UPSC Mains · Economics · Paper II · अध्याय 8

योजना काल एवं कृषि

Planning Era and Agriculture

नेहरू-महालनोबिस मॉडल, पंचवर्षीय योजनाएँ, NITI Aayog; हरित क्रांति, भूमि सुधार, कृषि मूल्य नीति, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण ऋण।

Paper II 25 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

Paper II का यह अध्याय "स्वतंत्रता के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था" के दो बड़े भागों को जोड़ता है: नियोजन (उदारीकरण से पहले और बाद) और कृषि। पिछले दो वर्षों में सबसे अधिक प्रश्न (2024 में नौ, 2025 में आठ) इसी अध्याय से आए। सिलेबस:

  • नियोजन: योजनाओं के उद्देश्य और प्राथमिकताएँ, महालनोबिस मॉडल और वैकल्पिक मॉडल (वकील-ब्रह्मानंद), 1950-80 की संवृद्धि और गरीबी, विकेंद्रीकृत नियोजन, NITI आयोग।
  • कृषि: भूमि सुधार, हरित क्रांति और द्वितीय हरित क्रांति, पूँजी-निर्माण, साख, विपणन, कीमत-नीति और सब्सिडी, खाद्य सुरक्षा और PDS, खाद्य प्रसंस्करण, पशुपालन, WTO और कृषि, PM-KISAN, कृषि में महिलाएँ।

2. उदारीकरण-पूर्व नियोजन

योजनाअवधिमुख्य बल/मॉडल
प्रथम1951-56कृषि, सिंचाई, शरणार्थी पुनर्वास; हैरोड-डोमर ढाँचा
द्वितीय1956-61महालनोबिस मॉडल: भारी और आधारभूत उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र, औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956
तृतीय1961-66आत्मनिर्भर और स्वयं-स्फूर्त अर्थव्यवस्था; युद्ध (1962, 1965) और सूखे से विफल
योजना-अवकाश1966-69तीन वार्षिक योजनाएँ; रुपये का अवमूल्यन (1966); हरित क्रांति की शुरुआत
चतुर्थ1969-74स्थिरता के साथ संवृद्धि, आत्मनिर्भरता; बैंक राष्ट्रीयकरण (1969)
पंचम1974-78गरीबी हटाओ, न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम; 1978 में समय से पहले समाप्त, अनवरत (rolling) योजना 1978-80
षष्ठ, सप्तम1980-85, 1985-90गरीबी-निवारण (IRDP), रोज़गार, उत्पादकता; आंशिक उदारीकरण; फिर वार्षिक योजनाएँ 1990-92
  • उदारीकरण-पूर्व नियोजन के प्रमुख बल-क्षेत्र: (i) तीव्र औद्योगीकरण, भारी उद्योग; (ii) सार्वजनिक क्षेत्र का "प्रमुख शिखरों" (commanding heights) पर नियंत्रण; (iii) आयात-स्थानापन्नता और आत्मनिर्भरता; (iv) समाजवादी समाज का स्वरूप: असमानता और आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण में कमी (MRTP अधिनियम 1969); (v) 1966 के बाद खाद्य आत्मनिर्भरता; (vi) 1970 के दशक से प्रत्यक्ष गरीबी-निवारण और रोज़गार; (vii) क्षेत्रीय संतुलन।

3. महालनोबिस मॉडल और वकील-ब्रह्मानंद विकल्प

  • दो-क्षेत्रीय मॉडल (1953): अर्थव्यवस्था को उपभोक्ता-वस्तु क्षेत्र और पूँजी-वस्तु क्षेत्र में बाँटा। निवेश का भाग λk पूँजी-वस्तु क्षेत्र को। दीर्घकाल में ऊँची संवृद्धि के लिए λk ऊँचा होना चाहिए, यानी आज कम उपभोग, कल अधिक क्षमता। बाद में चार-क्षेत्रीय मॉडल (पूँजी-वस्तु, कारख़ाना उपभोक्ता-वस्तु, घरेलू/लघु उद्योग, सेवाएँ) जिसमें रोज़गार के लिए लघु और कुटीर उद्योगों को उपभोक्ता-वस्तुओं की ज़िम्मेदारी।
  • अपर्याप्तताएँ:
    • कृषि और मज़दूरी-वस्तुओं (खाद्यान्न) की उपेक्षा; खाद्य-आपूर्ति बाधा से मुद्रास्फीति।
    • बंद अर्थव्यवस्था की मान्यता; विदेशी व्यापार से पूँजी-वस्तुएँ प्राप्त करने का विकल्प नहीं देखा (निर्यात-निराशावाद)।
    • बचत-बाधा और वित्तपोषण की समस्या की उपेक्षा; घाटे की वित्त-व्यवस्था और विदेशी सहायता पर निर्भरता।
    • पूँजी-गहन तकनीक, कम रोज़गार-सृजन; "ट्रिकल-डाउन" पर भरोसा।
    • सार्वजनिक उपक्रमों की अदक्षता और लाइसेंस-राज।
  • क्यों छोड़ा गया: तृतीय योजना का संकट (1965-66 के सूखे, PL-480 खाद्य आयात पर निर्भरता, युद्ध, BoP संकट, 1966 का अवमूल्यन) के बाद प्राथमिकता कृषि (हरित क्रांति) की ओर; 1980 और 1991 के सुधारों ने बचा-खुचा ढाँचा भी बदल दिया। फिर भी इसने भारत को एक विविध औद्योगिक आधार और तकनीकी संस्थाएँ दीं।
  • सी.एन. वकील और पी.आर. ब्रह्मानंद का "मज़दूरी-वस्तु मॉडल" (1956, "Planning for an Expanding Economy"):
    • भारत की मूल समस्या पूँजी की नहीं, मज़दूरी-वस्तुओं (खाद्यान्न, कपड़ा, आवश्यक उपभोग) की कमी है।
    • प्रच्छन्न बेरोज़गारों को उत्पादक काम (विशेषकर ग्रामीण निर्माण, सिंचाई) में लगाने के लिए उन्हें खिलाना होगा; अतः मज़दूरी-वस्तुओं की पूर्ति बढ़ाना ही "पूँजी-निर्माण" का आधार है।
    • प्राथमिकता: कृषि और मज़दूरी-वस्तु उद्योग; श्रम-गहन तकनीक; मुद्रास्फीति-रहित संवृद्धि।
    • महालनोबिस से भेद: भारी उद्योग के बजाय उपभोग-वस्तुओं और रोज़गार पर बल; यह बाद में हरित क्रांति और ग्रामीण रोज़गार कार्यक्रमों के तर्क में दिखा।

