Class 12 Political Science · Chapter 3 · स्वतंत्र भारत में राजनीति

नियोजित विकास की राजनीति

विकास के राजनीतिक फ़ैसले, योजना आयोग, बॉम्बे प्लान, पंचवर्षीय योजनाएँ, कृषि बनाम उद्योग और प्रमुख नतीजे।

NCERT समकालीन विश्व राजनीति + स्वतंत्र भारत में राजनीतिCBSE Class 12 14 min read

1. अध्याय एक नज़र में

स्वतंत्रता के समय भारत एक गरीब देश था — अधिकांश लोग खेती पर निर्भर थे, उद्योग कम थे, साक्षरता और जीवन-प्रत्याशा बहुत कम थी। अब प्रश्न था — विकास कैसे हो? पूँजीवादी रास्ते से या समाजवादी रास्ते से? उद्योग पहले या खेती? सरकार कितना करे और बाज़ार कितना? इन प्रश्नों के उत्तर राजनीतिक निर्णय थे। भारत ने नियोजित विकास (Planned Development) का मार्ग चुना। इस अध्याय में हम विकास की राजनीति, योजना आयोग, पहली दो पंचवर्षीय योजनाएँ, प्रमुख विवाद और उनके परिणाम समझेंगे।

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • विकास के राजनीतिक प्रश्न और दो मॉडल — पूँजीवादी और समाजवादी।
  • योजना आयोग और पहली दो पंचवर्षीय योजनाएँ।
  • प्रमुख विवाद — कृषि बनाम उद्योग, सार्वजनिक बनाम निजी क्षेत्र।
  • मिश्रित अर्थव्यवस्था; केरल मॉडल; गांधीवादी विकल्प।
  • परिणाम — भूमि सुधार, हरित क्रांति, श्वेत क्रांति; योजना आयोग से NITI आयोग तक।

2. विकास — एक राजनीतिक प्रश्न

विकास के निर्णय केवल अर्थशास्त्रियों के तकनीकी निर्णय नहीं होते — इनसे तय होता है कि किसे लाभ होगा और किसे हानि। उदाहरण के लिए, किसी आदिवासी क्षेत्र में इस्पात संयंत्र लगाने से रोज़गार और निवेश आता है, पर स्थानीय आदिवासियों का विस्थापन होता है और पर्यावरण को हानि होती है। इसलिए ऐसे निर्णयों पर लोकतंत्र में बहस और संघर्ष स्वाभाविक है।

पूँजीवादी मॉडलसमाजवादी मॉडल
उदाहरण — अमेरिका, यूरोप के अधिकांश देशउदाहरण — सोवियत संघ
बाज़ार और निजी क्षेत्र को प्रधानताराज्य का नियंत्रण, सार्वजनिक स्वामित्व, केंद्रीकृत नियोजन
व्यक्तिगत पहल और लाभसमानता और सामूहिक कल्याण

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही आम सहमति बन गई थी कि गरीबी दूर करने और सामाजिक-आर्थिक न्याय की ज़िम्मेदारी मुख्यतः सरकार की होगी। 1938 में कांग्रेस ने नेहरू की अध्यक्षता में राष्ट्रीय योजना समिति बनाई थी। 1944 में उद्योगपतियों के एक समूह ने "बॉम्बे प्लान" प्रस्तुत किया, जिसमें सरकार द्वारा उद्योग और अन्य आर्थिक निवेश में बड़ी भूमिका का सुझाव था। इस प्रकार दाएँ और बाएँ — दोनों विचारधाराओं ने नियोजन को स्वीकार किया।

3. योजना आयोग और पंचवर्षीय योजनाएँ

मार्च 1950 में भारत सरकार के एक प्रस्ताव से योजना आयोग बना — यह संवैधानिक या वैधानिक नहीं, बल्कि सलाहकारी निकाय था। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री थे। सोवियत संघ की तरह भारत ने भी पंचवर्षीय योजनाएँ अपनाईं — सरकार पाँच वर्षों के लिए आय-व्यय की योजना बनाती, और केंद्र तथा राज्य सरकारों के बजट योजनागत और गैर-योजनागत में बँटे।

