UPSC Mains · Geography · Paper I · अध्याय 3

समुद्र विज्ञान, जैव भूगोल एवं पर्यावरण

Oceanography, Biogeography and Environmental Geography

महासागरीय तल, तापमान, लवणता, धाराएँ, ज्वार-भाटा, प्रवाल भित्तियाँ; मृदा, वनस्पति, जैव विविधता, पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण प्रबंधन।

Paper I 23 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

Paper I के भाग 3-5 — समुद्र विज्ञान (महासागरीय नितल, तापमान-लवणता, तरंगें-धाराएँ-ज्वार, समुद्री संसाधन, प्रवाल भित्तियाँ, समुद्र-तल परिवर्तन), जैव भूगोल (मृदा की उत्पत्ति-वर्गीकरण, मृदा अपरदन, वनस्पति, जैव-विविधता, सामाजिक वानिकी) और पर्यावरण भूगोल (पारिस्थितिकी तंत्र, मानव-पर्यावरण संबंध, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रबंधन)। 2025 में तरंग-धारा-ज्वार में अंतर, गहन-समुद्री खनन, मानव-वन्यजीव संघर्ष, पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन का संयुक्त राष्ट्र दशक, अमेज़न-कांगो वनोन्मूलन; 2024 में समुद्र-तल परिवर्तन, हिंद महासागर की नितल-स्थलाकृति, सामाजिक वानिकी, पर्वतीय नाज़ुकता, मृदा अपरदन, PAVE, कार्बन तटस्थता और प्रजाति-समृद्धि की अक्षांशीय प्रवणता पूछी गई।

भूगोल: महासागर विज्ञान इन्फ़ोग्राफ़िक
महासागर विज्ञान — महासागरीय नितल, तापमान, लवणता और जल-संचलन (NCERT आधारित infographic)।

2. महासागरीय नितल

भागविशेषता
महाद्वीपीय मग्नतट (Shelf)मंद ढाल, औसत गहराई ~150-200 मीटर; चौड़ाई भिन्न (साइबेरियाई मग्नतट सर्वाधिक चौड़ा); मत्स्य, तेल-गैस, प्लेसर
महाद्वीपीय ढाल (Slope)तीव्र ढाल; पनडुब्बी कंदराएँ (submarine canyons)
महाद्वीपीय उत्थान (Rise)अवसाद-संचय, पंखे (fans)
गहन सागरीय मैदान (Abyssal plain)3-6 किमी गहराई; सपाट; पंक (ooze)
मध्य-महासागरीय कटकरचनात्मक प्लेट सीमा; विश्व की सबसे लंबी पर्वत-शृंखला
गर्त (Trench)सबसे गहरे भाग — मारियाना गर्त का चैलेंजर डीप (~11 किमी)
समुद्री टीले, गायटज्वालामुखी शिखर; गायट — सपाट शीर्ष

हिंद महासागर की नितल-स्थलाकृति (UPSC 2024)

  • मध्य-हिंद महासागरीय कटक — उल्टे "Y" आकार की कटक-व्यवस्था: उत्तर-पश्चिम में कार्ल्सबर्ग कटक (अरब सागर), मध्य हिंद कटक, दक्षिण-पश्चिम हिंद कटक और दक्षिण-पूर्व हिंद कटक — "रोड्रिग्स त्रि-संधि" (triple junction) पर मिलती हैं।
  • नाइंटी ईस्ट कटक (90°E के साथ) — ~5,000 किमी लंबी, लगभग सीधी, भूकंप-रहित (aseismic) कटक — केर्गुएलन हॉटस्पॉट के ऊपर से भारतीय प्लेट के गुज़रने का निशान।
  • चागोस-लक्षद्वीप कटक — लक्षद्वीप, मालदीव, चागोस — रीयूनियन हॉटस्पॉट का निशान; प्रवाल द्वीप।
  • गर्त — सुंडा (जावा) गर्त — हिंद महासागर का सबसे गहरा भाग (~7 किमी से अधिक), अधोगमन क्षेत्र — 2004 सुनामी का स्रोत क्षेत्र।
  • द्रोणियाँ (basins) — अरब, सोमाली, मस्करीन, मध्य हिंद, व्हार्टन, क्रोज़ेट, दक्षिण ऑस्ट्रेलियाई।
  • पठार और उत्थित भाग — केर्गुएलन पठार (विशाल आग्नेय प्रांत), मस्करीन पठार, मेडागास्कर कटक।
  • पनडुब्बी पंखे — बंगाल पंखा (विश्व का सबसे बड़ा पनडुब्बी पंखा — गंगा-ब्रह्मपुत्र अवसाद), सिंधु पंखा।
  • मग्नतट — भारत के पश्चिमी तट (गुजरात, मुंबई — बॉम्बे हाई) पर चौड़ा, पूर्वी तट पर संकरा (बंगाल के पास चौड़ा); द्वीप — महाद्वीपीय (मेडागास्कर, श्रीलंका), ज्वालामुखी (मॉरीशस, रीयूनियन), प्रवाल (मालदीव, लक्षद्वीप)।
  • आरेख — कटकों, गर्तों, द्रोणियों और पंखों का रेखाचित्र अनिवार्य।

3. तापमान, लवणता और जल-संचलन

  • तापमान — ऊपरी मिश्रित परत, ताप-प्रवणता परत (thermocline), गहन ठंडी परत; अक्षांश, धाराएँ, पवनें, स्थल-निकटता से नियंत्रित।
  • लवणता — औसत ~35‰ (प्रति हज़ार ग्राम); अधिक — लाल सागर (~41‰), भूमध्यसागर, फ़ारस की खाड़ी (उच्च वाष्पीकरण, कम वर्षा-नदी); कम — बाल्टिक सागर (नदियाँ, कम वाष्पीकरण), ध्रुवीय सागर; झीलें — मृत सागर, वान झील (अत्यधिक)।

तरंग, धारा और ज्वार-भाटा में मौलिक अंतर (UPSC 2025)