4. 1950-80: संवृद्धि और गरीबी

  • वास्तविक राष्ट्रीय आय की औसत वृद्धि लगभग 3.5% वार्षिक; जनसंख्या-वृद्धि लगभग 2% से अधिक होने से प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि धीमी। प्रो. राज कृष्णा ने इसे "हिंदू संवृद्धि दर" कहा।
  • उपलब्धियाँ: औपनिवेशिक ठहराव (20वीं सदी के पूर्वार्ध में लगभग शून्य प्रति व्यक्ति वृद्धि) से निर्णायक मोड़; औद्योगिक आधार, बचत और निवेश-दर में वृद्धि, हरित क्रांति से खाद्य आत्मनिर्भरता।
  • गरीबी पर प्रभाव: 1950 और 1960 के दशक में ग्रामीण गरीबी में कोई स्पष्ट गिरावट नहीं, कृषि-उत्पादन और कीमतों के साथ उतार-चढ़ाव; दांडेकर-रथ (1971) के अध्ययन ने व्यापक गरीबी दिखाई; योजना आयोग के लकड़ावाला-पद्धति अनुमान में 1973-74 में लगभग 54.9% जनसंख्या गरीबी-रेखा से नीचे थी। 1970 के दशक के अंत से गरीबी में धीरे-धीरे गिरावट।
  • कारण: धीमी वृद्धि, पूँजी-गहन औद्योगीकरण से कम रोज़गार, भूमि-सुधार की अधूरी सफलता, ऊँची जनसंख्या-वृद्धि, मुद्रास्फीति (विशेषकर खाद्य); इसलिए 1970 के दशक में ट्रिकल-डाउन से हटकर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप (न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम, IRDP, रोज़गार कार्यक्रम)।

5. विकेंद्रीकृत नियोजन

  • पृष्ठभूमि: बलवंत राय मेहता समिति (1957) से पंचायती राज; अशोक मेहता (1978); दांतवाला समिति (1978, प्रखंड-स्तरीय नियोजन); सी.एच. हनुमंत राव (1984, ज़िला नियोजन)।
  • संवैधानिक आधार: 73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992); ग्यारहवीं अनुसूची (29 विषय) और बारहवीं अनुसूची (18 विषय); अनुच्छेद 243G (पंचायतों द्वारा आर्थिक विकास की योजना), अनुच्छेद 243ZD (ज़िला योजना समिति), 243ZE (महानगर योजना समिति)।
  • दिशा-निर्देशों के मुख्य तत्व (योजना आयोग की 2006 विशेषज्ञ समूह रिपोर्ट और एकीकृत ज़िला नियोजन मैनुअल, 2008 के आधार पर):
    • नीचे से ऊपर (bottom-up) योजना: ग्राम सभा से आवश्यकताओं की पहचान।
    • हर स्तर के लिए "संसाधन-आवरण" (resource envelope) की पूर्व-जानकारी, ताकि यथार्थवादी योजना बने।
    • सहभागिता: महिलाएँ, अनुसूचित जाति/जनजाति, स्वयं-सहायता समूह।
    • योजनाओं का अभिसरण (convergence): विभिन्न केंद्र-राज्य योजनाओं को एक ज़िला योजना में।
    • दृष्टि-पत्र (10-15 वर्ष) और वार्षिक योजना; स्थानिक (spatial) नियोजन।
    • तकनीकी सहायता समूह, आँकड़ा-आधार, निगरानी और सामाजिक अंकेक्षण।
  • अनुभव: केरल का जन-योजना अभियान (1996) सफल उदाहरण; 14वें वित्त आयोग के सीधे अनुदानों के बाद ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP, 2015 से)। समस्याएँ: "3F" (funds, functions, functionaries) का अपूर्ण हस्तांतरण, ज़िला योजना समितियों की निष्क्रियता, क्षमता की कमी।
  • NITI आयोग (1 जनवरी 2015): योजना आयोग का स्थान; पंचवर्षीय योजनाएँ 12वीं (2012-17) के बाद समाप्त; सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद, आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (2018)।

6. भूमि सुधार और कृषि उत्पादकता

  • घटक: (i) बिचौलियों (ज़मींदारी) का उन्मूलन: 1950 के दशक में अधिकांशतः सफल; (ii) काश्तकारी सुधार: लगान का नियमन, काश्त की सुरक्षा, स्वामित्व-अधिकार (पश्चिम बंगाल का "ऑपरेशन बर्गा", 1978); (iii) भूमि-सीमा (ceiling) और अधिशेष भूमि का वितरण: सीमित सफलता; (iv) चकबंदी: पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सफल; (v) भू-अभिलेखों का आधुनिकीकरण (DILRMP, SVAMITVA)।
  • क्या भूमि सुधार उत्पादकता के लिए आवश्यक है?
    • पक्ष: काश्तकार की सुरक्षा से निवेश-प्रोत्साहन (मार्शलीय अदक्षता: बटाईदार को उत्पादन का केवल भाग मिलता है); छोटे खेतों पर प्रति हेक्टेयर उत्पादकता अधिक (फ़ार्म प्रबंधन अध्ययन, ए.के. सेन 1962 का "व्युत्क्रम संबंध": पारिवारिक श्रम का गहन उपयोग); भूमि-स्वामित्व से साख तक पहुँच; ऑपरेशन बर्गा के बाद पश्चिम बंगाल में उत्पादकता में वृद्धि (बनर्जी, गर्टलर, घटक के अध्ययन)।
    • विपक्ष/सीमा: हरित क्रांति के बाद व्युत्क्रम संबंध दुर्बल (बड़े किसानों का तकनीक और पूँजी में लाभ); अत्यधिक विखंडन से मशीनीकरण कठिन; सख़्त काश्तकारी क़ानूनों ने "छिपी काश्त" बढ़ाई और भूमि-पट्टा बाज़ार अवरुद्ध किया।
    • निष्कर्ष: भूमि सुधार आवश्यक पर पर्याप्त नहीं; अब "दूसरी पीढ़ी" के सुधार: वैध और सुरक्षित पट्टेदारी (मॉडल कृषि भूमि पट्टा अधिनियम, 2016), भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण, FPO द्वारा सामूहिक खेती।

