1. अध्याय एक नज़र में
Paper II का यह अध्याय भारत के उद्योग, श्रम-रोज़गार और बैंकिंग को समेटता है। सिलेबस:
- उद्योग: औद्योगिक नीतियाँ (1948, 1956, 1991), सार्वजनिक क्षेत्र और विनिवेश, औद्योगिक लाइसेंसिंग, लघु और कुटीर उद्योग, MSME, उदारीकरण-पूर्व औद्योगीकरण की कमियाँ।
- श्रम और रोज़गार: बेरोज़गारी के प्रकार और माप, रोज़गार योजनाएँ, श्रम सुधार, राष्ट्रीय रोज़गार नीति।
- बैंकिंग और मौद्रिक नीति: बैंकिंग सुधार, वित्तीय समावेशन, RBI की मौद्रिक नीति।
2025 में SSI/कुटीर उद्योगों की चुनौतियाँ, विनिवेश, औद्योगिक पिछड़ापन और नई औद्योगिक नीति 1991, राष्ट्रीय रोज़गार नीति, उदारीकरण-पूर्व सार्वजनिक क्षेत्र और RBI के वित्तीय समावेशन प्रयास पूछे गए। 2024 में रोज़गार योजनाएँ और बेरोज़गारी का बने रहना, MSME, उदारीकरण-पूर्व औद्योगीकरण की अपर्याप्तताएँ और RBI की पिछले पाँच वर्षों की मौद्रिक नीति आई।
2. औद्योगिक नीतियाँ: 1948 से 1991
| नीति | मुख्य प्रावधान |
|---|---|
| औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1948 | मिश्रित अर्थव्यवस्था; चार श्रेणियाँ (राज्य-एकाधिकार, मिश्रित, नियंत्रित निजी, स्वतंत्र निजी) |
| उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम 1951 | औद्योगिक लाइसेंसिंग का कानूनी आधार |
| औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 | "औद्योगिक संविधान"; अनुसूची A (17 उद्योग, केवल राज्य), अनुसूची B (12, राज्य प्रमुख), अनुसूची C (शेष, निजी); समाजवादी समाज का स्वरूप; लघु उद्योगों को प्रोत्साहन |
| 1960-70 के दशक | लघु उद्योगों के लिए उत्पाद-आरक्षण (1967 से); MRTP अधिनियम 1969; बैंक राष्ट्रीयकरण 1969; FERA 1973 |
| 1977, 1980 की नीतियाँ | ज़िला उद्योग केंद्र (1977); 1980 से आंशिक उदारीकरण |
| नई औद्योगिक नीति, 24 जुलाई 1991 | लाइसेंसिंग का लगभग अंत (कुछ ख़तरनाक/सामरिक उद्योग छोड़कर); सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योग 17 से घटकर 8 (अब केवल परमाणु ऊर्जा और रेलवे संचालन); MRTP का पुनर्गठन (बाद में प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002); विदेशी निवेश में 51% तक स्वचालित अनुमोदन; विदेशी तकनीक समझौतों का उदारीकरण; सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश और रुग्ण इकाइयाँ BIFR को |
3. उदारीकरण-पूर्व औद्योगीकरण: भूमिका और कमियाँ
- सार्वजनिक क्षेत्र की अग्रणी भूमिका (1991 से पहले):
- भारी और आधारभूत उद्योग जहाँ निजी पूँजी अपर्याप्त या अनिच्छुक (इस्पात: भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर; मशीनरी: HEC, BHEL; तेल: ONGC, IOC)।
- अवसंरचना: बिजली, रेलवे, दूरसंचार, बंदरगाह।
- "प्रमुख शिखरों" पर नियंत्रण, आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण को रोकना।
- पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग (क्षेत्रीय संतुलन), रोज़गार, आत्मनिर्भरता और तकनीकी क्षमता।
- संसाधन-जुटाव: सार्वजनिक बचत और पुनर्निवेश की अपेक्षा।
