1. अध्याय एक नज़र में
स्वतंत्रता के समय दुनिया द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही से उबर रही थी और शीत युद्ध शुरू हो चुका था — अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व में दो गुट बन रहे थे। ऐसे में नए स्वतंत्र, गरीब भारत को अपनी विदेश नीति तय करनी थी। भारत ने किसी गुट में शामिल होने के बजाय गुटनिरपेक्षता (Non-alignment) का मार्ग चुना। इस अध्याय में हम भारत की विदेश नीति के सिद्धांत, नेहरू की भूमिका, चीन और पाकिस्तान के साथ संघर्ष, तथा भारत की परमाणु नीति को समझेंगे।
- अंतरराष्ट्रीय संदर्भ और भारत की विदेश नीति के सिद्धांत।
- नेहरू और गुटनिरपेक्षता; बांडुंग सम्मेलन, गुटनिरपेक्ष आंदोलन।
- चीन के साथ शांति और संघर्ष — पंचशील, 1962 का युद्ध।
- पाकिस्तान के साथ युद्ध — 1965, 1971; ताशकंद और शिमला समझौते।
- भारत की परमाणु नीति।
2. अंतरराष्ट्रीय संदर्भ और विदेश नीति के सिद्धांत
भारत ने एक कठिन अंतरराष्ट्रीय वातावरण में स्वतंत्रता पाई — उपनिवेशवाद ख़त्म हो रहा था, संयुक्त राष्ट्र बन चुका था, और विश्व दो गुटों में बँट रहा था। भारत की प्राथमिकता थी गरीबी दूर करना और राष्ट्र-निर्माण, इसलिए उसे शांतिपूर्ण अंतरराष्ट्रीय वातावरण चाहिए था।
संविधान के अनुच्छेद 51 (नीति-निदेशक तत्त्व) में विदेश नीति के आदर्श दिए गए हैं — राज्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देगा, राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानजनक संबंध बनाए रखेगा, अंतरराष्ट्रीय कानून और संधियों का सम्मान करेगा, और अंतरराष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता से सुलझाने को प्रोत्साहन देगा।
3. नेहरू और गुटनिरपेक्षता
जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे और उन्होंने स्वतंत्र भारत की विदेश नीति को आकार दिया। नेहरू की विदेश नीति के तीन प्रमुख उद्देश्य थे:
- कठिन संघर्ष से मिली संप्रभुता को बचाए रखना।
- क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा।
- तेज़ आर्थिक विकास।
इन उद्देश्यों के लिए गुटनिरपेक्षता अपनाई गई। गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थता या अलगाव नहीं था — भारत अंतरराष्ट्रीय मामलों में सक्रिय रहा और हर मुद्दे पर उसके गुण-दोष के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेता था। भारत ने दोनों गुटों से संबंध रखे और दोनों से आर्थिक सहायता ली।
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1947 | नई दिल्ली में एशियाई संबंध सम्मेलन — स्वतंत्रता से कुछ महीने पहले |
| 1949 | इंडोनेशिया की स्वतंत्रता के समर्थन में सम्मेलन |
| 1955 | इंडोनेशिया के बांडुंग में एफ़्रो-एशियाई सम्मेलन — एशिया-अफ़्रीका के नव-स्वतंत्र देशों की एकजुटता; गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव |
| 1961 | बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में पहला गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन — नेहरू (भारत), टीटो (यूगोस्लाविया), नासिर (मिस्र), सुकर्णो (इंडोनेशिया), एन्क्रूमा (घाना) प्रमुख संस्थापक |
भारत ने उपनिवेशवाद और रंगभेद का खुलकर विरोध किया, और कोरिया युद्ध जैसे संघर्षों में शांति के लिए मध्यस्थता की। आलोचना: कुछ लोगों ने कहा कि गुटनिरपेक्षता "सिद्धांतहीन" है और भारत ने अपने हितों की रक्षा के लिए किसी गुट से गठबंधन न करके जोखिम लिया; दूसरों ने कहा कि भारत का झुकाव सोवियत संघ की ओर था।
4. चीन के साथ शांति और संघर्ष
- भारत ने 1949 की साम्यवादी क्रांति के बाद चीन की सरकार को सबसे पहले मान्यता देने वाले देशों में से एक था; संयुक्त राष्ट्र में चीन की सदस्यता का समर्थन किया।
