UPSC Mains · Economics · Paper II · अध्याय 9

उद्योग, श्रम, बैंकिंग एवं वित्तीय क्षेत्र

Industry, Labour, Banking and the Financial Sector

औद्योगिक नीतियाँ, सार्वजनिक क्षेत्र, MSME; श्रम बाज़ार और श्रम संहिताएँ; बैंक राष्ट्रीयकरण, NPA, IBC, पूँजी बाज़ार और SEBI।

Paper II 16 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

Paper II का यह अध्याय भारत के उद्योग, श्रम-रोज़गार और बैंकिंग को समेटता है। सिलेबस:

  • उद्योग: औद्योगिक नीतियाँ (1948, 1956, 1991), सार्वजनिक क्षेत्र और विनिवेश, औद्योगिक लाइसेंसिंग, लघु और कुटीर उद्योग, MSME, उदारीकरण-पूर्व औद्योगीकरण की कमियाँ।
  • श्रम और रोज़गार: बेरोज़गारी के प्रकार और माप, रोज़गार योजनाएँ, श्रम सुधार, राष्ट्रीय रोज़गार नीति।
  • बैंकिंग और मौद्रिक नीति: बैंकिंग सुधार, वित्तीय समावेशन, RBI की मौद्रिक नीति।

2025 में SSI/कुटीर उद्योगों की चुनौतियाँ, विनिवेश, औद्योगिक पिछड़ापन और नई औद्योगिक नीति 1991, राष्ट्रीय रोज़गार नीति, उदारीकरण-पूर्व सार्वजनिक क्षेत्र और RBI के वित्तीय समावेशन प्रयास पूछे गए। 2024 में रोज़गार योजनाएँ और बेरोज़गारी का बने रहना, MSME, उदारीकरण-पूर्व औद्योगीकरण की अपर्याप्तताएँ और RBI की पिछले पाँच वर्षों की मौद्रिक नीति आई।

2. औद्योगिक नीतियाँ: 1948 से 1991

नीतिमुख्य प्रावधान
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1948मिश्रित अर्थव्यवस्था; चार श्रेणियाँ (राज्य-एकाधिकार, मिश्रित, नियंत्रित निजी, स्वतंत्र निजी)
उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम 1951औद्योगिक लाइसेंसिंग का कानूनी आधार
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956"औद्योगिक संविधान"; अनुसूची A (17 उद्योग, केवल राज्य), अनुसूची B (12, राज्य प्रमुख), अनुसूची C (शेष, निजी); समाजवादी समाज का स्वरूप; लघु उद्योगों को प्रोत्साहन
1960-70 के दशकलघु उद्योगों के लिए उत्पाद-आरक्षण (1967 से); MRTP अधिनियम 1969; बैंक राष्ट्रीयकरण 1969; FERA 1973
1977, 1980 की नीतियाँज़िला उद्योग केंद्र (1977); 1980 से आंशिक उदारीकरण
नई औद्योगिक नीति, 24 जुलाई 1991लाइसेंसिंग का लगभग अंत (कुछ ख़तरनाक/सामरिक उद्योग छोड़कर); सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योग 17 से घटकर 8 (अब केवल परमाणु ऊर्जा और रेलवे संचालन); MRTP का पुनर्गठन (बाद में प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002); विदेशी निवेश में 51% तक स्वचालित अनुमोदन; विदेशी तकनीक समझौतों का उदारीकरण; सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश और रुग्ण इकाइयाँ BIFR को