आधारतरंग (Wave)धारा (Current)ज्वार-भाटा (Tide)
गति का स्वरूपऊर्जा का संचरण; जल-कण वृत्ताकार कक्षाओं में ऊपर-नीचे, जल आगे नहीं बढ़ता (तट के पास छोड़कर)जल-राशि का निश्चित दिशा में क्षैतिज प्रवाह — "समुद्र में नदियाँ"समुद्र-तल का आवधिक उठना-गिरना
कारणमुख्यतः पवन (सुनामी — भूकंप/भू-स्खलन)स्थायी पवनें, तापमान-लवणता से घनत्व-भेद, कोरिओलिस, तट-रेखाचंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण + पृथ्वी का घूर्णन (अपकेंद्री बल)
नियमितताअनियमित (पवन के अनुसार)अपेक्षाकृत स्थायी (मौसमी परिवर्तन — हिंद महासागर)अत्यंत नियमित — दैनिक (24 घं 50 मि), अर्ध-दैनिक; पूर्णिमा-अमावस्या पर दीर्घ ज्वार (spring), अष्टमी पर लघु ज्वार (neap)
प्रभाव-क्षेत्रसतही (तरंग-आधार तक)सतही और गहन (थर्मोहेलाइन)पूरे जल-स्तंभ में; तटों पर स्पष्ट
महत्वतटीय अपरदन-निक्षेप, तरंग-ऊर्जाऊष्मा-स्थानांतरण, जलवायु, मत्स्य, नौवहनबंदरगाह (ज्वारीय), ज्वारीय ऊर्जा (खंभात-कच्छ की खाड़ी), मैंग्रोव, मत्स्य
भूगोल: महासागरीय धाराएँ इन्फ़ोग्राफ़िक
विश्व की प्रमुख महासागरीय धाराएँ — उष्ण और शीत धाराएँ तथा गायर (NCERT आधारित infographic)।
  • प्रमुख धाराएँ — उष्ण: गल्फ़ स्ट्रीम, कुरोशियो, ब्राज़ील, अगुलहास, पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई; शीत: लैब्राडोर, ओयाशियो, कैलिफ़ोर्निया, कैनरी, हम्बोल्ट (पेरू), बेंगुएला, पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई; अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (पश्चिमी पवन प्रवाह); हिंद महासागर में मानसून के साथ धाराओं का उत्क्रमण (सोमाली धारा)।
  • थर्मोहेलाइन परिसंचरण — "महासागरीय कन्वेयर बेल्ट"; AMOC के कमज़ोर होने की आशंका।
  • ज्वार — सर्वाधिक ज्वारीय परास फ़ंडी की खाड़ी (कनाडा, ~16 मीटर); भारत में खंभात और कच्छ की खाड़ी में अधिक परास।
भूगोल: ज्वार-भाटा इन्फ़ोग्राफ़िक
ज्वार-भाटा — चंद्रमा-सूर्य की स्थिति, दीर्घ और लघु ज्वार (NCERT आधारित infographic)।

4. समुद्र-तल परिवर्तन (UPSC 2024)

प्रकारकारकउदाहरण
सुस्थैतिक (Eustatic) — वैश्विकहिमनद-सुस्थैतिक (हिमयुग में समुद्र-तल ~120 मीटर नीचे; हिम पिघलने से वृद्धि); तापीय प्रसार; विवर्तनिक-सुस्थैतिक (कटकों के आयतन में परिवर्तन)होलोसीन समुद्र-तल वृद्धि; डूबी घाटियाँ — रिया (गैलिसिया), फ़्योर्ड (नॉर्वे)
समस्थैतिक (Isostatic) — स्थानीयहिम-भार हटने से भूमि का उठना (पश्च-हिमनदीय पुनरुत्थान); अवसाद-भार से धँसनास्कैंडिनेविया, हडसन खाड़ी का उत्थान; उत्थित पुलिन (raised beaches — स्कॉटलैंड)
विवर्तनिकभूकंप, उत्थान-अवतलन2004 सुनामी में अंडमान के भाग धँसे/उठे
स्थानीय धँसावभू-जल दोहन, अवसाद-अभावजकार्ता (राजधानी का नुसंतारा स्थानांतरण), कोलकाता, ढाका
  • वर्तमान — IPCC AR6: 1901 से 2018 तक वैश्विक औसत समुद्र-तल ~0.20 मीटर बढ़ा; 2006-2018 में दर ~3.7 मिमी/वर्ष (त्वरित); कारण — तापीय प्रसार और हिमनद-हिमचादर पिघलन।
  • प्रभाव — तटीय बाढ़, लवणीकरण, सुंदरबन के द्वीपों का क्षरण (घोड़ामारा), छोटे द्वीप-राष्ट्र (मालदीव, तुवालु), द्वारका के जलमग्न अवशेष (ऐतिहासिक परिवर्तन)।

5. समुद्री संसाधन और गहन-समुद्री खनन (UPSC 2025)