योजनाअवधिप्रमुख योजनाकारमुख्य ज़ोर
पहली पंचवर्षीय योजना1951-56युवा अर्थशास्त्री के. एन. राज (प्रमुख भूमिका)कृषि — देश को गरीबी के दुष्चक्र से निकालना; बाँध और सिंचाई (जैसे भाखड़ा-नांगल), भूमि सुधार; विभाजन से कृषि क्षेत्र को हुई हानि की पूर्ति; धीमी, सावधान प्रगति ("जल्दबाज़ी नहीं")
दूसरी पंचवर्षीय योजना1956-61पी. सी. महालनोबिसभारी उद्योग — इस्पात, बिजली, मशीनरी, संचार; तेज़ औद्योगीकरण; घरेलू उद्योगों का संरक्षण (आयात पर भारी शुल्क); सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार; "समाजवादी ढंग का समाज"
दो मॉडल के बीच — मिश्रित अर्थव्यवस्था

भारत ने न पूरी तरह पूँजीवादी और न पूरी तरह समाजवादी मॉडल अपनाया, बल्कि मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) अपनाई — कृषि, व्यापार और कई उद्योग निजी हाथों में रहे, जबकि भारी उद्योग, बुनियादी ढाँचा और रणनीतिक क्षेत्र सरकार के पास। 1956 के औद्योगिक नीति प्रस्ताव ने यह विभाजन स्पष्ट किया। आलोचकों ने कहा कि योजनाकारों ने निजी क्षेत्र को पर्याप्त स्थान नहीं दिया, जबकि दूसरों ने कहा कि सरकार ने गरीबों के लिए पर्याप्त नहीं किया।

4. प्रमुख विवाद

(क) कृषि बनाम उद्योग

  • दूसरी योजना की आलोचना: कृषि की अनदेखी हुई; गांधीवादी अर्थशास्त्री जे. सी. कुमारप्पा ने वैकल्पिक योजना प्रस्तुत की, जिसमें ग्रामीण औद्योगीकरण और कुटीर उद्योगों पर ज़ोर था; चौधरी चरण सिंह ने कहा कि नियोजन शहरी और औद्योगिक वर्गों के पक्ष में है, किसानों की उपेक्षा हुई।
  • समर्थकों का तर्क: कृषि में भूमि सुधार और सिंचाई जैसे कदम उठाए गए; उद्योग के बिना कृषि में आधुनिक तकनीक, खाद, ट्रैक्टर और रोज़गार के विकल्प संभव नहीं थे। असली समस्या यह थी कि भूमि सुधार ठीक से लागू नहीं हुए, क्योंकि ग्रामीण भू-स्वामी वर्ग राजनीतिक रूप से शक्तिशाली था।

(ख) सार्वजनिक बनाम निजी क्षेत्र

  • आलोचना: सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरशाही, भ्रष्टाचार और अकुशलता बढ़ी; "लाइसेंस-परमिट राज" से निजी उद्यम दबे; मध्यम वर्ग को अधिक लाभ हुआ।
  • समर्थन: निजी क्षेत्र के पास भारी उद्योग लगाने लायक पूँजी नहीं थी; सार्वजनिक क्षेत्र ने औद्योगिक आधार बनाया जिस पर बाद में निजी क्षेत्र फला-फूला।

(ग) केरल मॉडल और विकेंद्रीकृत नियोजन

केरल ने आर्थिक वृद्धि दर तेज़ न होने के बावजूद शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि सुधार, खाद्य वितरण और गरीबी उन्मूलन पर ध्यान देकर मानव विकास में उल्लेखनीय प्रगति की। 1990 के दशक में केरल ने "जन योजना अभियान" से पंचायतों को योजना बनाने में भागीदार बनाया — इसे विकेंद्रीकृत नियोजन का उदाहरण माना जाता है।

