1. अध्याय एक नज़र में
Paper I Section B के चार units इस अध्याय में हैं — Principal Organs of the Union Government (कार्यपालिका, विधायिका, सर्वोच्च न्यायालय), Principal Organs of the State Government, Grassroots Democracy (पंचायती राज और नगर निकाय), Statutory Institutions/Commissions तथा Federalism। 2023 में संघवाद की केंद्रीकरण प्रवृत्ति, सर्वोच्च न्यायालय का "नीति-विकास का मंच" बनना, 74वाँ संशोधन, ज़िला योजना समिति और अल्पसंख्यक आयोग; 2024 में विधान परिषद की प्रासंगिकता, राष्ट्रीय महिला आयोग और ग्राम सभा पूछे गए।
- संवैधानिक अनुच्छेद + महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय + आयोगों की सिफ़ारिशें (सरकारिया, पुंछी, ARC)।
- विद्वानों की व्याख्या — के.सी. व्हेयर ("quasi-federal"), ग्रैनविल ऑस्टिन ("cooperative federalism"), मॉरिस-जोन्स ("bargaining federalism"), रजनी कोठारी ("Congress system")।
- समकालीन उदाहरण — GST परिषद, राज्यपाल-राज्य टकराव, कॉलेजियम बहस।
2. संघीय कार्यपालिका
राष्ट्रपति
- अनु. 52-62; निर्वाचन — संसद और राज्य विधानसभाओं (दिल्ली, पुडुचेरी सहित) के निर्वाचित सदस्यों से बना निर्वाचक मंडल, आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति।
- संवैधानिक प्रधान — अनु. 74(1): मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य; 42वाँ संशोधन — सलाह बाध्यकारी; 44वाँ संशोधन — एक बार पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं।
- विवेकाधिकार के क्षेत्र — त्रिशंकु लोकसभा में प्रधानमंत्री की नियुक्ति, विश्वास खो चुकी सरकार की लोकसभा भंग करने की सलाह, पॉकेट वीटो (1986 — ज़ैल सिंह, डाक विधेयक)।
- अध्यादेश (अनु. 123) — डी.सी. वाधवा (1987): पुनः-प्रख्यापन संविधान के साथ धोखा; कृष्ण कुमार सिंह (2017) — विधायिका के समक्ष न रखना भी दुरुपयोग।
प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल
- "समानों में प्रथम" (primus inter pares) से "मंत्रिमंडल प्रणाली के केंद्र" तक; जेनिंग्स — "sun around which planets revolve"।
- प्रधानमंत्री की भूमिका के निर्धारक — दलीय बहुमत (एकदलीय बनाम गठबंधन), व्यक्तित्व, PMO की संस्थागत शक्ति, मीडिया-केंद्रित चुनाव ("presidentialisation" — पोगुंत्के और वेब)।
- संघीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री (PYQ विषय) — नीति आयोग का अध्यक्ष, अंतरराज्यीय परिषद का अध्यक्ष, GST परिषद पर अप्रत्यक्ष प्रभाव; गठबंधन युग (1989-2014) में क्षेत्रीय दलों से सौदेबाज़ी।
- 91वाँ संशोधन (2003) — मंत्रिपरिषद का आकार लोकसभा का 15%।
3. संसद
- भूमिका — विधि-निर्माण, कार्यपालिका पर नियंत्रण (प्रश्नकाल, शून्यकाल, स्थगन प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, समितियाँ), वित्तीय नियंत्रण, विचार-विमर्श, प्रतिनिधित्व।
- संसद का पतन (Decline of Parliament) की बहस — बैठकों के दिनों में कमी, विधेयकों का समितियों को न भेजा जाना, धन विधेयक मार्ग का प्रयोग (आधार अधिनियम 2016 — पुट्टस्वामी 2018 में बहुमत ने स्वीकारा, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की असहमति), व्यवधान, दलबदल-विरोधी क़ानून (52वाँ संशोधन 1985, 10वीं अनुसूची) से सांसद की स्वतंत्रता घटी।