  • समुद्री संसाधन — जैविक (मत्स्य, समुद्री शैवाल), खनिज (प्लेसर, तेल-गैस, बहुधात्विक पिंड), ऊर्जा (ज्वारीय, तरंग, OTEC, अपतटीय पवन)।
  • गहन-समुद्री खनन — 200 मीटर से अधिक (प्रायः 4-6 किमी) गहराई से खनिजों का निष्कर्षण: (1) बहुधात्विक पिंड (manganese nodules — Mn, Ni, Cu, Co) — गहन सागरीय मैदानों पर; (2) बहुधात्विक सल्फ़ाइड — मध्य-महासागरीय कटकों के हाइड्रोथर्मल छिद्रों पर; (3) कोबाल्ट-समृद्ध पपड़ियाँ — समुद्री टीलों पर।
  • शासन — UNCLOS (1982) — अंतरराष्ट्रीय समुद्र-तल "मानवता की साझी विरासत"; अंतरराष्ट्रीय समुद्र-तल प्राधिकरण (ISA) (किंग्स्टन, जमैका, 1994) — अन्वेषण अनुबंध; व्यावसायिक दोहन हेतु "खनन संहिता" अभी अंतिम नहीं; अमेरिका ने अप्रैल 2025 में कार्यकारी आदेश द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर समुद्र-तल खनन को आगे बढ़ाने का प्रयास किया — विवाद।
  • भारत — 1987 में "अग्रणी निवेशक" दर्जा; मध्य हिंद महासागर द्रोणी में ~75,000 वर्ग किमी में बहुधात्विक पिंडों के अन्वेषण का अधिकार; डीप ओशन मिशन (2021) — समुद्रयान (मत्स्य-6000, 6,000 मीटर गहराई तक मानवयुक्त पनडुब्बी)।
  • संभावित लाभ — ऊर्जा संक्रमण (बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, पवन टरबाइन) के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति, आपूर्ति-शृंखला विविधीकरण (चीन पर निर्भरता घटाना), स्थल-खनन के सामाजिक प्रभावों (विस्थापन) से बचाव, वैज्ञानिक ज्ञान, आर्थिक लाभ।
  • जोखिम — (1) जैव-विविधता हानि — अधिकांश गहन-समुद्री प्रजातियाँ अज्ञात, स्थानिक, अत्यंत धीमी वृद्धि (पिंड बनने में लाखों वर्ष) — क्षति अपरिवर्तनीय; (2) अवसाद-धूम्र (sediment plumes) — बड़े क्षेत्र में फैलना; (3) शोर-प्रकाश प्रदूषण; (4) कार्बन-भंडार में व्यवधान; (5) गहन समुद्र में "डार्क ऑक्सीजन" (पिंडों द्वारा ऑक्सीजन-उत्पादन की 2024 की खोज) जैसी अज्ञात प्रक्रियाएँ; (6) शासन-शून्यता और लाभ-साझेदारी; (7) मत्स्य पर प्रभाव; अनेक देशों और कंपनियों ने "विराम" (moratorium) की माँग की।
  • निष्कर्ष — "सावधानी सिद्धांत" के साथ, पर्याप्त वैज्ञानिक आधार और सशक्त अंतरराष्ट्रीय नियमन के बाद ही दोहन; पुनर्चक्रण और विकल्प-प्रौद्योगिकी पहले।

प्रवाल भित्तियाँ

  • दशाएँ — जल-तापमान ~20-29°C, स्वच्छ-उथला प्रकाशित जल, सामान्य लवणता, अवसाद-मुक्त; ज़ूज़ैंथेली शैवाल से सहजीविता।
  • प्रकार — तटीय (fringing), अवरोधक (barrier — ग्रेट बैरियर रीफ़), एटॉल (वलयाकार — लक्षद्वीप, मालदीव); उत्पत्ति — डार्विन का अवतलन सिद्धांत (1842), डेली का हिमानी नियंत्रण, मरे का पूर्व-मंच सिद्धांत।
  • भारत — मन्नार की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी, लक्षद्वीप, अंडमान-निकोबार; विरंजन (2023-24 का चौथा वैश्विक विरंजन — NOAA)।

6. मृदा और मृदा अपरदन

  • मृदा निर्माण के कारक — हांस जेनी (1941) — CLORPT: जलवायु (Climate), जीव (Organisms), उच्चावच (Relief), मूल पदार्थ (Parent material), समय (Time); प्रक्रियाएँ — लैटेराइटीकरण, पॉडज़ोलीकरण, कैल्सीकरण, लवणीकरण, ग्लेईकरण।
  • वर्गीकरण — USDA मृदा वर्गीकरण (12 गण — एंटीसोल, वर्टीसोल, एरिडीसोल, अल्फ़ीसोल, ऑक्सीसोल आदि); भारत में ICAR — जलोढ़, काली (रेगुर), लाल-पीली, लैटेराइट, शुष्क, लवणीय, पीटमय, वन मृदा।

"मृदा अपरदन रेंगती मृत्यु है" और संरक्षण उपाय (UPSC 2024)

  • अर्थ — मृदा अपरदन धीरे-धीरे, लगभग अदृश्य रूप से, पर निरंतर उपजाऊ ऊपरी परत को हटाता है — एक सेमी मृदा बनने में सैकड़ों वर्ष, पर नष्ट होने में कुछ ही वर्ष; परिणाम — उत्पादकता में गिरावट, मरुस्थलीकरण, नदियों-जलाशयों में गाद, बाढ़, खाद्य असुरक्षा, ग़रीबी और पलायन — अर्थात् कृषि-सभ्यता की "धीमी मृत्यु"; इतिहास में मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताओं के पतन में भूमि-क्षरण की भूमिका; अमेरिका का "डस्ट बाउल" (1930 का दशक)।
  • भारत — इसरो के मरुस्थलीकरण एवं भूमि-क्षरण एटलस (2021) के अनुसार 2018-19 में लगभग 97.85 मिलियन हेक्टेयर (कुल भौगोलिक क्षेत्र का ~29.7%) क्षरित; जल-अपरदन सबसे बड़ा कारक; चंबल की बीहड़ें (ravines), शिवालिक की "चो", पूर्वोत्तर में झूम।
  • प्रकार — जल (परत/sheet, रिल, अवनालिका/gully, बीहड़), पवन, हिमनद, तटीय; कारण — वनोन्मूलन, अति-चराई, ढलान पर अवैज्ञानिक खेती, झूम, खनन, सड़क-निर्माण, अति-सिंचाई।
  • संरक्षण उपाय — (1) कृषि-विधियाँ: समोच्च जुताई (contour ploughing), पट्टीदार खेती (strip cropping), सीढ़ीदार खेत (terracing), फ़सल-चक्र, आवरण फ़सलें, पलवार (mulching), शून्य-जुताई; (2) यांत्रिक: मेड़बंदी (bunding), चेक-डैम, अवनालिका-प्लगिंग, जल-संग्रह गड्ढे, गेबियन; (3) जैविक: वनीकरण, घास-रोपण (वेटिवर), आश्रय-पट्टियाँ (shelter belts — राजस्थान), कृषि-वानिकी; (4) चराई नियंत्रण; (5) जलागम (watershed) प्रबंधन — रालेगण सिद्धि, हिवरे बाज़ार; (6) नीतिगत — मृदा स्वास्थ्य कार्ड (2015), PMKSY-जलागम घटक, राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम, बॉन चैलेंज (2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षरित भूमि पुनर्स्थापन का भारतीय लक्ष्य)।

7. वनस्पति, जैव-विविधता और सामाजिक वानिकी

  • विश्व के बायोम — उष्णकटिबंधीय वर्षावन, सवाना, मरुस्थल, भूमध्यसागरीय, शीतोष्ण घास, पर्णपाती वन, टैगा, टुंड्रा।
  • जैव-विविधता हॉटस्पॉट — नॉर्मन मायर्स (1988) — 36 वैश्विक हॉटस्पॉट; भारत में 4 — हिमालय, इंडो-बर्मा, पश्चिमी घाट और श्रीलंका, सुंडालैंड (निकोबार)।