5. नियोजन के परिणाम

  • भविष्य की नींव: इस दौर में भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड जैसे विशाल बाँध, भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला जैसे इस्पात संयंत्र, खनन, बिजली, रेल-सड़क और भारी मशीनरी के उद्योग बने — भविष्य के विकास का आधार।
  • भूमि सुधार: ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन सफल रहा, जिससे ग्रामीण राजनीति में ज़मींदारों का प्रभुत्व घटा; चकबंदी हुई। पर भूमि हदबंदी (अधिकतम सीमा) और बटाईदारों के अधिकार के कानून ठीक से लागू नहीं हुए।
  • खाद्य संकट: 1960 के दशक के मध्य में सूखा और युद्धों के कारण गंभीर खाद्य संकट; बिहार में अकाल जैसी स्थिति; अमेरिका से PL-480 के तहत अनाज आयात करना पड़ा।
  • हरित क्रांति (1960 के दशक का मध्य): उच्च उपज वाले बीज (HYV), उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई और समर्थन मूल्य से गेहूँ और चावल का उत्पादन बहुत बढ़ा; मुख्य लाभ पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे सिंचित क्षेत्रों को। परिणाम: खाद्यान्न आत्मनिर्भरता; पर अमीर और गरीब किसानों तथा क्षेत्रों के बीच असमानता बढ़ी; मध्यम किसानों का एक नया राजनीतिक वर्ग उभरा; वामपंथी संगठनों ने गरीब किसानों को संगठित किया।
  • श्वेत क्रांति: गुजरात के आनंद में अमूल सहकारी दुग्ध आंदोलन; वर्गीज़ कुरियन ("मिल्कमैन ऑफ़ इंडिया") के नेतृत्व में 1970 से ऑपरेशन फ़्लड — दुग्ध उत्पादन में भारी वृद्धि, ग्रामीण रोज़गार और महिलाओं की भागीदारी।
  • बाद का बदलाव: 1991 के बाद उदारीकरण से निजी क्षेत्र और बाज़ार की भूमिका बढ़ी; 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग की जगह NITI आयोग बना और 2017 में बारहवीं योजना के बाद पंचवर्षीय योजनाओं की परंपरा समाप्त हुई।
1944बॉम्बे प्लान 1950योजना आयोग 1951कृषि(के. एन. राज) 1956भारी उद्योग(महालनोबिस) 1965-हरित क्रांति 1970ऑपरेशन फ़्लड 2015NITI आयोग
नियोजित विकास की यात्रा (विचार-चित्र)।

6. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली

शब्दअर्थ
नियोजित विकाससरकार द्वारा तय लक्ष्यों और प्राथमिकताओं के अनुसार विकास
योजना आयोगमार्च 1950, सरकारी प्रस्ताव से; अध्यक्ष प्रधानमंत्री
बॉम्बे प्लान1944 — उद्योगपतियों की योजना, राज्य की बड़ी भूमिका
मिश्रित अर्थव्यवस्थासार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनों की भूमिका
महालनोबिस मॉडलदूसरी योजना — भारी उद्योगों पर ज़ोर
भूमि सुधारज़मींदारी उन्मूलन, चकबंदी, हदबंदी, बटाईदार अधिकार
हरित क्रांतिHYV बीज, उर्वरक, सिंचाई से खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि
ऑपरेशन फ़्लड1970 से सहकारी दुग्ध क्रांति — वर्गीज़ कुरियन
केरल मॉडलशिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि सुधार पर आधारित मानव विकास
NITI आयोग1 जनवरी 2015 से योजना आयोग का स्थान लेने वाला नीति थिंक-टैंक

7. मास्टर सारांश तालिका

पक्षपहली योजना (1951-56)दूसरी योजना (1956-61)
योजनाकारके. एन. राजपी. सी. महालनोबिस
प्राथमिकताकृषि, सिंचाई, बाँध, भूमि सुधारभारी उद्योग, बिजली, इस्पात
दृष्टिकोणधीमी, सावधान प्रगतितेज़ औद्योगीकरण, संरक्षणवाद, सार्वजनिक क्षेत्र
आलोचना—कृषि की उपेक्षा (कुमारप्पा, चरण सिंह)

चार्ट — पहली दो पंचवर्षीय योजनाओं में राष्ट्रीय आय की वार्षिक वृद्धि दर (लक्ष्य बनाम प्राप्ति, लगभग):

पहली योजना — लक्ष्य2.1%
पहली योजना — प्राप्ति3.6%
दूसरी योजना — लक्ष्य4.5%
दूसरी योजना — प्राप्ति4.2%

8. माइंड मैप

नियोजित विकास की राजनीति
मॉडल
  • पूँजीवादी
  • समाजवादी → मिश्रित
योजनाएँ
  • पहली — कृषि
  • दूसरी — उद्योग
विवाद
  • कृषि बनाम उद्योग
  • सार्वजनिक बनाम निजी
परिणाम
  • भूमि सुधार
  • हरित-श्वेत क्रांति
बाद में
  • 1991 उदारीकरण
  • NITI 2015