- 29 अप्रैल 1954 को नेहरू और चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाई ने पंचशील — शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांतों — की घोषणा की: (1) एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान, (2) अनाक्रमण, (3) एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, (4) समानता और पारस्परिक लाभ, (5) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व। "हिंदी-चीनी भाई-भाई" का नारा लोकप्रिय हुआ।
- तिब्बत: 1950 में चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया; 1959 में तिब्बती विद्रोह के बाद दलाई लामा को भारत ने शरण दी। इससे चीन नाराज़ हुआ।
- सीमा विवाद: पश्चिम में अक्साई चिन (लद्दाख) और पूर्व में नेफ़ा (आज का अरुणाचल प्रदेश) पर विवाद। चीन ने मैकमोहन रेखा को मानने से इनकार किया।
- 1962 का युद्ध: अक्टूबर 1962 में चीन ने दोनों क्षेत्रों में बड़ा आक्रमण किया; भारत को पराजय मिली; चीन ने एकतरफ़ा युद्धविराम किया।
(1) भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को धक्का लगा और नेहरू की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई; (2) रक्षा मंत्री वी. के. कृष्ण मेनन को इस्तीफ़ा देना पड़ा; (3) नेहरू सरकार के विरुद्ध पहली बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया; (4) सेना के आधुनिकीकरण की ज़रूरत महसूस हुई; (5) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में मतभेद गहराए, जो 1964 में विभाजन तक पहुँचे; (6) पूर्वोत्तर क्षेत्र की ओर अधिक ध्यान दिया गया। भारत-चीन संबंध 1976 में पूर्ण राजनयिक संबंध बहाल होने और 1988 में राजीव गांधी की यात्रा के बाद धीरे-धीरे सामान्य हुए।
5. पाकिस्तान के साथ युद्ध और शांति
| घटना | विवरण |
|---|---|
| 1947-48 कश्मीर | पाकिस्तान समर्थित क़बायली हमले के बाद कश्मीर का भारत में विलय; युद्ध; मामला संयुक्त राष्ट्र गया; नियंत्रण रेखा बनी |
| सिंधु जल संधि (1960) | विश्व बैंक की मध्यस्थता से नेहरू और जनरल अयूब ख़ान के बीच — सहयोग का उदाहरण |
| 1965 का युद्ध | अप्रैल 1965 में गुजरात के कच्छ के रण में हमला; अगस्त-सितंबर में जम्मू-कश्मीर में बड़ा आक्रमण; प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भारतीय सेना ने लाहौर की ओर बढ़कर जवाब दिया; संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से युद्धविराम |
| ताशकंद समझौता (जनवरी 1966) | सोवियत संघ की मध्यस्थता से शास्त्री और अयूब ख़ान के बीच; ताशकंद में ही शास्त्री जी का निधन। शास्त्री जी ने "जय जवान, जय किसान" का नारा दिया था |
| 1971 का युद्ध | पूर्वी पाकिस्तान में शेख़ मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग की चुनावी जीत के बाद पश्चिमी पाकिस्तान का दमन; लगभग 80 लाख शरणार्थी भारत आए; अगस्त 1971 में भारत-सोवियत मैत्री संधि; दिसंबर 1971 में युद्ध; 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण; बांग्लादेश का उदय। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लोकप्रियता चरम पर |
| शिमला समझौता (जुलाई 1972) | इंदिरा गांधी और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के बीच — विवादों को द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाने का संकल्प |
6. भारत की परमाणु नीति
- प्रारंभ: नेहरू ने परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर बल दिया; वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा के नेतृत्व में 1940 के दशक के अंत में परमाणु कार्यक्रम शुरू हुआ। नेहरू परमाणु हथियारों के विरोधी थे और व्यापक परमाणु निरस्त्रीकरण की माँग करते थे।
- NPT (1968): भारत ने इसे भेदभावपूर्ण मानकर हस्ताक्षर नहीं किए, क्योंकि यह केवल पाँच परमाणु शक्तियों (अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन) को हथियार रखने देती है। चीन ने 1964 में परमाणु परीक्षण किया था, जिससे भारत की सुरक्षा चिंता बढ़ी।