प्रजाति-समृद्धि की अक्षांशीय प्रवणता (UPSC 2024)

  • प्रवृत्ति — विषुवत् से ध्रुवों की ओर प्रजाति-समृद्धि घटती है — पृथ्वी के जीवन का सबसे व्यापक भौगोलिक प्रतिरूप (उष्णकटिबंधीय वर्षावन पृथ्वी के ~7% क्षेत्र में पर आधी से अधिक प्रजातियाँ)।
  • व्याख्याएँ — (1) ऊर्जा/उत्पादकता — अधिक सौर ऊर्जा और प्राथमिक उत्पादकता; (2) समय-क्षेत्र — उष्णकटिबंध अधिक पुराने और विस्तृत, हिमयुगों से कम बाधित; (3) जलवायु स्थिरता — संकीर्ण निकेत (niche) का विकास; (4) विकास की गति — उच्च तापमान से तेज़ उत्परिवर्तन और प्रजाति-उद्भवन (क्लाउस रोहडे, 1992); (5) निकेत रूढ़िवाद — अधिकांश वंश उष्ण मूल के, ठंड में फैलना कठिन; (6) जैविक अंतःक्रियाएँ — परजीवी-शिकारी दबाव; (7) "मध्य-डोमेन प्रभाव" (ज्यामितीय संयोग)।
  • अपवाद — पेंगुइन, कुछ समुद्री वर्ग, एफ़िड, शंकुधारी — शीतोष्ण में अधिक विविध; पर्वतों पर ऊँचाई के साथ भी समान प्रवणता।
  • महत्व — संरक्षण-प्राथमिकता (उष्णकटिबंधीय वनों का संरक्षण), जलवायु परिवर्तन से प्रजातियों का ध्रुवोन्मुख खिसकाव।

सामाजिक वानिकी और ग्रामीण परिवर्तन (UPSC 2024)

  • अवधारणा — राष्ट्रीय कृषि आयोग (1976) — लोगों की सहभागिता से, लोगों के लाभ हेतु, वन-क्षेत्र के बाहर वृक्षारोपण; घटक — कृषि वानिकी (खेतों की मेड़ पर), सामुदायिक वानिकी (ग्राम-भूमि पर), विस्तार वानिकी (सड़क, नहर, रेल के किनारे), मनोरंजक वानिकी।
  • सामाजिक-आर्थिक प्रभाव — (1) ईंधन-चारा-इमारती लकड़ी की उपलब्धता — स्त्रियों का "ईंधन-ढोने" का श्रम घटा; (2) अतिरिक्त आय और रोज़गार (नर्सरी, लकड़ी-विक्रय); (3) प्राकृतिक वनों पर दबाव में कमी; (4) मृदा संरक्षण और सूक्ष्म-जलवायु सुधार; (5) पंचायतों-समुदायों की भागीदारी; (6) गोबर का ईंधन के बजाय खाद में उपयोग।
  • आलोचना — यूकेलिप्टस जैसे एकल-कृषि (monoculture) वृक्ष — भू-जल-ह्रास (कर्नाटक में 1980 के दशक के विरोध), लाभ बड़े किसानों और उद्योग (कागज़ मिल) को, सामुदायिक भूमि का निजीकरण, निर्धनों की ईंधन-आवश्यकता की उपेक्षा।

8. पर्यावरण: पारिस्थितिकी, संकट और प्रबंधन

भूगोल: पर्यावरणीय समस्याएँ और समाधान इन्फ़ोग्राफ़िक
पर्यावरणीय समस्याएँ और समाधान — प्रदूषण, वनोन्मूलन, जलवायु परिवर्तन और संरक्षण (NCERT आधारित infographic)।

पर्वतीय क्षेत्रों की नाज़ुकता (UPSC 2024)

  • कारण — तीव्र ढलान और पतली मृदा (अपरदन-भू-स्खलन), कम तापमान से धीमी पुनर्प्राप्ति, उच्च स्थानिकता (endemism) और संकीर्ण आवास, ऊँचाई-निर्भर उष्णन (मैदानों से तेज़ गर्म होना), हिमनद-पिघलन और GLOF, भूकंपीय सक्रियता, पृथक्करण, पर्यटन-सड़क-जलविद्युत का दबाव।
  • उदाहरण — जोशीमठ धँसाव (2023), केदारनाथ (2013), हिमाचल 2023 की बाढ़-भू-स्खलन; "सतत पर्वतीय विकास का अंतरराष्ट्रीय वर्ष" (2022); SDG लक्ष्य 15.4।
  • प्रबंधन — वहन-क्षमता अध्ययन, भू-संकट मानचित्रण, सतत पर्यटन, पारंपरिक ज्ञान, राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण मिशन (NAPCC के अंतर्गत)।

PAVE और सतत पर्यावरण संरक्षण (UPSC 2024)

  • PAVE — धारणा (Perception) — पर्यावरणीय संकट को कैसे देखा जाता है; अभिवृत्ति (Attitude) — संरक्षण के प्रति अनुकूल/प्रतिकूल झुकाव; मूल्य (Value) — प्रकृति के प्रति गहरे नैतिक-सांस्कृतिक मूल्य; भावना (Emotion) — प्रकृति से भावनात्मक जुड़ाव ("बायोफ़िलिया" — ई.ओ. विल्सन, 1984)।
  • महत्व — संरक्षण केवल तकनीक-क़ानून से नहीं, मानव-व्यवहार से सफल; उदाहरण — पवित्र उपवन (मूल्य), बिश्नोई (मूल्य-भावना), चिपको (भावना-अभिवृत्ति), स्थानीय समुदायों की बाघ-धारणा (संघर्ष बनाम सह-अस्तित्व); मिशन LiFE (2022) — "व्यवहार परिवर्तन" पर केंद्रित; पर्यावरण-शिक्षा, संचार, सामुदायिक सहभागिता से PAVE को सकारात्मक बनाना।
  • भूगोल से संबंध — व्यवहारवादी भूगोल (मानव भूगोल अध्याय) — "मानसिक मानचित्र", पर्यावरणीय धारणा।