9. टिप्स और ट्रिक्स

याद रखने के सूत्र
  • "पहली — कृषि — के. एन. राज; दूसरी — उद्योग — महालनोबिस" (क-क, दू-उ)।
  • "44 बॉम्बे, 50 आयोग, 15 NITI"।
  • श्वेत क्रांति: "आनंद-अमूल-कुरियन-1970"।
आम गलतियाँ
  • योजना आयोग संवैधानिक निकाय नहीं था; यह सरकारी प्रस्ताव से बना था।
  • बॉम्बे प्लान उद्योगपतियों का था, सरकार का नहीं।
  • हरित क्रांति का लाभ पूरे देश को समान रूप से नहीं मिला — मुख्यतः सिंचित क्षेत्रों को।

10. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर

  • राष्ट्रीय योजना समिति 1938 में नेहरू की अध्यक्षता में बनी।
  • बॉम्बे प्लान 1944 में प्रस्तुत हुआ।
  • योजना आयोग मार्च 1950 में बना।
  • योजना आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते थे।
  • पहली पंचवर्षीय योजना 1951-56 में कृषि पर केंद्रित थी।
  • दूसरी योजना महालनोबिस मॉडल पर आधारित थी।
  • जे. सी. कुमारप्पा ने गांधीवादी वैकल्पिक योजना दी।
  • हरित क्रांति में HYV बीजों का प्रयोग हुआ।
  • ऑपरेशन फ़्लड 1970 में शुरू हुआ।
  • वर्गीज़ कुरियन को "मिल्कमैन ऑफ़ इंडिया" कहा जाता है।
  • NITI आयोग 1 जनवरी 2015 को बना।
  • केरल में जन योजना अभियान 1990 के दशक में चला।

11. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)

प्र1आसान

दूसरी पंचवर्षीय योजना का मुख्य ज़ोर किस पर था?

  1. कृषि
  2. भारी उद्योग
  3. सेवा क्षेत्र
  4. पर्यटन
उत्तर देखें

पी. सी. महालनोबिस के नेतृत्व में बनी दूसरी योजना (1956-61) ने भारी उद्योगों और तेज़ औद्योगीकरण पर ज़ोर दिया।

उत्तर: (ख) भारी उद्योग

प्र2आसान

ऑपरेशन फ़्लड किससे संबंधित है?

  1. बाढ़ नियंत्रण
  2. दुग्ध उत्पादन
  3. सिंचाई
  4. मत्स्य पालन
उत्तर देखें

1970 में शुरू हुआ ऑपरेशन फ़्लड सहकारी दुग्ध उत्पादन (श्वेत क्रांति) का कार्यक्रम था, जिसका नेतृत्व वर्गीज़ कुरियन ने किया।

उत्तर: (ख) दुग्ध उत्पादन

प्र3आसान

मिश्रित अर्थव्यवस्था से क्या तात्पर्य है?

उत्तर देखें

मिश्रित अर्थव्यवस्था वह है जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र (सरकार) और निजी क्षेत्र दोनों साथ-साथ काम करते हैं। भारत में भारी उद्योग, बुनियादी ढाँचा और रणनीतिक क्षेत्र सरकार के पास रहे, जबकि कृषि, व्यापार और कई उद्योग निजी हाथों में।

उत्तर: सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का सह-अस्तित्व

प्र4मध्यम

पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजना में अंतर बताइए।

उत्तर देखें

पहली योजना (1951-56): के. एन. राज की प्रमुख भूमिका; कृषि, सिंचाई, बाँध (भाखड़ा-नांगल) और भूमि सुधार पर ज़ोर; विभाजन से हुई कृषि हानि की पूर्ति; धीमी और सावधान प्रगति। दूसरी योजना (1956-61): पी. सी. महालनोबिस; भारी उद्योग, बिजली, इस्पात पर ज़ोर; तेज़ औद्योगीकरण; आयात पर भारी शुल्क से घरेलू उद्योगों का संरक्षण; सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार।

उत्तर: पहली — कृषि; दूसरी — भारी उद्योग

प्र5मध्यम

हरित क्रांति के सकारात्मक और नकारात्मक परिणाम बताइए।

उत्तर देखें

सकारात्मक: गेहूँ और चावल के उत्पादन में भारी वृद्धि; खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता; विदेशी अनाज (PL-480) पर निर्भरता समाप्त; किसानों की आय बढ़ी। नकारात्मक: लाभ मुख्यतः सिंचित क्षेत्रों (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी UP) और संपन्न किसानों को; क्षेत्रीय और वर्गीय असमानता बढ़ी; रासायनिक उर्वरकों-कीटनाशकों से मिट्टी और जल पर दुष्प्रभाव; भूजल का अत्यधिक दोहन। राजनीतिक रूप से मध्यम किसानों का नया शक्तिशाली वर्ग उभरा।

उत्तर: खाद्य आत्मनिर्भरता बनाम असमानता व पर्यावरणीय हानि

प्र6मध्यम

भूमि सुधार कहाँ सफल रहे और कहाँ विफल?

