1. अध्याय एक नज़र में
Paper I के भाग 3-5 — समुद्र विज्ञान (महासागरीय नितल, तापमान-लवणता, तरंगें-धाराएँ-ज्वार, समुद्री संसाधन, प्रवाल भित्तियाँ, समुद्र-तल परिवर्तन), जैव भूगोल (मृदा की उत्पत्ति-वर्गीकरण, मृदा अपरदन, वनस्पति, जैव-विविधता, सामाजिक वानिकी) और पर्यावरण भूगोल (पारिस्थितिकी तंत्र, मानव-पर्यावरण संबंध, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रबंधन)। 2025 में तरंग-धारा-ज्वार में अंतर, गहन-समुद्री खनन, मानव-वन्यजीव संघर्ष, पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन का संयुक्त राष्ट्र दशक, अमेज़न-कांगो वनोन्मूलन; 2024 में समुद्र-तल परिवर्तन, हिंद महासागर की नितल-स्थलाकृति, सामाजिक वानिकी, पर्वतीय नाज़ुकता, मृदा अपरदन, PAVE, कार्बन तटस्थता और प्रजाति-समृद्धि की अक्षांशीय प्रवणता पूछी गई।

2. महासागरीय नितल
| भाग | विशेषता |
|---|---|
| महाद्वीपीय मग्नतट (Shelf) | मंद ढाल, औसत गहराई ~150-200 मीटर; चौड़ाई भिन्न (साइबेरियाई मग्नतट सर्वाधिक चौड़ा); मत्स्य, तेल-गैस, प्लेसर |
| महाद्वीपीय ढाल (Slope) | तीव्र ढाल; पनडुब्बी कंदराएँ (submarine canyons) |
| महाद्वीपीय उत्थान (Rise) | अवसाद-संचय, पंखे (fans) |
| गहन सागरीय मैदान (Abyssal plain) | 3-6 किमी गहराई; सपाट; पंक (ooze) |
| मध्य-महासागरीय कटक | रचनात्मक प्लेट सीमा; विश्व की सबसे लंबी पर्वत-शृंखला |
| गर्त (Trench) | सबसे गहरे भाग — मारियाना गर्त का चैलेंजर डीप (~11 किमी) |
| समुद्री टीले, गायट | ज्वालामुखी शिखर; गायट — सपाट शीर्ष |
हिंद महासागर की नितल-स्थलाकृति (UPSC 2024)
- मध्य-हिंद महासागरीय कटक — उल्टे "Y" आकार की कटक-व्यवस्था: उत्तर-पश्चिम में कार्ल्सबर्ग कटक (अरब सागर), मध्य हिंद कटक, दक्षिण-पश्चिम हिंद कटक और दक्षिण-पूर्व हिंद कटक — "रोड्रिग्स त्रि-संधि" (triple junction) पर मिलती हैं।
- नाइंटी ईस्ट कटक (90°E के साथ) — ~5,000 किमी लंबी, लगभग सीधी, भूकंप-रहित (aseismic) कटक — केर्गुएलन हॉटस्पॉट के ऊपर से भारतीय प्लेट के गुज़रने का निशान।
- चागोस-लक्षद्वीप कटक — लक्षद्वीप, मालदीव, चागोस — रीयूनियन हॉटस्पॉट का निशान; प्रवाल द्वीप।
- गर्त — सुंडा (जावा) गर्त — हिंद महासागर का सबसे गहरा भाग (~7 किमी से अधिक), अधोगमन क्षेत्र — 2004 सुनामी का स्रोत क्षेत्र।
- द्रोणियाँ (basins) — अरब, सोमाली, मस्करीन, मध्य हिंद, व्हार्टन, क्रोज़ेट, दक्षिण ऑस्ट्रेलियाई।
- पठार और उत्थित भाग — केर्गुएलन पठार (विशाल आग्नेय प्रांत), मस्करीन पठार, मेडागास्कर कटक।
- पनडुब्बी पंखे — बंगाल पंखा (विश्व का सबसे बड़ा पनडुब्बी पंखा — गंगा-ब्रह्मपुत्र अवसाद), सिंधु पंखा।
- मग्नतट — भारत के पश्चिमी तट (गुजरात, मुंबई — बॉम्बे हाई) पर चौड़ा, पूर्वी तट पर संकरा (बंगाल के पास चौड़ा); द्वीप — महाद्वीपीय (मेडागास्कर, श्रीलंका), ज्वालामुखी (मॉरीशस, रीयूनियन), प्रवाल (मालदीव, लक्षद्वीप)।
- आरेख — कटकों, गर्तों, द्रोणियों और पंखों का रेखाचित्र अनिवार्य।
3. तापमान, लवणता और जल-संचलन
- तापमान — ऊपरी मिश्रित परत, ताप-प्रवणता परत (thermocline), गहन ठंडी परत; अक्षांश, धाराएँ, पवनें, स्थल-निकटता से नियंत्रित।
- लवणता — औसत ~35‰ (प्रति हज़ार ग्राम); अधिक — लाल सागर (~41‰), भूमध्यसागर, फ़ारस की खाड़ी (उच्च वाष्पीकरण, कम वर्षा-नदी); कम — बाल्टिक सागर (नदियाँ, कम वाष्पीकरण), ध्रुवीय सागर; झीलें — मृत सागर, वान झील (अत्यधिक)।
तरंग, धारा और ज्वार-भाटा में मौलिक अंतर (UPSC 2025)
| आधार | तरंग (Wave) | धारा (Current) | ज्वार-भाटा (Tide) |
|---|---|---|---|
| गति का स्वरूप | ऊर्जा का संचरण; जल-कण वृत्ताकार कक्षाओं में ऊपर-नीचे, जल आगे नहीं बढ़ता (तट के पास छोड़कर) | जल-राशि का निश्चित दिशा में क्षैतिज प्रवाह — "समुद्र में नदियाँ" | समुद्र-तल का आवधिक उठना-गिरना |
| कारण | मुख्यतः पवन (सुनामी — भूकंप/भू-स्खलन) | स्थायी पवनें, तापमान-लवणता से घनत्व-भेद, कोरिओलिस, तट-रेखा | चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण + पृथ्वी का घूर्णन (अपकेंद्री बल) |
