कांग्रेस को हराना — लोहिया
1969 में कांग्रेस के विभाजन के कारण बताइए।
उत्तर देखें
(1) इंदिरा गांधी और सिंडिकेट के बीच सत्ता संघर्ष — इंदिरा सिंडिकेट से स्वतंत्र होना चाहती थीं; (2) वैचारिक मतभेद — इंदिरा का वामपंथी झुकाव (दस सूत्री कार्यक्रम, बैंक राष्ट्रीयकरण) बनाम सिंडिकेट का रूढ़िवादी रुख़; (3) 1969 का राष्ट्रपति चुनाव — सिंडिकेट के उम्मीदवार संजीव रेड्डी के विरुद्ध इंदिरा द्वारा वी. वी. गिरि का समर्थन और "अंतरात्मा की आवाज़" की अपील; (4) मोरारजी देसाई से वित्त मंत्रालय वापस लेना। गिरि की जीत के बाद नवंबर 1969 में कांग्रेस (O) और कांग्रेस (R) में विभाजन हो गया।
उत्तर: सत्ता संघर्ष, वैचारिक मतभेद, राष्ट्रपति चुनाव, मोरारजी प्रकरण
1967 के बाद गठबंधन सरकारों की प्रकृति बताइए।
उत्तर देखें
1967 के बाद कई राज्यों में कोई एक दल बहुमत नहीं पा सका, इसलिए विभिन्न विपक्षी दलों ने संयुक्त विधायक दल (SVD) बनाकर सरकारें बनाईं। इनमें अलग-अलग विचारधाराओं के दल — जैसे बिहार में SSP, PSP, CPI, जनसंघ, और पंजाब में अकाली दल व जनसंघ — एक साथ थे। ये गठबंधन मुख्यतः "कांग्रेस-विरोध" पर आधारित थे, न कि साझा कार्यक्रम पर; इसलिए आपसी मतभेद और दल-बदल से ये प्रायः अस्थिर रहे और कई जल्दी गिर गए। फिर भी इन्होंने भारत में गठबंधन राजनीति की शुरुआत की।
उत्तर: विरोधी विचारधाराओं के कांग्रेस-विरोधी, अस्थिर गठबंधन
1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत के कारणों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर देखें
(1) सकारात्मक कार्यक्रम: "ग़रीबी हटाओ" का नारा गरीबों, भूमिहीनों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और बेरोज़गार युवाओं को आकर्षित करने वाला था, जबकि विपक्ष का "इंदिरा हटाओ" केवल नकारात्मक था। (2) ठोस कदम: 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण (1969), प्रिवी पर्स समाप्त करने के प्रयास और भूमि सुधार से इंदिरा की प्रगतिशील छवि बनी। (3) विपक्ष की कमज़ोरी: महागठबंधन के दलों के बीच कोई साझा कार्यक्रम नहीं था; वे केवल इंदिरा-विरोध पर एकजुट थे। (4) व्यक्तिगत लोकप्रियता: इंदिरा गांधी ने संघर्ष को अमीर बनाम गरीब, रूढ़िवादी बनाम प्रगतिशील के रूप में प्रस्तुत किया। (5) समय से पहले चुनाव कराने की रणनीति। परिणामस्वरूप कांग्रेस (R) को 352 सीटें मिलीं।
उत्तर: ग़रीबी हटाओ, प्रगतिशील कदम, विपक्ष की कमज़ोरी, व्यक्तिगत करिश्मा
"1971 के बाद कांग्रेस की पुनर्स्थापना पुरानी कांग्रेस प्रणाली की वापसी नहीं थी।" विवेचना कीजिए।
उत्तर देखें
पुरानी कांग्रेस प्रणाली (1952-67): विभिन्न गुटों और विचारधाराओं के तालमेल पर आधारित; मज़बूत पार्टी संगठन; आंतरिक बहस और लोकतंत्र; राज्यों के शक्तिशाली क्षेत्रीय नेता; सामाजिक गठबंधन में ग्रामीण अभिजात वर्ग प्रभावशाली। 1971 के बाद की कांग्रेस: (1) नेता-केंद्रित — पार्टी की सफलता इंदिरा गांधी के व्यक्तिगत करिश्मे पर निर्भर; (2) पार्टी संगठन कमज़ोर हुआ, आंतरिक चुनाव और बहस घटे; राज्यों के मुख्यमंत्री केंद्र द्वारा तय होने लगे; (3) गुटों की गुंजाइश कम; (4) नया सामाजिक आधार — गरीब, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिलाएँ; (5) विचारधारा में स्पष्ट समाजवादी झुकाव। इसलिए यह पुनर्स्थापना एक नई तरह की कांग्रेस का "पुनर्निर्माण" थी, जिसकी कमज़ोरियाँ बाद में आपातकाल (1975) के दौर में दिखीं।
उत्तर: गुट-आधारित संगठन से नेता-केंद्रित दल; नया सामाजिक आधार
नेहरू के बाद राजनीतिक उत्तराधिकार की प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को कैसे दर्शाती है?