7. हरित क्रांति और द्वितीय हरित क्रांति

  • उद्देश्य: खाद्यान्न उत्पादन में तीव्र वृद्धि, PL-480 आयात पर निर्भरता का अंत, खाद्य आत्मनिर्भरता और बफ़र स्टॉक, कृषि आय में वृद्धि।
  • घटक (पैकेज दृष्टिकोण): उच्च-उत्पादकता किस्म (HYV) के बीज (नॉर्मन बोरलॉग के मैक्सिकन गेहूँ, एम.एस. स्वामीनाथन); सुनिश्चित सिंचाई (नलकूप); रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक; संस्थागत साख; न्यूनतम समर्थन मूल्य और ख़रीद (कृषि मूल्य आयोग, 1965, अब CACP; भारतीय खाद्य निगम, 1965); कृषि विस्तार और विश्वविद्यालय (पंतनगर, 1960); पूर्ववर्ती गहन कृषि ज़िला कार्यक्रम (IADP, 1960-61) और HYVP (1966-67)।
  • परिणाम: गेहूँ उत्पादन में असाधारण वृद्धि, बाद में चावल; खाद्य आत्मनिर्भरता। सीमाएँ: क्षेत्रीय असमानता (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उ.प्र.), फ़सल-असमानता (गेहूँ-चावल, दलहन-तिलहन उपेक्षित), भूजल-ह्रास, मृदा-स्वास्थ्य, बड़े-छोटे किसान असमानता, बाद में उत्पादकता-ठहराव।
  • द्वितीय हरित क्रांति: 1990 के दशक के बाद उत्पादकता-ठहराव और कृषि-संकट की प्रतिक्रिया। राष्ट्रीय किसान आयोग (अध्यक्ष एम.एस. स्वामीनाथन, 2004-06, पाँच रिपोर्टें) की प्रमुख सिफ़ारिशें: भूमि सुधार और बंजर भूमि वितरण; जल-संरक्षण और "हर बूँद अधिक फ़सल"; मृदा-स्वास्थ्य; सस्ती साख और बीमा; ज्ञान-केंद्र (ग्राम ज्ञान केंद्र); MSP उत्पादन-लागत (भारित औसत) से कम से कम 50% अधिक; राष्ट्रीय किसान नीति (2007); किसान को "किसान" की परिभाषा में काश्तकार, महिला और भूमिहीन भी।
  • द्वितीय हरित क्रांति के तत्व: पूर्वी भारत (BGREI, 2010-11), वर्षा-आधारित/शुष्क क्षेत्र, सदाबहार (evergreen) क्रांति: पर्यावरण-अनुकूल उत्पादकता; विविधीकरण (बागवानी, पशुपालन, मत्स्य); सूक्ष्म-सिंचाई, जैव-प्रौद्योगिकी, डिजिटल कृषि; बाज़ार-सुधार।

8. कृषि में पूँजी-निर्माण और साख

  • सार्वजनिक पूँजी-निर्माण की बाधाएँ: 1980 के दशक से सब्सिडी (उर्वरक, बिजली, जल) ने निवेश को "निष्कासित" किया; राज्यों का राजकोषीय दबाव; सिंचाई परियोजनाओं में लागत और समय की अधिकता, अधूरी परियोजनाएँ; अनुसंधान और विस्तार पर कम व्यय; अधिकांश कृषि राज्य-विषय, संसाधन कम।
  • निजी पूँजी-निर्माण की बाधाएँ: छोटी और विखंडित जोतें; काश्तकारी की असुरक्षा; संस्थागत साख तक सीमित पहुँच; कम और अनिश्चित कृषि आय (कीमत और मौसम जोखिम); बाज़ार और भंडारण अवसंरचना की कमी; सार्वजनिक निवेश की कमी (दोनों पूरक हैं: सार्वजनिक नहर के बिना निजी पंपसेट कम)।
  • उपाय: कृषि अवसंरचना कोष (2020), सूक्ष्म-सिंचाई कोष, PMKSY (2015), FPO, सब्सिडी से निवेश की ओर पुनर्संतुलन।
  • गैर-संस्थागत साख का बने रहना: संस्थागत साख का हिस्सा 1950 के दशक के बहुत निम्न स्तर से बैंक-राष्ट्रीयकरण, RRB (1975), NABARD (1982), किसान क्रेडिट कार्ड (1998) के बाद बहुत बढ़ा, फिर भी सीमांत किसानों, काश्तकारों और भूमिहीनों में महाजन और व्यापारी अब भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं। कारण: संपार्श्विक (भूमि-दस्तावेज़) का अभाव, बैंकों की कागज़ी प्रक्रिया और देरी, उपभोग और आपात आवश्यकताओं के लिए ऋण न मिलना, ऋण-विपणन का अंतर्संबंध (व्यापारी-महाजन), बैंक-शाखाओं की दूरी, पिछले ऋण-चूक से अयोग्यता। उपाय: संयुक्त देयता समूह, स्वयं-सहायता समूह-बैंक संबंध, भू-अभिलेखों से पट्टेदार को साख, डिजिटल साख-मूल्यांकन, PACS का कंप्यूटरीकरण।