- औद्योगिक पिछड़ेपन और अपर्याप्तताओं के कारण:
- लाइसेंस-परमिट राज: क्षमता-सीमा, विलंब, किराया-माँग; पैमाने की मितव्ययिता नहीं।
- आयात-स्थानापन्नता: संरक्षित बाज़ार, गुणवत्ता और लागत पर प्रतिस्पर्धा का अभाव, निर्यात-विरोधी पक्षपात।
- सार्वजनिक उपक्रमों की अदक्षता: कम क्षमता-उपयोग, राजनीतिक हस्तक्षेप, अधिक स्टाफ़, घाटे; अपेक्षित सार्वजनिक बचत नहीं मिली।
- तकनीकी पिछड़ापन (विदेशी तकनीक और FDI पर प्रतिबंध), अनुसंधान पर कम व्यय।
- पूँजी-गहनता और कम रोज़गार-सृजन; लघु उद्योग आरक्षण से आकार-वृद्धि रुकी।
- 1965 के बाद औद्योगिक मंदी (1965-80 में वृद्धि-दर में गिरावट), रुग्ण इकाइयाँ।
- कठोर श्रम क़ानून (औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 का अध्याय V-B), अवसंरचना की बाधाएँ।
- NIP 1991 ने इन्हें कैसे संबोधित किया: विलाइसेंसिंग से प्रवेश और विस्तार की स्वतंत्रता, विदेशी तकनीक और पूँजी, प्रतिस्पर्धा, सार्वजनिक क्षेत्र का पुनर्गठन, MRTP सीमाएँ हटाना। परिणाम: 1990 के दशक के मध्य में औद्योगिक तेज़ी; पर विनिर्माण का GDP-हिस्सा अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ा, इसलिए "मेक इन इंडिया" (2014), PLI (2020 से)।
4. तुलनात्मक दृष्टि: भूमि-उपयोग, कृषि और उद्योग
भारत की औद्योगिक संरचना को पड़ोसी देशों के संदर्भ में देखना उपयोगी है। भूमि का कितना भाग खेती, वन और गैर-कृषि उपयोग में है, और श्रम-शक्ति कृषि से उद्योग में कितनी तेज़ी से गई, इसी से संरचनात्मक रूपांतरण की गति का पता चलता है।

- चीन: 1978 के सुधारों के बाद श्रम-गहन, निर्यात-उन्मुख विनिर्माण (विशेष आर्थिक क्षेत्र, ग्राम-नगर उद्यम) से कृषि-श्रम का तेज़ स्थानांतरण; "विश्व का कारख़ाना"।
- भारत: श्रम कृषि से सीधे सेवाओं और निर्माण (अनौपचारिक) में गया; विनिर्माण-रोज़गार का हिस्सा कम रहा; सेवा-नेतृत्व वृद्धि (IT, वित्तीय सेवाएँ)।
- पाकिस्तान: कृषि (कपास, गेहूँ) और वस्त्र उद्योग पर अधिक निर्भरता; बार-बार BoP संकट और कम निवेश-दर।
- सबक: विनिर्माण-आधारित रोज़गार के लिए श्रम-गहन क्षेत्रों (वस्त्र, जूते, खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली) में पैमाना, अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स और व्यापार-एकीकरण आवश्यक।
5. सार्वजनिक क्षेत्र और विनिवेश
- विनिवेश का अर्थ: सार्वजनिक उपक्रमों में सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री: अल्पांश (IPO, OFS, ETF), रणनीतिक (प्रबंधन-नियंत्रण सहित)।
- विकासक्रम: 1991-92 में अल्पांश बिक्री का आरंभ; रंगराजन समिति (1993); विनिवेश आयोग (1996); 1999-2004 में रणनीतिक बिक्री (मॉडर्न फ़ूड्स, BALCO, VSNL, हिंदुस्तान ज़िंक); राष्ट्रीय निवेश कोष (2005); DIPAM (2016); नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति (2021): चार सामरिक क्षेत्रों (परमाणु ऊर्जा-अंतरिक्ष-रक्षा; परिवहन-दूरसंचार; ऊर्जा-खनिज; बैंकिंग-बीमा-वित्तीय सेवाएँ) में न्यूनतम उपस्थिति, शेष में निजीकरण/बंद करना। एयर इंडिया का टाटा समूह को हस्तांतरण (जनवरी 2022); LIC का IPO (मई 2022)।