- पोखरण-I (18 मई 1974): भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया और इसे "शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट" कहा।
- CTBT (1996): व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर भी भारत ने भेदभावपूर्ण मानकर हस्ताक्षर नहीं किए।
- पोखरण-II (मई 1998): प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय परमाणु परीक्षण कर भारत ने स्वयं को परमाणु हथियार संपन्न देश घोषित किया; इसके बाद पाकिस्तान ने भी परीक्षण किए।
- परमाणु सिद्धांत: "पहले प्रयोग नहीं" (No First Use), विश्वसनीय न्यूनतम अवरोध, और सार्वभौमिक, भेदभाव-रहित परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रति प्रतिबद्धता।
7. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| गुटनिरपेक्षता | किसी सैन्य गुट में शामिल न होकर स्वतंत्र विदेश नीति |
| पंचशील | 1954 — भारत-चीन के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत |
| बांडुंग सम्मेलन | 1955 — एफ़्रो-एशियाई देशों का सम्मेलन |
| NAM | गुटनिरपेक्ष आंदोलन — 1961, बेलग्रेड |
| मैकमोहन रेखा | पूर्वी क्षेत्र में भारत-चीन सीमा रेखा, जिसे चीन नहीं मानता |
| ताशकंद समझौता | जनवरी 1966 — 1965 युद्ध के बाद भारत-पाकिस्तान समझौता |
| शिमला समझौता | जुलाई 1972 — द्विपक्षीय बातचीत से विवाद सुलझाना |
| NPT | 1968 — परमाणु अप्रसार संधि; भारत ने हस्ताक्षर नहीं किए |
| CTBT | 1996 — व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि |
| पहले प्रयोग नहीं | भारत की परमाणु हथियार नीति |
8. मास्टर सारांश तालिका
| विषय | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| सिद्धांत | अनु. 51; संप्रभुता, अखंडता, विकास; गुटनिरपेक्षता |
| नेहरू | PM + विदेश मंत्री; एशियाई संबंध सम्मेलन 1947, बांडुंग 1955, NAM 1961 |
| चीन | पंचशील 1954; दलाई लामा 1959; युद्ध 1962 (अक्साई चिन, नेफ़ा); कृष्ण मेनन का इस्तीफ़ा |
| पाकिस्तान | 1947-48; सिंधु संधि 1960; 1965 (शास्त्री, ताशकंद 1966); 1971 (इंदिरा, बांग्लादेश, शिमला 1972) |
| परमाणु नीति | भाभा; NPT व CTBT पर हस्ताक्षर नहीं; पोखरण 1974, 1998; पहले प्रयोग नहीं |
चार्ट — गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सदस्यता:
9. माइंड मैप
- अनु. 51
- गुटनिरपेक्षता
- बांडुंग 1955
- NAM 1961
- पंचशील
- 1962 युद्ध
- 1965, ताशकंद
- 1971, शिमला
- 1974, 1998
- पहले प्रयोग नहीं
10. टिप्स और ट्रिक्स
- NAM के 5 संस्थापक "ने-टी-ना-सु-एन": नेहरू, टीटो, नासिर, सुकर्णो, एन्क्रूमा।
- युद्ध और समझौते जोड़ें: "65 → ताशकंद 66 (शास्त्री), 71 → शिमला 72 (इंदिरा)"।
- "54 पंचशील, 55 बांडुंग, 61 बेलग्रेड, 62 युद्ध"।
- गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थता नहीं; भारत अंतरराष्ट्रीय मामलों में सक्रिय रहा।
- बांडुंग (1955) NAM का पहला शिखर सम्मेलन नहीं था; पहला शिखर सम्मेलन बेलग्रेड (1961) में हुआ।
- ताशकंद समझौते की मध्यस्थता अमेरिका ने नहीं, सोवियत संघ ने की।
11. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर
- अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति को बढ़ावा देने का निर्देश देता है।
- एशियाई संबंध सम्मेलन 1947 में नई दिल्ली में हुआ।
- बांडुंग सम्मेलन 1955 में इंडोनेशिया में हुआ।
- पहला गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन 1961 में बेलग्रेड में हुआ।
- पंचशील पर 29 अप्रैल 1954 को सहमति हुई।
- दलाई लामा को 1959 में भारत में शरण मिली।
- भारत-चीन युद्ध अक्टूबर 1962 में हुआ।
- ताशकंद समझौता जनवरी 1966 में हुआ।
- "जय जवान, जय किसान" का नारा शास्त्री जी ने दिया।
- भारत-सोवियत मैत्री संधि अगस्त 1971 में हुई।
- शिमला समझौता जुलाई 1972 में हुआ।
- पोखरण-I परीक्षण 18 मई 1974 को हुआ।
12. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
पंचशील समझौता किन दो देशों के बीच हुआ?
