Class 12 Political Science · Chapter 6 · समकालीन विश्व राजनीति

पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

वैश्विक राजनीति में पर्यावरण, साझी विरासत, साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ, संसाधनों की भू-राजनीति, मूलवासी और भारत का पक्ष।

NCERT समकालीन विश्व राजनीति + स्वतंत्र भारत में राजनीतिCBSE Class 12 15 min read

1. अध्याय एक नज़र में

बढ़ता तापमान, पिघलते ग्लेशियर, घटते जंगल, प्रदूषित नदियाँ और ओज़ोन परत में छेद — ये समस्याएँ किसी एक देश की नहीं, पूरी दुनिया की हैं। 1960 के दशक के बाद पर्यावरण विश्व राजनीति का प्रमुख मुद्दा बना। इस अध्याय में हम समझेंगे कि पर्यावरण वैश्विक राजनीति का विषय क्यों बना, विश्व की साझी संपदा क्या है, साझी पर अलग-अलग ज़िम्मेदारियों का सिद्धांत, संसाधनों की भू-राजनीति, मूल निवासियों के अधिकार और पर्यावरण पर भारत का दृष्टिकोण।

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • पर्यावरण वैश्विक राजनीति का विषय क्यों बना।
  • रियो पृथ्वी सम्मेलन, टिकाऊ विकास, क्योटो प्रोटोकॉल, पेरिस समझौता।
  • विश्व की साझी संपदा और उसकी रक्षा।
  • उत्तर बनाम दक्षिण — साझी पर अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ।
  • संसाधनों की भू-राजनीति, मूल निवासी और भारत का पक्ष।

2. पर्यावरण वैश्विक राजनीति का विषय क्यों?

  • कृषि-भूमि का क्षरण: दुनिया भर में खेती योग्य भूमि बढ़ नहीं रही, जबकि उपजाऊ भूमि का बड़ा हिस्सा बंजर हो रहा है; चरागाह खत्म हो रहे हैं।
  • जल संकट: विकासशील देशों में करोड़ों लोगों को स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता सुविधा उपलब्ध नहीं; जल-जनित बीमारियों से बड़ी संख्या में बच्चों की मृत्यु।
  • वनों की कटाई: प्राकृतिक वन जलवायु संतुलन, जल चक्र और जैव विविधता के लिए आवश्यक हैं, पर तेज़ी से घट रहे हैं।
  • ओज़ोन परत का क्षरण: क्लोरोफ़्लोरोकार्बन (CFC) जैसी गैसों से ओज़ोन परत पतली हुई, जिससे पराबैंगनी किरणों का ख़तरा।
  • समुद्री प्रदूषण और तटीय क्षेत्रों का क्षरण।
  • जलवायु परिवर्तन — ग्रीनहाउस गैसों से वैश्विक तापमान वृद्धि।

ये समस्याएँ सीमाओं को नहीं मानतीं और कोई देश अकेले इनसे नहीं निपट सकता — इसलिए पर्यावरण अंतरराष्ट्रीय सहयोग और राजनीतिक बहस का विषय बना: किसे कितना त्याग करना चाहिए, कौन ज़िम्मेदार है, और कौन ख़र्च उठाएगा?

वर्षप्रमुख घटना
1972क्लब ऑफ़ रोम की पुस्तक "लिमिट्स टू ग्रोथ" — बढ़ती जनसंख्या के साथ संसाधनों के समाप्त होने की चेतावनी; स्टॉकहोम में UN मानव पर्यावरण सम्मेलन; UNEP की स्थापना
1987ब्रुंटलैंड रिपोर्ट — "अवर कॉमन फ़्यूचर" — टिकाऊ विकास (Sustainable Development) की अवधारणा: ऐसा विकास जो वर्तमान की ज़रूरतें भावी पीढ़ियों की ज़रूरतों से समझौता किए बिना पूरी करे; मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (ओज़ोन परत की रक्षा)
1992रियो डी जनेरियो (ब्राज़ील) पृथ्वी सम्मेलन — 170 देश; जलवायु परिवर्तन (UNFCCC), जैव विविधता (CBD), वानिकी पर समझौते; एजेंडा-21
1997क्योटो प्रोटोकॉल (जापान) — विकसित देशों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के बाध्यकारी लक्ष्य; 2005 से लागू
2015पेरिस समझौता — वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से काफ़ी नीचे, और 1.5°C तक सीमित रखने का प्रयास; सभी देश अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) तय करेंगे