मानव-वन्यजीव संघर्ष (UPSC 2025)

  • कारण — आवास-क्षरण और विखंडन (सड़क, रेल, खनन), गलियारों का टूटना, कृषि-विस्तार, जनसंख्या-घनत्व, फ़सल-पैटर्न (गन्ना — तेंदुए), कचरा (बंदर, भालू), वन्यजीव संख्या में सफल संरक्षण से वृद्धि, जलवायु परिवर्तन से जल-भोजन की कमी, आक्रामक प्रजातियाँ (लैंटाना) से चारे में कमी।
  • परिणाम — मानव मृत्यु-घायल, फ़सल-पशुधन हानि, प्रतिशोधात्मक हत्याएँ, संरक्षण के प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति, मानसिक तनाव, आर्थिक हानि; भारत में हाथी और बाघ से हर वर्ष सैकड़ों मानव मृत्यु।
  • निवारण — हाथी गलियारों का संरक्षण, पूर्व-चेतावनी (SMS, AI-कैमरे), मधुमक्खी-बाड़, सौर-बाड़, फ़सल-बीमा और त्वरित क्षतिपूर्ति, सामुदायिक "प्राथमिक प्रतिक्रिया दल", अपशिष्ट-प्रबंधन, भूमि-उपयोग नियोजन, PAVE-आधारित जागरूकता; राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष न्यूनीकरण रणनीति।

पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन का संयुक्त राष्ट्र दशक (UPSC 2025)

  • क्या है — संयुक्त राष्ट्र महासभा (मार्च 2019) द्वारा घोषित 2021-2030 का दशक; नेतृत्व — UNEP और FAO; लक्ष्य — विश्व भर में क्षरित पारिस्थितिकी तंत्रों (वन, कृषि-भूमि, आर्द्रभूमि, पर्वत, महासागर, नगर) के क्षरण को रोकना और पुनर्स्थापित करना; "Generation Restoration"।
  • पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक संतुलन — (1) भू-दृश्य दृष्टिकोण — संरक्षण और उत्पादन को एक साथ नियोजित करना; (2) कृषि-वानिकी और पुनर्योजी कृषि — मृदा-स्वास्थ्य सुधार से उत्पादकता बढ़ाना (खाद्य सुरक्षा); (3) पारिस्थितिक सेवाओं के लिए भुगतान; (4) स्थानीय और मूलनिवासी समुदायों की भूमिका और अधिकार; (5) हरित रोज़गार — नर्सरी, पुनर्वनीकरण; (6) प्रकृति-आधारित समाधान — मैंग्रोव से तटीय सुरक्षा और मत्स्य; (7) निजी वित्त; (8) 10 सिद्धांत — वैश्विक योगदान, व्यापक सहभागिता, अनेक लाभ, क्षरण के कारणों का समाधान, स्थानीय ज्ञान आदि।
  • भारत — बॉन चैलेंज लक्ष्य (2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर), ग्रीन इंडिया मिशन, अरावली ग्रीन वॉल परियोजना (2025), MISHTI (मैंग्रोव, 2023), अमृत धरोहर (आर्द्रभूमि, 2023)।
  • चुनौतियाँ — वित्त की कमी, एकल-वृक्षारोपण को "पुनर्स्थापन" कहना, भूमि-अधिकार विवाद, निगरानी।

अमेज़न और कांगो बेसिन में कृषि-जनित वनोन्मूलन (UPSC 2025)

  • कारण — अमेज़न: पशुपालन (मवेशी चरागाह — सबसे बड़ा कारक), सोयाबीन, अवैध लकड़ी-कटाई, खनन, सड़कें (BR-163); कांगो: छोटे किसानों की स्थानांतरी कृषि और चारकोल, जनसंख्या-वृद्धि, लकड़ी, खनन।
  • जैव-विविधता पर परिणाम — विश्व के सबसे समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्रों में प्रजाति-हानि, स्थानिक प्रजातियों का विलोपन, आवास-विखंडन (किनारा-प्रभाव), बड़े स्तनधारियों (गोरिल्ला, जगुआर) पर संकट, बीज-प्रसारकों की हानि।
  • जलवायु-नियंत्रण पर परिणाम — (1) कार्बन-सिंक का कमज़ोर होना — अमेज़न के कुछ भाग अब कार्बन के शुद्ध स्रोत (गैटी और साथी, Nature, 2021); (2) जल-पुनर्चक्रण — वाष्पोत्सर्जन से "उड़ती नदियाँ" (flying rivers) दक्षिण अमेरिका की वर्षा का स्रोत — वनोन्मूलन से सूखा; (3) "टिपिंग पॉइंट" — 20-25% वनोन्मूलन पर अमेज़न के सवाना में बदलने की आशंका (लवजॉय और नोब्रे, 2018); (4) कांगो की पीटभूमि (कुवेत सेंट्रल — लगभग 29-30 अरब टन कार्बन) का क्षरण; (5) स्थानीय तापमान वृद्धि, वनाग्नि; (6) वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण पर प्रभाव।
  • प्रयास — ब्राज़ील की PPCDAm नीति (2023 के बाद वनोन्मूलन में गिरावट), अमेज़न फ़ंड, REDD+, COP30 (बेलेम, ब्राज़ील, 2025) — "उष्णकटिबंधीय वन सदैव सुविधा" (TFFF) का प्रस्ताव।

कार्बन तटस्थता (UPSC 2024)