| नियमितता | अनियमित (पवन के अनुसार) | अपेक्षाकृत स्थायी (मौसमी परिवर्तन — हिंद महासागर) | अत्यंत नियमित — दैनिक (24 घं 50 मि), अर्ध-दैनिक; पूर्णिमा-अमावस्या पर दीर्घ ज्वार (spring), अष्टमी पर लघु ज्वार (neap) |
| प्रभाव-क्षेत्र | सतही (तरंग-आधार तक) | सतही और गहन (थर्मोहेलाइन) | पूरे जल-स्तंभ में; तटों पर स्पष्ट |
| महत्व | तटीय अपरदन-निक्षेप, तरंग-ऊर्जा | ऊष्मा-स्थानांतरण, जलवायु, मत्स्य, नौवहन | बंदरगाह (ज्वारीय), ज्वारीय ऊर्जा (खंभात-कच्छ की खाड़ी), मैंग्रोव, मत्स्य |

- प्रमुख धाराएँ — उष्ण: गल्फ़ स्ट्रीम, कुरोशियो, ब्राज़ील, अगुलहास, पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई; शीत: लैब्राडोर, ओयाशियो, कैलिफ़ोर्निया, कैनरी, हम्बोल्ट (पेरू), बेंगुएला, पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई; अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (पश्चिमी पवन प्रवाह); हिंद महासागर में मानसून के साथ धाराओं का उत्क्रमण (सोमाली धारा)।
- थर्मोहेलाइन परिसंचरण — "महासागरीय कन्वेयर बेल्ट"; AMOC के कमज़ोर होने की आशंका।
- ज्वार — सर्वाधिक ज्वारीय परास फ़ंडी की खाड़ी (कनाडा, ~16 मीटर); भारत में खंभात और कच्छ की खाड़ी में अधिक परास।

4. समुद्र-तल परिवर्तन (UPSC 2024)
| प्रकार | कारक | उदाहरण |
|---|---|---|
| सुस्थैतिक (Eustatic) — वैश्विक | हिमनद-सुस्थैतिक (हिमयुग में समुद्र-तल ~120 मीटर नीचे; हिम पिघलने से वृद्धि); तापीय प्रसार; विवर्तनिक-सुस्थैतिक (कटकों के आयतन में परिवर्तन) | होलोसीन समुद्र-तल वृद्धि; डूबी घाटियाँ — रिया (गैलिसिया), फ़्योर्ड (नॉर्वे) |
| समस्थैतिक (Isostatic) — स्थानीय | हिम-भार हटने से भूमि का उठना (पश्च-हिमनदीय पुनरुत्थान); अवसाद-भार से धँसना | स्कैंडिनेविया, हडसन खाड़ी का उत्थान; उत्थित पुलिन (raised beaches — स्कॉटलैंड) |
| विवर्तनिक | भूकंप, उत्थान-अवतलन | 2004 सुनामी में अंडमान के भाग धँसे/उठे |
| स्थानीय धँसाव | भू-जल दोहन, अवसाद-अभाव | जकार्ता (राजधानी का नुसंतारा स्थानांतरण), कोलकाता, ढाका |
- वर्तमान — IPCC AR6: 1901 से 2018 तक वैश्विक औसत समुद्र-तल ~0.20 मीटर बढ़ा; 2006-2018 में दर ~3.7 मिमी/वर्ष (त्वरित); कारण — तापीय प्रसार और हिमनद-हिमचादर पिघलन।
- प्रभाव — तटीय बाढ़, लवणीकरण, सुंदरबन के द्वीपों का क्षरण (घोड़ामारा), छोटे द्वीप-राष्ट्र (मालदीव, तुवालु), द्वारका के जलमग्न अवशेष (ऐतिहासिक परिवर्तन)।
5. समुद्री संसाधन और गहन-समुद्री खनन (UPSC 2025)
- समुद्री संसाधन — जैविक (मत्स्य, समुद्री शैवाल), खनिज (प्लेसर, तेल-गैस, बहुधात्विक पिंड), ऊर्जा (ज्वारीय, तरंग, OTEC, अपतटीय पवन)।
- गहन-समुद्री खनन — 200 मीटर से अधिक (प्रायः 4-6 किमी) गहराई से खनिजों का निष्कर्षण: (1) बहुधात्विक पिंड (manganese nodules — Mn, Ni, Cu, Co) — गहन सागरीय मैदानों पर; (2) बहुधात्विक सल्फ़ाइड — मध्य-महासागरीय कटकों के हाइड्रोथर्मल छिद्रों पर; (3) कोबाल्ट-समृद्ध पपड़ियाँ — समुद्री टीलों पर।
- शासन — UNCLOS (1982) — अंतरराष्ट्रीय समुद्र-तल "मानवता की साझी विरासत"; अंतरराष्ट्रीय समुद्र-तल प्राधिकरण (ISA) (किंग्स्टन, जमैका, 1994) — अन्वेषण अनुबंध; व्यावसायिक दोहन हेतु "खनन संहिता" अभी अंतिम नहीं; अमेरिका ने अप्रैल 2025 में कार्यकारी आदेश द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर समुद्र-तल खनन को आगे बढ़ाने का प्रयास किया — विवाद।
- भारत — 1987 में "अग्रणी निवेशक" दर्जा; मध्य हिंद महासागर द्रोणी में ~75,000 वर्ग किमी में बहुधात्विक पिंडों के अन्वेषण का अधिकार; डीप ओशन मिशन (2021) — समुद्रयान (मत्स्य-6000, 6,000 मीटर गहराई तक मानवयुक्त पनडुब्बी)।
- संभावित लाभ — ऊर्जा संक्रमण (बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, पवन टरबाइन) के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति, आपूर्ति-शृंखला विविधीकरण (चीन पर निर्भरता घटाना), स्थल-खनन के सामाजिक प्रभावों (विस्थापन) से बचाव, वैज्ञानिक ज्ञान, आर्थिक लाभ।
