1. अध्याय एक नज़र में
लोकतंत्र में प्रशासन की शक्ति जितनी बढ़ती है, उस पर नियंत्रण की आवश्यकता उतनी ही बढ़ती है। Paper I के इस अध्याय में ये विषय हैं:
- उत्तरदायित्व और नियंत्रण: अवधारणा; विधायी, कार्यपालिका और न्यायिक नियंत्रण; नागरिक और प्रशासन; मीडिया, हित-समूह, स्वैच्छिक संगठन और नागरिक समाज की भूमिका; नागरिक चार्टर, सूचना का अधिकार और सामाजिक अंकेक्षण।
- प्रशासनिक विधि: अर्थ और महत्व; डाइसी बनाम "द्रॉइ आदमिनिस्त्रातिफ़" (droit administratif); प्रत्यायोजित विधान; प्रशासनिक न्यायाधिकरण; प्रशासनिक विवेकाधिकार पर नियंत्रण।
2025 में सरकारों को जवाबदेह बनाने में मीडिया की भूमिका, प्रशासनिक विधि का विकास, नियंत्रण और संतुलन का सिद्धांत, और प्रत्यायोजित विधान तथा विवेकाधिकार के दुरुपयोग पर नियंत्रण पूछे गए। 2024 में "मीडिया संस्थागत नहीं, सामाजिक लेंस बन गया है", सामाजिक अंकेक्षण, कल्याणकारी राज्य में प्रशासनिक न्यायाधिकरण, और विधायी नियंत्रण की अप्रभावशीलता आए।
2. उत्तरदायित्व की अवधारणा
- अर्थ: उत्तरदायित्व (accountability) यानी अपने कार्यों और निर्णयों का हिसाब देने की बाध्यता, और ग़लती पर परिणाम भुगतना। अनुक्रियाशीलता (responsiveness) यानी जनता की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशीलता।
- प्रकार: राजनीतिक (मंत्री संसद के प्रति), प्रशासनिक (पद-सोपान), विधिक (न्यायालय), वित्तीय (अंकेक्षण), नैतिक और सामाजिक (नागरिक और मीडिया)।
- बहस (फ़्राइडरिख़ बनाम फ़ाइनर, 1940-41): कार्ल फ़्राइडरिख़ के अनुसार आंतरिक नियंत्रण, यानी पेशेवर मानक और नैतिकता, पर्याप्त हैं। हर्मन फ़ाइनर के अनुसार बाहरी नियंत्रण (विधायिका, न्यायालय) आवश्यक हैं, क्योंकि "नैतिकता पर भरोसा पर्याप्त नहीं"। आज दोनों का संयोजन स्वीकार्य है।
- आंतरिक नियंत्रण: पद-सोपान, बजट, कार्य-निष्पादन मूल्यांकन, आंतरिक सतर्कता, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC; 2003 में वैधानिक दर्जा)।
- बाहरी नियंत्रण: विधायी, न्यायिक, कार्यपालिका, नागरिक, मीडिया और नागरिक समाज।
3. विधायी नियंत्रण और उसकी अप्रभावशीलता (UPSC 2024)
| साधन | विवरण |
|---|---|
| प्रश्नकाल और शून्यकाल | प्रश्नकाल प्रतिदिन का पहला घंटा; शून्यकाल (1962 से प्रचलन) बिना पूर्व सूचना के मुद्दे उठाना |
| प्रस्ताव | ध्यानाकर्षण, स्थगन, अविश्वास और कटौती प्रस्ताव |
| बजट पर चर्चा | अनुदान माँगों पर मतदान; विनियोग और वित्त विधेयक |
| वित्तीय समितियाँ | लोक लेखा समिति (PAC; 1921; 1967 से अध्यक्ष विपक्ष से), प्राक्कलन समिति (1950), सार्वजनिक उपक्रम समिति (COPU; 1964) |
| अन्य समितियाँ | विभाग-संबंधित स्थायी समितियाँ (1993 से; अभी 24), अधीनस्थ विधान समिति, सरकारी आश्वासन समिति |
- अप्रभावशीलता के कारण:
- समय और व्यवधान: सदन का बार-बार स्थगन; प्रश्नकाल का नष्ट होना।
- समितियों का कम उपयोग: PRS के आँकड़ों के अनुसार विधेयकों को समितियों में भेजने का अनुपात 15वीं लोकसभा के 71% से घटकर 16वीं में लगभग 27% और 17वीं में लगभग 16% रह गया।
- दलबदल-विरोधी क़ानून (दसवीं अनुसूची): सांसद पार्टी-निर्देश से बँधे रहते हैं; स्वतंत्र जाँच की क्षमता घटती है।
- तकनीकी जटिलता: विशेषज्ञता और शोध-सहायता की कमी।
- बहुमत का प्रभुत्व: सशक्त सरकार के समय कार्यपालिका का वर्चस्व।
- अध्यादेश और धन विधेयक के मार्ग से बहस को टालना।
- प्रत्यायोजित विधान की विशाल मात्रा, जिसकी जाँच कठिन।
- व्यापक उपाय: सभी प्रमुख विधेयकों का अनिवार्य रूप से समिति में जाना; संसदीय शोध-सेवा का सुदृढ़ीकरण (ब्रिटेन और अमेरिका की तरह); निश्चित न्यूनतम बैठकें (राष्ट्रीय संविधान समीक्षा आयोग, 2002 ने लोकसभा के लिए कम से कम 120 दिन की संस्तुति की); अधीनस्थ विधान की प्रभावी जाँच; विपक्ष के लिए "छाया-मंत्रिमंडल" जैसी परंपराएँ; और RTI, CAG तथा मीडिया के साथ संसदीय नियंत्रण का समन्वय।
4. न्यायिक नियंत्रण
- साधन: रिट (अनुच्छेद 32 और 226: बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार-पृच्छा); जनहित याचिका (एस.पी. गुप्ता, 1981); और प्रशासनिक कार्यों का न्यायिक पुनर्विलोकन।
- पुनर्विलोकन के आधार: ब्रिटेन के GCHQ मामले (1985, लॉर्ड डिप्लॉक) के अनुसार अवैधता, अतार्किकता ("वेडनसबरी अतार्किकता") और प्रक्रियात्मक अनुचितता; साथ में आनुपातिकता (proportionality)।
- प्राकृतिक न्याय: "दूसरे पक्ष को सुनो" (audi alteram partem) और "कोई अपने ही मामले में न्यायाधीश न हो" (nemo judex in causa sua); तर्कसंगत आदेश (reasoned orders)। मेनका गांधी (1978) में "न्यायसंगत, निष्पक्ष और युक्तियुक्त प्रक्रिया" का सिद्धांत आया।
- सीमाएँ: मुक़दमों की भारी संख्या और देरी; न्यायिक सक्रियता बनाम अतिरेक; और न्यायालयों की तकनीकी नीति-निर्णयों में सीमित विशेषज्ञता।
5. नागरिक, मीडिया और सामाजिक अंकेक्षण
- नागरिक चार्टर: ब्रिटेन (1991, जॉन मेजर) से प्रेरित; भारत में 1997 से। सेवा के मानक, समय-सीमा और शिकायत-निवारण। सीमाएँ: क़ानूनी बाध्यता नहीं, और जागरूकता कम। इसीलिए "सेवोत्तम" मॉडल (DARPG) और राज्यों के "लोक सेवा गारंटी" क़ानून आए (मध्य प्रदेश, 2010, पहला)।
- सूचना का अधिकार (2005): 30 दिन में सूचना; जीवन और स्वतंत्रता के मामलों में 48 घंटे; केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग। 2019 के संशोधन से सूचना आयुक्तों का कार्यकाल और वेतन केंद्र सरकार तय करती है, जिससे स्वायत्तता पर प्रश्न उठे। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (2023) की धारा 44(3) ने RTI की धारा 8(1)(j) में संशोधन किया, जिस पर पारदर्शिता को लेकर चिंता जताई गई।