3. उदारीकरण-पूर्व औद्योगीकरण: भूमिका और कमियाँ

  • सार्वजनिक क्षेत्र की अग्रणी भूमिका (1991 से पहले):
    • भारी और आधारभूत उद्योग जहाँ निजी पूँजी अपर्याप्त या अनिच्छुक (इस्पात: भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर; मशीनरी: HEC, BHEL; तेल: ONGC, IOC)।
    • अवसंरचना: बिजली, रेलवे, दूरसंचार, बंदरगाह।
    • "प्रमुख शिखरों" पर नियंत्रण, आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण को रोकना।
    • पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग (क्षेत्रीय संतुलन), रोज़गार, आत्मनिर्भरता और तकनीकी क्षमता।
    • संसाधन-जुटाव: सार्वजनिक बचत और पुनर्निवेश की अपेक्षा।
  • औद्योगिक पिछड़ेपन और अपर्याप्तताओं के कारण:
    • लाइसेंस-परमिट राज: क्षमता-सीमा, विलंब, किराया-माँग; पैमाने की मितव्ययिता नहीं।
    • आयात-स्थानापन्नता: संरक्षित बाज़ार, गुणवत्ता और लागत पर प्रतिस्पर्धा का अभाव, निर्यात-विरोधी पक्षपात।
    • सार्वजनिक उपक्रमों की अदक्षता: कम क्षमता-उपयोग, राजनीतिक हस्तक्षेप, अधिक स्टाफ़, घाटे; अपेक्षित सार्वजनिक बचत नहीं मिली।
    • तकनीकी पिछड़ापन (विदेशी तकनीक और FDI पर प्रतिबंध), अनुसंधान पर कम व्यय।
    • पूँजी-गहनता और कम रोज़गार-सृजन; लघु उद्योग आरक्षण से आकार-वृद्धि रुकी।
    • 1965 के बाद औद्योगिक मंदी (1965-80 में वृद्धि-दर में गिरावट), रुग्ण इकाइयाँ।
    • कठोर श्रम क़ानून (औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 का अध्याय V-B), अवसंरचना की बाधाएँ।
  • NIP 1991 ने इन्हें कैसे संबोधित किया: विलाइसेंसिंग से प्रवेश और विस्तार की स्वतंत्रता, विदेशी तकनीक और पूँजी, प्रतिस्पर्धा, सार्वजनिक क्षेत्र का पुनर्गठन, MRTP सीमाएँ हटाना। परिणाम: 1990 के दशक के मध्य में औद्योगिक तेज़ी; पर विनिर्माण का GDP-हिस्सा अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ा, इसलिए "मेक इन इंडिया" (2014), PLI (2020 से)।

4. तुलनात्मक दृष्टि: भूमि-उपयोग, कृषि और उद्योग

भारत की औद्योगिक संरचना को पड़ोसी देशों के संदर्भ में देखना उपयोगी है। भूमि का कितना भाग खेती, वन और गैर-कृषि उपयोग में है, और श्रम-शक्ति कृषि से उद्योग में कितनी तेज़ी से गई, इसी से संरचनात्मक रूपांतरण की गति का पता चलता है।

उद्योग, श्रम और बैंकिंग: भारत, चीन और पाकिस्तान में भूमि-उपयोग, कृषि और उद्योग
भारत, चीन और पाकिस्तान में भूमि-उपयोग, कृषि और उद्योग की तुलनात्मक झलक; संरचनात्मक रूपांतरण की भिन्न गति को समझने में सहायक
  • चीन: 1978 के सुधारों के बाद श्रम-गहन, निर्यात-उन्मुख विनिर्माण (विशेष आर्थिक क्षेत्र, ग्राम-नगर उद्यम) से कृषि-श्रम का तेज़ स्थानांतरण; "विश्व का कारख़ाना"।
  • भारत: श्रम कृषि से सीधे सेवाओं और निर्माण (अनौपचारिक) में गया; विनिर्माण-रोज़गार का हिस्सा कम रहा; सेवा-नेतृत्व वृद्धि (IT, वित्तीय सेवाएँ)।
  • पाकिस्तान: कृषि (कपास, गेहूँ) और वस्त्र उद्योग पर अधिक निर्भरता; बार-बार BoP संकट और कम निवेश-दर।
  • सबक: विनिर्माण-आधारित रोज़गार के लिए श्रम-गहन क्षेत्रों (वस्त्र, जूते, खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली) में पैमाना, अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स और व्यापार-एकीकरण आवश्यक।