रियो सम्मेलन में यह स्पष्ट हुआ कि उत्तर (विकसित, अमीर देश) और दक्षिण (विकासशील, गरीब देश) की प्राथमिकताएँ अलग हैं — उत्तर ओज़ोन क्षरण और ग्लोबल वार्मिंग पर ज़ोर देता था, जबकि दक्षिण आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के बीच संबंध पर।

3. विश्व की साझी संपदा (Global Commons)

साझी संपदा वे संसाधन हैं जिन पर किसी एक का नहीं, पूरे समुदाय का अधिकार होता है — जैसे गाँव का कुआँ, चरागाह, नदी। विश्व स्तर पर कुछ क्षेत्र किसी देश के क्षेत्राधिकार में नहीं आते — इन्हें "मानवता की साझी विरासत" या विश्व की साझी संपदा कहते हैं:

  • पृथ्वी का वायुमंडल
  • अंटार्कटिका
  • समुद्री सतह और खुला समुद्र (राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर)
  • बाहरी अंतरिक्ष (Outer Space)
समझौतावर्षउद्देश्य
अंटार्कटिका संधि1959अंटार्कटिका का केवल शांतिपूर्ण, वैज्ञानिक उपयोग
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल1987ओज़ोन परत को नुक़सान पहुँचाने वाले पदार्थों पर रोक
अंटार्कटिका पर्यावरण प्रोटोकॉल1991अंटार्कटिका के पर्यावरण की रक्षा

चुनौतियाँ: साझी संपदा पर सहमति बनाना कठिन है, क्योंकि वैज्ञानिक प्रमाणों की व्याख्या, समय-सीमा और बोझ के बँटवारे पर मतभेद होते हैं। बाहरी अंतरिक्ष के प्रबंधन पर उत्तर-दक्षिण असमानता स्पष्ट है — तकनीक और उद्योग में आगे देश ही अंतरिक्ष का अधिक लाभ उठाते हैं।

4. साझी पर अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ

पर्यावरण पर उत्तर और दक्षिण के बीच मूल विवाद है — ज़िम्मेदारी किसकी?

विकसित देशों (उत्तर) का तर्कविकासशील देशों (दक्षिण) का तर्क
पर्यावरण की रक्षा में सभी देशों की बराबर ज़िम्मेदारी होपर्यावरण का अधिकांश नुक़सान विकसित देशों के औद्योगिक विकास से हुआ है; इसलिए उन्हें अधिक ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए
विकासशील देश भी अब बड़े उत्सर्जक हैंविकासशील देशों को अभी विकास करना है; उन पर समान प्रतिबंध अनुचित हैं; उनका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बहुत कम है

रियो घोषणा-पत्र ने "साझी पर अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ" (Common but Differentiated Responsibilities — CBDR) का सिद्धांत स्वीकार किया — पर्यावरण की रक्षा सबकी साझी ज़िम्मेदारी है, पर विकसित देशों की ज़िम्मेदारी अधिक है क्योंकि उन्होंने अधिक प्रदूषण किया और उनके पास अधिक संसाधन व तकनीक हैं। इसी आधार पर क्योटो प्रोटोकॉल में भारत, चीन जैसे विकासशील देशों को बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्यों से छूट दी गई।

5. संसाधनों की भू-राजनीति

  • तेल: यूरोपीय औपनिवेशिक विस्तार से लेकर आज तक संसाधनों पर नियंत्रण शक्ति का स्रोत रहा है। 20वीं शताब्दी में पेट्रोलियम सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन बना; विश्व के तेल भंडार का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया (विशेषकर खाड़ी क्षेत्र) में है, इसलिए यह क्षेत्र महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा और संघर्षों का केंद्र रहा।
  • सामरिक खनिज: शीत युद्ध में महाशक्तियाँ यूरेनियम, दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत रहीं; आज लिथियम और दुर्लभ मृदा तत्त्व (बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए) नई प्रतिस्पर्धा के विषय हैं।
  • जल: मीठा पानी सीमित और असमान रूप से वितरित है; कई देश एक ही नदी साझा करते हैं — जैसे नील, सिंधु, गंगा-ब्रह्मपुत्र, मेकांग — जिससे जल-युद्ध की आशंका व्यक्त की जाती है। ऐसे विवादों को संधियों से सुलझाना आवश्यक है।