सामाजिक अंकेक्षण और समावेशी शासन (UPSC 2024)
- अर्थ: सरकारी योजना के लाभार्थियों और समुदाय द्वारा उसके क्रियान्वयन की सार्वजनिक जाँच: अभिलेखों की जाँच, भौतिक सत्यापन और "जन-सुनवाई"।
- उद्भव: 1990 के दशक में राजस्थान में मज़दूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) की "जन-सुनवाई"। MGNREGA (2005) की धारा 17 में ग्राम सभा द्वारा सामाजिक अंकेक्षण अनिवार्य है।
- मॉडल: आंध्र प्रदेश का स्वतंत्र "सामाजिक अंकेक्षण, जवाबदेही और पारदर्शिता सोसाइटी" (SSAAT, 2009); मेघालय का सामाजिक अंकेक्षण अधिनियम (2017), इस विषय पर पहला राज्य क़ानून; CAG के सामाजिक अंकेक्षण मानक (2016)।
- समावेशिता में योगदान: निर्धन, दलित, आदिवासी और स्त्रियों को आवाज़; भ्रष्टाचार में कमी और धन की वसूली; जागरूकता और अधिकार-बोध; और "लाभार्थी" से "निगरानीकर्ता" बनना।
- चुनौतियाँ: अंकेक्षण इकाइयों की स्वतंत्रता (राज्य सरकारों पर निर्भरता), स्थानीय अभिजात द्वारा प्रक्रिया पर कब्ज़ा, अनुवर्ती कार्रवाई (दंड, वसूली) की कमज़ोरी, प्रशिक्षित संसाधन-व्यक्तियों की कमी, और ग्राम सभाओं में कम उपस्थिति।
- सुदृढ़ीकरण के उपाय: वैधानिक और स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण इकाइयाँ (मेघालय की तर्ज़ पर), सभी कल्याण योजनाओं पर विस्तार (PDS, मध्याह्न भोजन, PMAY), डिजिटल अभिलेखों का सार्वजनिक प्रकाशन, अंकेक्षण के निष्कर्षों पर समयबद्ध कार्रवाई और उनका प्रकाशन, और स्वयं सहायता समूहों तथा नागरिक संगठनों की भागीदारी।
मीडिया और जवाबदेही (UPSC 2024, 2025)
- भूमिका: "चौथा स्तंभ"; प्रहरी (watchdog); एजेंडा तय करना; खोजी पत्रकारिता (बोफ़ोर्स, 2G जैसे मामलों की रिपोर्टिंग); जनमत का निर्माण; और सरकार तथा नागरिक के बीच संवाद-सेतु।
- क्या मीडिया ने अपनी भूमिका खो दी है? पक्ष में तर्क:
- कॉर्पोरेट और राजनीतिक स्वामित्व से हित-संघर्ष।
- "पेड न्यूज़" और विज्ञापनों पर निर्भरता (सरकारी विज्ञापन भी)।
- सनसनीखेज़ी, TRP-प्रेरित बहसें और "मीडिया ट्रायल"।
- खोजी पत्रकारिता में गिरावट (लागत, क़ानूनी जोखिम, मानहानि-मुक़दमे)।
- ध्रुवीकरण और "स्टूडियो-पत्रकारिता"।
- प्रेस-स्वतंत्रता के अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में भारत का निचला स्थान (RSF सूचकांक, 2024 में 180 में 159वाँ)।
- विपक्ष में तर्क: क्षेत्रीय मीडिया, स्वतंत्र डिजिटल मंच, तथ्य-जाँच संगठन और नागरिक पत्रकारिता आज भी अनेक मुद्दों को उजागर करते हैं। RTI-आधारित पत्रकारिता और डेटा-पत्रकारिता नए उपकरण बने हैं।