9. कृषि विपणन

किसान की आय केवल उत्पादन से नहीं, उसे बेचने की व्यवस्था से भी तय होती है। स्वतंत्रता के बाद राज्यों ने कृषि उपज विपणन (विनियमन) अधिनियम (APMC अधिनियम, अधिकांश 1960-70 के दशक में) बनाकर विनियमित बाज़ार (मंडी) स्थापित किए, ताकि व्यापारियों द्वारा तौल में धोखाधड़ी, मनमानी कटौतियाँ और कम कीमत रोकी जा सके।

नियोजन और कृषि: विनियमित कृषि उपज मंडी की कार्य-प्रक्रिया
विनियमित मंडी में किसान उपज लाते हैं, फिर श्रेणीकरण, तौल, खुली बोली और प्रेषण होता है; पारदर्शी कीमत और सही तौल इसका उद्देश्य है
  • विनियमित मंडी की प्रक्रिया: आगमन → श्रेणीकरण (grading) → प्रमाणित तौल → खुली नीलामी/बोली → भुगतान → प्रेषण; बाज़ार समिति में किसानों का प्रतिनिधित्व।
  • समस्याएँ: मंडियों की कम संख्या और दूरी; कमीशन एजेंटों (आढ़तियों) का एकाधिकार और लाइसेंस-बाधा; ऊँचे बाज़ार शुल्क; किसान का अपने राज्य की मंडी से बाहर बेचने पर प्रतिबंध; श्रेणीकरण और भंडारण का अभाव; संकट-बिक्री।
  • सुधार: राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (e-NAM, अप्रैल 2016); मॉडल APLM अधिनियम (2017); मॉडल अनुबंध कृषि अधिनियम (2018); गोदाम रसीद (WDRA, 2007 अधिनियम); ग्रामीण हाटों का उन्नयन (GrAMs); तीन कृषि क़ानून (2020) जो नवंबर 2021 में निरस्त हुए; FPO (10,000 FPO योजना, 2020)।
  • किसानों को कॉरपोरेट क्षेत्र से जोड़ना: अनुबंध कृषि (पंजाब में पेप्सिको, मुर्गीपालन में तमिलनाडु के एकीकृत मॉडल), प्रत्यक्ष ख़रीद, मूल्य-शृंखला एकीकरण। लाभ: सुनिश्चित बाज़ार और कीमत, तकनीक, गुणवत्ता, ऋण। जोखिम: असमान सौदेबाज़ी शक्ति, अनुबंध-विवाद (गुणवत्ता के नाम पर अस्वीकृति), एकल-फ़सल निर्भरता, छोटे किसानों का बहिष्कार। शर्तें: FPO के माध्यम से सामूहिक सौदेबाज़ी, त्वरित विवाद-निपटारा, भूमि-अधिकार की सुरक्षा।

10. कीमत-नीति, सब्सिडी और PM-KISAN

  • MSP: CACP की सिफ़ारिश पर 22 अनिवार्य फ़सलों के लिए (और गन्ने का FRP); 2018-19 से उत्पादन-लागत (A2+FL) से कम से कम 1.5 गुना; प्रभावी ख़रीद मुख्यतः गेहूँ और धान में, कुछ राज्यों तक सीमित।
  • कृषि सब्सिडी के रूप: (i) आगत: उर्वरक (यूरिया का नियंत्रित मूल्य, P&K पर पोषक-आधारित सब्सिडी 2010 से), बिजली, सिंचाई जल, बीज; (ii) साख: ब्याज सहायता (संशोधित ब्याज सहायता योजना); (iii) बीमा: PMFBY (2016); (iv) कीमत-समर्थन: MSP-ख़रीद, PM-AASHA; (v) प्रत्यक्ष आय-समर्थन: PM-KISAN; (vi) पूँजीगत: सूक्ष्म-सिंचाई, कृषि-मशीनरी पर अनुदान।
  • औचित्य: छोटे किसानों की कम आय और जोखिम; बाज़ार-विफलता (साख, बीमा); खाद्य सुरक्षा; नई तकनीक अपनाने को प्रोत्साहन (हरित क्रांति में उर्वरक); कीमत-स्थिरीकरण; विकसित देशों की भारी कृषि सब्सिडी के विरुद्ध प्रतिस्पर्धा। आलोचना: संसाधनों का दुरुपयोग (भूजल, असंतुलित NPK), बड़े किसानों और समृद्ध राज्यों को अधिक लाभ, राजकोषीय भार, निवेश का निष्कासन। सुधार-दिशा: DBT, लक्ष्यीकरण, आगत-सब्सिडी से आय-समर्थन और सार्वजनिक निवेश की ओर।
  • PM-KISAN (फ़रवरी 2019): भूमिधारक किसान परिवारों को ₹6000 प्रति वर्ष, तीन किस्तों में, सीधे बैंक खाते में (आरंभ में 2 हेक्टेयर तक के किसान, जून 2019 से सभी भूमिधारक, कुछ अपवर्जनों के साथ)।
    • निहितार्थ (सकारात्मक): बुवाई के समय तरलता, अनौपचारिक साख पर निर्भरता में कमी, बाज़ार-विकृति रहित (WTO "ग्रीन बॉक्स" के अनुकूल), DBT से लीकेज कम, फ़सल-तटस्थ।
    • सीमाएँ: काश्तकार और भूमिहीन कृषि-मज़दूर बाहर (भू-अभिलेखों पर निर्भर); राशि छोटी और महँगाई से वास्तविक मूल्य घटता; प्रति हेक्टेयर नहीं प्रति परिवार; उत्पादकता-निवेश से सीधा संबंध नहीं; बड़ा राजकोषीय व्यय जो पूँजीगत निवेश में भी जा सकता था। राज्य-स्तरीय मॉडल: तेलंगाना का रायथु बंधु (2018), ओडिशा का KALIA (जिसमें भूमिहीन भी)।