6. मूल निवासी और उनके अधिकार

मूल निवासी (Indigenous People) वे लोग हैं जो किसी क्षेत्र में सदियों से रहते आए हैं, पर बाद में आए लोगों के प्रभुत्व में हाशिये पर चले गए। उनकी पहचान, संस्कृति और आजीविका ज़मीन, जंगल और प्रकृति से गहराई से जुड़ी है। फ़िलीपींस का कोर्डिलेरा क्षेत्र, चिली के मापुशे, बांग्लादेश के चटगाँव पर्वतीय क्षेत्र के आदिवासी और भारत के जनजातीय समुदाय इसके उदाहरण हैं।

  • मूल निवासियों की विश्व परिषद (1975) बनी; UN में इन्हें आवाज़ मिली।
  • मुद्दे: विकास परियोजनाओं से विस्थापन (बाँध, खनन), ज़मीन और संसाधनों पर अधिकार, सांस्कृतिक पहचान की रक्षा।
  • भारत में वन अधिकार अधिनियम (2006) और PESA (1996) इनके अधिकारों की रक्षा के प्रयास हैं।

7. पर्यावरण पर भारत का पक्ष

  • भारत ने 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर कर उसका अनुमोदन किया; भारत, चीन और अन्य विकासशील देशों को CBDR के आधार पर बाध्यकारी लक्ष्यों से छूट मिली।
  • भारत का तर्क: ग्रीनहाउस गैसों के ऐतिहासिक और वर्तमान प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में विकसित देशों का हिस्सा कहीं अधिक है; भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विश्व औसत से बहुत कम है।
  • भारत विकसित देशों से वित्तीय सहायता और तकनीक हस्तांतरण की माँग करता है।
  • घरेलू कदम: राष्ट्रीय ऑटो-ईंधन नीति (स्वच्छ ईंधन), ऊर्जा संरक्षण अधिनियम (2001), विद्युत अधिनियम (2003) — नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा; जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (2008) के आठ मिशन; प्राकृतिक गैस और स्वच्छ कोयला तकनीक।
  • वैश्विक पहल: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA, 2015) — भारत और फ़्रांस की पहल; मिशन LiFE (पर्यावरण के लिए जीवनशैली)।
  • लक्ष्य: COP-26 (ग्लासगो, 2021) में भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया।
1972स्टॉकहोम,लिमिट्स टू ग्रोथ 1987ब्रुंटलैंड,मॉन्ट्रियल 1992रियो पृथ्वीसम्मेलन, CBDR 1997क्योटोप्रोटोकॉल 2015पेरिससमझौता
वैश्विक पर्यावरण राजनीति की प्रमुख घटनाएँ (विचार-चित्र)।

8. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली

शब्दअर्थ
टिकाऊ विकासभावी पीढ़ियों की ज़रूरतों से समझौता किए बिना वर्तमान का विकास
विश्व की साझी संपदावायुमंडल, अंटार्कटिका, खुला समुद्र, बाहरी अंतरिक्ष
CBDRसाझी पर अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ — विकसित देशों की अधिक ज़िम्मेदारी
UNFCCCजलवायु परिवर्तन पर UN फ़्रेमवर्क संधि (1992)
क्योटो प्रोटोकॉल1997 — विकसित देशों के लिए उत्सर्जन घटाने के बाध्यकारी लक्ष्य
पेरिस समझौता2015 — 2°C से नीचे, 1.5°C का प्रयास; NDC
NDCराष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान
ग्रीनहाउस गैसेंकार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन आदि — तापमान वृद्धि का कारण
भू-राजनीतिभूगोल और संसाधनों से जुड़ी शक्ति-राजनीति
मूल निवासीकिसी क्षेत्र के मूल, पारंपरिक निवासी

9. मास्टर सारांश तालिका

विषयमुख्य बिंदु
वैश्विक मुद्दा क्योंभूमि, जल, वन, ओज़ोन, समुद्र, जलवायु — सीमापार समस्याएँ
प्रमुख पड़ाव1972 लिमिट्स टू ग्रोथ, 1987 ब्रुंटलैंड, 1992 रियो, 1997 क्योटो, 2015 पेरिस
साझी संपदाअंटार्कटिका संधि 1959, मॉन्ट्रियल 1987, अंटार्कटिका प्रोटोकॉल 1991
उत्तर बनाम दक्षिणबराबर बनाम अलग-अलग ज़िम्मेदारी → CBDR
भू-राजनीतितेल (पश्चिम एशिया), खनिज, जल-विवाद
मूल निवासीविश्व परिषद 1975; विस्थापन; FRA 2006
भारतक्योटो 2002, प्रति व्यक्ति कम उत्सर्जन, ISA, नेट-ज़ीरो 2070