5. सार्वजनिक क्षेत्र और विनिवेश

  • विनिवेश का अर्थ: सार्वजनिक उपक्रमों में सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री: अल्पांश (IPO, OFS, ETF), रणनीतिक (प्रबंधन-नियंत्रण सहित)।
  • विकासक्रम: 1991-92 में अल्पांश बिक्री का आरंभ; रंगराजन समिति (1993); विनिवेश आयोग (1996); 1999-2004 में रणनीतिक बिक्री (मॉडर्न फ़ूड्स, BALCO, VSNL, हिंदुस्तान ज़िंक); राष्ट्रीय निवेश कोष (2005); DIPAM (2016); नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति (2021): चार सामरिक क्षेत्रों (परमाणु ऊर्जा-अंतरिक्ष-रक्षा; परिवहन-दूरसंचार; ऊर्जा-खनिज; बैंकिंग-बीमा-वित्तीय सेवाएँ) में न्यूनतम उपस्थिति, शेष में निजीकरण/बंद करना। एयर इंडिया का टाटा समूह को हस्तांतरण (जनवरी 2022); LIC का IPO (मई 2022)।
  • विनिवेश नीति का महत्व: (i) दक्षता: निजी प्रबंधन, कठोर बजट-बाधा, बाज़ार-अनुशासन; (ii) राजकोषीय: गैर-ऋण पूँजी-प्राप्ति से घाटा घटाना और अवसंरचना/सामाजिक क्षेत्र में निवेश; (iii) "सरकार का व्यापार में कोई काम नहीं": शासन पर ध्यान; (iv) पूँजी बाज़ार को गहराई, खुदरा भागीदारी; (v) बंद संपत्तियों का मुद्रीकरण।
  • आलोचना: "परिवार की चाँदी बेचना" (आवर्ती आय के बदले एकबारगी प्राप्ति), मूल्यांकन-विवाद, लक्ष्य प्रायः पूरे नहीं, रोज़गार और आरक्षण पर प्रभाव, निजी एकाधिकार का ख़तरा, सामरिक संपत्तियाँ।
  • सुधार के अन्य उपकरण: नवरत्न (1997), महारत्न (2009), मिनीरत्न; MoU प्रणाली; परिसंपत्ति मुद्रीकरण पाइपलाइन (2021)।

6. लघु, कुटीर उद्योग और MSME

  • भूमिका: कृषि के बाद सबसे बड़ा रोज़गार-प्रदाता; GDP, विनिर्माण-उत्पादन और निर्यात में बड़ा योगदान; कम पूँजी में अधिक रोज़गार; ग्रामीण-अर्धशहरी क्षेत्रों में औद्योगीकरण, क्षेत्रीय संतुलन; उद्यमशीलता और नवाचार; बड़े उद्योगों के सहायक (पूरक)।
  • परिभाषा: MSMED अधिनियम 2006; 1 जुलाई 2020 से संयुक्त (निवेश + कारोबार) मानदंड, विनिर्माण-सेवा का भेद समाप्त: सूक्ष्म (निवेश ≤ ₹1 करोड़, कारोबार ≤ ₹5 करोड़), लघु (≤ ₹10 करोड़, ≤ ₹50 करोड़), मध्यम (≤ ₹50 करोड़, ≤ ₹250 करोड़); बजट 2025-26 में इन सीमाओं को बढ़ाने की घोषणा। उद्यम पंजीकरण पोर्टल (2020)।
  • चुनौतियाँ:
    • साख: संपार्श्विक का अभाव, ऊँची ब्याज-दर, औपचारिक ऋण तक सीमित पहुँच (बड़ा ऋण-अंतराल)।
    • विलंबित भुगतान: बड़े ख़रीदारों से कार्यशील पूँजी फँसती है।
    • पुरानी तकनीक, कम उत्पादकता, गुणवत्ता-मानक; कौशल की कमी।
    • विपणन, ब्रांडिंग और निर्यात-बाज़ार तक पहुँच; बड़े उद्योगों और आयात (विशेषकर चीन) से प्रतिस्पर्धा।
    • अनौपचारिकता, अनुपालन-भार (GST, श्रम, पर्यावरण), "बौना बने रहने" का प्रोत्साहन (missing middle)।
    • अवसंरचना (बिजली, कच्चा माल), आघात-संवेदनशीलता (विमुद्रीकरण, GST संक्रमण, कोविड)।
    • कुटीर/ग्रामोद्योग विशेष: हथकरघा-हस्तशिल्प में मशीन-निर्मित वस्तुओं की प्रतिस्पर्धा, कच्चे माल की महँगाई, बिचौलियों पर निर्भरता, युवा पीढ़ी का पलायन।
  • सरकारी कदम: CGTMSE (2000) ऋण-गारंटी; प्राथमिकता क्षेत्र ऋण; PMEGP (2008); मुद्रा (2015); TReDS और MSME समाधान (विलंबित भुगतान); 45-दिन भुगतान नियम (आयकर अधिनियम धारा 43B(h), 2023 से); ECLGS (2020, कोविड); सार्वजनिक ख़रीद में MSME से 25% ख़रीद का अनिवार्य लक्ष्य; ZED प्रमाणन; SFURTI (पारंपरिक उद्योग क्लस्टर), KVIC; RAMP कार्यक्रम (2022); PM विश्वकर्मा (2023, पारंपरिक कारीगर); लघु उद्योग आरक्षण का पूर्ण अंत (2015)।