- सुधार — PRS जैसी संस्थाओं की सिफ़ारिशें: न्यूनतम बैठक दिन, विधेयकों का अनिवार्य समिति-परीक्षण, विपक्ष दिवस।
विधान परिषद की प्रासंगिकता (UPSC 2024)
- अनु. 169 — संसद, राज्य विधानसभा के विशेष बहुमत प्रस्ताव पर, परिषद का सृजन/उन्मूलन कर सकती है। अभी 6 राज्यों में — आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश।
- पक्ष — विचारशील "दूसरा सदन", विशेषज्ञों-शिक्षकों-स्नातकों का प्रतिनिधित्व, जल्दबाज़ी के क़ानूनों पर रोक।
- विपक्ष — केवल विलंबकारी (धन विधेयक 14 दिन, साधारण विधेयक अधिकतम 4 माह), हारे नेताओं का "पुनर्वास केंद्र", ख़र्चीली; विभिन्न राज्यों में असमान स्थिति (आंध्र प्रदेश ने 2020 में उन्मूलन प्रस्ताव पारित कर बाद में वापस लिया)।
- निष्कर्ष — स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की उपयोगिता बढ़ाकर, एकरूप राष्ट्रीय नीति बनाकर ही प्रासंगिक।
4. सर्वोच्च न्यायालय और न्यायिक सक्रियता
- क्षेत्राधिकार — मूल (अनु. 131 — संघ-राज्य विवाद), रिट (अनु. 32), अपीलीय (132-136), परामर्शी (अनु. 143), पुनर्विलोकन (137), उपचारात्मक याचिका (रूपा हुर्रा 2002)।
- न्यायाधीशों की नियुक्ति — प्रथम न्यायाधीश मामला (एस.पी. गुप्ता 1981), द्वितीय (1993) — कॉलेजियम का उदय, तृतीय (1998) — 5 सदस्यीय कॉलेजियम; 99वाँ संशोधन और NJAC — 2015 में असंवैधानिक घोषित (चतुर्थ न्यायाधीश मामला)।
- न्यायिक सक्रियता — PIL (हुसैनारा ख़ातून 1979, एम.सी. मेहता मामले, विशाखा 1997 — दिशानिर्देश), "continuing mandamus" (विनीत नारायण 1997)।
- सर्वोच्च न्यायालय — नीति-विकास का मंच? (UPSC 2023) — पक्ष: वन संरक्षण (गोदावर्मन), भोजन का अधिकार (PUCL 2001 → मिड-डे मील, NFSA), दिल्ली में CNG, चुनाव सुधार (ADR 2002 — उम्मीदवारों का घोषणापत्र; चुनावी बॉन्ड योजना असंवैधानिक — ADR बनाम भारत संघ, फ़रवरी 2024), ट्रांसजेंडर अधिकार (NALSA 2014)। विपक्ष: शक्ति-पृथक्करण का उल्लंघन, जवाबदेही का अभाव ("judicial overreach"), विशेषज्ञता की कमी, क्रियान्वयन की कठिनाई; उपेंद्र बक्सी — "judicial populism", प्रताप भानु मेहता — "the rise of judicial sovereignty"।
5. राज्य सरकार के प्रमुख अंग
- राज्यपाल (अनु. 153-162) — केंद्र द्वारा नियुक्त, "प्रसादपर्यंत" पद; दोहरी भूमिका — संवैधानिक प्रधान और केंद्र का एजेंट।
- विवाद — अनु. 356 का दुरुपयोग (एस.आर. बोम्मई 1994: बहुमत का परीक्षण सदन में, न्यायिक पुनरावलोकन संभव), विधेयकों पर अनिश्चितकालीन रोक — तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल (अप्रैल 2025) में दो न्यायाधीशों की पीठ ने समयसीमा तय कर रोके गए विधेयकों को "deemed assent" दिया; इसके बाद राष्ट्रपति के अनु. 143 संदर्भ पर संविधान पीठ (नवंबर 2025) ने राय दी कि न्यायालय राज्यपाल/राष्ट्रपति पर कठोर समयसीमा नहीं थोप सकते और "deemed assent" स्वीकार्य नहीं, यद्यपि अनिश्चितकालीन निष्क्रियता पर सीमित न्यायिक हस्तक्षेप संभव है; विश्वविद्यालयों में कुलाधिपति की भूमिका।