  • अर्थ — मानवजनित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और अवशोषण (सिंक, CCS) का संतुलन — "नेट-ज़ीरो"; IPCC — 1.5°C के लिए 2050 के आसपास CO₂ नेट-ज़ीरो आवश्यक।
  • क्यों आवश्यक — तापन को रोकने का एकमात्र मार्ग (संचयी उत्सर्जन ∝ तापमान), चरम घटनाओं-समुद्र-तल वृद्धि-जैव-विविधता हानि को सीमित करना, अंतर-पीढ़ीगत न्याय।
  • राष्ट्रों के प्रयास — पेरिस समझौता (2015) और NDC; नेट-ज़ीरो लक्ष्य — यूरोपीय संघ 2050 (यूरोपीय जलवायु क़ानून, 2021), अमेरिका 2050, चीन 2060, भारत 2070; भूटान और सूरीनाम पहले से "कार्बन-नकारात्मक"; कार्बन बाज़ार (अनुच्छेद 6), कार्बन कर (स्वीडन), EU का CBAM; नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन (भारत — राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, 2023), इलेक्ट्रिक वाहन, वन-सिंक (REDD+), ऊर्जा दक्षता; भारत — 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता, उत्सर्जन-तीव्रता में 45% कमी (2005 की तुलना में), कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (2023)।
  • चुनौतियाँ — विकास बनाम उत्सर्जन, जलवायु-वित्त (COP29 बाकू 2024 — 2035 तक प्रति वर्ष कम से कम 300 अरब डॉलर का नया लक्ष्य), तकनीक-हस्तांतरण, "ग्रीनवॉशिंग", ऑफ़सेट की गुणवत्ता।

9. Master Summary Table

विषयमुख्य तथ्ययाद रखें
हिंद महासागरउल्टा Y कटक; नाइंटी ईस्ट; सुंडा गर्त; बंगाल पंखाकेर्गुएलन, रीयूनियन हॉटस्पॉट
तरंग-धारा-ज्वारऊर्जा बनाम जल-प्रवाह बनाम आवधिक उठानफ़ंडी ~16 मी
समुद्र-तलसुस्थैतिक, समस्थैतिक, विवर्तनिक, स्थानीयAR6: ~0.20 मी (1901-2018), 3.7 मिमी/वर्ष
गहन-समुद्री खननUNCLOS 1982; ISA 1994; भारत — CIOB, डीप ओशन मिशन 2021लाभ बनाम अपरिवर्तनीय क्षति
मृदाजेनी 1941 CLORPT; 97.85 Mha क्षरित (2021 एटलस)रेंगती मृत्यु
जैव-विविधतामायर्स 1988 (36, भारत 4); अक्षांशीय प्रवणतारोहडे 1992
सामाजिक वानिकीराष्ट्रीय कृषि आयोग 1976यूकेलिप्टस विवाद
पुनर्स्थापन दशक2021-2030; UNEP-FAOबॉन — 2.6 करोड़ हेक्टेयर
अमेज़न-कांगोउड़ती नदियाँ; 20-25% टिपिंग पॉइंट; कांगो पीटगैटी 2021
कार्बन तटस्थताEU 2050, चीन 2060, भारत 2070भूटान, सूरीनाम कार्बन-नकारात्मक

10. चार्ट: हिंद महासागर का नितल (सरलीकृत)

अफ़्रीका-अरब भारत दक्षिण-पूर्व एशिया कार्ल्सबर्ग कटक द.प. हिंद कटक द.पू. हिंद कटक रोड्रिग्स त्रि-संधि नाइंटी ईस्ट कटक चागोस-लक्षद्वीप सुंडा (जावा) गर्त बंगाल पंखा
हिंद महासागर का नितल: उल्टे "Y" आकार की मध्य-महासागरीय कटक, नाइंटी ईस्ट कटक, चागोस-लक्षद्वीप कटक और सुंडा गर्त (पैमाना और स्थितियाँ सांकेतिक)।

11. Mind Map

समुद्र, जैव भूगोल, पर्यावरण
समुद्र नितल
  • मग्नतट से गर्त
  • हिंद महासागर
जल-संचलन
  • तरंग-धारा-ज्वार
  • समुद्र-तल परिवर्तन
  • गहन-समुद्री खनन
मृदा
  • CLORPT
  • अपरदन, संरक्षण
जैव
  • हॉटस्पॉट, अक्षांशीय प्रवणता
  • सामाजिक वानिकी
पर्यावरण
  • पर्वतीय नाज़ुकता, PAVE
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष
  • पुनर्स्थापन, अमेज़न-कांगो, नेट-ज़ीरो

12. महत्वपूर्ण One-liners

  • महासागरों की औसत लवणता — ~35‰; सर्वाधिक लवणीय सागर (खुले सागरों में) — लाल सागर।
  • विश्व का सबसे बड़ा पनडुब्बी पंखा — बंगाल पंखा।
  • हिंद महासागर का सबसे गहरा भाग — सुंडा (जावा) गर्त।
  • UNCLOS — 1982; ISA — 1994, किंग्स्टन; भारत का डीप ओशन मिशन — 2021।
  • प्रवाल भित्तियों का अवतलन सिद्धांत — चार्ल्स डार्विन (1842)।
  • मृदा निर्माण के कारक CLORPT — हांस जेनी (1941)।
  • जैव-विविधता हॉटस्पॉट अवधारणा — नॉर्मन मायर्स (1988); भारत में 4।
  • "सामाजिक वानिकी" शब्द — राष्ट्रीय कृषि आयोग (1976)।
  • पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन दशक — 2021-2030 (UNEP-FAO)।
  • "बायोफ़िलिया" — ई.ओ. विल्सन (1984)।

13. टिप्स एवं ट्रिक्स

समुद्र-पर्यावरण उत्तर
  • हिंद महासागर, धाराएँ, प्रवाल वितरण — मानचित्र अनिवार्य।
  • पर्यावरण-प्रश्नों में अंतरराष्ट्रीय ढाँचा + भारत की पहल + स्थानीय उदाहरण — तीन स्तर।
  • हाल की रिपोर्टें (IPCC AR6, ISRO एटलस 2021) और घटनाएँ (COP29, COP30) जोड़ें।
याद रखने की तरकीब

CLORPT — "जलवायु-जीव-उच्चावच-मूल-समय"; PAVE — "धारणा-अभिवृत्ति-मूल्य-भावना"; भारत के हॉटस्पॉट — "हि-इं-प-सु"।

14. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2025 · Paper I · 2(b)

गहन-समुद्री खनन क्या है? इससे जुड़े संभावित लाभ और जोखिम क्या हैं?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

अर्थ और संसाधन: 200 मीटर से अधिक (प्रायः 4-6 किमी) गहराई से बहुधात्विक पिंड, सल्फ़ाइड, कोबाल्ट-पपड़ियों का निष्कर्षण।