7. बेरोज़गारी और रोज़गार नीति

  • माप: PLFS (2017-18 से) में सामान्य स्थिति (मुख्य + सहायक) और वर्तमान साप्ताहिक स्थिति; 2025 से मासिक और त्रैमासिक अनुमान का विस्तार।
  • प्रकार: संरचनात्मक, प्रच्छन्न (कृषि), मौसमी, शिक्षित बेरोज़गारी, अल्प-रोज़गार, घर्षणात्मक।
  • प्रमुख रोज़गार योजनाएँ: MGNREGA (2005; 100 दिन की कानूनी गारंटी); PMEGP; DAY-NRLM (2011) और DAY-NULM; DDU-GKY (2014); PMKVY (2015); मुद्रा (2015); स्टैंड-अप इंडिया और स्टार्टअप इंडिया (2016); आत्मनिर्भर भारत रोज़गार योजना (2020); PLI योजनाएँ; रोज़गार-संबद्ध प्रोत्साहन (ELI) योजना (2025)।
  • बेरोज़गारी बने रहने के कारण:
    • "रोज़गार-विहीन/रोज़गार-अल्प वृद्धि": पूँजी और कौशल-गहन क्षेत्रों (IT, वित्त) का नेतृत्व।
    • विनिर्माण का कम हिस्सा; श्रम-गहन निर्यात में पिछड़ना।
    • शिक्षा और कौशल की बेमेल (skill mismatch); शिक्षित युवाओं में ऊँची बेरोज़गारी।
    • अनौपचारिकता (अधिकांश श्रम-शक्ति अनौपचारिक) और निम्न गुणवत्ता का रोज़गार।
    • महिला श्रम-भागीदारी का निम्न स्तर (हालिया वृद्धि मुख्यतः कृषि स्व-रोज़गार में)।
    • कृषि में अतिरिक्त श्रम; योजनाओं का खंडित, आपूर्ति-पक्षी स्वरूप; कमज़ोर कार्यान्वयन।
  • राष्ट्रीय रोज़गार नीति की आवश्यकता: भारत में रोज़गार को समर्पित कोई समग्र राष्ट्रीय नीति नहीं; योजनाएँ अलग-अलग मंत्रालयों में बिखरी। आवश्यकता: (i) जनसांख्यिकीय लाभांश (कार्यशील आयु जनसंख्या का बढ़ता अनुपात) को काम देना; (ii) रोज़गार को मैक्रो-नीति का स्पष्ट लक्ष्य बनाना (रोज़गार-लोच बढ़ाना); (iii) श्रम-गहन क्षेत्रों की पहचान और प्रोत्साहन; (iv) कौशल-शिक्षा-उद्योग का समन्वय; (v) सामाजिक सुरक्षा और औपचारिकीकरण; (vi) महिलाओं के लिए विशेष रणनीति; (vii) बेहतर, बार-बार आँकड़े। संबंधित पहलें: राष्ट्रीय कौशल विकास और उद्यमिता नीति (2015), चार श्रम संहिताएँ (2019-20 में पारित; नवंबर 2025 से प्रभावी), ई-श्रम पोर्टल (2021, असंगठित श्रमिकों का डेटाबेस), राष्ट्रीय करियर सेवा (2015)।