11. खाद्य सुरक्षा और PDS

  • विकासक्रम: सार्वभौमिक PDS → संशोधित PDS (1992) → लक्षित PDS (1997) → अंत्योदय अन्न योजना (2000) → राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013: ग्रामीण 75% और शहरी 50% तक जनसंख्या, 5 किग्रा प्रति व्यक्ति प्रति माह, AAY परिवारों को 35 किग्रा) → "एक राष्ट्र एक राशन कार्ड" → जनवरी 2023 से NFSA अनाज निःशुल्क (PMGKAY)।
  • संरचनात्मक कमियाँ: समावेशन और अपवर्जन त्रुटियाँ (पुराने BPL सूचियाँ); अनाज का रिसाव और खुले बाज़ार में विचलन; FCI की ऊँची आर्थिक लागत, भंडारण-हानि, बफ़र मानक से अधिक स्टॉक; अनाज-केंद्रित (दाल, तेल, पोषण की उपेक्षा); उचित मूल्य दुकानों का कम कमीशन और अव्यवहार्यता; ख़रीद का कुछ राज्यों में संकेंद्रण (क्षेत्रीय असंतुलन); अनाज की गुणवत्ता; प्रवासियों की पहुँच (ONORC से सुधार)। शांता कुमार उच्च-स्तरीय समिति (2015) ने FCI के पुनर्गठन, कवरेज घटाने और नकद हस्तांतरण पर विचार की सिफ़ारिश की।
  • सुधार: राशन कार्डों का आधार-सीडिंग और डिजिटलीकरण, ePoS मशीनें, अंत-से-अंत कंप्यूटरीकरण, विकेंद्रीकृत ख़रीद (DCP), फ़ोर्टिफ़ाइड चावल, कुछ केंद्रशासित प्रदेशों में DBT प्रयोग (चंडीगढ़, पुदुचेरी)।

12. पशुपालन और खाद्य प्रसंस्करण

कृषि-आय का एक तेज़ी से बढ़ता भाग पशुपालन, डेयरी, मुर्गीपालन और मत्स्य से आता है; छोटे और भूमिहीन परिवारों के लिए ये आय और पोषण के बड़े स्रोत हैं।

नियोजन और कृषि: भारत में पशुधन का क्षेत्रीय वितरण
भारत में मुर्गीपालन, गाय-बैल, भैंस, भेड़, बकरी और सुअर के प्रमुख क्षेत्रों का वितरण दिखाता मानचित्र
  • श्वेत क्रांति: ऑपरेशन फ्लड (1970 से, NDDB, वर्गीज़ कुरियन); आनंद पैटर्न की सहकारी डेयरी (ग्राम सहकारी, ज़िला संघ, राज्य संघ); भारत विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक। अन्य: राष्ट्रीय गोकुल मिशन (2014), नीली क्रांति और PM मत्स्य संपदा योजना (2020)।
  • पशुधन का क्षेत्रीय स्वरूप: भैंस: उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पंजाब (दूध); भेड़: राजस्थान, दक्षिणी पठार (तेलंगाना, आंध्र, कर्नाटक); बकरी: राजस्थान, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश (भूमिहीनों का "ग़रीब की गाय"); सुअर: पूर्वोत्तर; मुर्गीपालन: आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, महाराष्ट्र (एकीकृत अनुबंध मॉडल)।
  • खाद्य प्रसंस्करण योजनाएँ:
    • PM किसान संपदा योजना (2017) के घटक: मेगा फ़ूड पार्क; एकीकृत शीत-शृंखला और मूल्य-संवर्धन अवसंरचना; खाद्य प्रसंस्करण/परिरक्षण क्षमता का सृजन और विस्तार; कृषि-प्रसंस्करण क्लस्टर; पश्च और अग्र संबंधन; खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता आश्वासन अवसंरचना; मानव संसाधन और संस्थाएँ; ऑपरेशन ग्रीन्स (टमाटर, प्याज़, आलू से आरंभ, बाद में विस्तार)।
    • PM सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकीकरण (PMFME, 2020): "एक ज़िला एक उत्पाद" दृष्टिकोण, ऋण-संबद्ध पूँजीगत सब्सिडी, SHG/FPO/सहकारिताओं को सहायता, ब्रांडिंग-विपणन।
    • खाद्य प्रसंस्करण के लिए PLI (2021); खाद्य प्रसंस्करण में स्वचालित मार्ग से 100% FDI, भारत में उत्पादित खाद्य के व्यापार में सरकारी अनुमोदन से 100%।

13. WTO कृषि समझौता (1995) और भारत

  • तीन स्तंभ: (i) बाज़ार-पहुँच: गैर-प्रशुल्क बाधाओं का प्रशुल्कीकरण और बंधित प्रशुल्कों में कटौती; (ii) घरेलू समर्थन: एम्बर बॉक्स (व्यापार-विकृतिकारी, AMS सीमा; विकासशील देशों के लिए 10% न्यूनतम-सीमा "de minimis"), ब्लू बॉक्स (उत्पादन-सीमित), ग्रीन बॉक्स (न्यूनतम विकृति: अनुसंधान, आय-समर्थन), अनुच्छेद 6.2 (विकासशील देशों में निम्न-आय किसानों को आगत सब्सिडी की छूट); (iii) निर्यात सब्सिडी में कटौती (नैरोबी 2015 में समाप्ति का निर्णय)।
  • भारत के लिए निहितार्थ: भारत के बंधित प्रशुल्क ऊँचे होने से बाज़ार-पहुँच प्रतिबद्धताएँ कम बाधक; उर्वरक आदि की आगत सब्सिडी अधिकांशतः 6.2 के अंतर्गत; मुख्य विवाद MSP-आधारित सार्वजनिक भंडारण: AMS की गणना 1986-88 की बाहरी संदर्भ कीमत से होने से समर्थन कृत्रिम रूप से ऊँचा दिखता है। बाली (2013) की "शांति धारा" (अंतरिम संरक्षण) और भारत द्वारा 2018-19 के चावल समर्थन के लिए 2020 में इसका प्रयोग; स्थायी समाधान लंबित। विकसित देशों की भारी सब्सिडी (ग्रीन/ब्लू बॉक्स में स्थानांतरित) से असमान प्रतिस्पर्धा; विशेष सुरक्षा तंत्र (SSM) की माँग।