- विनिवेश नीति का महत्व: (i) दक्षता: निजी प्रबंधन, कठोर बजट-बाधा, बाज़ार-अनुशासन; (ii) राजकोषीय: गैर-ऋण पूँजी-प्राप्ति से घाटा घटाना और अवसंरचना/सामाजिक क्षेत्र में निवेश; (iii) "सरकार का व्यापार में कोई काम नहीं": शासन पर ध्यान; (iv) पूँजी बाज़ार को गहराई, खुदरा भागीदारी; (v) बंद संपत्तियों का मुद्रीकरण।
- आलोचना: "परिवार की चाँदी बेचना" (आवर्ती आय के बदले एकबारगी प्राप्ति), मूल्यांकन-विवाद, लक्ष्य प्रायः पूरे नहीं, रोज़गार और आरक्षण पर प्रभाव, निजी एकाधिकार का ख़तरा, सामरिक संपत्तियाँ।
- सुधार के अन्य उपकरण: नवरत्न (1997), महारत्न (2009), मिनीरत्न; MoU प्रणाली; परिसंपत्ति मुद्रीकरण पाइपलाइन (2021)।
6. लघु, कुटीर उद्योग और MSME
- भूमिका: कृषि के बाद सबसे बड़ा रोज़गार-प्रदाता; GDP, विनिर्माण-उत्पादन और निर्यात में बड़ा योगदान; कम पूँजी में अधिक रोज़गार; ग्रामीण-अर्धशहरी क्षेत्रों में औद्योगीकरण, क्षेत्रीय संतुलन; उद्यमशीलता और नवाचार; बड़े उद्योगों के सहायक (पूरक)।
- परिभाषा: MSMED अधिनियम 2006; 1 जुलाई 2020 से संयुक्त (निवेश + कारोबार) मानदंड, विनिर्माण-सेवा का भेद समाप्त: सूक्ष्म (निवेश ≤ ₹1 करोड़, कारोबार ≤ ₹5 करोड़), लघु (≤ ₹10 करोड़, ≤ ₹50 करोड़), मध्यम (≤ ₹50 करोड़, ≤ ₹250 करोड़); बजट 2025-26 में इन सीमाओं को बढ़ाने की घोषणा। उद्यम पंजीकरण पोर्टल (2020)।
- चुनौतियाँ:
- साख: संपार्श्विक का अभाव, ऊँची ब्याज-दर, औपचारिक ऋण तक सीमित पहुँच (बड़ा ऋण-अंतराल)।
- विलंबित भुगतान: बड़े ख़रीदारों से कार्यशील पूँजी फँसती है।
- पुरानी तकनीक, कम उत्पादकता, गुणवत्ता-मानक; कौशल की कमी।
- विपणन, ब्रांडिंग और निर्यात-बाज़ार तक पहुँच; बड़े उद्योगों और आयात (विशेषकर चीन) से प्रतिस्पर्धा।
- अनौपचारिकता, अनुपालन-भार (GST, श्रम, पर्यावरण), "बौना बने रहने" का प्रोत्साहन (missing middle)।
- अवसंरचना (बिजली, कच्चा माल), आघात-संवेदनशीलता (विमुद्रीकरण, GST संक्रमण, कोविड)।
- कुटीर/ग्रामोद्योग विशेष: हथकरघा-हस्तशिल्प में मशीन-निर्मित वस्तुओं की प्रतिस्पर्धा, कच्चे माल की महँगाई, बिचौलियों पर निर्भरता, युवा पीढ़ी का पलायन।
- सरकारी कदम: CGTMSE (2000) ऋण-गारंटी; प्राथमिकता क्षेत्र ऋण; PMEGP (2008); मुद्रा (2015); TReDS और MSME समाधान (विलंबित भुगतान); 45-दिन भुगतान नियम (आयकर अधिनियम धारा 43B(h), 2023 से); ECLGS (2020, कोविड); सार्वजनिक ख़रीद में MSME से 25% ख़रीद का अनिवार्य लक्ष्य; ZED प्रमाणन; SFURTI (पारंपरिक उद्योग क्लस्टर), KVIC; RAMP कार्यक्रम (2022); PM विश्वकर्मा (2023, पारंपरिक कारीगर); लघु उद्योग आरक्षण का पूर्ण अंत (2015)।
7. बेरोज़गारी और रोज़गार नीति
- माप: PLFS (2017-18 से) में सामान्य स्थिति (मुख्य + सहायक) और वर्तमान साप्ताहिक स्थिति; 2025 से मासिक और त्रैमासिक अनुमान का विस्तार।