- "संस्थागत लेंस" से "सामाजिक लेंस" (2024): पहले मीडिया संस्थाओं (संसद, न्यायपालिका, नौकरशाही) की नियमित और व्यवस्थित जाँच करता था ("संस्थागत लेंस")। अब वह मुख्यतः समाज की भावनाओं, ट्रेंड, वायरल मुद्दों और पहचान-आधारित बहसों को प्रतिबिंबित करता है ("सामाजिक लेंस")। सोशल मीडिया ने एजेंडा तय करने की शक्ति को विकेंद्रित किया है, पर उसके साथ भ्रामक सूचना और "इको-चैंबर" भी आए।
- लाभ: हाशिये के समूहों की आवाज़; तेज़ जन-प्रतिक्रिया (जैसे आपदाओं में)।
- हानि: संस्थागत प्रक्रियाओं (नीति, बजट, क़ानून) की गहन जाँच में कमी; भावनात्मक मुद्दों का प्रभुत्व।
- सुधार: स्वतंत्र स्व-नियमन (भारतीय प्रेस परिषद, 1966; NBDSA), स्वामित्व में पारदर्शिता, सार्वजनिक प्रसारण की स्वायत्तता, मीडिया-साक्षरता, और सोशल मीडिया पर भ्रामक सूचना से निपटने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुकूल ढाँचा (श्रेया सिंघल, 2015 में IT अधिनियम की धारा 66A रद्द)।
- निष्कर्ष: मीडिया ने अपनी भूमिका पूरी तरह नहीं खोई, पर उसकी "संस्थागत जवाबदेही" वाली भूमिका कमज़ोर हुई है। स्वतंत्र, बहुल और जवाबदेह मीडिया लोकतंत्र की शर्त है।
- हित-समूह, स्वैच्छिक संगठन और नागरिक समाज: नीति पर दबाव, सेवा-वितरण, अधिकार-आंदोलन (RTI, भोजन का अधिकार), और सामाजिक अंकेक्षण। विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA, 2020 के संशोधन) से नागरिक संगठनों के वित्त पर कड़ा नियंत्रण आया।
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम (2013): लोकपाल का गठन 2019 में हुआ।
6. प्रशासनिक विधि
प्रशासनिक विधि: "विधि के अधीन लोक प्रशासन" की आवश्यकता (UPSC 2025)
- अर्थ: प्रशासनिक विधि वह विधि है जो प्रशासनिक प्राधिकारियों के संगठन, शक्तियों, कर्तव्यों और उन पर नियंत्रण को निर्धारित करती है (आइवर जेनिंग्स; के.सी. डेविस)।
- विकास के कारण:
- "पुलिस राज्य" से "कल्याणकारी राज्य" में परिवर्तन, जिससे प्रशासन की शक्तियों और कार्यों का विस्फोट हुआ (स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, नियमन)।
- संसद के पास विस्तृत क़ानून बनाने का समय और विशेषज्ञता नहीं, इसलिए प्रत्यायोजित विधान।
- सामान्य न्यायालयों की धीमी और महँगी प्रक्रिया, इसलिए विशेषज्ञ न्यायाधिकरण।
- विवेकाधिकार में वृद्धि, जिस पर नियंत्रण आवश्यक।
- उद्देश्य: प्रशासन को शक्तिशाली और प्रभावी बनाना, पर साथ ही "विधि के अधीन" रखना, यानी शक्ति और स्वतंत्रता का संतुलन।
- भारत: अनुच्छेद 14, 19 और 21; न्यायिक पुनर्विलोकन; प्राकृतिक न्याय; प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम (1985)।
| आधार | डाइसी का "विधि का शासन" (इंग्लैंड) | "द्रॉइ आदमिनिस्त्रातिफ़" (फ़्रांस) |
|---|---|---|
| न्यायालय | अधिकारी और नागरिक, दोनों सामान्य न्यायालयों के अधीन | प्रशासनिक मामलों के लिए अलग प्रशासनिक न्यायालय; शीर्ष पर "कॉन्सेय देता" (Conseil d'État, 1799, नेपोलियन) |