14. उदारीकरण के बाद कृषि में महिलाएँ

  • कृषि का स्त्रीकरण: पुरुषों के गैर-कृषि कार्य और शहरों की ओर प्रवास से कृषि-कार्य में महिलाओं का अनुपात बढ़ा; हाल के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षणों (PLFS) में महिला श्रम-भागीदारी की वृद्धि का बड़ा भाग कृषि में स्व-रोज़गार (अवैतनिक पारिवारिक श्रम सहित) से।
  • समस्याएँ: भूमि-स्वामित्व बहुत कम (इसलिए साख, बीमा, PM-KISAN, MSP-पंजीकरण से बाहर); "किसान" के रूप में मान्यता का अभाव; मज़दूरी-अंतर; मशीनीकरण से पारंपरिक कामों (रोपाई, निराई, कटाई) का विस्थापन; विस्तार सेवाओं की पहुँच कम; दोहरा कार्य-भार।
  • नीति: महिला किसान सशक्तीकरण परियोजना (2011), कृषि योजनाओं में महिलाओं के लिए न्यूनतम 30% आवंटन का निर्देश, हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005, SHG (DAY-NRLM), "लखपति दीदी", "नमो ड्रोन दीदी" (2023-24)।

15. Master Summary Table

विषयमुख्य तथ्यपरीक्षा-बिंदु
महालनोबिसदूसरी योजना; λk ऊँचाकृषि, व्यापार, रोज़गार की उपेक्षा
वकील-ब्रह्मानंदमज़दूरी-वस्तु मॉडल, 1956खाद्यान्न ही बाधा
1950-80~3.5% वृद्धि; "हिंदू दर" (राज कृष्णा)1973-74 गरीबी ~54.9%
विकेंद्रीकरण73वाँ-74वाँ संशोधन; 243ZDकेरल 1996, GPDP 2015
भूमि सुधारऑपरेशन बर्गा 1978व्युत्क्रम संबंध (सेन 1962)
हरित क्रांति1966-67; CACP और FCI 1965पैकेज दृष्टिकोण
NCFस्वामीनाथन 2004-06MSP = लागत + 50%
विपणनAPMC; e-NAM 2016; मॉडल अधिनियम 2017, 2018FPO
PM-KISAN2019; ₹6000, तीन किस्तेंकाश्तकार बाहर
NFSA2013; 75%/50%; 5 किग्रा2023 से निःशुल्क
खाद्य प्रसंस्करणPMKSY 2017; PMFME 2020; PLI 2021ODOP
WTO-AoA1995; तीन स्तंभशांति धारा, बाली 2013

16. चार्ट: महालनोबिस बनाम वकील-ब्रह्मानंद

महालनोबिस (1953-55) वकील-ब्रह्मानंद (1956) • बाधा: पूँजी-वस्तुएँ • निवेश: भारी उद्योग (λk ↑) • तकनीक: पूँजी-गहन • समय-दृष्टि: दीर्घकालीन क्षमता • जोखिम: खाद्य-कमी, मुद्रास्फीति • रोज़गार: लघु उद्योगों पर • बाधा: मज़दूरी-वस्तुएँ (खाद्य) • निवेश: कृषि, उपभोग-वस्तुएँ • तकनीक: श्रम-गहन • समय-दृष्टि: रोज़गार अभी • लक्ष्य: मुद्रास्फीति-रहित वृद्धि • प्रच्छन्न बेरोज़गारी का उपयोग
दूसरी योजना ने महालनोबिस का मार्ग चुना; 1960 के दशक के मध्य के खाद्य-संकट ने वकील-ब्रह्मानंद की चेतावनी को सही सिद्ध किया।

17. Mind Map

नियोजन और कृषि
नियोजन
  • योजनाएँ, महालनोबिस, वकील
  • विकेंद्रीकरण, NITI
संस्थागत
  • भूमि सुधार, साख
  • पूँजी-निर्माण
तकनीक
  • हरित क्रांति
  • द्वितीय हरित क्रांति, NCF
बाज़ार और कीमत
  • APMC, e-NAM, अनुबंध कृषि
  • MSP, सब्सिडी, PM-KISAN
खाद्य और व्यापार
  • PDS, NFSA, प्रसंस्करण
  • पशुपालन, WTO-AoA, महिलाएँ

18. महत्वपूर्ण One-liners

  • "हिंदू संवृद्धि दर" शब्द: प्रो. राज कृष्णा।
  • "Planning for an Expanding Economy" (1956): सी.एन. वकील और पी.आर. ब्रह्मानंद।
  • ज़िला योजना समिति: अनुच्छेद 243ZD।
  • CACP (तब कृषि मूल्य आयोग) और FCI: 1965।
  • राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष: एम.एस. स्वामीनाथन।
  • e-NAM की शुरुआत: अप्रैल 2016।
  • ऑपरेशन फ्लड: 1970 से, NDDB।
  • WTO में भारत ने शांति धारा का पहली बार प्रयोग: 2020 (चावल)।