8. बैंकिंग सुधार और वित्तीय समावेशन

  • सुधार: नरसिंहम समिति I (1991) और II (1998): SLR-CRR में कमी, ब्याज विनियमन-मुक्ति, विवेकपूर्ण मानदंड (आय-पहचान, परिसंपत्ति-वर्गीकरण, प्रावधान), नए निजी बैंक; SARFAESI (2002); "चार R" (पहचान, समाधान, पुनर्पूंजीकरण, सुधार, 2015 से), परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा (2015); दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (2016); सार्वजनिक बैंकों का विलय (2019-20 तक 27 से 12)।
  • RBI के वित्तीय समावेशन प्रयास:
    • अग्रणी बैंक योजना (1969), प्राथमिकता क्षेत्र ऋण, RRB (1975), ग्रामीण शाखा-विस्तार नीति।
    • "नो-फ़्रिल्स" खाते (2005), बाद में मूल बचत बैंक जमा खाता (BSBDA, 2012)।
    • व्यवसाय प्रतिनिधि (BC) मॉडल (2006): बैंक-शाखा के बिना अंतिम छोर तक सेवा।
    • सरलीकृत KYC, आधार-आधारित e-KYC; वित्तीय समावेशन योजनाएँ (FIP) बैंकों के लिए।
    • भुगतान बैंक और लघु वित्त बैंक (2015 में लाइसेंस)।
    • वित्तीय साक्षरता केंद्र, "वित्तीय साक्षरता सप्ताह"।
    • वित्तीय समावेशन हेतु राष्ट्रीय रणनीति (NSFI 2019-24);वित्तीय समावेशन सूचकांक (FI-Index, अगस्त 2021 से वार्षिक)।
    • डिजिटल भुगतान अवसंरचना: NPCI, UPI (2016), भुगतान अवसंरचना विकास कोष (2021), UPI123Pay और UPI-लाइट।
  • सरकार की ओर से: PMJDY (28 अगस्त 2014), JAM त्रिमूर्ति, PMJJBY, PMSBY, APY (2015)।

9. RBI की मौद्रिक नीति: हाल के वर्ष

  • ढाँचा: 2016 से लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (CPI 4% ± 2%), मौद्रिक नीति समिति; प्राथमिक उद्देश्य मूल्य-स्थिरता, "संवृद्धि के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए"।
  • कोविड चरण (2020-21): रेपो दर घटाकर 4% (मई 2020); रिवर्स रेपो 3.35%; लक्षित दीर्घकालीन रेपो (TLTRO), ऋण-स्थगन (moratorium), समाधान ढाँचे, सरकारी प्रतिभूति अधिग्रहण कार्यक्रम (G-SAP, 2021); "समायोजनकारी" रुख़। उद्देश्य: तरलता, वित्तीय स्थिरता, निवेश और माँग का समर्थन।
  • मुद्रास्फीति-विरोधी चरण (2022-23): रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ऊँची मुद्रास्फीति; मई 2022 में अनिर्धारित बैठक में वृद्धि और फ़रवरी 2023 तक रेपो 6.5%; अप्रैल 2022 से स्थायी जमा सुविधा (SDF) गलियारे का तल; "समायोजन की वापसी" का रुख़।
  • स्थिरता और फिर ढील (2023-25): लंबे समय तक 6.5% पर ठहराव; मुद्रास्फीति लक्ष्य के निकट आने पर 2025 में कटौतियाँ (फ़रवरी और अप्रैल में 25-25 आधार अंक, जून में 50 आधार अंक, जिससे रेपो 5.5%) और CRR में चरणबद्ध कटौती।
  • निवेश बनाम मूल्य-स्थिरता: कम दरें निवेश को प्रोत्साहित करती हैं पर मुद्रास्फीति-जोखिम; RBI ने "मूल्य-स्थिरता ही सतत वृद्धि की पूर्व-शर्त" का तर्क अपनाया। निवेश पर प्रभाव संचरण (बाह्य बेंचमार्क ऋण), बैंकों की बैलेंस-शीट (NPA में कमी), और माँग-अपेक्षाओं पर निर्भर; निजी पूँजीगत व्यय की धीमी वसूली मौद्रिक से अधिक माँग और अनिश्चितता से जुड़ी।