- प्रकार: संरचनात्मक, प्रच्छन्न (कृषि), मौसमी, शिक्षित बेरोज़गारी, अल्प-रोज़गार, घर्षणात्मक।
- प्रमुख रोज़गार योजनाएँ: MGNREGA (2005; 100 दिन की कानूनी गारंटी); PMEGP; DAY-NRLM (2011) और DAY-NULM; DDU-GKY (2014); PMKVY (2015); मुद्रा (2015); स्टैंड-अप इंडिया और स्टार्टअप इंडिया (2016); आत्मनिर्भर भारत रोज़गार योजना (2020); PLI योजनाएँ; रोज़गार-संबद्ध प्रोत्साहन (ELI) योजना (2025)।
- बेरोज़गारी बने रहने के कारण:
- "रोज़गार-विहीन/रोज़गार-अल्प वृद्धि": पूँजी और कौशल-गहन क्षेत्रों (IT, वित्त) का नेतृत्व।
- विनिर्माण का कम हिस्सा; श्रम-गहन निर्यात में पिछड़ना।
- शिक्षा और कौशल की बेमेल (skill mismatch); शिक्षित युवाओं में ऊँची बेरोज़गारी।
- अनौपचारिकता (अधिकांश श्रम-शक्ति अनौपचारिक) और निम्न गुणवत्ता का रोज़गार।
- महिला श्रम-भागीदारी का निम्न स्तर (हालिया वृद्धि मुख्यतः कृषि स्व-रोज़गार में)।
- कृषि में अतिरिक्त श्रम; योजनाओं का खंडित, आपूर्ति-पक्षी स्वरूप; कमज़ोर कार्यान्वयन।
- राष्ट्रीय रोज़गार नीति की आवश्यकता: भारत में रोज़गार को समर्पित कोई समग्र राष्ट्रीय नीति नहीं; योजनाएँ अलग-अलग मंत्रालयों में बिखरी। आवश्यकता: (i) जनसांख्यिकीय लाभांश (कार्यशील आयु जनसंख्या का बढ़ता अनुपात) को काम देना; (ii) रोज़गार को मैक्रो-नीति का स्पष्ट लक्ष्य बनाना (रोज़गार-लोच बढ़ाना); (iii) श्रम-गहन क्षेत्रों की पहचान और प्रोत्साहन; (iv) कौशल-शिक्षा-उद्योग का समन्वय; (v) सामाजिक सुरक्षा और औपचारिकीकरण; (vi) महिलाओं के लिए विशेष रणनीति; (vii) बेहतर, बार-बार आँकड़े। संबंधित पहलें: राष्ट्रीय कौशल विकास और उद्यमिता नीति (2015), चार श्रम संहिताएँ (2019-20 में पारित; नवंबर 2025 से प्रभावी), ई-श्रम पोर्टल (2021, असंगठित श्रमिकों का डेटाबेस), राष्ट्रीय करियर सेवा (2015)।
8. बैंकिंग सुधार और वित्तीय समावेशन
- सुधार: नरसिंहम समिति I (1991) और II (1998): SLR-CRR में कमी, ब्याज विनियमन-मुक्ति, विवेकपूर्ण मानदंड (आय-पहचान, परिसंपत्ति-वर्गीकरण, प्रावधान), नए निजी बैंक; SARFAESI (2002); "चार R" (पहचान, समाधान, पुनर्पूंजीकरण, सुधार, 2015 से), परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा (2015); दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (2016); सार्वजनिक बैंकों का विलय (2019-20 तक 27 से 12)।
- RBI के वित्तीय समावेशन प्रयास:
- अग्रणी बैंक योजना (1969), प्राथमिकता क्षेत्र ऋण, RRB (1975), ग्रामीण शाखा-विस्तार नीति।
- "नो-फ़्रिल्स" खाते (2005), बाद में मूल बचत बैंक जमा खाता (BSBDA, 2012)।
- व्यवसाय प्रतिनिधि (BC) मॉडल (2006): बैंक-शाखा के बिना अंतिम छोर तक सेवा।
- सरलीकृत KYC, आधार-आधारित e-KYC; वित्तीय समावेशन योजनाएँ (FIP) बैंकों के लिए।
- भुगतान बैंक और लघु वित्त बैंक (2015 में लाइसेंस)।
- वित्तीय साक्षरता केंद्र, "वित्तीय साक्षरता सप्ताह"।
- वित्तीय समावेशन हेतु राष्ट्रीय रणनीति (NSFI 2019-24);वित्तीय समावेशन सूचकांक (FI-Index, अगस्त 2021 से वार्षिक)।