| डाइसी का मत (1885) | विधि के समक्ष समानता | अधिकारियों को "विशेषाधिकार" देने वाली व्यवस्था; इंग्लैंड में प्रशासनिक विधि "अज्ञात" है |
| वास्तविकता | इंग्लैंड में भी प्रत्यायोजित विधान और न्यायाधिकरण बढ़े; डाइसी ने 1915 के लेख में इसे आंशिक रूप से स्वीकार किया | फ़्रांसीसी प्रशासनिक न्यायालय नागरिकों को प्रभावी सुरक्षा देते हैं ("राज्य दायित्व" का विकसित सिद्धांत) |
प्रत्यायोजित विधान और विवेकाधिकार पर नियंत्रण (UPSC 2025)
- प्रत्यायोजित विधान: संसद मूल क़ानून में नीति तय करती है और विस्तृत नियम, विनियम तथा अधिसूचनाएँ बनाने का अधिकार कार्यपालिका को देती है।
- कारण: समय का अभाव, तकनीकी विषय, लचीलापन, आपात परिस्थितियाँ और प्रयोग की सुविधा।
- सीमाएँ (भारत): "दिल्ली लॉज़ ऐक्ट" मामले (1951) के अनुसार "आवश्यक विधायी कार्य" (नीति निर्धारण) प्रत्यायोजित नहीं किए जा सकते; अत्यधिक प्रत्यायोजन असंवैधानिक है। कथन का अर्थ यही है: प्रत्यायोजन स्पष्ट हो और विधायिका द्वारा तय सीमाओं के भीतर रहे।
- नियंत्रण:
- संसदीय: नियमों को सदन के पटल पर रखना (laying; नकारात्मक या सकारात्मक प्रक्रिया); अधीनस्थ विधान समिति (लोकसभा में 1953 से)।
- न्यायिक: "अधिकारातीत" (ultra vires) सिद्धांत, यानी मूल क़ानून या संविधान से परे होने पर नियम अमान्य।
- प्रक्रियात्मक: प्रकाशन, पूर्व-परामर्श (2014 की "पूर्व-विधायी परामर्श नीति")।
- विवेकाधिकार के दुरुपयोग पर नियंत्रण:
- न्यायिक पुनर्विलोकन के आधार: असंगत विचारों पर निर्णय, दुर्भावना (mala fides), विवेक का प्रयोग न करना ("बँधा हुआ विवेक" या किसी और के आदेश पर निर्णय), वेडनसबरी अतार्किकता और आनुपातिकता (ओम कुमार, 2000; मॉडर्न डेंटल कॉलेज, 2016)।
- प्राकृतिक न्याय और तर्कसंगत आदेश।
- मार्गदर्शी सिद्धांत, मानक संचालन प्रक्रियाएँ और पारदर्शी मानदंड (जैसे तबादलों में)।
- RTI, लोकपाल, CVC और विभागीय जाँच।
- संरचित विवेक: के.सी. डेविस (Discretionary Justice, 1969) के अनुसार विवेक को "सीमित, संरचित और जाँचा हुआ" (confine, structure, check) होना चाहिए।
कल्याणकारी राज्य और प्रशासनिक न्यायाधिकरण (UPSC 2024)
- आवश्यकता: कल्याणकारी राज्य में सेवा-विवाद, कर, श्रम, भूमि, पर्यावरण और उपभोक्ता जैसे मामलों की संख्या बहुत बढ़ी। इनके लिए विशेषज्ञता, गति, कम लागत, कम औपचारिकता और लचीलापन चाहिए, जो सामान्य न्यायालयों में संभव नहीं।
- ब्रिटेन: डोनोमोर समिति (मंत्रियों की शक्तियों पर, 1932) और फ़्रैंक्स समिति (1957; न्यायाधिकरणों के लिए "खुलापन, निष्पक्षता और निष्पक्षता की छवि")।