10. Master Summary Table

विषयमुख्य तथ्यपरीक्षा-बिंदु
IPR 1956अनुसूची A 17, B 12, C शेष"औद्योगिक संविधान"
NIP 199124 जुलाई 1991; विलाइसेंसिंगआरक्षित 17 → 8 → 2
विनिवेशरंगराजन 1993; DIPAM 2016; PSE नीति 2021एयर इंडिया 2022
MSME परिभाषा1 जुलाई 2020: निवेश + कारोबारउद्यम पोर्टल
MSME सहायताCGTMSE, TReDS, 43B(h), PM विश्वकर्माविलंबित भुगतान
रोज़गारMGNREGA 2005; PMKVY 2015; ELI 2025रोज़गार-अल्प वृद्धि
श्रम संहिताएँमज़दूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा, OSH29 क़ानूनों का समेकन
बैंकिंग सुधारनरसिंहम 1991, 1998; IBC 20164R
वित्तीय समावेशनBC 2006; BSBDA 2012; PB/SFB 2015; FI-Index 2021PMJDY 2014
मौद्रिक नीति4% (2020) → 6.5% (2023) → 5.5% (जून 2025)SDF 2022

11. चार्ट: रेपो दर का हालिया चक्र

4.0% (मई 2020) 6.5% (फ़र. 2023) 5.5% CPI लक्ष्य 4% (संदर्भ) 2020202220232025 रेपो
सांकेतिक चरण-रेखा (पैमाना अनुमानित): कोविड में ढील, 2022-23 में मुद्रास्फीति-विरोधी कसाव, 2025 में पुनः ढील।

12. Mind Map

उद्योग, श्रम, बैंकिंग
औद्योगिक नीति
  • 1948, 1956, 1991
  • लाइसेंस-राज की कमियाँ
सार्वजनिक क्षेत्र
  • अग्रणी भूमिका
  • विनिवेश, PSE नीति 2021
MSME
  • भूमिका, परिभाषा
  • चुनौतियाँ, सहायता
रोज़गार
  • योजनाएँ, बने रहने के कारण
  • राष्ट्रीय नीति, श्रम संहिताएँ
बैंकिंग
  • नरसिंहम, IBC, विलय
  • वित्तीय समावेशन, मौद्रिक नीति

13. महत्वपूर्ण One-liners

  • नई औद्योगिक नीति: 24 जुलाई 1991।
  • IPR 1956 की अनुसूची A में 17 उद्योग।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के लिए अब आरक्षित: परमाणु ऊर्जा और रेलवे संचालन।
  • नई MSME परिभाषा प्रभावी: 1 जुलाई 2020।
  • व्यवसाय प्रतिनिधि मॉडल: 2006।
  • PMJDY की शुरुआत: 28 अगस्त 2014।
  • स्थायी जमा सुविधा (SDF): अप्रैल 2022।
  • विनिवेश पर पहली प्रमुख समिति: सी. रंगराजन (1993)।