शासन: UNCLOS 1982, ISA 1994, खनन संहिता लंबित; अमेरिका का 2025 का आदेश; भारत — CIOB (~75,000 वर्ग किमी), डीप ओशन मिशन, समुद्रयान।

लाभ: महत्वपूर्ण खनिज (ऊर्जा संक्रमण), आपूर्ति-शृंखला विविधीकरण, स्थल-खनन विस्थापन से बचाव, वैज्ञानिक ज्ञान।

जोखिम: अपरिवर्तनीय जैव-विविधता हानि, अवसाद-धूम्र, शोर-प्रकाश, कार्बन-भंडार, "डार्क ऑक्सीजन" जैसी अज्ञात प्रक्रियाएँ, शासन-शून्यता, मत्स्य।

आरेख: नितल पर संसाधनों के स्थान।

निष्कर्ष: सावधानी सिद्धांत, वैज्ञानिक आधार और अंतरराष्ट्रीय नियमन के बिना दोहन "भविष्य से उधार" होगा।

Q2UPSC 2024 · Paper I · 2(c)

उपयुक्त रेखाचित्रों सहित हिंद महासागर की नितल-स्थलाकृति का विस्तृत वर्णन कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: तीसरा सबसे बड़ा महासागर; प्लेट-विवर्तनिकी से जटिल नितल।

स्थलरूप: मध्य-हिंद कटक (उल्टा Y — कार्ल्सबर्ग, मध्य, द.प., द.पू.; रोड्रिग्स त्रि-संधि); नाइंटी ईस्ट कटक (भूकंप-रहित, केर्गुएलन हॉटस्पॉट); चागोस-लक्षद्वीप कटक (रीयूनियन हॉटस्पॉट); सुंडा गर्त; द्रोणियाँ; केर्गुएलन-मस्करीन पठार; बंगाल-सिंधु पंखे; मग्नतट की चौड़ाई; द्वीप-प्रकार।

रेखाचित्र: कटक-गर्त-द्रोणी का मानचित्र (ऊपर चार्ट जैसा) और अनुप्रस्थ काट।

महत्व: बहुधात्विक पिंड (CIOB), तेल (बॉम्बे हाई), सुनामी-जोखिम (सुंडा), सामरिक महत्व।

निष्कर्ष: हिंद महासागर का नितल भारतीय प्लेट की उत्तर-यात्रा का "भूवैज्ञानिक अभिलेख" है।

Q3UPSC 2025 · Paper I · 4(a)

जैव-विविधता और जलवायु-नियंत्रण के विशेष संदर्भ में अमेज़न और कांगो बेसिन में कृषि-जनित वनोन्मूलन के पारिस्थितिक परिणाम क्या हैं?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

कारण: अमेज़न — पशुपालन, सोया, लकड़ी, खनन, सड़कें; कांगो — छोटे किसान, चारकोल, जनसंख्या, लकड़ी।

जैव-विविधता: प्रजाति-हानि, स्थानिक विलोपन, विखंडन-किनारा प्रभाव, बड़े स्तनधारी, बीज-प्रसारक।

जलवायु-नियंत्रण: कार्बन-सिंक का कमज़ोर होना (गैटी 2021 — शुद्ध स्रोत), उड़ती नदियाँ और वर्षा-पुनर्चक्रण, टिपिंग पॉइंट (लवजॉय-नोब्रे 2018), कांगो पीट (~29-30 अरब टन), स्थानीय तापन-वनाग्नि, वैश्विक परिसंचरण।

तुलना: अमेज़न — औद्योगिक कृषि, कांगो — निर्धनता-जनित; नीति-उपाय भिन्न होने चाहिए।

प्रयास: PPCDAm, अमेज़न फ़ंड, REDD+, COP30 का TFFF।

निष्कर्ष: ये वर्षावन पृथ्वी के "फेफड़े" से अधिक उसके "जलवायु-नियामक" हैं — इनका संरक्षण वैश्विक सार्वजनिक हित है।

Q4UPSC 2024 · Paper I · 3(b)

"मृदा अपरदन रेंगती मृत्यु है।" इस कथन की व्याख्या करते हुए विभिन्न मृदा संरक्षण उपाय सुझाइए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

व्याख्या: धीमा, अदृश्य पर निरंतर क्षरण; निर्माण में सदियाँ, विनाश में वर्ष; उत्पादकता-गिरावट, मरुस्थलीकरण, गाद, खाद्य असुरक्षा — "धीमी मृत्यु"; डस्ट बाउल।

भारत: ISRO एटलस (2021) — ~97.85 Mha (~29.7%) क्षरित; चंबल बीहड़, शिवालिक चो, झूम।

प्रकार और कारण: जल, पवन; वनोन्मूलन, अति-चराई, ढलान-कृषि, खनन।

उपाय: कृषि-विधियाँ (समोच्च, पट्टीदार, सीढ़ीदार, पलवार, शून्य-जुताई); यांत्रिक (मेड़बंदी, चेक-डैम, अवनालिका-प्लगिंग); जैविक (वनीकरण, वेटिवर, आश्रय-पट्टियाँ, कृषि-वानिकी); चराई-नियंत्रण; जलागम प्रबंधन (रालेगण सिद्धि); नीतियाँ (मृदा स्वास्थ्य कार्ड, PMKSY, बॉन चैलेंज)।

निष्कर्ष: मृदा "नवीकरणीय नहीं" संसाधन है — उसका संरक्षण खाद्य और जलवायु सुरक्षा का आधार।

Q5UPSC 2024 · Paper I · 4(c)

"प्रजाति-समृद्धि की अक्षांशीय प्रवणता जैव-विविधता की एक महत्वपूर्ण भौगोलिक प्रवृत्ति है।" कथन का परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

प्रवृत्ति: विषुवत् से ध्रुवों की ओर प्रजाति-समृद्धि में कमी — सबसे व्यापक भौगोलिक प्रतिरूप।

व्याख्याएँ: ऊर्जा-उत्पादकता; समय-क्षेत्र; जलवायु स्थिरता; विकास-गति (रोहडे 1992); निकेत रूढ़िवाद; जैविक अंतःक्रियाएँ; मध्य-डोमेन प्रभाव।