उत्तर देखें

सफलता: ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन — इससे अंग्रेज़ों के समय से चला आ रहा बिचौलियों का शोषण समाप्त हुआ और ग्रामीण राजनीति में ज़मींदारों का प्रभुत्व घटा; चकबंदी से छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरी ज़मीन एक जगह की गई। विफलता: भूमि हदबंदी (एक परिवार की अधिकतम ज़मीन) और बटाईदारों को सुरक्षा के कानून प्रभावी ढंग से लागू नहीं हुए, क्योंकि बड़े भू-स्वामी राजनीतिक रूप से शक्तिशाली थे और उन्होंने बेनामी हस्तांतरण जैसे तरीक़ों से कानूनों को निष्प्रभावी किया। अपवाद — केरल और पश्चिम बंगाल में अधिक सफलता।

उत्तर: ज़मींदारी उन्मूलन सफल; हदबंदी व बटाईदार सुधार विफल

प्र7मध्यम

"केरल मॉडल" की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर देखें

केरल ने तेज़ आर्थिक वृद्धि के बिना भी (1) शिक्षा, (2) स्वास्थ्य, (3) भूमि सुधार, (4) प्रभावी खाद्य वितरण और (5) गरीबी उन्मूलन पर ध्यान देकर मानव विकास सूचकांकों — साक्षरता, जीवन-प्रत्याशा, कम शिशु मृत्यु दर — में देश में अग्रणी स्थान पाया। 1990 के दशक में "जन योजना अभियान" से पंचायतों को योजना निर्माण में भागीदार बनाकर विकेंद्रीकृत नियोजन का उदाहरण दिया। आलोचना: औद्योगिक विकास और रोज़गार कम, जिससे बड़ी संख्या में लोग खाड़ी देशों में काम करने गए।

उत्तर: शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि सुधार, विकेंद्रीकरण आधारित मानव विकास

प्र8कठिन

"विकास के निर्णय राजनीतिक निर्णय होते हैं।" उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर देखें

विकास का कोई भी निर्णय यह तय करता है कि किसे लाभ होगा और किसे हानि। (1) किसी आदिवासी क्षेत्र में खनन या इस्पात संयंत्र से निवेश और रोज़गार आते हैं, पर आदिवासियों का विस्थापन और पर्यावरण की हानि होती है — इसलिए स्थानीय विरोध होता है। (2) दूसरी योजना में भारी उद्योगों को प्राथमिकता देने से शहरी-औद्योगिक वर्गों को लाभ हुआ, जबकि चरण सिंह जैसे नेताओं ने किसानों की उपेक्षा का आरोप लगाया। (3) हरित क्रांति ने संपन्न किसानों और सिंचित क्षेत्रों को अधिक लाभ दिया, जिससे नए किसान आंदोलन और राजनीतिक वर्ग उभरे। (4) सार्वजनिक बनाम निजी क्षेत्र का प्रश्न विचारधाराओं (स्वतंत्र पार्टी बनाम समाजवादी) के बीच विवाद बना। अतः विकास पर लोकतंत्र में बहस, संघर्ष और समझौता स्वाभाविक है।

उत्तर: लाभ-हानि का बँटवारा तय करते हैं — विस्थापन, कृषि बनाम उद्योग, हरित क्रांति के उदाहरण

प्र9कठिन

नियोजित विकास के प्रारंभिक दौर (1950-70) का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर देखें