- भारत-पाकिस्तान
- भारत-चीन
- भारत-नेपाल
- भारत-सोवियत संघ
उत्तर देखें
29 अप्रैल 1954 को नेहरू और चाऊ एन-लाई ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांतों (पंचशील) की घोषणा की।
उत्तर: (ख) भारत-चीन
शिमला समझौता (1972) किनके बीच हुआ?
- शास्त्री और अयूब ख़ान
- इंदिरा गांधी और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो
- नेहरू और लियाक़त अली
- वाजपेयी और नवाज़ शरीफ़
उत्तर देखें
1971 के युद्ध के बाद जुलाई 1972 में इंदिरा गांधी और भुट्टो के बीच शिमला समझौता हुआ।
उत्तर: (ख) इंदिरा गांधी और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो
गुटनिरपेक्षता का अर्थ बताइए।
उत्तर देखें
गुटनिरपेक्षता का अर्थ है शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व वाले किसी भी सैन्य गुट में शामिल न होना, और हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर उसके गुण-दोष के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेना। यह तटस्थता नहीं, बल्कि सक्रिय और स्वतंत्र विदेश नीति है।
उत्तर: सैन्य गुटों से दूर, स्वतंत्र और सक्रिय विदेश नीति
नेहरू की विदेश नीति के तीन उद्देश्य बताइए। गुटनिरपेक्षता ने इन्हें कैसे पूरा किया?
उत्तर देखें
उद्देश्य: (1) कठिन संघर्ष से मिली संप्रभुता की रक्षा; (2) क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा; (3) तेज़ आर्थिक विकास। गुटनिरपेक्षता की भूमिका: किसी गुट में शामिल न होने से भारत को अपनी नीतियाँ स्वयं तय करने की स्वतंत्रता मिली (संप्रभुता); दोनों गुटों से आर्थिक-तकनीकी सहायता ली जा सकी (विकास); और भारत शीत युद्ध के संघर्षों में घसीटे जाने से बचा, जिससे संसाधन विकास पर लगे।
उत्तर: संप्रभुता, अखंडता, विकास — स्वतंत्र नीति व दोनों गुटों से सहायता
1962 के भारत-चीन युद्ध के कारण बताइए।
उत्तर देखें
(1) सीमा विवाद: पश्चिम में अक्साई चिन और पूर्व में नेफ़ा (अरुणाचल प्रदेश) पर दोनों के अलग दावे; चीन ने मैकमोहन रेखा को अस्वीकार किया। (2) तिब्बत: 1950 में चीन का तिब्बत पर नियंत्रण और 1959 में भारत द्वारा दलाई लामा को शरण देना, जिसे चीन ने शत्रुतापूर्ण माना। (3) चीन द्वारा अक्साई चिन में सड़क निर्माण। (4) बातचीत से विवाद न सुलझ पाना। इन कारणों से अक्टूबर 1962 में चीन ने दोनों मोर्चों पर बड़ा हमला किया।
उत्तर: सीमा विवाद, तिब्बत व दलाई लामा, अक्साई चिन
भारत ने NPT पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए?