- भारत: 42वें संशोधन (1976) से अनुच्छेद 323A (प्रशासनिक न्यायाधिकरण) और 323B (अन्य न्यायाधिकरण) जोड़े गए। प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम (1985) से केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) बना। अन्य उदाहरण: NGT (2010), आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण, उपभोक्ता आयोग।
- न्यायिक दृष्टि: एल. चंद्र कुमार (1997) में तय हुआ कि न्यायिक पुनर्विलोकन मूल ढाँचे का भाग है, इसलिए न्यायाधिकरणों के निर्णयों पर उच्च न्यायालय में अपील या पुनर्विलोकन संभव है। मद्रास बार एसोसिएशन के मामलों में नियुक्ति और कार्यकाल पर कार्यपालिका के नियंत्रण की आलोचना हुई। अधिकरण सुधार अधिनियम (2021) से कुछ अपीलीय न्यायाधिकरण समाप्त किए गए।
- चुनौतियाँ: स्वतंत्रता (नियुक्ति और सेवा-शर्तों पर मंत्रालय का नियंत्रण), रिक्तियाँ, समान प्रक्रिया का अभाव, और न्यायालयों का बोझ वास्तव में घटा या नहीं।
- सुधार: राष्ट्रीय अधिकरण आयोग (सर्वोच्च न्यायालय का सुझाव), निश्चित कार्यकाल, न्यायिक सदस्यों की प्रधानता, और डिजिटल प्रक्रियाएँ।
- निष्कर्ष: न्यायाधिकरण कल्याणकारी राज्य की "आवश्यकता" हैं, पर उनकी स्वतंत्रता के बिना वे "विधि के शासन" के बजाय "कार्यपालिका के शासन" का साधन बन सकते हैं।
नियंत्रण और संतुलन (UPSC 2025)
- विचार: मॉन्टेस्क्यू का शक्ति-पृथक्करण (1748); जेम्स मैडिसन (Federalist No. 51) के अनुसार "महत्वाकांक्षा का सामना महत्वाकांक्षा से हो", यानी हर अंग दूसरे पर नियंत्रण रखे।
- भारत में: कठोर पृथक्करण नहीं, बल्कि "कार्यात्मक पृथक्करण" और पारस्परिक नियंत्रण:
- विधायिका से कार्यपालिका पर: अविश्वास, प्रश्न, समितियाँ।
- न्यायपालिका से दोनों पर: न्यायिक पुनर्विलोकन (अनुच्छेद 13, 32, 226) और मूल ढाँचा (केशवानंद, 1973; इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण, 1975 में शक्ति-पृथक्करण को मूल ढाँचे का अंग माना गया)।
- कार्यपालिका से: राष्ट्रपति का निलंबनकारी वीटो, अध्यादेश, न्यायाधीशों की नियुक्ति में भूमिका।
- विधायिका से न्यायपालिका पर: महाभियोग।
- अनुच्छेद 50: लोक सेवाओं में न्यायपालिका और कार्यपालिका का पृथक्करण।
- स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएँ: CAG, निर्वाचन आयोग, UPSC।
- सबसे मौलिक मूल्य क्यों: सत्ता का केंद्रीकरण रोकना ("सत्ता भ्रष्ट करती है"; लॉर्ड ऐक्टन), अधिकारों की रक्षा, और जवाबदेही।
- चुनौतियाँ: बहुमत वाली सरकारों में कार्यपालिका का वर्चस्व, संस्थाओं की स्वायत्तता पर प्रश्न, और न्यायिक अतिरेक बनाम न्यायिक संयम की बहस।
7. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| बहस | फ़्राइडरिख़ (आंतरिक) बनाम फ़ाइनर (बाहरी) | 1940-41 |
| संसदीय समितियाँ | PAC 1921; प्राक्कलन 1950; COPU 1964; DRSC 1993 | समिति में विधेयक: 71% से लगभग 16% |
| न्यायिक | GCHQ 1985; मेनका 1978; PIL 1981 | प्राकृतिक न्याय |