चार्ट — पेरिस समझौते के तहत भारत के अद्यतन NDC (2022) लक्ष्य, 2030 तक:

गैर-जीवाश्म स्रोतों से विद्युत क्षमता का हिस्सा50%
GDP की उत्सर्जन तीव्रता में कमी (2005 के स्तर से)45%

10. माइंड मैप

पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन
सम्मेलन
  • रियो 1992
  • क्योटो, पेरिस
साझी संपदा
  • अंटार्कटिका
  • वायुमंडल, अंतरिक्ष
CBDR
  • उत्तर बनाम दक्षिण
  • ऐतिहासिक उत्सर्जन
भू-राजनीति
  • तेल
  • जल
भारत
  • ISA
  • नेट-ज़ीरो 2070

11. टिप्स और ट्रिक्स

याद रखने के सूत्र
  • क्रम "72-87-92-97-15": लिमिट्स टू ग्रोथ → ब्रुंटलैंड → रियो → क्योटो → पेरिस।
  • साझी संपदा "वा-अं-स-अं": वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्र, अंतरिक्ष।
  • CBDR = "सबकी ज़िम्मेदारी, पर अमीरों की ज़्यादा"।
आम गलतियाँ
  • "अवर कॉमन फ़्यूचर" ब्रुंटलैंड रिपोर्ट (1987) है; "लिमिट्स टू ग्रोथ" क्लब ऑफ़ रोम (1972) की।
  • क्योटो प्रोटोकॉल 1997 में अपनाया गया, पर 2005 से लागू हुआ।
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ओज़ोन परत से जुड़ा है, ग्लोबल वार्मिंग से नहीं।

12. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर

  • "लिमिट्स टू ग्रोथ" क्लब ऑफ़ रोम ने 1972 में प्रकाशित की।
  • UNEP की स्थापना 1972 में हुई।
  • ब्रुंटलैंड रिपोर्ट "अवर कॉमन फ़्यूचर" 1987 में आई।
  • पृथ्वी सम्मेलन 1992 में रियो डी जनेरियो में हुआ।
  • एजेंडा-21 रियो सम्मेलन से जुड़ा है।
  • क्योटो प्रोटोकॉल 1997 में हुआ।
  • भारत ने 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल का अनुमोदन किया।
  • अंटार्कटिका संधि 1959 में हुई।
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल 1987 में हुआ।
  • पेरिस समझौता 2015 में हुआ।
  • अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन भारत और फ़्रांस की पहल है।
  • भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो का लक्ष्य रखा है।

13. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)

प्र1आसान

पृथ्वी सम्मेलन (1992) कहाँ हुआ?

  1. स्टॉकहोम
  2. रियो डी जनेरियो
  3. क्योटो
  4. पेरिस
उत्तर देखें

1992 का UN पर्यावरण और विकास सम्मेलन (पृथ्वी सम्मेलन) ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो में हुआ।

उत्तर: (ख) रियो डी जनेरियो

प्र2आसान

इनमें से कौन विश्व की साझी संपदा नहीं है?

  1. अंटार्कटिका
  2. बाहरी अंतरिक्ष
  3. हिमालय
  4. पृथ्वी का वायुमंडल
उत्तर देखें

हिमालय विभिन्न देशों के क्षेत्राधिकार में आता है; बाक़ी तीन किसी एक देश के क्षेत्राधिकार में नहीं हैं।

उत्तर: (ग) हिमालय

प्र3आसान

टिकाऊ विकास का अर्थ बताइए।

उत्तर देखें

ब्रुंटलैंड रिपोर्ट (1987) के अनुसार टिकाऊ विकास वह है जो वर्तमान पीढ़ी की ज़रूरतें पूरी करे, पर भावी पीढ़ियों की अपनी ज़रूरतें पूरी करने की क्षमता से समझौता न करे — यानी आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन।

उत्तर: भावी पीढ़ियों का ध्यान रखते हुए वर्तमान का विकास

प्र4मध्यम

पर्यावरण वैश्विक राजनीति का मुद्दा क्यों बना?