उत्तर देखें
1968 की NPT उन पाँच देशों (अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन) को परमाणु हथियार रखने का अधिकार देती है जिन्होंने 1967 से पहले परीक्षण किए थे, और बाक़ी देशों को हथियार बनाने से रोकती है। भारत ने इसे भेदभावपूर्ण माना, क्योंकि इसमें परमाणु शक्तियों पर निरस्त्रीकरण की कोई बाध्यता नहीं थी। चीन के 1964 के परमाणु परीक्षण के बाद भारत की सुरक्षा चिंताएँ भी थीं। भारत सार्वभौमिक और भेदभाव-रहित निरस्त्रीकरण का समर्थक है।
उत्तर: संधि भेदभावपूर्ण; सुरक्षा चिंता; सार्वभौमिक निरस्त्रीकरण का समर्थन
1971 के बांग्लादेश युद्ध की पृष्ठभूमि और परिणाम बताइए।
उत्तर देखें
पृष्ठभूमि: 1970 के चुनाव में पूर्वी पाकिस्तान की अवामी लीग (शेख़ मुजीबुर्रहमान) को बहुमत मिला, पर पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों ने सत्ता देने से इनकार किया और मार्च 1971 से भीषण सैन्य दमन किया; लगभग 80 लाख शरणार्थी भारत आए। भारत ने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम का समर्थन किया; अगस्त 1971 में भारत-सोवियत मैत्री संधि हुई। परिणाम: दिसंबर 1971 में युद्ध; 16 दिसंबर को ढाका में लगभग 90 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण; बांग्लादेश का उदय; इंदिरा गांधी की लोकप्रियता चरम पर; जुलाई 1972 में शिमला समझौता।
उत्तर: पूर्वी पाकिस्तान में दमन व शरणार्थी → युद्ध → बांग्लादेश का उदय, शिमला समझौता
गुटनिरपेक्षता की नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर देखें
सफलताएँ: (1) भारत ने शीत युद्ध में स्वतंत्र निर्णय की क्षमता बनाए रखी; (2) दोनों गुटों से आर्थिक और तकनीकी सहायता ली; (3) एशिया-अफ़्रीका के नव-स्वतंत्र देशों का नेतृत्व किया — बांडुंग 1955, NAM 1961; (4) उपनिवेशवाद और रंगभेद के विरुद्ध आवाज़ उठाई; (5) कोरिया युद्ध जैसे संघर्षों में शांति के लिए मध्यस्थता की। आलोचनाएँ: (1) इसे "सिद्धांतहीन" कहा गया — भारत ने राष्ट्रीय हितों के नाम पर कई बार स्पष्ट रुख़ नहीं अपनाया; (2) 1962 के युद्ध में भारत अकेला पड़ गया और उसे अमेरिका-ब्रिटेन से सहायता माँगनी पड़ी; (3) 1971 में सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि को गुटनिरपेक्षता से विचलन माना गया। निष्कर्ष: यह नीति अपने समय की परिस्थितियों में भारत के हितों के लिए उपयोगी थी और आज की "रणनीतिक स्वायत्तता" की नीति की आधारशिला है।
उत्तर: स्वतंत्रता, सहायता, नेतृत्व; सिद्धांतहीनता व 1962-71 की आलोचना; रणनीतिक स्वायत्तता की नींव
1962 के युद्ध के भारत की राजनीति और विदेश नीति पर प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर देखें
राजनीतिक प्रभाव: (1) नेहरू की छवि और प्रतिष्ठा को धक्का; (2) रक्षा मंत्री वी. के. कृष्ण मेनन का इस्तीफ़ा; (3) नेहरू सरकार के विरुद्ध पहली बार अविश्वास प्रस्ताव; (4) कांग्रेस की लोकप्रियता घटने लगी — 1963 के उपचुनावों में हार; (5) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में चीन समर्थक और सोवियत समर्थक धड़ों के बीच मतभेद, जो 1964 में CPI और CPI(M) के विभाजन में बदले। विदेश-रक्षा नीति पर प्रभाव: (1) सेना के आधुनिकीकरण और रक्षा बजट में वृद्धि; (2) गुटनिरपेक्षता की सीमाएँ उजागर हुईं — भारत को पश्चिमी देशों से सैन्य सहायता माँगनी पड़ी; (3) पूर्वोत्तर क्षेत्र की सुरक्षा और विकास पर ध्यान; (4) चीन के साथ संबंध लंबे समय तक ठंडे रहे — 1976 में राजदूत स्तर के संबंध बहाल।