- सिफ़ारिशें — सरकारिया आयोग (1988): राज्यपाल सक्रिय राजनीति से न हो, मुख्यमंत्री से परामर्श; पुंछी आयोग (2010): निश्चित कार्यकाल, महाभियोग जैसी हटाने की प्रक्रिया, "स्थानीयकृत आपातकाल"।
- मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद, मुख्य सचिव — राज्य स्तर पर संसदीय प्रणाली का दर्पण।
6. ज़मीनी लोकतंत्र (Grassroots Democracy)
| चरण | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| बलवंत राय मेहता समिति (1957) | त्रि-स्तरीय पंचायती राज; "democratic decentralisation"; राजस्थान (नागौर, 2 अक्टूबर 1959) पहला राज्य |
| अशोक मेहता समिति (1978) | द्वि-स्तरीय (ज़िला परिषद, मंडल पंचायत); दलों की भागीदारी |
| जी.वी.के. राव (1985), एल.एम. सिंघवी (1986) | ज़िला को केंद्र बनाना; संवैधानिक दर्जा |
| 73वाँ संशोधन (1992, लागू 24 अप्रैल 1993) | भाग IX, अनु. 243-243O, 11वीं अनुसूची (29 विषय); ग्राम सभा; हर 5 वर्ष चुनाव; SC/ST आरक्षण, महिलाओं को 1/3 (कई राज्यों में 50%); राज्य चुनाव आयोग, राज्य वित्त आयोग |
| 74वाँ संशोधन (1992, लागू 1 जून 1993) | भाग IXA, अनु. 243P-243ZG, 12वीं अनुसूची (18 विषय); नगर पंचायत, नगर परिषद, नगर निगम; वार्ड समितियाँ; ज़िला योजना समिति (243ZD), महानगर योजना समिति (243ZE) |
| PESA (1996) | पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्राम सभा को लघु वनोपज, भूमि अधिग्रहण पर परामर्श, शराब नियंत्रण जैसी शक्तियाँ |
- ग्राम सभा (UPSC 2024) — अनु. 243(b), 243A; गाँव के सभी पंजीकृत मतदाता; लाभार्थी चयन, सामाजिक अंकेक्षण (MGNREGA धारा 17), योजना अनुमोदन; नियमगिरि मामला (2013 — ओडिशा माइनिंग कॉर्पोरेशन) में ग्राम सभाओं ने वेदांता खनन परियोजना अस्वीकार की — "प्रत्यक्ष लोकतंत्र" का उदाहरण। सीमाएँ — कम उपस्थिति, अभिजन वर्चस्व, "सरपंच-पति" प्रवृत्ति, धन-कार्य-कार्मिक (3F) का अभाव।
- ज़िला योजना समिति के कार्य (UPSC 2023) — पंचायतों और नगर निकायों की योजनाओं का समेकन, ज़िले के लिए प्रारूप विकास योजना; सदस्यों का कम से कम 4/5 भाग निर्वाचित (ग्रामीण-शहरी जनसंख्या के अनुपात में); कई राज्यों में निष्क्रिय या मंत्री-अध्यक्षता से नौकरशाहीकृत।
- 74वाँ संशोधन — "अधूरा सपना"? (UPSC 2023) — 12वीं अनुसूची के कार्य पूरी तरह हस्तांतरित नहीं; पैरास्टेटल एजेंसियाँ (विकास प्राधिकरण) शक्तियाँ अपने पास रखती हैं; कमज़ोर महापौर; राज्य वित्त आयोगों की सिफ़ारिशें लागू नहीं; चुनावों में विलंब; नगर निकायों का अपना राजस्व GDP का बहुत छोटा हिस्सा (RBI की 2022 की नगर-वित्त रिपोर्ट ने भी इसे विकासशील और विकसित देशों की तुलना में अत्यंत कम बताया)। सकारात्मक — महिला-SC प्रतिनिधित्व, स्मार्ट सिटी, AMRUT, 15वें वित्त आयोग के अनुदान।
7. सांविधिक संस्थाएँ / आयोग
| संस्था | आधार | संरचना और कार्य | सीमाएँ |
|---|---|---|---|
| चुनाव आयोग | संवैधानिक, अनु. 324 | मुख्य चुनाव आयुक्त + 2 आयुक्त; अनूप बरनवाल (2023) — चयन समिति; मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम 2023 | आदर्श आचार संहिता का वैधानिक आधार नहीं |