- डिजिटल भुगतान अवसंरचना: NPCI, UPI (2016), भुगतान अवसंरचना विकास कोष (2021), UPI123Pay और UPI-लाइट।
- सरकार की ओर से: PMJDY (28 अगस्त 2014), JAM त्रिमूर्ति, PMJJBY, PMSBY, APY (2015)।
9. RBI की मौद्रिक नीति: हाल के वर्ष
- ढाँचा: 2016 से लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (CPI 4% ± 2%), मौद्रिक नीति समिति; प्राथमिक उद्देश्य मूल्य-स्थिरता, "संवृद्धि के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए"।
- कोविड चरण (2020-21): रेपो दर घटाकर 4% (मई 2020); रिवर्स रेपो 3.35%; लक्षित दीर्घकालीन रेपो (TLTRO), ऋण-स्थगन (moratorium), समाधान ढाँचे, सरकारी प्रतिभूति अधिग्रहण कार्यक्रम (G-SAP, 2021); "समायोजनकारी" रुख़। उद्देश्य: तरलता, वित्तीय स्थिरता, निवेश और माँग का समर्थन।
- मुद्रास्फीति-विरोधी चरण (2022-23): रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ऊँची मुद्रास्फीति; मई 2022 में अनिर्धारित बैठक में वृद्धि और फ़रवरी 2023 तक रेपो 6.5%; अप्रैल 2022 से स्थायी जमा सुविधा (SDF) गलियारे का तल; "समायोजन की वापसी" का रुख़।
- स्थिरता और फिर ढील (2023-25): लंबे समय तक 6.5% पर ठहराव; मुद्रास्फीति लक्ष्य के निकट आने पर 2025 में कटौतियाँ (फ़रवरी और अप्रैल में 25-25 आधार अंक, जून में 50 आधार अंक, जिससे रेपो 5.5%) और CRR में चरणबद्ध कटौती।
- निवेश बनाम मूल्य-स्थिरता: कम दरें निवेश को प्रोत्साहित करती हैं पर मुद्रास्फीति-जोखिम; RBI ने "मूल्य-स्थिरता ही सतत वृद्धि की पूर्व-शर्त" का तर्क अपनाया। निवेश पर प्रभाव संचरण (बाह्य बेंचमार्क ऋण), बैंकों की बैलेंस-शीट (NPA में कमी), और माँग-अपेक्षाओं पर निर्भर; निजी पूँजीगत व्यय की धीमी वसूली मौद्रिक से अधिक माँग और अनिश्चितता से जुड़ी।
10. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | परीक्षा-बिंदु |
|---|---|---|
| IPR 1956 | अनुसूची A 17, B 12, C शेष | "औद्योगिक संविधान" |
| NIP 1991 | 24 जुलाई 1991; विलाइसेंसिंग | आरक्षित 17 → 8 → 2 |
| विनिवेश | रंगराजन 1993; DIPAM 2016; PSE नीति 2021 | एयर इंडिया 2022 |
| MSME परिभाषा | 1 जुलाई 2020: निवेश + कारोबार | उद्यम पोर्टल |
| MSME सहायता | CGTMSE, TReDS, 43B(h), PM विश्वकर्मा | विलंबित भुगतान |
| रोज़गार | MGNREGA 2005; PMKVY 2015; ELI 2025 | रोज़गार-अल्प वृद्धि |
| श्रम संहिताएँ | मज़दूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा, OSH | 29 क़ानूनों का समेकन |
| बैंकिंग सुधार | नरसिंहम 1991, 1998; IBC 2016 | 4R |
| वित्तीय समावेशन | BC 2006; BSBDA 2012; PB/SFB 2015; FI-Index 2021 | PMJDY 2014 |
| मौद्रिक नीति | 4% (2020) → 6.5% (2023) → 5.5% (जून 2025) | SDF 2022 |
11. चार्ट: रेपो दर का हालिया चक्र
12. Mind Map
- 1948, 1956, 1991
- लाइसेंस-राज की कमियाँ
- अग्रणी भूमिका
- विनिवेश, PSE नीति 2021
- भूमिका, परिभाषा
- चुनौतियाँ, सहायता
- योजनाएँ, बने रहने के कारण
- राष्ट्रीय नीति, श्रम संहिताएँ