उत्तर: नेहरू की प्रतिष्ठा घटी, मेनन का इस्तीफ़ा, CPI विभाजन; सेना आधुनिकीकरण, चीन से ठंडे संबंध
भारत की परमाणु नीति के विकास को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखें
(1) प्रारंभिक चरण: नेहरू ने होमी जहाँगीर भाभा के नेतृत्व में परमाणु कार्यक्रम शुरू किया, पर इसका उद्देश्य परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग था; नेहरू परमाणु हथियारों के विरोधी और व्यापक निरस्त्रीकरण के समर्थक थे। (2) चीन का परीक्षण (1964) और NPT (1968) की भेदभावपूर्ण प्रकृति ने भारत को परमाणु विकल्प खुला रखने के लिए प्रेरित किया; भारत ने NPT पर हस्ताक्षर नहीं किए। (3) पोखरण-I (18 मई 1974): "शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट"। (4) CTBT (1996) को भी भेदभावपूर्ण मानकर अस्वीकार किया। (5) पोखरण-II (मई 1998): भारत ने स्वयं को परमाणु हथियार संपन्न देश घोषित किया। (6) सिद्धांत: "पहले प्रयोग नहीं", विश्वसनीय न्यूनतम अवरोध, गैर-परमाणु देशों पर प्रयोग नहीं, और सार्वभौमिक निरस्त्रीकरण की प्रतिबद्धता। इस प्रकार भारत की नीति शांति और सुरक्षा के बीच संतुलन पर आधारित है।
उत्तर: शांतिपूर्ण उपयोग → NPT अस्वीकार → 1974 → 1998 → पहले प्रयोग नहीं
भारत-पाकिस्तान संबंधों में संघर्ष और सहयोग दोनों के उदाहरण देकर विश्लेषण कीजिए।
उत्तर देखें
संघर्ष: (1) 1947-48 — कश्मीर पर पाकिस्तान समर्थित हमला और युद्ध; (2) 1965 — कच्छ और कश्मीर में आक्रमण, भारत का जवाबी हमला; (3) 1971 — बांग्लादेश युद्ध; (4) बाद में कारगिल (1999) और सीमा-पार आतंकवाद। सहयोग: (1) सिंधु जल संधि (1960) — विश्व बैंक की मध्यस्थता से, कई युद्धों के बावजूद दशकों तक लागू रही; (2) ताशकंद समझौता (1966) — युद्ध-पूर्व स्थिति की बहाली और शांतिपूर्ण संबंधों का संकल्प; (3) शिमला समझौता (1972) — विवादों को द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाने की सहमति; युद्धबंदियों की वापसी। निष्कर्ष: दोनों देशों के संबंध कश्मीर और सुरक्षा चिंताओं के कारण तनावपूर्ण रहे, पर सहयोग के उदाहरण दिखाते हैं कि बातचीत और समझौते से समाधान संभव है।
उत्तर: 1947-48, 1965, 1971 युद्ध; सिंधु संधि, ताशकंद, शिमला सहयोग
13. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- अंतरराष्ट्रीय संदर्भ: शीत युद्ध, उपनिवेशवाद का अंत; अनु. 51 — शांति, अंतरराष्ट्रीय कानून, मध्यस्थता।
- नेहरू: संप्रभुता, अखंडता, विकास; गुटनिरपेक्षता (तटस्थता नहीं); एशियाई संबंध सम्मेलन 1947, बांडुंग 1955, NAM बेलग्रेड 1961 (नेहरू, टीटो, नासिर, सुकर्णो, एन्क्रूमा)।
- चीन: पंचशील 1954; दलाई लामा 1959; युद्ध 1962 (अक्साई चिन, नेफ़ा); कृष्ण मेनन का इस्तीफ़ा, अविश्वास प्रस्ताव, CPI विभाजन 1964।
- पाकिस्तान: 1947-48; सिंधु संधि 1960; 1965 (शास्त्री, "जय जवान जय किसान", ताशकंद 1966); 1971 (इंदिरा, भारत-सोवियत संधि, बांग्लादेश, शिमला 1972)।
- परमाणु नीति: भाभा; NPT व CTBT अस्वीकार; पोखरण 18 मई 1974 व 1998; पहले प्रयोग नहीं।