14. टिप्स एवं ट्रिक्स

उत्तर-लेखन
  • नीति-प्रश्नों में "1991 से पहले बनाम बाद" की तालिका सबसे प्रभावी।
  • मौद्रिक नीति के उत्तर में दरें केवल वही लिखें जिन पर पूरा भरोसा हो; रुख़ (समायोजनकारी, तटस्थ) और कारण अधिक महत्वपूर्ण।
  • MSME और रोज़गार के उत्तर में आर्थिक सर्वेक्षण और PLFS को स्रोत के रूप में उद्धृत करें।
याद रखने की तरकीब

NIP 1991 के स्तंभ: "LPG + DIP": उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण + विलाइसेंसिंग, निवेश (FDI), सार्वजनिक क्षेत्र सुधार।

सामान्य भूल

PMJDY को RBI की योजना लिखना: PMJDY केंद्र सरकार (वित्त मंत्रालय) की योजना है; RBI के अपने समावेशन उपाय (BC, BSBDA, PB/SFB, NSFI, FI-Index) अलग से गिनाएँ।

15. PYQ-आधारित प्रश्न एवं हल

Q1UPSC 2025 · Paper II · 5(d) · 10 अंक

भारत की विनिवेश नीति के महत्व की चर्चा कीजिए।

मॉडल उत्तर

खंड 5: अर्थ, विकासक्रम (संक्षेप में), महत्व के पाँच बिंदु, आलोचना, निष्कर्ष (रणनीतिक विनिवेश दक्षता के लिए, केवल राजस्व के लिए नहीं)।

Q2UPSC 2025 · Paper II · 3(c)

भारत में लघु और कुटीर उद्योगों के समक्ष चुनौतियों की चर्चा कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका (रोज़गार, क्षेत्रीय संतुलन); खंड 6 की चुनौतियाँ (साख, भुगतान, तकनीक, विपणन, अनौपचारिकता, कुटीर-विशेष); उपाय और सरकारी कदम; निष्कर्ष: "missing middle" की समस्या हल करने हेतु विकास-अनुकूल प्रोत्साहन।

Q3UPSC 2024 · Paper II · 3(a)

भारतीय अर्थव्यवस्था में MSME की भूमिका और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की चर्चा कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 6: भूमिका, परिभाषा (2020), सरकारी कदम (साख, भुगतान, ख़रीद, तकनीक, कोविड-राहत, पारंपरिक कारीगर)। आगे की राह: औपचारिकीकरण के प्रोत्साहन, क्लस्टर-विकास, निर्यात-संवर्धन, डिजिटल साख।

Q4UPSC 2025 · Paper II · 6(a)

1991 से पहले भारत के औद्योगिक पिछड़ेपन के कारण बताइए। नई औद्योगिक नीति (जुलाई 1991) ने इनका समाधान कैसे किया?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 3 के कारण; NIP के प्रावधान (खंड 2 की तालिका) और उनका कारण-वार मिलान; परिणाम और सीमाएँ; मेक इन इंडिया, PLI।

Q5UPSC 2024 · Paper II · 3(c)

उदारीकरण-पूर्व भारत में औद्योगीकरण की अपर्याप्तताओं की चर्चा कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

उपलब्धियों से आरंभ (विविध औद्योगिक आधार, पूँजी-वस्तु क्षमता); फिर खंड 3 की अपर्याप्तताएँ; 1965-80 की औद्योगिक मंदी पर बहस (आइ.जे. अहलूवालिया: उत्पादकता-ठहराव; अन्य: कृषि-माँग और सार्वजनिक निवेश में कमी)।

Q6UPSC 2025 · Paper II · 8(b)

उदारीकरण से पहले सार्वजनिक क्षेत्र ने भारत के आर्थिक विकास में अग्रणी भूमिका निभाई। विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 3 की अग्रणी भूमिका (पाँच बिंदु, उदाहरण सहित); उपलब्धियाँ (आधारभूत उद्योग, अवसंरचना, तकनीकी क्षमता, पिछड़े क्षेत्र); सीमाएँ (अदक्षता, घाटे, सार्वजनिक बचत की अपेक्षा अधूरी); निष्कर्ष: प्रारंभिक चरण में आवश्यक, पर 1980 के दशक तक सुधार अपरिहार्य हो गए।