- नरसिंहम, IBC, विलय
- वित्तीय समावेशन, मौद्रिक नीति
13. महत्वपूर्ण One-liners
- नई औद्योगिक नीति: 24 जुलाई 1991।
- IPR 1956 की अनुसूची A में 17 उद्योग।
- सार्वजनिक क्षेत्र के लिए अब आरक्षित: परमाणु ऊर्जा और रेलवे संचालन।
- नई MSME परिभाषा प्रभावी: 1 जुलाई 2020।
- व्यवसाय प्रतिनिधि मॉडल: 2006।
- PMJDY की शुरुआत: 28 अगस्त 2014।
- स्थायी जमा सुविधा (SDF): अप्रैल 2022।
- विनिवेश पर पहली प्रमुख समिति: सी. रंगराजन (1993)।
14. टिप्स एवं ट्रिक्स
- नीति-प्रश्नों में "1991 से पहले बनाम बाद" की तालिका सबसे प्रभावी।
- मौद्रिक नीति के उत्तर में दरें केवल वही लिखें जिन पर पूरा भरोसा हो; रुख़ (समायोजनकारी, तटस्थ) और कारण अधिक महत्वपूर्ण।
- MSME और रोज़गार के उत्तर में आर्थिक सर्वेक्षण और PLFS को स्रोत के रूप में उद्धृत करें।
NIP 1991 के स्तंभ: "LPG + DIP": उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण + विलाइसेंसिंग, निवेश (FDI), सार्वजनिक क्षेत्र सुधार।
PMJDY को RBI की योजना लिखना: PMJDY केंद्र सरकार (वित्त मंत्रालय) की योजना है; RBI के अपने समावेशन उपाय (BC, BSBDA, PB/SFB, NSFI, FI-Index) अलग से गिनाएँ।
15. PYQ-आधारित प्रश्न एवं हल
भारत की विनिवेश नीति के महत्व की चर्चा कीजिए।
मॉडल उत्तर
खंड 5: अर्थ, विकासक्रम (संक्षेप में), महत्व के पाँच बिंदु, आलोचना, निष्कर्ष (रणनीतिक विनिवेश दक्षता के लिए, केवल राजस्व के लिए नहीं)।
भारत में लघु और कुटीर उद्योगों के समक्ष चुनौतियों की चर्चा कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका (रोज़गार, क्षेत्रीय संतुलन); खंड 6 की चुनौतियाँ (साख, भुगतान, तकनीक, विपणन, अनौपचारिकता, कुटीर-विशेष); उपाय और सरकारी कदम; निष्कर्ष: "missing middle" की समस्या हल करने हेतु विकास-अनुकूल प्रोत्साहन।
भारतीय अर्थव्यवस्था में MSME की भूमिका और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की चर्चा कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 6: भूमिका, परिभाषा (2020), सरकारी कदम (साख, भुगतान, ख़रीद, तकनीक, कोविड-राहत, पारंपरिक कारीगर)। आगे की राह: औपचारिकीकरण के प्रोत्साहन, क्लस्टर-विकास, निर्यात-संवर्धन, डिजिटल साख।
1991 से पहले भारत के औद्योगिक पिछड़ेपन के कारण बताइए। नई औद्योगिक नीति (जुलाई 1991) ने इनका समाधान कैसे किया?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 3 के कारण; NIP के प्रावधान (खंड 2 की तालिका) और उनका कारण-वार मिलान; परिणाम और सीमाएँ; मेक इन इंडिया, PLI।
उदारीकरण-पूर्व भारत में औद्योगीकरण की अपर्याप्तताओं की चर्चा कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
उपलब्धियों से आरंभ (विविध औद्योगिक आधार, पूँजी-वस्तु क्षमता); फिर खंड 3 की अपर्याप्तताएँ; 1965-80 की औद्योगिक मंदी पर बहस (आइ.जे. अहलूवालिया: उत्पादकता-ठहराव; अन्य: कृषि-माँग और सार्वजनिक निवेश में कमी)।