| CAG | संवैधानिक, अनु. 148 | संसद का "मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक"; प्रदर्शन अंकेक्षण | पूर्व-अंकेक्षण का अधिकार नहीं |
| वित्त आयोग | संवैधानिक, अनु. 280 | कर-हस्तांतरण; 15वाँ आयोग — 41%; 16वाँ आयोग (अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया) 2026-31 के लिए | उपकर-अधिभार बाँटने योग्य पूल से बाहर |
| राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग | सांविधिक, 1993 अधिनियम | अध्यक्ष — पूर्व CJI या SC न्यायाधीश; सिफ़ारिशी शक्ति | "दंतहीन बाघ"; सशस्त्र बलों पर सीमित |
| राष्ट्रीय महिला आयोग | सांविधिक, NCW अधिनियम 1990 (गठन जनवरी 1992) | अध्यक्ष + 5 सदस्य + सदस्य-सचिव (SC/ST से एक-एक सदस्य अनिवार्य); क़ानूनों की समीक्षा, शिकायत-जाँच, दीवानी न्यायालय की शक्तियाँ | सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं; नियुक्ति में राजनीतिक प्रभाव |
| राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग | सांविधिक, NCM अधिनियम 1992 | 6 अधिसूचित अल्पसंख्यक — मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी, जैन (2014); सुरक्षा उपायों की निगरानी | संवैधानिक दर्जा नहीं |
| राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग | संवैधानिक, अनु. 338, 338A (89वाँ संशोधन 2003) | सुरक्षा उपायों की जाँच | संसाधनों की कमी |
| राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग | संवैधानिक, अनु. 338B (102वाँ संशोधन 2018) | OBC हितों की रक्षा; 105वाँ संशोधन (2021) — राज्यों को OBC सूची का अधिकार पुनः | — |
8. संघवाद (Federalism)
संवैधानिक प्रावधान
- अनु. 1 — "भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ (Union of States) होगा" — आंबेडकर: संघ राज्यों के समझौते का परिणाम नहीं, इसलिए राज्य अलग नहीं हो सकते — "indestructible union of destructible states"।
- सातवीं अनुसूची — संघ (मूलतः 97 विषय), राज्य (66), समवर्ती (47) सूचियाँ; अवशिष्ट शक्ति केंद्र में (अनु. 248)।
- एकात्मक झुकाव — एकल नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, अखिल भारतीय सेवाएँ, अनु. 3 (राज्यों की सीमाएँ बदलना), अनु. 249, 252, 356, 365, आपात प्रावधान, राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व, राज्यपाल।
- के.सी. व्हेयर — "quasi-federal"; आइवर जेनिंग्स — "federation with a strong centralising tendency"; ग्रैनविल ऑस्टिन — "cooperative federalism"; मॉरिस-जोन्स — "bargaining federalism"; एस.आर. बोम्मई (1994) — संघवाद मूल ढाँचे का भाग।
संघवाद का विकास
| चरण | प्रवृत्ति |
|---|---|
| 1950–67 | कांग्रेस प्रणाली में केंद्रीकृत, दल के भीतर सौदेबाज़ी; भाषायी राज्यों का पुनर्गठन (1956) |
| 1967–89 | गैर-कांग्रेसी राज्य सरकारें, टकराव; अनु. 356 का भारी प्रयोग; राजमन्नार समिति (1969), आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973) |