- जोखिम — (1) जैव-विविधता हानि — अधिकांश गहन-समुद्री प्रजातियाँ अज्ञात, स्थानिक, अत्यंत धीमी वृद्धि (पिंड बनने में लाखों वर्ष) — क्षति अपरिवर्तनीय; (2) अवसाद-धूम्र (sediment plumes) — बड़े क्षेत्र में फैलना; (3) शोर-प्रकाश प्रदूषण; (4) कार्बन-भंडार में व्यवधान; (5) गहन समुद्र में "डार्क ऑक्सीजन" (पिंडों द्वारा ऑक्सीजन-उत्पादन की 2024 की खोज) जैसी अज्ञात प्रक्रियाएँ; (6) शासन-शून्यता और लाभ-साझेदारी; (7) मत्स्य पर प्रभाव; अनेक देशों और कंपनियों ने "विराम" (moratorium) की माँग की।
- निष्कर्ष — "सावधानी सिद्धांत" के साथ, पर्याप्त वैज्ञानिक आधार और सशक्त अंतरराष्ट्रीय नियमन के बाद ही दोहन; पुनर्चक्रण और विकल्प-प्रौद्योगिकी पहले।
प्रवाल भित्तियाँ
- दशाएँ — जल-तापमान ~20-29°C, स्वच्छ-उथला प्रकाशित जल, सामान्य लवणता, अवसाद-मुक्त; ज़ूज़ैंथेली शैवाल से सहजीविता।
- प्रकार — तटीय (fringing), अवरोधक (barrier — ग्रेट बैरियर रीफ़), एटॉल (वलयाकार — लक्षद्वीप, मालदीव); उत्पत्ति — डार्विन का अवतलन सिद्धांत (1842), डेली का हिमानी नियंत्रण, मरे का पूर्व-मंच सिद्धांत।
- भारत — मन्नार की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी, लक्षद्वीप, अंडमान-निकोबार; विरंजन (2023-24 का चौथा वैश्विक विरंजन — NOAA)।
6. मृदा और मृदा अपरदन
- मृदा निर्माण के कारक — हांस जेनी (1941) — CLORPT: जलवायु (Climate), जीव (Organisms), उच्चावच (Relief), मूल पदार्थ (Parent material), समय (Time); प्रक्रियाएँ — लैटेराइटीकरण, पॉडज़ोलीकरण, कैल्सीकरण, लवणीकरण, ग्लेईकरण।
- वर्गीकरण — USDA मृदा वर्गीकरण (12 गण — एंटीसोल, वर्टीसोल, एरिडीसोल, अल्फ़ीसोल, ऑक्सीसोल आदि); भारत में ICAR — जलोढ़, काली (रेगुर), लाल-पीली, लैटेराइट, शुष्क, लवणीय, पीटमय, वन मृदा।
"मृदा अपरदन रेंगती मृत्यु है" और संरक्षण उपाय (UPSC 2024)
- अर्थ — मृदा अपरदन धीरे-धीरे, लगभग अदृश्य रूप से, पर निरंतर उपजाऊ ऊपरी परत को हटाता है — एक सेमी मृदा बनने में सैकड़ों वर्ष, पर नष्ट होने में कुछ ही वर्ष; परिणाम — उत्पादकता में गिरावट, मरुस्थलीकरण, नदियों-जलाशयों में गाद, बाढ़, खाद्य असुरक्षा, ग़रीबी और पलायन — अर्थात् कृषि-सभ्यता की "धीमी मृत्यु"; इतिहास में मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताओं के पतन में भूमि-क्षरण की भूमिका; अमेरिका का "डस्ट बाउल" (1930 का दशक)।
- भारत — इसरो के मरुस्थलीकरण एवं भूमि-क्षरण एटलस (2021) के अनुसार 2018-19 में लगभग 97.85 मिलियन हेक्टेयर (कुल भौगोलिक क्षेत्र का ~29.7%) क्षरित; जल-अपरदन सबसे बड़ा कारक; चंबल की बीहड़ें (ravines), शिवालिक की "चो", पूर्वोत्तर में झूम।
- प्रकार — जल (परत/sheet, रिल, अवनालिका/gully, बीहड़), पवन, हिमनद, तटीय; कारण — वनोन्मूलन, अति-चराई, ढलान पर अवैज्ञानिक खेती, झूम, खनन, सड़क-निर्माण, अति-सिंचाई।
- संरक्षण उपाय — (1) कृषि-विधियाँ: समोच्च जुताई (contour ploughing), पट्टीदार खेती (strip cropping), सीढ़ीदार खेत (terracing), फ़सल-चक्र, आवरण फ़सलें, पलवार (mulching), शून्य-जुताई; (2) यांत्रिक: मेड़बंदी (bunding), चेक-डैम, अवनालिका-प्लगिंग, जल-संग्रह गड्ढे, गेबियन; (3) जैविक: वनीकरण, घास-रोपण (वेटिवर), आश्रय-पट्टियाँ (shelter belts — राजस्थान), कृषि-वानिकी; (4) चराई नियंत्रण; (5) जलागम (watershed) प्रबंधन — रालेगण सिद्धि, हिवरे बाज़ार; (6) नीतिगत — मृदा स्वास्थ्य कार्ड (2015), PMKSY-जलागम घटक, राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम, बॉन चैलेंज (2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षरित भूमि पुनर्स्थापन का भारतीय लक्ष्य)।
7. वनस्पति, जैव-विविधता और सामाजिक वानिकी
- विश्व के बायोम — उष्णकटिबंधीय वर्षावन, सवाना, मरुस्थल, भूमध्यसागरीय, शीतोष्ण घास, पर्णपाती वन, टैगा, टुंड्रा।
- जैव-विविधता हॉटस्पॉट — नॉर्मन मायर्स (1988) — 36 वैश्विक हॉटस्पॉट; भारत में 4 — हिमालय, इंडो-बर्मा, पश्चिमी घाट और श्रीलंका, सुंडालैंड (निकोबार)।
प्रजाति-समृद्धि की अक्षांशीय प्रवणता (UPSC 2024)
- प्रवृत्ति — विषुवत् से ध्रुवों की ओर प्रजाति-समृद्धि घटती है — पृथ्वी के जीवन का सबसे व्यापक भौगोलिक प्रतिरूप (उष्णकटिबंधीय वर्षावन पृथ्वी के ~7% क्षेत्र में पर आधी से अधिक प्रजातियाँ)।