अपवाद: पेंगुइन, कुछ समुद्री वर्ग, एफ़िड, शंकुधारी।

महत्व: संरक्षण-प्राथमिकता; जलवायु परिवर्तन से प्रजाति-खिसकाव।

आरेख: अक्षांश बनाम प्रजाति-संख्या का वक्र।

निष्कर्ष: कथन सही — पर एक कारक नहीं, अनेक कारकों का संयुक्त परिणाम।

Q6UPSC 2024 · Paper I · 4(a)

भविष्य के पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्बन तटस्थता कैसे आवश्यक है? इस संबंध में राष्ट्रों द्वारा किए गए विभिन्न प्रयासों का वर्णन कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

अर्थ: उत्सर्जन = अवशोषण (नेट-ज़ीरो)।

आवश्यकता: संचयी उत्सर्जन और तापमान का सीधा संबंध; 1.5°C हेतु ~2050 तक CO₂ नेट-ज़ीरो (IPCC); चरम घटनाएँ, समुद्र-तल, जैव-विविधता; अंतर-पीढ़ीगत न्याय।

प्रयास: पेरिस-NDC; EU 2050, अमेरिका 2050, चीन 2060, भारत 2070; भूटान-सूरीनाम कार्बन-नकारात्मक; कार्बन बाज़ार और कर, CBAM; नवीकरणीय, हरित हाइड्रोजन, EV, REDD+; भारत — 500 GW, 45% तीव्रता-कमी, CCTS 2023।

चुनौतियाँ: विकास बनाम उत्सर्जन, वित्त (COP29 — $300 अरब), तकनीक, ग्रीनवॉशिंग।

निष्कर्ष: कार्बन तटस्थता "विकल्प" नहीं, जीवित रहने की शर्त — "साझा पर विभेदित उत्तरदायित्व" के साथ।

Q7UPSC 2025 · Paper I · 1(e) · 10 अंक

समुद्री तरंग, समुद्री धारा और ज्वार-भाटा में मौलिक अंतर क्या हैं?

मॉडल उत्तर

अंतर (तालिका): गति का स्वरूप (ऊर्जा-संचरण / क्षैतिज जल-प्रवाह / आवधिक उठान); कारण (पवन / पवन-घनत्व-कोरिओलिस / चंद्र-सूर्य गुरुत्व); नियमितता; प्रभाव-क्षेत्र; महत्व।

उदाहरण: सुनामी; गल्फ़ स्ट्रीम; फ़ंडी और खंभात के ज्वार।

Q8UPSC 2024 · Paper I · 1(c) · 10 अंक

उपयुक्त उदाहरणों सहित समुद्र-तल परिवर्तन के कारकों की व्याख्या कीजिए।

मॉडल उत्तर

कारक: सुस्थैतिक (हिमनद, तापीय प्रसार, विवर्तनिक-सुस्थैतिक); समस्थैतिक (पश्च-हिमनदीय पुनरुत्थान — स्कैंडिनेविया); विवर्तनिक (2004 अंडमान); स्थानीय धँसाव (जकार्ता)।

साक्ष्य: रिया, फ़्योर्ड, उत्थित पुलिन, द्वारका।

वर्तमान: AR6 — ~0.20 मी (1901-2018), 3.7 मिमी/वर्ष; प्रभाव — सुंदरबन, मालदीव।

Q9UPSC 2025 · Paper I · 3(b)

"पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन का संयुक्त राष्ट्र दशक" क्या है? यह पारिस्थितिक लक्ष्यों को खाद्य सुरक्षा और विकास जैसी उभरती सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं के साथ कैसे संतुलित करता है?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

क्या है: 2021-2030; UNGA (मार्च 2019); UNEP-FAO; सभी पारिस्थितिकी तंत्रों का पुनर्स्थापन; 10 सिद्धांत।

संतुलन: भू-दृश्य दृष्टिकोण; कृषि-वानिकी और पुनर्योजी कृषि (खाद्य सुरक्षा); पारिस्थितिक सेवाओं के लिए भुगतान; समुदाय-अधिकार; हरित रोज़गार; प्रकृति-आधारित समाधान (मैंग्रोव); निजी वित्त।

भारत: बॉन लक्ष्य, ग्रीन इंडिया मिशन, अरावली ग्रीन वॉल, MISHTI, अमृत धरोहर।

चुनौतियाँ: वित्त, एकल-वृक्षारोपण, भूमि-अधिकार, निगरानी।

निष्कर्ष: पुनर्स्थापन "संरक्षण बनाम विकास" नहीं, "संरक्षण के माध्यम से विकास" का मार्ग है।

Q10UPSC 2025 · Paper I · 2(c)

मानव-वन्यजीव संघर्ष निरंतर बढ़ रहे हैं। इसके कारणों, परिणामों और निवारण के उपायों की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर

कारण: आवास-क्षरण-विखंडन, गलियारे टूटना, कृषि-विस्तार, फ़सल-पैटर्न, कचरा, संरक्षण-सफलता से संख्या-वृद्धि, जलवायु परिवर्तन, आक्रामक प्रजातियाँ।

परिणाम: मानव मृत्यु-हानि, फ़सल-पशुधन हानि, प्रतिशोधी हत्याएँ, संरक्षण-विरोधी अभिवृत्ति।

निवारण: गलियारे, पूर्व-चेतावनी, मधुमक्खी-सौर बाड़, बीमा-क्षतिपूर्ति, प्रतिक्रिया दल, अपशिष्ट-प्रबंधन, भूमि-उपयोग नियोजन, PAVE-आधारित जागरूकता।

15. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • नितल — मग्नतट से गर्त; हिंद महासागर (कटक, गर्त, द्रोणी, पंखे)।
  • जल — तापमान, लवणता; तरंग-धारा-ज्वार अंतर; धाराएँ; समुद्र-तल परिवर्तन; प्रवाल।
  • संसाधन — गहन-समुद्री खनन (लाभ-जोखिम, ISA, भारत)।
  • मृदा — CLORPT, वर्गीकरण, अपरदन ("रेंगती मृत्यु") और संरक्षण।
  • जैव — बायोम, हॉटस्पॉट, अक्षांशीय प्रवणता, सामाजिक वानिकी।
  • पर्यावरण — पर्वतीय नाज़ुकता, PAVE, मानव-वन्यजीव संघर्ष, पुनर्स्थापन दशक, अमेज़न-कांगो, कार्बन तटस्थता।