| 1989–2014 | गठबंधन युग — क्षेत्रीय दलों की केंद्रीय भूमिका; "federalisation of party system"; बोम्मई से 356 पर अंकुश; 1991 के बाद "market-preserving federalism" — राज्यों में निवेश प्रतिस्पर्धा |
| 2014 के बाद | एकदलीय बहुमत, "सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद" (नीति आयोग); GST (101वाँ संशोधन 2016) — "pooled sovereignty"; अनु. 370 हटाना (2019, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन — सर्वोच्च न्यायालय ने दिसंबर 2023 में वैध माना); कर-हस्तांतरण बढ़ा पर उपकर-अधिभार का हिस्सा भी बढ़ा |
केंद्रीकरण की प्रवृत्तियाँ (UPSC 2023)
- हाँ, केंद्रीकरण — राज्यपाल-राज्य टकराव, केंद्रीय एजेंसियों (CBI, ED) का प्रयोग, केंद्र प्रायोजित योजनाएँ, समवर्ती सूची विषयों पर केंद्रीय क़ानून (कृषि क़ानून 2020 — बाद में वापस), GST परिषद में केंद्र का 1/3 वोट।
- नहीं, संतुलन — 14वें-15वें वित्त आयोग से उच्च हस्तांतरण, GST परिषद में सहमति से निर्णय, क्षेत्रीय दलों का सशक्त होना, न्यायालयों का संघवाद-संरक्षण (GST परिषद की सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं — मोहित मिनरल्स 2022; राज्यपाल की निष्क्रियता पर तमिलनाडु निर्णय 2025 और उसके बाद की संविधान पीठ की राय), "aspirational districts" जैसे सहकारी कार्यक्रम।
- निष्कर्ष — भारतीय संघवाद "संदर्भ-आधारित" (contextual) है: राजनीतिक दलीय स्वरूप के साथ उसकी दिशा बदलती है; "asymmetric federalism" (अनु. 371, छठी अनुसूची) इसकी विशेषता।
9. चार्ट: शक्ति का बँटवारा
10. Master Summary Table
| संस्था / विषय | संवैधानिक आधार | प्रमुख निर्णय / समिति | परीक्षा-उपयोगी बिंदु |
|---|---|---|---|
| राष्ट्रपति | अनु. 52-74 | शमशेर सिंह (1974) | संवैधानिक प्रधान, सीमित विवेक |
| प्रधानमंत्री | अनु. 74-75 | — | presidentialisation, PMO |
| संसद | अनु. 79-122 | पुट्टस्वामी (आधार, धन विधेयक) | संसद का पतन, समितियाँ |
| सर्वोच्च न्यायालय | अनु. 124-147 | NJAC (2015), ADR (2024) | न्यायिक सक्रियता बनाम अतिक्रमण |
| राज्यपाल | अनु. 153-162, 200, 356 | बोम्मई (1994), तमिलनाडु (2025) | सरकारिया, पुंछी |
| पंचायती राज | भाग IX, 73वाँ संशोधन | नियमगिरि (2013) | ग्राम सभा, 3F |
| नगर निकाय | भाग IXA, 74वाँ संशोधन | — | DPC, MPC, "अधूरा सपना" |
| संघवाद | अनु. 1, 246, 7वीं अनुसूची | बोम्मई; मोहित मिनरल्स (2022) | quasi-federal, cooperative, bargaining |
11. Mind Map
- राष्ट्रपति — अनु. 74
- प्रधानमंत्री, PMO
- संसद — नियंत्रण, पतन
- सर्वोच्च न्यायालय — PIL
- राज्यपाल — दोहरी भूमिका
- विधान परिषद — अनु. 169
- मुख्यमंत्री
- 73वाँ, 74वाँ संशोधन
- ग्राम सभा, PESA
- DPC, MPC
- EC, CAG, वित्त आयोग
- NHRC, NCW, NCM
- NCSC, NCST, NCBC
- quasi-federal (व्हेयर)
- सहकारी/प्रतिस्पर्धी
- GST, अनु. 356, राज्यपाल
12. महत्वपूर्ण One-liners
- "Quasi-federal" — के.सी. व्हेयर; "Cooperative federalism" — ग्रैनविल ऑस्टिन; "Bargaining federalism" — मॉरिस-जोन्स।