| नागरिक | चार्टर 1997; RTI 2005; सेवा गारंटी (मध्य प्रदेश 2010) | सेवोत्तम |
| सामाजिक अंकेक्षण | MKSS; MGNREGA धारा 17; SSAAT 2009; मेघालय 2017 | CAG मानक 2016 |
| मीडिया | प्रेस परिषद 1966; श्रेया सिंघल 2015 | संस्थागत बनाम सामाजिक लेंस |
| प्रशासनिक विधि | डाइसी 1885; कॉन्सेय देता 1799 | डेविस 1969 |
| प्रत्यायोजित विधान | दिल्ली लॉज़ 1951; अधीनस्थ विधान समिति 1953 | अधिकारातीत |
| न्यायाधिकरण | 323A, 323B (1976); CAT 1985 | एल. चंद्र कुमार 1997; 2021 का अधिनियम |
| नियंत्रण-संतुलन | मॉन्टेस्क्यू, मैडिसन | राज नारायण 1975; अनुच्छेद 50 |
8. चार्ट: प्रशासन पर नियंत्रण के स्रोत
9. Mind Map
- प्रकार
- फ़्राइडरिख़-फ़ाइनर
- समितियाँ, अप्रभावशीलता
- रिट, पुनर्विलोकन
- चार्टर, RTI
- सामाजिक अंकेक्षण, मीडिया
- डाइसी बनाम फ़्रांस
- प्रत्यायोजित विधान, विवेक
- न्यायाधिकरण
- नियंत्रण और संतुलन
10. महत्वपूर्ण One-liners
- लोक लेखा समिति का गठन: 1921; अध्यक्ष विपक्ष से: 1967 से।
- विभाग-संबंधित स्थायी समितियाँ: 1993 से।
- पहला राज्य सेवा-गारंटी क़ानून: मध्य प्रदेश (2010)।
- सामाजिक अंकेक्षण पर पहला राज्य क़ानून: मेघालय (2017)।
- MGNREGA में सामाजिक अंकेक्षण: धारा 17।
- फ़्रांस का सर्वोच्च प्रशासनिक न्यायालय: कॉन्सेय देता।
- "Discretionary Justice": के.सी. डेविस (1969)।
- प्रशासनिक न्यायाधिकरणों का संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 323A (42वाँ संशोधन)।
- न्यायाधिकरणों पर उच्च न्यायालय का पुनर्विलोकन: एल. चंद्र कुमार (1997)।
- फ़्रैंक्स समिति: 1957 (ब्रिटेन)।
11. टिप्स एवं ट्रिक्स
- हर उत्तर में संवैधानिक प्रावधान, क़ानून और न्यायिक निर्णय (वर्ष सहित) दें।
- "अप्रभावशीलता" वाले प्रश्नों में कारण और उपाय दो अलग उपशीर्षकों में लिखें, और आँकड़े (PRS) जोड़ें।
- ARC-II की प्रासंगिक रिपोर्टें (जैसे "Ethics in Governance", 2007) का उल्लेख उत्तर को मज़बूत करता है।
पुनर्विलोकन के आधार: "अ-अ-प्र-आ" (अवैधता, अतार्किकता, प्रक्रियात्मक अनुचितता, आनुपातिकता)। डेविस का सूत्र: "सीमित, संरचित, जाँचा हुआ"।
12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
"प्रत्यायोजित विधान स्पष्ट होना चाहिए और विधायिका द्वारा निर्धारित सीमाओं तक सीमित रहना चाहिए।" इस कथन के आलोक में बताइए कि प्रशासनिक विवेकाधिकार के दुरुपयोग को कैसे रोका जा सकता है।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
प्रत्यायोजित विधान: अर्थ, कारण, "आवश्यक विधायी कार्य" (1951)।
नियंत्रण: संसदीय (पटल पर रखना, समिति), न्यायिक (अधिकारातीत), प्रक्रियात्मक।
विवेक पर नियंत्रण: पुनर्विलोकन के आधार (दुर्भावना, असंगत विचार, आनुपातिकता), प्राकृतिक न्याय, दिशानिर्देश, RTI, लोकपाल; डेविस।