उत्तर देखें
नेहरू 17 वर्ष तक प्रधानमंत्री रहे और उनका व्यक्तित्व राजनीति पर छाया हुआ था। उनके निधन (मई 1964) के बाद कई विदेशी विश्लेषकों ने आशंका व्यक्त की कि भारत में भी अन्य नव-स्वतंत्र देशों की तरह सैन्य शासन या अराजकता आ सकती है। पर (1) कांग्रेस अध्यक्ष कामराज ने पार्टी नेताओं से परामर्श कर सर्वसम्मति से लाल बहादुर शास्त्री को चुना; (2) 1966 में शास्त्री के अचानक निधन के बाद संसदीय दल में खुले मतदान से इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को हराकर नेतृत्व पाया; (3) दोनों बार सत्ता का हस्तांतरण संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार, शांतिपूर्वक हुआ; (4) सेना ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। इससे सिद्ध हुआ कि भारतीय लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि संस्थाओं और प्रक्रियाओं पर टिका है।
उत्तर: शांतिपूर्ण, संवैधानिक, सहमति व मतदान आधारित हस्तांतरण
1966-67 के आर्थिक संकट ने कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर देखें
(1) 1962 और 1965 के युद्धों से रक्षा व्यय बढ़ा और विकास योजनाओं पर दबाव पड़ा; (2) 1965-66 में लगातार सूखे से गंभीर खाद्य संकट — बिहार में अकाल जैसी स्थिति; विदेशी (अमेरिकी PL-480) अनाज पर निर्भरता; (3) जून 1966 में अमेरिकी दबाव में रुपये के अवमूल्यन से कीमतें तेज़ी से बढ़ीं; (4) बेरोज़गारी, हड़तालें और छात्र आंदोलन; विपक्षी दलों ने जन असंतोष को संगठित किया। राजनीतिक प्रभाव: जनता में सरकार के विरुद्ध नाराज़गी बढ़ी; लोहिया का गैर-कांग्रेसवाद प्रभावी हुआ; 1967 के चुनाव में कांग्रेस की लोकसभा सीटें 283 पर आ गईं और 9 राज्यों में सत्ता हाथ से निकल गई। इस संकट ने इंदिरा गांधी को वामपंथी झुकाव वाली नीतियों और हरित क्रांति की ओर भी प्रेरित किया।
उत्तर: युद्ध, सूखा, अवमूल्यन, महँगाई से असंतोष → 1967 की हार
12. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- उत्तराधिकार: नेहरू (मई 1964) → शास्त्री (कामराज की पहल; जय जवान जय किसान; ताशकंद जनवरी 1966) → इंदिरा (मोरारजी को हराया; सिंडिकेट का समर्थन)।
- सिंडिकेट: कामराज, पाटिल, अतुल्य घोष, निजलिंगप्पा, संजीव रेड्डी।
- 1967: युद्ध, सूखा, अवमूल्यन (1966) → गैर-कांग्रेसवाद (लोहिया) → लोकसभा 283 सीटें, 9 राज्यों में हार ("राजनीतिक भूकंप"); SVD गठबंधन; "आया राम, गया राम"।
- 1969: दस सूत्री कार्यक्रम, राष्ट्रपति चुनाव (गिरि बनाम रेड्डी, "अंतरात्मा की आवाज़"), 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण → कांग्रेस (O) बनाम कांग्रेस (R)।
- 1971: "इंदिरा हटाओ" बनाम "ग़रीबी हटाओ"; कांग्रेस (R) को 352 सीटें; प्रिवी पर्स समाप्त (26वाँ संशोधन); नेता-केंद्रित नई कांग्रेस।