- "Indestructible union of destructible states" — भारतीय संघ (आंबेडकर की व्याख्या के आधार पर)।
- अनु. 356 पर अंकुश, संघवाद मूल ढाँचा — एस.आर. बोम्मई (1994)।
- पॉकेट वीटो का प्रयोग — ज़ैल सिंह (भारतीय डाक संशोधन विधेयक, 1986)।
- NJAC असंवैधानिक — 2015 (चतुर्थ न्यायाधीश मामला)।
- चुनावी बॉन्ड योजना असंवैधानिक — ADR बनाम भारत संघ, फ़रवरी 2024।
- पहला पंचायती राज — नागौर, राजस्थान, 2 अक्टूबर 1959।
- ज़िला योजना समिति — अनु. 243ZD; महानगर योजना समिति — 243ZE।
- GST — 101वाँ संशोधन (2016), GST परिषद — अनु. 279A।
- राष्ट्रीय महिला आयोग — NCW अधिनियम 1990; अल्पसंख्यक आयोग — NCM अधिनियम 1992।
13. टिप्स एवं ट्रिक्स
- आधार — अनुच्छेद/अधिनियम, वर्ष।
- संरचना — सदस्य, नियुक्ति, कार्यकाल।
- कार्य और शक्तियाँ।
- प्रदर्शन का मूल्यांकन — उपलब्धियाँ, सीमाएँ, उदाहरण।
- सुधार — आयोग/समिति की सिफ़ारिशें।
पंचायतों की कमी "3F" — Funds, Functions, Functionaries; संघवाद के विद्वान "व्हे-ऑ-मॉ" — व्हेयर (quasi), ऑस्टिन (cooperative), मॉरिस-जोन्स (bargaining)।
14. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
क्या भारतीय संघवाद की वास्तविक कार्यप्रणाली भारतीय राजव्यवस्था की केंद्रीकरण प्रवृत्तियों के अनुरूप है? कारण सहित उत्तर दीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: भारतीय संविधान ने "राज्यों का संघ" बनाया जिसमें एकात्मक झुकाव जानबूझकर रखा गया — विभाजन, रियासतों के विलय और विकास की आवश्यकता के कारण।
केंद्रीकरण के पक्ष में तर्क: संवैधानिक — अवशिष्ट शक्ति, अनु. 3, 249, 356, आपात प्रावधान; राजनीतिक — कांग्रेस प्रणाली (1950-67), 2014 के बाद एकदलीय बहुमत; वित्तीय — उपकर-अधिभार में वृद्धि, केंद्र प्रायोजित योजनाएँ; प्रशासनिक — अखिल भारतीय सेवाएँ, केंद्रीय एजेंसियाँ; राज्यपाल के विवाद।
विपरीत प्रवृत्तियाँ: क्षेत्रीय दलों का उदय और गठबंधन युग; बोम्मई निर्णय; 14वें-15वें वित्त आयोग का उच्च हस्तांतरण; GST परिषद में सहमति; 73वें-74वें संशोधन से तीसरा स्तर; न्यायालयों का संघवाद-संरक्षण (मोहित मिनरल्स 2022; राज्यपाल की भूमिका पर 2025 के निर्णय और राष्ट्रपति संदर्भ पर राय)।
विश्लेषण: भारतीय संघवाद "पेंडुलम" की तरह है — केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण के बीच दलीय व्यवस्था के अनुसार झूलता है; विद्वान इसे "contextual" या "asymmetric" संघवाद कहते हैं।
निष्कर्ष: संवैधानिक ढाँचा केंद्रीकरण के अनुकूल है, पर वास्तविक कार्यप्रणाली लोकतांत्रिक राजनीति, न्यायपालिका और सहकारी संस्थाओं के कारण संतुलन खोजती रहती है; अंतरराज्यीय परिषद को सक्रिय करना और पुंछी आयोग की सिफ़ारिशें लागू करना आगे का मार्ग है।
74वें संविधान संशोधन अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों की चर्चा कीजिए। क्या आप मानते हैं कि यह अधिनियम एक "अधूरा सपना" बना हुआ है?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