उदारीकरण से पहले सार्वजनिक क्षेत्र ने भारत के आर्थिक विकास में अग्रणी भूमिका निभाई। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 3 की अग्रणी भूमिका (पाँच बिंदु, उदाहरण सहित); उपलब्धियाँ (आधारभूत उद्योग, अवसंरचना, तकनीकी क्षमता, पिछड़े क्षेत्र); सीमाएँ (अदक्षता, घाटे, सार्वजनिक बचत की अपेक्षा अधूरी); निष्कर्ष: प्रारंभिक चरण में आवश्यक, पर 1980 के दशक तक सुधार अपरिहार्य हो गए।
भारत में रोज़गार-सृजन की प्रमुख योजनाओं की चर्चा कीजिए। इनके बावजूद बेरोज़गारी क्यों बनी हुई है?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 7: योजनाओं का वर्गीकरण (मज़दूरी-रोज़गार: MGNREGA; स्व-रोज़गार: PMEGP, मुद्रा, NRLM; कौशल: PMKVY, DDU-GKY; प्रोत्साहन: ABRY, PLI, ELI); बने रहने के छह कारण; सुझाव (श्रम-गहन विनिर्माण, कौशल-उद्योग संबंध, महिला भागीदारी, शहरी रोज़गार गारंटी पर विचार)।
राष्ट्रीय रोज़गार नीति की आवश्यकता बताइए। इस दिशा में सरकार की पहलों की चर्चा कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 7 का अंतिम बिंदु: सात आवश्यकताएँ और संबंधित पहलें (कौशल नीति, श्रम संहिताएँ, ई-श्रम, NCS, ELI)। निष्कर्ष: एक समन्वित नीति जो मैक्रो, क्षेत्रीय, कौशल और सामाजिक सुरक्षा उपायों को एक लक्ष्य से जोड़े।
वित्तीय समावेशन के लिए RBI की पहलों की चर्चा कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अर्थ (उचित लागत पर औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुँच: बचत, ऋण, बीमा, पेंशन, भुगतान); खंड 8 की RBI पहलें (कालक्रम से); परिणाम (खातों का विस्तार, डिजिटल भुगतान); चुनौतियाँ (निष्क्रिय खाते, ऋण-पहुँच, साइबर धोखाधड़ी, लैंगिक अंतर); आगे: उपयोग-गुणवत्ता (केवल खाता नहीं, ऋण-बीमा-पेंशन), वित्तीय साक्षरता और उपभोक्ता-संरक्षण।
पिछले पाँच वर्षों में RBI की मौद्रिक नीति के उद्देश्यों की चर्चा कीजिए। इसने निवेश और मूल्य-स्थिरता के बीच संतुलन कैसे साधा?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 9: ढाँचा, तीन चरण (कोविड-ढील, मुद्रास्फीति-विरोधी कसाव, स्थिरता), चार्ट (खंड 11), संतुलन का तर्क। निष्कर्ष: लचीले लक्ष्यीकरण ने आघातों के समय वृद्धि को सहारा और मुद्रास्फीति-अपेक्षाओं को स्थिर रखा; निवेश-पुनरुद्धार के लिए मौद्रिक नीति के साथ राजकोषीय (सार्वजनिक पूँजीगत व्यय) और संरचनात्मक सुधार भी आवश्यक।
16. Quick Revision Summary
- नीतियाँ: 1948, IDRA 1951, 1956 (17-12-शेष), MRTP 1969, NIP 1991 के प्रावधान।
- 1991 से पहले: सार्वजनिक क्षेत्र की अग्रणी भूमिका; लाइसेंस-राज, ISI, अदक्षता जैसी कमियाँ।
- तुलना: भारत (सेवा-नेतृत्व) बनाम चीन (विनिर्माण-नेतृत्व) बनाम पाकिस्तान।
- विनिवेश: रंगराजन से PSE नीति 2021; महत्व और आलोचना।
- MSME: भूमिका, 2020 परिभाषा, चुनौतियाँ, सहायता-उपाय।
- रोज़गार: योजनाएँ, बने रहने के कारण, राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता, श्रम संहिताएँ।
- बैंकिंग: नरसिंहम, IBC, विलय; RBI का वित्तीय समावेशन; मौद्रिक नीति 2020-25।