Q7UPSC 2024 · Paper II · 2(a)

भारत में रोज़गार-सृजन की प्रमुख योजनाओं की चर्चा कीजिए। इनके बावजूद बेरोज़गारी क्यों बनी हुई है?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 7: योजनाओं का वर्गीकरण (मज़दूरी-रोज़गार: MGNREGA; स्व-रोज़गार: PMEGP, मुद्रा, NRLM; कौशल: PMKVY, DDU-GKY; प्रोत्साहन: ABRY, PLI, ELI); बने रहने के छह कारण; सुझाव (श्रम-गहन विनिर्माण, कौशल-उद्योग संबंध, महिला भागीदारी, शहरी रोज़गार गारंटी पर विचार)।

Q8UPSC 2025 · Paper II · 6(c)

राष्ट्रीय रोज़गार नीति की आवश्यकता बताइए। इस दिशा में सरकार की पहलों की चर्चा कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 7 का अंतिम बिंदु: सात आवश्यकताएँ और संबंधित पहलें (कौशल नीति, श्रम संहिताएँ, ई-श्रम, NCS, ELI)। निष्कर्ष: एक समन्वित नीति जो मैक्रो, क्षेत्रीय, कौशल और सामाजिक सुरक्षा उपायों को एक लक्ष्य से जोड़े।

Q9UPSC 2025 · Paper II · 8(c)

वित्तीय समावेशन के लिए RBI की पहलों की चर्चा कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

अर्थ (उचित लागत पर औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुँच: बचत, ऋण, बीमा, पेंशन, भुगतान); खंड 8 की RBI पहलें (कालक्रम से); परिणाम (खातों का विस्तार, डिजिटल भुगतान); चुनौतियाँ (निष्क्रिय खाते, ऋण-पहुँच, साइबर धोखाधड़ी, लैंगिक अंतर); आगे: उपयोग-गुणवत्ता (केवल खाता नहीं, ऋण-बीमा-पेंशन), वित्तीय साक्षरता और उपभोक्ता-संरक्षण।

Q10UPSC 2024 · Paper II · 8(a)

पिछले पाँच वर्षों में RBI की मौद्रिक नीति के उद्देश्यों की चर्चा कीजिए। इसने निवेश और मूल्य-स्थिरता के बीच संतुलन कैसे साधा?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 9: ढाँचा, तीन चरण (कोविड-ढील, मुद्रास्फीति-विरोधी कसाव, स्थिरता), चार्ट (खंड 11), संतुलन का तर्क। निष्कर्ष: लचीले लक्ष्यीकरण ने आघातों के समय वृद्धि को सहारा और मुद्रास्फीति-अपेक्षाओं को स्थिर रखा; निवेश-पुनरुद्धार के लिए मौद्रिक नीति के साथ राजकोषीय (सार्वजनिक पूँजीगत व्यय) और संरचनात्मक सुधार भी आवश्यक।

16. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • नीतियाँ: 1948, IDRA 1951, 1956 (17-12-शेष), MRTP 1969, NIP 1991 के प्रावधान।
  • 1991 से पहले: सार्वजनिक क्षेत्र की अग्रणी भूमिका; लाइसेंस-राज, ISI, अदक्षता जैसी कमियाँ।
  • तुलना: भारत (सेवा-नेतृत्व) बनाम चीन (विनिर्माण-नेतृत्व) बनाम पाकिस्तान।
  • विनिवेश: रंगराजन से PSE नीति 2021; महत्व और आलोचना।
  • MSME: भूमिका, 2020 परिभाषा, चुनौतियाँ, सहायता-उपाय।
  • रोज़गार: योजनाएँ, बने रहने के कारण, राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता, श्रम संहिताएँ।
  • बैंकिंग: नरसिंहम, IBC, विलय; RBI का वित्तीय समावेशन; मौद्रिक नीति 2020-25।