19. टिप्स एवं ट्रिक्स

उत्तर-लेखन
  • Paper II के उत्तर में हर दावे के साथ एक योजना/वर्ष/समिति का नाम दें; परीक्षक तथ्यात्मक सटीकता देखते हैं।
  • सांख्यिकी केवल वही लिखें जिसके स्रोत पर भरोसा हो (आर्थिक सर्वेक्षण, PLFS, NSO); अनिश्चित हो तो "लगभग" या प्रवृत्ति लिखें।
  • हर "समस्या" वाले प्रश्न का अंत "सुधार/आगे की राह" से करें: समितियाँ (स्वामीनाथन, शांता कुमार, दलवाई) उद्धृत करें।
याद रखने की तरकीब

हरित क्रांति के घटक: "बीज-पानी-खाद-ऋण-कीमत-विस्तार"। WTO के बॉक्स: "एम्बर = रुको (सीमा), ब्लू = सीमित, ग्रीन = चलो"।

सामान्य भूल

NCF की MSP सिफ़ारिश "C2 + 50%" है, जबकि 2018 से सरकार "A2 + FL" के 1.5 गुने पर MSP देती है; दोनों को एक कहना गलत।

20. PYQ-आधारित प्रश्न एवं हल

Q1UPSC 2024 · Paper II · 1(e) · 10 अंक

PM-KISAN योजना के निहितार्थों की चर्चा कीजिए।

मॉडल उत्तर

खंड 10: योजना का स्वरूप, सकारात्मक निहितार्थ (तरलता, DBT, ग्रीन बॉक्स), सीमाएँ (काश्तकार, राशि, राजकोषीय), राज्य-मॉडल से तुलना (KALIA)। निष्कर्ष: आय-समर्थन के साथ उत्पादकता-निवेश और भू-अभिलेख सुधार आवश्यक।

Q2UPSC 2024 · Paper II · 5(a) · 10 अंक

सी.एन. वकील के वैकल्पिक (मज़दूरी-वस्तु) मॉडल की व्याख्या कीजिए।

मॉडल उत्तर

खंड 3: मूल तर्क (मज़दूरी-वस्तु बाधा, प्रच्छन्न बेरोज़गारी का उपयोग), प्राथमिकताएँ, महालनोबिस से तुलना (चार्ट, खंड 16)। मूल्यांकन: 1960 के दशक के खाद्य-संकट ने इसकी प्रासंगिकता सिद्ध की; सीमा: दीर्घकालीन औद्योगिक क्षमता और तकनीक पर कम ध्यान।

Q3UPSC 2025 · Paper II · 5(a) · 10 अंक

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की सरकारी योजनाओं के घटक बताइए।

मॉडल उत्तर

खंड 12: PM किसान संपदा योजना के आठ घटक, PMFME (ODOP, सब्सिडी, SHG), PLI, FDI नीति। महत्व: फ़सल-उपरांत हानि में कमी, किसान की आय, ग्रामीण रोज़गार, निर्यात।

Q4UPSC 2025 · Paper II · 5(c) · 10 अंक

सार्वजनिक वितरण प्रणाली की संरचनात्मक कमियाँ बताइए।

मॉडल उत्तर

खंड 11 की कमियाँ (लक्ष्यीकरण त्रुटियाँ, रिसाव, FCI लागत, पोषण, FPS व्यवहार्यता, क्षेत्रीय संकेंद्रण) और सुधार (आधार, ePoS, ONORC, DCP, फ़ोर्टिफ़िकेशन; शांता कुमार समिति)।

Q5UPSC 2025 · Paper II · 2(a)

क्या कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए भूमि सुधार आवश्यक है? विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 6: घटक, पक्ष (मार्शलीय अदक्षता, व्युत्क्रम संबंध, ऑपरेशन बर्गा), विपक्ष (हरित क्रांति के बाद, विखंडन, छिपी काश्त), निष्कर्ष (आवश्यक पर पर्याप्त नहीं; पट्टा-बाज़ार का वैधीकरण, FPO)। पूर्वी एशिया (जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया) का उदाहरण जहाँ भूमि सुधार कृषि और औद्योगिक विकास दोनों का आधार बना।

Q6UPSC 2025 · Paper II · 2(b)

कृषि में सार्वजनिक और निजी पूँजी-निर्माण की बाधाएँ क्या हैं?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 8 की दोनों सूचियाँ; पूरकता का तर्क (सार्वजनिक सिंचाई, बिजली और सड़क से निजी निवेश को प्रोत्साहन); सब्सिडी बनाम निवेश बहस (एस. महेंद्र देव, अशोक गुलाटी के अध्ययन); उपाय: AIF, PMKSY, सब्सिडी-युक्तिकरण, सुरक्षित पट्टेदारी।

Q7UPSC 2025 · Paper II · 2(c)

उदारीकरण से पहले भारतीय नियोजन के प्रमुख बल-क्षेत्रों की चर्चा कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 2 के सात बल-क्षेत्र, योजनाओं के उदाहरण सहित (तालिका)। मूल्यांकन: औद्योगिक आधार और खाद्य आत्मनिर्भरता की उपलब्धि; अदक्षता, धीमी वृद्धि और 1991 का BoP संकट जिसने दिशा बदली।

Q8UPSC 2024 · Paper II · 2(b)

महालनोबिस रणनीति को क्यों छोड़ दिया गया? इसकी अपर्याप्तताएँ बताइए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 3: मॉडल का सार (दो/चार क्षेत्र), अपर्याप्तताएँ (पाँच), छोड़ने के कारण (तृतीय योजना का संकट, हरित क्रांति की ओर मोड़, 1980-91 के सुधार)। संतुलित निष्कर्ष: रणनीति ने औद्योगिक और वैज्ञानिक आधार दिया पर कृषि, रोज़गार और दक्षता की क़ीमत पर।

Q9UPSC 2024 · Paper II · 3(b)