उत्तर देखें

(1) कृषि-भूमि का क्षरण, जल संकट, वनों की कटाई, ओज़ोन क्षरण, समुद्री प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ सीमाओं को नहीं मानतीं; (2) कोई एक देश इन्हें अकेले हल नहीं कर सकता — अंतरराष्ट्रीय सहयोग ज़रूरी है; (3) इनके समाधान में "बोझ किसका" — यह राजनीतिक प्रश्न है, जिस पर उत्तर और दक्षिण में मतभेद है; (4) 1972 से संयुक्त राष्ट्र सम्मेलनों और रिपोर्टों ने इसे वैश्विक एजेंडे पर लाया।

उत्तर: सीमापार समस्याएँ, सहयोग की आवश्यकता, ज़िम्मेदारी का राजनीतिक प्रश्न

प्र5मध्यम

"साझी पर अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ" का सिद्धांत समझाइए।

उत्तर देखें

रियो घोषणा-पत्र (1992) के अनुसार पर्यावरण की रक्षा सभी देशों की साझी ज़िम्मेदारी है, पर ज़िम्मेदारी की मात्रा अलग-अलग है। विकसित देशों ने औद्योगिक विकास के दौरान अधिकांश प्रदूषण किया है और उनके पास अधिक संसाधन व तकनीक हैं, इसलिए उन्हें उत्सर्जन में अधिक कटौती करनी चाहिए और विकासशील देशों को वित्त व तकनीक देनी चाहिए। इसी आधार पर क्योटो प्रोटोकॉल में भारत-चीन जैसे विकासशील देशों को बाध्यकारी लक्ष्यों से छूट मिली।

उत्तर: साझी ज़िम्मेदारी, पर विकसित देशों की अधिक

प्र6मध्यम

संसाधनों की भू-राजनीति में तेल की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

उत्तर देखें

20वीं शताब्दी में पेट्रोलियम उद्योग, परिवहन और सेना के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन बना। विश्व के तेल भंडार का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया (खाड़ी क्षेत्र) में है, इसलिए महाशक्तियाँ इस क्षेत्र में प्रभाव बनाए रखने का प्रयास करती रहीं। तेल पर नियंत्रण और आपूर्ति की सुरक्षा कई संघर्षों और युद्धों का कारण बनी; तेल की क़ीमतें विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं। अब नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव से लिथियम और दुर्लभ खनिजों की नई भू-राजनीति उभर रही है।

उत्तर: तेल पर नियंत्रण शक्ति का स्रोत; पश्चिम एशिया प्रतिस्पर्धा का केंद्र

प्र7मध्यम

मूल निवासियों की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं?

उत्तर देखें

(1) बाँध, खनन, उद्योग जैसी विकास परियोजनाओं से विस्थापन और आजीविका का नुक़सान; (2) पारंपरिक ज़मीन और वन-संसाधनों पर कानूनी अधिकारों का अभाव; (3) बाद में आए प्रभावशाली समूहों द्वारा हाशिये पर धकेला जाना और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी; (4) भाषा, संस्कृति और पहचान पर संकट। 1975 में मूल निवासियों की विश्व परिषद बनी; भारत में वन अधिकार अधिनियम 2006 और PESA 1996 इनके अधिकारों के लिए हैं।

उत्तर: विस्थापन, भूमि अधिकार, हाशियाकरण, सांस्कृतिक संकट

प्र8कठिन

पर्यावरण के मुद्दे पर उत्तर और दक्षिण के दृष्टिकोणों की तुलना कीजिए।

उत्तर देखें

उत्तर (विकसित देश): सभी देशों की बराबर ज़िम्मेदारी हो; ओज़ोन क्षरण और ग्लोबल वार्मिंग पर प्राथमिक ध्यान; विकासशील देश भी अब बड़े उत्सर्जक हैं, इसलिए उन्हें भी बाध्यकारी लक्ष्य लेने चाहिए। दक्षिण (विकासशील देश): अधिकांश ऐतिहासिक प्रदूषण विकसित देशों के औद्योगिकीकरण से हुआ; विकासशील देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बहुत कम है और उन्हें अभी गरीबी दूर करने के लिए विकास करना है; इसलिए उन पर समान प्रतिबंध अनुचित; विकसित देश वित्त और तकनीक दें। समाधान: रियो (1992) में CBDR का सिद्धांत और पेरिस समझौते (2015) में स्वैच्छिक NDC — दोनों पक्षों के बीच संतुलन के प्रयास।

उत्तर: बराबर ज़िम्मेदारी बनाम ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी; CBDR और NDC से संतुलन

प्र9कठिन

पर्यावरण संरक्षण पर भारत के दृष्टिकोण और प्रयासों का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर देखें

अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण: भारत CBDR का समर्थक है; उसका तर्क है कि ऐतिहासिक और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में विकसित देशों का हिस्सा कहीं अधिक है; वह जलवायु वित्त और तकनीक हस्तांतरण की माँग करता है। भारत ने 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल का अनुमोदन किया और पेरिस समझौते में सक्रिय भूमिका निभाई। घरेलू प्रयास: ऊर्जा संरक्षण अधिनियम 2001, विद्युत अधिनियम 2003 (नवीकरणीय ऊर्जा), राष्ट्रीय कार्ययोजना 2008 के आठ मिशन (जैसे राष्ट्रीय सौर मिशन), स्वच्छ ईंधन नीति। वैश्विक नेतृत्व: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, मिशन LiFE; NDC के तहत 2030 तक 50% गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता और उत्सर्जन तीव्रता में 45% कमी; 2070 तक नेट-ज़ीरो। चुनौतियाँ: कोयले पर निर्भरता, शहरी वायु प्रदूषण, नदियों का प्रदूषण। निष्कर्ष: भारत विकास और पर्यावरण में संतुलन की नीति पर चल रहा है।

उत्तर: CBDR का समर्थक; घरेलू कानून, ISA, NDC, नेट-ज़ीरो 2070; कोयला व प्रदूषण चुनौतियाँ

प्र10कठिन

विश्व की साझी संपदा की रक्षा में आने वाली कठिनाइयों का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर देखें

(1) "साझी संपदा की त्रासदी": जब संसाधन सबका होता है, तो हर कोई उसका अधिकतम उपयोग करना चाहता है, पर रक्षा की ज़िम्मेदारी कोई नहीं लेता। (2) वैज्ञानिक प्रमाणों पर मतभेद: समस्या की गंभीरता और समय-सीमा पर सहमति कठिन। (3) बोझ का बँटवारा: उत्तर-दक्षिण विवाद — कौन कितना त्याग करे। (4) तकनीकी असमानता: बाहरी अंतरिक्ष और गहरे समुद्र के संसाधनों का लाभ प्रायः तकनीकी रूप से उन्नत देश ही उठा पाते हैं। (5) लागू कराने की कमी: कोई विश्व सरकार नहीं जो समझौतों को लागू कराए। फिर भी अंटार्कटिका संधि (1959) और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) जैसी सफलताएँ दिखाती हैं कि सहयोग संभव है — मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के बाद ओज़ोन परत में सुधार दर्ज किया गया है।

उत्तर: साझी संपदा की त्रासदी, मतभेद, असमानता, लागू कराने की कमी; कुछ सफल उदाहरण

प्र11कठिन

क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते की तुलना कीजिए।

उत्तर देखें

क्योटो प्रोटोकॉल (1997, 2005 से लागू): केवल विकसित देशों के लिए उत्सर्जन घटाने के बाध्यकारी लक्ष्य; विकासशील देशों को छूट (CBDR पर आधारित, "ऊपर से नीचे" लक्ष्य); अमेरिका ने इसका अनुमोदन नहीं किया, जिससे इसकी प्रभावशीलता घटी। पेरिस समझौता (2015): सभी देश — विकसित और विकासशील — अपने स्वैच्छिक राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) तय करते हैं ("नीचे से ऊपर"); लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से काफ़ी नीचे और 1.5°C तक सीमित करने का प्रयास; हर पाँच वर्ष में NDC अद्यतन और वैश्विक समीक्षा। निष्कर्ष: पेरिस समझौता अधिक समावेशी है, पर लक्ष्य कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं — इसकी सफलता देशों की इच्छाशक्ति पर निर्भर है।

उत्तर: क्योटो — विकसित देशों के बाध्यकारी लक्ष्य; पेरिस — सभी देशों के स्वैच्छिक NDC

14. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश

2 मिनट में दोहराएँ
  • पर्यावरण वैश्विक मुद्दा: भूमि, जल, वन, ओज़ोन, समुद्र, जलवायु — सीमापार समस्याएँ।
  • पड़ाव: 1972 लिमिट्स टू ग्रोथ व स्टॉकहोम; 1987 ब्रुंटलैंड (टिकाऊ विकास); 1992 रियो (UNFCCC, एजेंडा-21); 1997 क्योटो; 2015 पेरिस (NDC)।
  • साझी संपदा: वायुमंडल, अंटार्कटिका, खुला समुद्र, अंतरिक्ष; अंटार्कटिका संधि 1959, मॉन्ट्रियल 1987।
  • CBDR: साझी पर अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ — उत्तर बनाम दक्षिण।
  • भू-राजनीति (तेल, जल), मूल निवासी (1975); भारत — क्योटो 2002, ISA, NDC 2030, नेट-ज़ीरो 2070।