- व्याख्याएँ — (1) ऊर्जा/उत्पादकता — अधिक सौर ऊर्जा और प्राथमिक उत्पादकता; (2) समय-क्षेत्र — उष्णकटिबंध अधिक पुराने और विस्तृत, हिमयुगों से कम बाधित; (3) जलवायु स्थिरता — संकीर्ण निकेत (niche) का विकास; (4) विकास की गति — उच्च तापमान से तेज़ उत्परिवर्तन और प्रजाति-उद्भवन (क्लाउस रोहडे, 1992); (5) निकेत रूढ़िवाद — अधिकांश वंश उष्ण मूल के, ठंड में फैलना कठिन; (6) जैविक अंतःक्रियाएँ — परजीवी-शिकारी दबाव; (7) "मध्य-डोमेन प्रभाव" (ज्यामितीय संयोग)।
- अपवाद — पेंगुइन, कुछ समुद्री वर्ग, एफ़िड, शंकुधारी — शीतोष्ण में अधिक विविध; पर्वतों पर ऊँचाई के साथ भी समान प्रवणता।
- महत्व — संरक्षण-प्राथमिकता (उष्णकटिबंधीय वनों का संरक्षण), जलवायु परिवर्तन से प्रजातियों का ध्रुवोन्मुख खिसकाव।
सामाजिक वानिकी और ग्रामीण परिवर्तन (UPSC 2024)
- अवधारणा — राष्ट्रीय कृषि आयोग (1976) — लोगों की सहभागिता से, लोगों के लाभ हेतु, वन-क्षेत्र के बाहर वृक्षारोपण; घटक — कृषि वानिकी (खेतों की मेड़ पर), सामुदायिक वानिकी (ग्राम-भूमि पर), विस्तार वानिकी (सड़क, नहर, रेल के किनारे), मनोरंजक वानिकी।
- सामाजिक-आर्थिक प्रभाव — (1) ईंधन-चारा-इमारती लकड़ी की उपलब्धता — स्त्रियों का "ईंधन-ढोने" का श्रम घटा; (2) अतिरिक्त आय और रोज़गार (नर्सरी, लकड़ी-विक्रय); (3) प्राकृतिक वनों पर दबाव में कमी; (4) मृदा संरक्षण और सूक्ष्म-जलवायु सुधार; (5) पंचायतों-समुदायों की भागीदारी; (6) गोबर का ईंधन के बजाय खाद में उपयोग।
- आलोचना — यूकेलिप्टस जैसे एकल-कृषि (monoculture) वृक्ष — भू-जल-ह्रास (कर्नाटक में 1980 के दशक के विरोध), लाभ बड़े किसानों और उद्योग (कागज़ मिल) को, सामुदायिक भूमि का निजीकरण, निर्धनों की ईंधन-आवश्यकता की उपेक्षा।
8. पर्यावरण: पारिस्थितिकी, संकट और प्रबंधन

पर्वतीय क्षेत्रों की नाज़ुकता (UPSC 2024)
- कारण — तीव्र ढलान और पतली मृदा (अपरदन-भू-स्खलन), कम तापमान से धीमी पुनर्प्राप्ति, उच्च स्थानिकता (endemism) और संकीर्ण आवास, ऊँचाई-निर्भर उष्णन (मैदानों से तेज़ गर्म होना), हिमनद-पिघलन और GLOF, भूकंपीय सक्रियता, पृथक्करण, पर्यटन-सड़क-जलविद्युत का दबाव।
- उदाहरण — जोशीमठ धँसाव (2023), केदारनाथ (2013), हिमाचल 2023 की बाढ़-भू-स्खलन; "सतत पर्वतीय विकास का अंतरराष्ट्रीय वर्ष" (2022); SDG लक्ष्य 15.4।
- प्रबंधन — वहन-क्षमता अध्ययन, भू-संकट मानचित्रण, सतत पर्यटन, पारंपरिक ज्ञान, राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण मिशन (NAPCC के अंतर्गत)।
PAVE और सतत पर्यावरण संरक्षण (UPSC 2024)
- PAVE — धारणा (Perception) — पर्यावरणीय संकट को कैसे देखा जाता है; अभिवृत्ति (Attitude) — संरक्षण के प्रति अनुकूल/प्रतिकूल झुकाव; मूल्य (Value) — प्रकृति के प्रति गहरे नैतिक-सांस्कृतिक मूल्य; भावना (Emotion) — प्रकृति से भावनात्मक जुड़ाव ("बायोफ़िलिया" — ई.ओ. विल्सन, 1984)।
- महत्व — संरक्षण केवल तकनीक-क़ानून से नहीं, मानव-व्यवहार से सफल; उदाहरण — पवित्र उपवन (मूल्य), बिश्नोई (मूल्य-भावना), चिपको (भावना-अभिवृत्ति), स्थानीय समुदायों की बाघ-धारणा (संघर्ष बनाम सह-अस्तित्व); मिशन LiFE (2022) — "व्यवहार परिवर्तन" पर केंद्रित; पर्यावरण-शिक्षा, संचार, सामुदायिक सहभागिता से PAVE को सकारात्मक बनाना।
- भूगोल से संबंध — व्यवहारवादी भूगोल (मानव भूगोल अध्याय) — "मानसिक मानचित्र", पर्यावरणीय धारणा।
मानव-वन्यजीव संघर्ष (UPSC 2025)
- कारण — आवास-क्षरण और विखंडन (सड़क, रेल, खनन), गलियारों का टूटना, कृषि-विस्तार, जनसंख्या-घनत्व, फ़सल-पैटर्न (गन्ना — तेंदुए), कचरा (बंदर, भालू), वन्यजीव संख्या में सफल संरक्षण से वृद्धि, जलवायु परिवर्तन से जल-भोजन की कमी, आक्रामक प्रजातियाँ (लैंटाना) से चारे में कमी।
- परिणाम — मानव मृत्यु-घायल, फ़सल-पशुधन हानि, प्रतिशोधात्मक हत्याएँ, संरक्षण के प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति, मानसिक तनाव, आर्थिक हानि; भारत में हाथी और बाघ से हर वर्ष सैकड़ों मानव मृत्यु।