1950-80 के दौरान राष्ट्रीय आय की वृद्धि और गरीबी पर उसके प्रभाव की समीक्षा कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 4: वृद्धि-दर, क्षेत्रीय संरचना में बदलाव (कृषि का हिस्सा घटा, उद्योग-सेवाएँ बढ़ीं), गरीबी के अनुमान और उनका स्थिर रहना, कारण, 1970 के दशक में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की ओर मोड़। निष्कर्ष: "वृद्धि आवश्यक पर पर्याप्त नहीं"; 1980 के बाद तेज़ वृद्धि के साथ ही गरीबी में स्पष्ट गिरावट।

Q10UPSC 2025 · Paper II · 3(a)

हरित क्रांति के उद्देश्यों और घटकों की चर्चा कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

पृष्ठभूमि (1965-66 सूखा, PL-480), खंड 7 के उद्देश्य और घटक, परिणाम और सीमाएँ, द्वितीय हरित क्रांति की आवश्यकता।

Q11UPSC 2024 · Paper II · 4(b)

क्या किसानों को कॉरपोरेट क्षेत्र से जोड़ा जाना चाहिए? तर्क दीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 9 का अंतिम बिंदु: लाभ, जोखिम, शर्तें; अनुभव (अनुबंध कृषि, मुर्गीपालन एकीकरण); 2020 के क़ानूनों पर बहस और निरस्ती। निष्कर्ष: हाँ, पर FPO के माध्यम से सामूहिक सौदेबाज़ी, नियामक संरक्षण और MSP/सार्वजनिक ख़रीद के सुरक्षा-जाल के साथ।

Q12UPSC 2025 · Paper II · 4(c)

विकेंद्रीकृत नियोजन के दिशा-निर्देशों की चर्चा कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 5: पृष्ठभूमि समितियाँ, संवैधानिक आधार, दिशा-निर्देश (छह तत्व), अनुभव (केरल, GPDP) और चुनौतियाँ (3F)। निष्कर्ष: विकेंद्रीकृत नियोजन की सफलता वित्तीय हस्तांतरण और स्थानीय क्षमता पर निर्भर।

Q13UPSC 2024 · Paper II · 6(c)

द्वितीय हरित क्रांति की आवश्यकता क्यों है? राष्ट्रीय किसान आयोग की प्रमुख सिफ़ारिशें बताइए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

आवश्यकता: उत्पादकता-ठहराव, पर्यावरण-ह्रास, क्षेत्रीय असंतुलन, किसानों की आय-संकट, जलवायु परिवर्तन, पोषण-सुरक्षा। खंड 7 की NCF सिफ़ारिशें और द्वितीय हरित क्रांति के तत्व। कार्यान्वयन: राष्ट्रीय किसान नीति 2007, मृदा स्वास्थ्य कार्ड (2015), PMKSY, BGREI।

Q14UPSC 2025 · Paper II · 6(b)

WTO के कृषि समझौते (1995) के भारतीय कृषि पर निहितार्थ बताइए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 13: तीन स्तंभ और बॉक्स; भारत पर प्रभाव (बाज़ार-पहुँच, आगत-सब्सिडी, MSP-भंडारण विवाद, शांति धारा); अवसर (कृषि निर्यात: चावल, समुद्री उत्पाद, मसाले) और चुनौतियाँ (विकसित देशों की सब्सिडी, SPS बाधाएँ)। निष्कर्ष: खाद्य सुरक्षा के लिए स्थायी समाधान और SSM की माँग जारी।

Q15UPSC 2024 · Paper II · 7(b)

उदारीकरण के बाद भारतीय कृषि में महिलाओं की भूमिका की चर्चा कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 14: स्त्रीकरण की प्रवृत्ति और कारण, समस्याएँ (भूमि-अधिकार सबसे बड़ी), नीतियाँ। सुझाव: संयुक्त भू-पट्टे, महिला-अनुकूल उपकरण, महिला FPO, विस्तार-सेवाओं में महिला कार्यकर्ता (कृषि सखी)।

Q16UPSC 2024 · Paper II · 8(b)

भारत में कृषि साख में गैर-संस्थागत स्रोत अब भी महत्वपूर्ण क्यों हैं?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 8 का अंतिम बिंदु: संस्थागत साख का विस्तार (राष्ट्रीयकरण, RRB, NABARD, KCC, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण) और फिर भी सीमांत किसानों/काश्तकारों में महाजन की भूमिका के कारण। आँकड़े अखिल भारतीय ऋण और निवेश सर्वेक्षण (AIDIS) और NABARD के NAFIS से उद्धृत करें। उपाय सूची।

Q17UPSC 2024 · Paper II · 8(c)

भारत में कृषि सब्सिडी के विभिन्न रूप और उनका औचित्य बताइए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 10: छह रूप, औचित्य, आलोचना, सुधार-दिशा। संतुलित निष्कर्ष: सब्सिडी का युक्तिकरण (संसाधन-संरक्षण, लक्ष्यीकरण) और उसका सार्वजनिक निवेश में पुनर्निर्देशन।

21. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • नियोजन: योजनाओं की तालिका, सात बल-क्षेत्र; महालनोबिस बनाम वकील-ब्रह्मानंद; 1950-80 की "हिंदू दर" और गरीबी; विकेंद्रीकरण (243ZD, केरल, GPDP); NITI।
  • कृषि-संस्थाएँ: भूमि सुधार और व्युत्क्रम संबंध; पूँजी-निर्माण की बाधाएँ; गैर-संस्थागत साख।
  • तकनीक: हरित क्रांति के उद्देश्य-घटक-सीमाएँ; द्वितीय हरित क्रांति और NCF।
  • बाज़ार: विनियमित मंडी, e-NAM, मॉडल अधिनियम, अनुबंध कृषि, FPO।
  • कीमत और समर्थन: MSP, सब्सिडी के रूप, PM-KISAN; PDS और NFSA।
  • संबद्ध और बाह्य: पशुधन और श्वेत क्रांति, खाद्य प्रसंस्करण योजनाएँ, WTO-AoA, कृषि में महिलाएँ।