उपलब्धियाँ: (1) भविष्य की नींव — बड़े बाँध (भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड), इस्पात संयंत्र (भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला), बिजली, खनन, परिवहन; (2) ज़मींदारी उन्मूलन; (3) 1960 के दशक के मध्य से हरित क्रांति द्वारा खाद्य आत्मनिर्भरता की ओर; (4) वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थान (IIT आदि); (5) पहली योजना में लक्ष्य से अधिक वृद्धि। कमियाँ: (1) वृद्धि दर अपेक्षा से धीमी ("हिंदू विकास दर" की आलोचना); (2) भूमि हदबंदी विफल, ग्रामीण असमानता बनी रही; (3) 1960 के दशक में खाद्य संकट और विदेशी अनाज पर निर्भरता; (4) लाइसेंस राज, नौकरशाही और सार्वजनिक क्षेत्र की अकुशलता; (5) गरीबी और बेरोज़गारी में धीमा सुधार। निष्कर्ष: इस दौर ने आत्मनिर्भर औद्योगिक आधार दिया, पर समावेशी विकास अधूरा रहा।

उत्तर: मज़बूत आधारभूत ढाँचा व खाद्य आत्मनिर्भरता; धीमी वृद्धि, असमानता, लाइसेंस राज

प्र10कठिन

कृषि बनाम उद्योग की बहस में दोनों पक्षों के तर्क दीजिए।

उत्तर देखें

कृषि को प्राथमिकता के पक्ष में: भारत की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी; दूसरी योजना में कृषि की उपेक्षा से 1960 के दशक में खाद्य संकट आया; जे. सी. कुमारप्पा ने ग्रामीण औद्योगीकरण और कुटीर उद्योगों की गांधीवादी योजना दी; चौधरी चरण सिंह ने कहा कि नियोजन शहरी-औद्योगिक वर्ग के पक्ष में और किसानों के विरुद्ध है। उद्योग को प्राथमिकता के पक्ष में: तेज़ औद्योगीकरण के बिना गरीबी दूर नहीं हो सकती थी; कृषि को आधुनिक बनाने के लिए खाद, ट्रैक्टर, बिजली उद्योग से ही आते; उद्योग कृषि से अतिरिक्त श्रम को रोज़गार देते; पहली योजना में कृषि को पर्याप्त प्राथमिकता मिली थी, और असली समस्या भूमि सुधारों का अधूरा क्रियान्वयन थी। निष्कर्ष: दोनों क्षेत्र एक-दूसरे पर निर्भर हैं; संतुलित विकास ही सही मार्ग है।

उत्तर: कृषि-निर्भर जनसंख्या बनाम औद्योगिक आधार; दोनों परस्पर निर्भर, संतुलन आवश्यक

प्र11कठिन

श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ़्लड) को विकास का एक अलग मॉडल क्यों माना जाता है?

उत्तर देखें

गुजरात के आनंद में अमूल सहकारी आंदोलन से शुरू होकर, वर्गीज़ कुरियन के नेतृत्व में 1970 से ऑपरेशन फ़्लड चला। इसकी विशेषताएँ: (1) सहकारी मॉडल — दूध उत्पादक किसान स्वयं सहकारी समितियों के सदस्य और मालिक; (2) छोटे और भूमिहीन किसानों तथा महिलाओं को आय का स्रोत; (3) ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों को शहरी उपभोक्ताओं से सीधे जोड़कर बिचौलियों को हटाया; (4) गाँवों में ही रोज़गार और आय, बड़े पूँजी-निवेश या विस्थापन के बिना; (5) भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बनाने में योगदान। यह राज्य-नियंत्रित भारी उद्योग मॉडल और बाज़ार-आधारित निजी मॉडल दोनों से अलग — विकेंद्रीकृत, जन-भागीदारी पर आधारित विकास का उदाहरण है।

उत्तर: सहकारी, विकेंद्रीकृत, छोटे किसानों व महिलाओं को सशक्त करने वाला मॉडल

12. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश

2 मिनट में दोहराएँ
  • विकास राजनीतिक प्रश्न; पूँजीवादी बनाम समाजवादी मॉडल → भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था।
  • राष्ट्रीय योजना समिति 1938, बॉम्बे प्लान 1944, योजना आयोग मार्च 1950 (अध्यक्ष PM)।
  • पहली योजना (1951-56, के. एन. राज) — कृषि; दूसरी (1956-61, महालनोबिस) — भारी उद्योग।
  • विवाद: कृषि बनाम उद्योग (कुमारप्पा, चरण सिंह), सार्वजनिक बनाम निजी; केरल मॉडल व विकेंद्रीकृत नियोजन।
  • परिणाम: बाँध-इस्पात की नींव; ज़मींदारी उन्मूलन सफल, हदबंदी विफल; खाद्य संकट → हरित क्रांति; ऑपरेशन फ़्लड (1970, कुरियन); NITI आयोग 2015।