- निवारण — हाथी गलियारों का संरक्षण, पूर्व-चेतावनी (SMS, AI-कैमरे), मधुमक्खी-बाड़, सौर-बाड़, फ़सल-बीमा और त्वरित क्षतिपूर्ति, सामुदायिक "प्राथमिक प्रतिक्रिया दल", अपशिष्ट-प्रबंधन, भूमि-उपयोग नियोजन, PAVE-आधारित जागरूकता; राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष न्यूनीकरण रणनीति।
पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन का संयुक्त राष्ट्र दशक (UPSC 2025)
- क्या है — संयुक्त राष्ट्र महासभा (मार्च 2019) द्वारा घोषित 2021-2030 का दशक; नेतृत्व — UNEP और FAO; लक्ष्य — विश्व भर में क्षरित पारिस्थितिकी तंत्रों (वन, कृषि-भूमि, आर्द्रभूमि, पर्वत, महासागर, नगर) के क्षरण को रोकना और पुनर्स्थापित करना; "Generation Restoration"।
- पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक संतुलन — (1) भू-दृश्य दृष्टिकोण — संरक्षण और उत्पादन को एक साथ नियोजित करना; (2) कृषि-वानिकी और पुनर्योजी कृषि — मृदा-स्वास्थ्य सुधार से उत्पादकता बढ़ाना (खाद्य सुरक्षा); (3) पारिस्थितिक सेवाओं के लिए भुगतान; (4) स्थानीय और मूलनिवासी समुदायों की भूमिका और अधिकार; (5) हरित रोज़गार — नर्सरी, पुनर्वनीकरण; (6) प्रकृति-आधारित समाधान — मैंग्रोव से तटीय सुरक्षा और मत्स्य; (7) निजी वित्त; (8) 10 सिद्धांत — वैश्विक योगदान, व्यापक सहभागिता, अनेक लाभ, क्षरण के कारणों का समाधान, स्थानीय ज्ञान आदि।
- भारत — बॉन चैलेंज लक्ष्य (2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर), ग्रीन इंडिया मिशन, अरावली ग्रीन वॉल परियोजना (2025), MISHTI (मैंग्रोव, 2023), अमृत धरोहर (आर्द्रभूमि, 2023)।
- चुनौतियाँ — वित्त की कमी, एकल-वृक्षारोपण को "पुनर्स्थापन" कहना, भूमि-अधिकार विवाद, निगरानी।
अमेज़न और कांगो बेसिन में कृषि-जनित वनोन्मूलन (UPSC 2025)
- कारण — अमेज़न: पशुपालन (मवेशी चरागाह — सबसे बड़ा कारक), सोयाबीन, अवैध लकड़ी-कटाई, खनन, सड़कें (BR-163); कांगो: छोटे किसानों की स्थानांतरी कृषि और चारकोल, जनसंख्या-वृद्धि, लकड़ी, खनन।
- जैव-विविधता पर परिणाम — विश्व के सबसे समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्रों में प्रजाति-हानि, स्थानिक प्रजातियों का विलोपन, आवास-विखंडन (किनारा-प्रभाव), बड़े स्तनधारियों (गोरिल्ला, जगुआर) पर संकट, बीज-प्रसारकों की हानि।
- जलवायु-नियंत्रण पर परिणाम — (1) कार्बन-सिंक का कमज़ोर होना — अमेज़न के कुछ भाग अब कार्बन के शुद्ध स्रोत (गैटी और साथी, Nature, 2021); (2) जल-पुनर्चक्रण — वाष्पोत्सर्जन से "उड़ती नदियाँ" (flying rivers) दक्षिण अमेरिका की वर्षा का स्रोत — वनोन्मूलन से सूखा; (3) "टिपिंग पॉइंट" — 20-25% वनोन्मूलन पर अमेज़न के सवाना में बदलने की आशंका (लवजॉय और नोब्रे, 2018); (4) कांगो की पीटभूमि (कुवेत सेंट्रल — लगभग 29-30 अरब टन कार्बन) का क्षरण; (5) स्थानीय तापमान वृद्धि, वनाग्नि; (6) वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण पर प्रभाव।
- प्रयास — ब्राज़ील की PPCDAm नीति (2023 के बाद वनोन्मूलन में गिरावट), अमेज़न फ़ंड, REDD+, COP30 (बेलेम, ब्राज़ील, 2025) — "उष्णकटिबंधीय वन सदैव सुविधा" (TFFF) का प्रस्ताव।
कार्बन तटस्थता (UPSC 2024)
- अर्थ — मानवजनित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और अवशोषण (सिंक, CCS) का संतुलन — "नेट-ज़ीरो"; IPCC — 1.5°C के लिए 2050 के आसपास CO₂ नेट-ज़ीरो आवश्यक।
- क्यों आवश्यक — तापन को रोकने का एकमात्र मार्ग (संचयी उत्सर्जन ∝ तापमान), चरम घटनाओं-समुद्र-तल वृद्धि-जैव-विविधता हानि को सीमित करना, अंतर-पीढ़ीगत न्याय।
- राष्ट्रों के प्रयास — पेरिस समझौता (2015) और NDC; नेट-ज़ीरो लक्ष्य — यूरोपीय संघ 2050 (यूरोपीय जलवायु क़ानून, 2021), अमेरिका 2050, चीन 2060, भारत 2070; भूटान और सूरीनाम पहले से "कार्बन-नकारात्मक"; कार्बन बाज़ार (अनुच्छेद 6), कार्बन कर (स्वीडन), EU का CBAM; नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन (भारत — राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, 2023), इलेक्ट्रिक वाहन, वन-सिंक (REDD+), ऊर्जा दक्षता; भारत — 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता, उत्सर्जन-तीव्रता में 45% कमी (2005 की तुलना में), कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (2023)।