प्रमुख प्रावधान: भाग IXA; तीन प्रकार के नगर निकाय; प्रत्यक्ष चुनाव, 5 वर्ष का कार्यकाल, भंग होने पर 6 माह में चुनाव; SC/ST और महिलाओं (1/3) को आरक्षण; वार्ड समितियाँ (3 लाख+ जनसंख्या); राज्य चुनाव आयोग और राज्य वित्त आयोग; 12वीं अनुसूची के 18 कार्य; DPC (243ZD) और MPC (243ZE)।
"अधूरा सपना" के तर्क: 12वीं अनुसूची के कार्य राज्य की इच्छा पर — अनेक कार्य अब भी पैरास्टेटल्स के पास; कमज़ोर, अल्प-कार्यकाल वाले महापौर; राज्य वित्त आयोगों की सिफ़ारिशों की उपेक्षा; नगर निकायों का अपना राजस्व बहुत कम; चुनावों में विलंब; DPC-MPC निष्क्रिय; स्मार्ट सिटी SPV ने निर्वाचित निकायों को दरकिनार किया।
उपलब्धियाँ: लाखों महिला और SC/ST प्रतिनिधि; कुछ नगरों में participatory budgeting (पुणे); 15वें वित्त आयोग के प्रत्यक्ष अनुदान; संपत्ति कर सुधार।
आगे का मार्ग: "3F" का वास्तविक हस्तांतरण, प्रत्यक्ष निर्वाचित सशक्त महापौर (2nd ARC), नगर-कैडर, म्युनिसिपल बॉन्ड, नागरिक भागीदारी।
निष्कर्ष: 74वाँ संशोधन ढाँचा तो देता है पर आत्मा अधूरी है — तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण (2036 तक लगभग 40% शहरी जनसंख्या का अनुमान) में सशक्त शहरी स्वशासन अनिवार्य है।
क्या आप सहमत हैं कि वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय नीति-विकास का मंच बन गया है? अपने उत्तर का औचित्य दीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: 1980 के बाद PIL और अनु. 21 के विस्तार ने सर्वोच्च न्यायालय को अधिकारों के संरक्षक से आगे नीति-निर्माण में सहभागी बना दिया।
पक्ष — उदाहरण: विशाखा दिशानिर्देश (कार्यस्थल यौन उत्पीड़न — बाद में 2013 का क़ानून), भोजन का अधिकार (मिड-डे मील, NFSA), पर्यावरण (CNG, वन संरक्षण), पुलिस सुधार (प्रकाश सिंह 2006), चुनाव पारदर्शिता, ट्रांसजेंडर अधिकार, निजता (पुट्टस्वामी)।
कारण: विधायिका-कार्यपालिका की निष्क्रियता, "governance deficit", नागरिक समाज की सक्रियता, न्यायालय पर जन-विश्वास।
आलोचना: शक्ति-पृथक्करण का क्षरण; न्यायालय लोकतांत्रिक रूप से उत्तरदायी नहीं; विशेषज्ञता का अभाव; निर्णयों का क्रियान्वयन कमज़ोर; लंबित मामलों का बोझ।
निष्कर्ष: हाँ, न्यायालय नीति-विकास का मंच बना है — पर यह "संस्थागत रिक्तता" भरने की भूमिका होनी चाहिए, स्थायी विकल्प नहीं; न्यायिक संयम और संवाद-आधारित (dialogic) पुनरावलोकन संतुलन देगा।
राष्ट्रीय महिला आयोग की संरचना और कार्यों की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 के अंतर्गत जनवरी 1992 में गठित सांविधिक निकाय; "Towards Equality" रिपोर्ट (1974) और महिला आंदोलन की माँगों की परिणति।
संरचना: केंद्र द्वारा नामित अध्यक्ष (महिलाओं के हित के प्रति समर्पित), 5 सदस्य (विधि, ट्रेड यूनियन, उद्योग, महिला संगठन, प्रशासन, शिक्षा आदि अनुभव; कम से कम एक-एक SC और ST से), सदस्य-सचिव; कार्यकाल 3 वर्ष।
कार्य: संवैधानिक-विधिक सुरक्षा उपायों की जाँच; केंद्र को रिपोर्ट; क़ानूनों की समीक्षा और संशोधन सुझाव; शिकायतों पर स्वतः संज्ञान; जेल, हिरासत गृहों का निरीक्षण; विशेष अध्ययन; जाँच में दीवानी न्यायालय की शक्तियाँ।