- चुनौतियाँ — विकास बनाम उत्सर्जन, जलवायु-वित्त (COP29 बाकू 2024 — 2035 तक प्रति वर्ष कम से कम 300 अरब डॉलर का नया लक्ष्य), तकनीक-हस्तांतरण, "ग्रीनवॉशिंग", ऑफ़सेट की गुणवत्ता।
9. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| हिंद महासागर | उल्टा Y कटक; नाइंटी ईस्ट; सुंडा गर्त; बंगाल पंखा | केर्गुएलन, रीयूनियन हॉटस्पॉट |
| तरंग-धारा-ज्वार | ऊर्जा बनाम जल-प्रवाह बनाम आवधिक उठान | फ़ंडी ~16 मी |
| समुद्र-तल | सुस्थैतिक, समस्थैतिक, विवर्तनिक, स्थानीय | AR6: ~0.20 मी (1901-2018), 3.7 मिमी/वर्ष |
| गहन-समुद्री खनन | UNCLOS 1982; ISA 1994; भारत — CIOB, डीप ओशन मिशन 2021 | लाभ बनाम अपरिवर्तनीय क्षति |
| मृदा | जेनी 1941 CLORPT; 97.85 Mha क्षरित (2021 एटलस) | रेंगती मृत्यु |
| जैव-विविधता | मायर्स 1988 (36, भारत 4); अक्षांशीय प्रवणता | रोहडे 1992 |
| सामाजिक वानिकी | राष्ट्रीय कृषि आयोग 1976 | यूकेलिप्टस विवाद |
| पुनर्स्थापन दशक | 2021-2030; UNEP-FAO | बॉन — 2.6 करोड़ हेक्टेयर |
| अमेज़न-कांगो | उड़ती नदियाँ; 20-25% टिपिंग पॉइंट; कांगो पीट | गैटी 2021 |
| कार्बन तटस्थता | EU 2050, चीन 2060, भारत 2070 | भूटान, सूरीनाम कार्बन-नकारात्मक |
10. चार्ट: हिंद महासागर का नितल (सरलीकृत)
11. Mind Map
- मग्नतट से गर्त
- हिंद महासागर
- तरंग-धारा-ज्वार
- समुद्र-तल परिवर्तन
- गहन-समुद्री खनन
- CLORPT
- अपरदन, संरक्षण
- हॉटस्पॉट, अक्षांशीय प्रवणता
- सामाजिक वानिकी
- पर्वतीय नाज़ुकता, PAVE
- मानव-वन्यजीव संघर्ष
- पुनर्स्थापन, अमेज़न-कांगो, नेट-ज़ीरो
12. महत्वपूर्ण One-liners
- महासागरों की औसत लवणता — ~35‰; सर्वाधिक लवणीय सागर (खुले सागरों में) — लाल सागर।
- विश्व का सबसे बड़ा पनडुब्बी पंखा — बंगाल पंखा।
- हिंद महासागर का सबसे गहरा भाग — सुंडा (जावा) गर्त।
- UNCLOS — 1982; ISA — 1994, किंग्स्टन; भारत का डीप ओशन मिशन — 2021।
- प्रवाल भित्तियों का अवतलन सिद्धांत — चार्ल्स डार्विन (1842)।
- मृदा निर्माण के कारक CLORPT — हांस जेनी (1941)।
- जैव-विविधता हॉटस्पॉट अवधारणा — नॉर्मन मायर्स (1988); भारत में 4।
- "सामाजिक वानिकी" शब्द — राष्ट्रीय कृषि आयोग (1976)।
- पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन दशक — 2021-2030 (UNEP-FAO)।
- "बायोफ़िलिया" — ई.ओ. विल्सन (1984)।
13. टिप्स एवं ट्रिक्स
- हिंद महासागर, धाराएँ, प्रवाल वितरण — मानचित्र अनिवार्य।
- पर्यावरण-प्रश्नों में अंतरराष्ट्रीय ढाँचा + भारत की पहल + स्थानीय उदाहरण — तीन स्तर।
- हाल की रिपोर्टें (IPCC AR6, ISRO एटलस 2021) और घटनाएँ (COP29, COP30) जोड़ें।
CLORPT — "जलवायु-जीव-उच्चावच-मूल-समय"; PAVE — "धारणा-अभिवृत्ति-मूल्य-भावना"; भारत के हॉटस्पॉट — "हि-इं-प-सु"।
14. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
गहन-समुद्री खनन क्या है? इससे जुड़े संभावित लाभ और जोखिम क्या हैं?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अर्थ और संसाधन: 200 मीटर से अधिक (प्रायः 4-6 किमी) गहराई से बहुधात्विक पिंड, सल्फ़ाइड, कोबाल्ट-पपड़ियों का निष्कर्षण।
शासन: UNCLOS 1982, ISA 1994, खनन संहिता लंबित; अमेरिका का 2025 का आदेश; भारत — CIOB (~75,000 वर्ग किमी), डीप ओशन मिशन, समुद्रयान।
लाभ: महत्वपूर्ण खनिज (ऊर्जा संक्रमण), आपूर्ति-शृंखला विविधीकरण, स्थल-खनन विस्थापन से बचाव, वैज्ञानिक ज्ञान।
जोखिम: अपरिवर्तनीय जैव-विविधता हानि, अवसाद-धूम्र, शोर-प्रकाश, कार्बन-भंडार, "डार्क ऑक्सीजन" जैसी अज्ञात प्रक्रियाएँ, शासन-शून्यता, मत्स्य।
आरेख: नितल पर संसाधनों के स्थान।
निष्कर्ष: सावधानी सिद्धांत, वैज्ञानिक आधार और अंतरराष्ट्रीय नियमन के बिना दोहन "भविष्य से उधार" होगा।
उपयुक्त रेखाचित्रों सहित हिंद महासागर की नितल-स्थलाकृति का विस्तृत वर्णन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: तीसरा सबसे बड़ा महासागर; प्लेट-विवर्तनिकी से जटिल नितल।
स्थलरूप: मध्य-हिंद कटक (उल्टा Y — कार्ल्सबर्ग, मध्य, द.प., द.पू.; रोड्रिग्स त्रि-संधि); नाइंटी ईस्ट कटक (भूकंप-रहित, केर्गुएलन हॉटस्पॉट); चागोस-लक्षद्वीप कटक (रीयूनियन हॉटस्पॉट); सुंडा गर्त; द्रोणियाँ; केर्गुएलन-मस्करीन पठार; बंगाल-सिंधु पंखे; मग्नतट की चौड़ाई; द्वीप-प्रकार।
रेखाचित्र: कटक-गर्त-द्रोणी का मानचित्र (ऊपर चार्ट जैसा) और अनुप्रस्थ काट।
महत्व: बहुधात्विक पिंड (CIOB), तेल (बॉम्बे हाई), सुनामी-जोखिम (सुंडा), सामरिक महत्व।
निष्कर्ष: हिंद महासागर का नितल भारतीय प्लेट की उत्तर-यात्रा का "भूवैज्ञानिक अभिलेख" है।
जैव-विविधता और जलवायु-नियंत्रण के विशेष संदर्भ में अमेज़न और कांगो बेसिन में कृषि-जनित वनोन्मूलन के पारिस्थितिक परिणाम क्या हैं?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
कारण: अमेज़न — पशुपालन, सोया, लकड़ी, खनन, सड़कें; कांगो — छोटे किसान, चारकोल, जनसंख्या, लकड़ी।
जैव-विविधता: प्रजाति-हानि, स्थानिक विलोपन, विखंडन-किनारा प्रभाव, बड़े स्तनधारी, बीज-प्रसारक।
जलवायु-नियंत्रण: कार्बन-सिंक का कमज़ोर होना (गैटी 2021 — शुद्ध स्रोत), उड़ती नदियाँ और वर्षा-पुनर्चक्रण, टिपिंग पॉइंट (लवजॉय-नोब्रे 2018), कांगो पीट (~29-30 अरब टन), स्थानीय तापन-वनाग्नि, वैश्विक परिसंचरण।
तुलना: अमेज़न — औद्योगिक कृषि, कांगो — निर्धनता-जनित; नीति-उपाय भिन्न होने चाहिए।
प्रयास: PPCDAm, अमेज़न फ़ंड, REDD+, COP30 का TFFF।
निष्कर्ष: ये वर्षावन पृथ्वी के "फेफड़े" से अधिक उसके "जलवायु-नियामक" हैं — इनका संरक्षण वैश्विक सार्वजनिक हित है।
"मृदा अपरदन रेंगती मृत्यु है।" इस कथन की व्याख्या करते हुए विभिन्न मृदा संरक्षण उपाय सुझाइए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
व्याख्या: धीमा, अदृश्य पर निरंतर क्षरण; निर्माण में सदियाँ, विनाश में वर्ष; उत्पादकता-गिरावट, मरुस्थलीकरण, गाद, खाद्य असुरक्षा — "धीमी मृत्यु"; डस्ट बाउल।
भारत: ISRO एटलस (2021) — ~97.85 Mha (~29.7%) क्षरित; चंबल बीहड़, शिवालिक चो, झूम।
प्रकार और कारण: जल, पवन; वनोन्मूलन, अति-चराई, ढलान-कृषि, खनन।
उपाय: कृषि-विधियाँ (समोच्च, पट्टीदार, सीढ़ीदार, पलवार, शून्य-जुताई); यांत्रिक (मेड़बंदी, चेक-डैम, अवनालिका-प्लगिंग); जैविक (वनीकरण, वेटिवर, आश्रय-पट्टियाँ, कृषि-वानिकी); चराई-नियंत्रण; जलागम प्रबंधन (रालेगण सिद्धि); नीतियाँ (मृदा स्वास्थ्य कार्ड, PMKSY, बॉन चैलेंज)।
निष्कर्ष: मृदा "नवीकरणीय नहीं" संसाधन है — उसका संरक्षण खाद्य और जलवायु सुरक्षा का आधार।
"प्रजाति-समृद्धि की अक्षांशीय प्रवणता जैव-विविधता की एक महत्वपूर्ण भौगोलिक प्रवृत्ति है।" कथन का परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
प्रवृत्ति: विषुवत् से ध्रुवों की ओर प्रजाति-समृद्धि में कमी — सबसे व्यापक भौगोलिक प्रतिरूप।
व्याख्याएँ: ऊर्जा-उत्पादकता; समय-क्षेत्र; जलवायु स्थिरता; विकास-गति (रोहडे 1992); निकेत रूढ़िवाद; जैविक अंतःक्रियाएँ; मध्य-डोमेन प्रभाव।
अपवाद: पेंगुइन, कुछ समुद्री वर्ग, एफ़िड, शंकुधारी।
महत्व: संरक्षण-प्राथमिकता; जलवायु परिवर्तन से प्रजाति-खिसकाव।
आरेख: अक्षांश बनाम प्रजाति-संख्या का वक्र।
निष्कर्ष: कथन सही — पर एक कारक नहीं, अनेक कारकों का संयुक्त परिणाम।
भविष्य के पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्बन तटस्थता कैसे आवश्यक है? इस संबंध में राष्ट्रों द्वारा किए गए विभिन्न प्रयासों का वर्णन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अर्थ: उत्सर्जन = अवशोषण (नेट-ज़ीरो)।
आवश्यकता: संचयी उत्सर्जन और तापमान का सीधा संबंध; 1.5°C हेतु ~2050 तक CO₂ नेट-ज़ीरो (IPCC); चरम घटनाएँ, समुद्र-तल, जैव-विविधता; अंतर-पीढ़ीगत न्याय।
प्रयास: पेरिस-NDC; EU 2050, अमेरिका 2050, चीन 2060, भारत 2070; भूटान-सूरीनाम कार्बन-नकारात्मक; कार्बन बाज़ार और कर, CBAM; नवीकरणीय, हरित हाइड्रोजन, EV, REDD+; भारत — 500 GW, 45% तीव्रता-कमी, CCTS 2023।
चुनौतियाँ: विकास बनाम उत्सर्जन, वित्त (COP29 — $300 अरब), तकनीक, ग्रीनवॉशिंग।
निष्कर्ष: कार्बन तटस्थता "विकल्प" नहीं, जीवित रहने की शर्त — "साझा पर विभेदित उत्तरदायित्व" के साथ।
समुद्री तरंग, समुद्री धारा और ज्वार-भाटा में मौलिक अंतर क्या हैं?