मूल्यांकन: घरेलू हिंसा अधिनियम 2005, POSH अधिनियम 2013 में भूमिका; ऑनलाइन शिकायत, हेल्पलाइन; पर सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं, स्वतंत्रता पर प्रश्न, अपर्याप्त संसाधन।
निष्कर्ष: NCW को संवैधानिक दर्जा, स्वतंत्र चयन-प्रक्रिया और प्रवर्तन शक्तियाँ देकर उसे "महिलाओं का लोकपाल" बनाया जा सकता है।
पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम सभा वह मंच है जो लोगों के सामूहिक विवेक, आकांक्षाओं और इच्छा को अभिव्यक्ति देता है। टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: अनु. 243(b) — ग्राम सभा पंचायत क्षेत्र के सभी पंजीकृत मतदाताओं का निकाय; यह प्रतिनिधि लोकतंत्र के भीतर प्रत्यक्ष लोकतंत्र का स्थान है — गांधी के ग्राम स्वराज की आत्मा।
सामूहिक विवेक की अभिव्यक्ति: विकास योजनाओं (GPDP) का अनुमोदन, लाभार्थी चयन, MGNREGA सामाजिक अंकेक्षण, PESA क्षेत्रों में भूमि-वन-खनन पर सहमति, FRA 2006 में वनाधिकार दावों की जाँच; नियमगिरि (2013) में खनन अस्वीकृति; केरल का जन-योजना अभियान।
चुनौतियाँ: कम उपस्थिति और कोरम का अभाव; जाति-लिंग आधारित अभिजन वर्चस्व; नौकरशाही प्रभुत्व; अपर्याप्त जानकारी; "proxy" प्रतिनिधित्व।
सुधार: वार्ड/महिला सभाएँ, निश्चित वार्षिक बैठकें, डिजिटल पारदर्शिता (eGramSwaraj), सामाजिक अंकेक्षण को वैधानिक बल।
निष्कर्ष: ग्राम सभा तभी "सामूहिक इच्छा" का मंच बनेगी जब उसे वास्तविक निर्णय-शक्ति और संसाधन मिलें — अन्यथा वह औपचारिक बैठक मात्र रह जाएगी।
विधान परिषद की प्रासंगिकता — टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
भूमिका: अनु. 168-169 के अंतर्गत राज्यों में वैकल्पिक दूसरा सदन; वर्तमान में छह राज्यों में अस्तित्व।
प्रासंगिकता के पक्ष: जल्दबाज़ी में बने क़ानूनों पर पुनर्विचार; स्नातक (1/12), शिक्षक (1/12), स्थानीय निकाय (1/3) निर्वाचन क्षेत्रों से विशेष हितों का प्रतिनिधित्व; राज्यपाल द्वारा कला-विज्ञान-सहकारिता के विशेषज्ञों का मनोनयन (1/6)।
विपक्ष: केवल विलंबकारी शक्तियाँ; अनुपात की कमी — विधानसभा अंततः सर्वोपरि; राजनीतिक "पुनर्वास"; राज्यों के बीच असमानता; ख़र्च।
निष्कर्ष: राष्ट्रीय नीति (सृजन-उन्मूलन के समान मानदंड), समितियों के माध्यम से विधायी गुणवत्ता में भूमिका और विशेषज्ञ प्रतिनिधित्व बढ़ाकर ही विधान परिषद की प्रासंगिकता सिद्ध हो सकती है।
15. Quick Revision Summary
- कार्यपालिका — राष्ट्रपति (अनु. 74, सीमित विवेक, अध्यादेश — वाधवा), प्रधानमंत्री (presidentialisation, PMO, गठबंधन)।
- संसद — नियंत्रण के साधन, "पतन" की बहस; विधान परिषद (अनु. 169, छह राज्य)।
- न्यायपालिका — कॉलेजियम, NJAC (2015), PIL, नीति-निर्माण बनाम अतिक्रमण।
- राज्यपाल — दोहरी भूमिका, बोम्मई, सरकारिया-पुंछी, तमिलनाडु निर्णय (अप्रैल 2025) और अनु. 143 संदर्भ पर संविधान पीठ की राय (नवंबर 2025)।
- ज़मीनी लोकतंत्र — मेहता समितियाँ → 73वाँ-74वाँ संशोधन, ग्राम सभा, PESA, DPC-MPC; 3F की कमी।
- आयोग — EC, CAG, वित्त आयोग, NHRC, NCW (1990/1992), NCM (1992), NCSC/NCST/NCBC।
- संघवाद — quasi-federal, cooperative, bargaining; केंद्रीकरण बनाम संतुलन; GST, अनु. 356, 370।