मॉडल उत्तर
अंतर (तालिका): गति का स्वरूप (ऊर्जा-संचरण / क्षैतिज जल-प्रवाह / आवधिक उठान); कारण (पवन / पवन-घनत्व-कोरिओलिस / चंद्र-सूर्य गुरुत्व); नियमितता; प्रभाव-क्षेत्र; महत्व।
उदाहरण: सुनामी; गल्फ़ स्ट्रीम; फ़ंडी और खंभात के ज्वार।
उपयुक्त उदाहरणों सहित समुद्र-तल परिवर्तन के कारकों की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर
कारक: सुस्थैतिक (हिमनद, तापीय प्रसार, विवर्तनिक-सुस्थैतिक); समस्थैतिक (पश्च-हिमनदीय पुनरुत्थान — स्कैंडिनेविया); विवर्तनिक (2004 अंडमान); स्थानीय धँसाव (जकार्ता)।
साक्ष्य: रिया, फ़्योर्ड, उत्थित पुलिन, द्वारका।
वर्तमान: AR6 — ~0.20 मी (1901-2018), 3.7 मिमी/वर्ष; प्रभाव — सुंदरबन, मालदीव।
"पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन का संयुक्त राष्ट्र दशक" क्या है? यह पारिस्थितिक लक्ष्यों को खाद्य सुरक्षा और विकास जैसी उभरती सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं के साथ कैसे संतुलित करता है?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
क्या है: 2021-2030; UNGA (मार्च 2019); UNEP-FAO; सभी पारिस्थितिकी तंत्रों का पुनर्स्थापन; 10 सिद्धांत।
संतुलन: भू-दृश्य दृष्टिकोण; कृषि-वानिकी और पुनर्योजी कृषि (खाद्य सुरक्षा); पारिस्थितिक सेवाओं के लिए भुगतान; समुदाय-अधिकार; हरित रोज़गार; प्रकृति-आधारित समाधान (मैंग्रोव); निजी वित्त।
भारत: बॉन लक्ष्य, ग्रीन इंडिया मिशन, अरावली ग्रीन वॉल, MISHTI, अमृत धरोहर।
चुनौतियाँ: वित्त, एकल-वृक्षारोपण, भूमि-अधिकार, निगरानी।
निष्कर्ष: पुनर्स्थापन "संरक्षण बनाम विकास" नहीं, "संरक्षण के माध्यम से विकास" का मार्ग है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष निरंतर बढ़ रहे हैं। इसके कारणों, परिणामों और निवारण के उपायों की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
कारण: आवास-क्षरण-विखंडन, गलियारे टूटना, कृषि-विस्तार, फ़सल-पैटर्न, कचरा, संरक्षण-सफलता से संख्या-वृद्धि, जलवायु परिवर्तन, आक्रामक प्रजातियाँ।
परिणाम: मानव मृत्यु-हानि, फ़सल-पशुधन हानि, प्रतिशोधी हत्याएँ, संरक्षण-विरोधी अभिवृत्ति।
निवारण: गलियारे, पूर्व-चेतावनी, मधुमक्खी-सौर बाड़, बीमा-क्षतिपूर्ति, प्रतिक्रिया दल, अपशिष्ट-प्रबंधन, भूमि-उपयोग नियोजन, PAVE-आधारित जागरूकता।
15. Quick Revision Summary
- नितल — मग्नतट से गर्त; हिंद महासागर (कटक, गर्त, द्रोणी, पंखे)।
- जल — तापमान, लवणता; तरंग-धारा-ज्वार अंतर; धाराएँ; समुद्र-तल परिवर्तन; प्रवाल।
- संसाधन — गहन-समुद्री खनन (लाभ-जोखिम, ISA, भारत)।
- मृदा — CLORPT, वर्गीकरण, अपरदन ("रेंगती मृत्यु") और संरक्षण।
- जैव — बायोम, हॉटस्पॉट, अक्षांशीय प्रवणता, सामाजिक वानिकी।
- पर्यावरण — पर्वतीय नाज़ुकता, PAVE, मानव-वन्यजीव संघर्ष, पुनर्स्थापन दशक, अमेज़न-कांगो, कार्बन तटस्थता।