निष्कर्ष: विवेक आवश्यक है, पर "संरचित" विवेक ही विधि का शासन है।
नियंत्रण और संतुलन के सिद्धांत सबसे मौलिक संवैधानिक मूल्यों में गिने जाते हैं। टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
विचार: मॉन्टेस्क्यू, मैडिसन।
भारत: कार्यात्मक पृथक्करण; विभिन्न अंगों के पारस्परिक नियंत्रण; अनुच्छेद 50; स्वतंत्र संस्थाएँ; राज नारायण।
मौलिक क्यों: केंद्रीकरण पर रोक, अधिकार, जवाबदेही।
चुनौतियाँ और निष्कर्ष।
उपयुक्त तरीक़ों से सामाजिक अंकेक्षण को सुदृढ़ करना समावेशी शासन को बढ़ावा देगा। टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अर्थ और उद्भव: MKSS, धारा 17।
मॉडल: SSAAT, मेघालय, CAG मानक।
समावेशिता: आवाज़, भ्रष्टाचार में कमी, अधिकार-बोध।
चुनौतियाँ और सुदृढ़ीकरण के उपाय।
कल्याणकारी राज्य में प्रशासनिक विधि के विकास ने प्रशासनिक न्यायाधिकरणों को एक आवश्यकता बना दिया है। परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
आवश्यकता: मामलों में वृद्धि; विशेषज्ञता, गति, लागत।
ब्रिटेन: डोनोमोर, फ़्रैंक्स।
भारत: 323A और B, CAT, NGT; एल. चंद्र कुमार; मद्रास बार; 2021।
चुनौतियाँ और सुधार।
प्रशासन पर विधायी नियंत्रण की अप्रभावशीलता अनेक कारकों से उत्पन्न हो सकती है, इसलिए उसकी प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक दृष्टिकोण समय की माँग है। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
साधन: तालिका।
कारण: व्यवधान, समितियों का कम उपयोग (PRS आँकड़े), दलबदल-विरोधी क़ानून, जटिलता, बहुमत, अध्यादेश।
व्यापक उपाय: अनिवार्य समिति, शोध-सेवा, न्यूनतम बैठकें, अधीनस्थ विधान की जाँच, अन्य साधनों से समन्वय।
क्या मीडिया ने सरकारों को जवाबदेह बनाने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की अपनी भूमिका खो दी है? तर्क दीजिए।
मॉडल उत्तर
भूमिका: प्रहरी, एजेंडा, खोजी पत्रकारिता।
खोने के तर्क: स्वामित्व, पेड न्यूज़, सनसनी, ध्रुवीकरण, RSF सूचकांक।
विपक्ष: क्षेत्रीय और डिजिटल मीडिया, तथ्य-जाँच, RTI पत्रकारिता।
निष्कर्ष: भूमिका कमज़ोर हुई, समाप्त नहीं।
प्रशासनिक विधि विधि के अधीन लोक प्रशासन की एक प्रणाली बनाने की आवश्यकता से विकसित हुई है। स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर
अर्थ: जेनिंग्स, डेविस।
कारण: कल्याणकारी राज्य, प्रत्यायोजन, न्यायाधिकरण, विवेक।
डाइसी बनाम फ़्रांस।
भारत: अनुच्छेद 14 और 21, पुनर्विलोकन, 1985 का अधिनियम।
मीडिया संस्थागत लेंस के बजाय अधिक एक सामाजिक लेंस बन गया है। विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर
अर्थ: संस्थाओं की व्यवस्थित जाँच से सामाजिक भावनाओं और ट्रेंड के प्रतिबिंब की ओर।
कारण: सोशल मीडिया, TRP, स्वामित्व।
लाभ और हानि।
सुधार: स्व-नियमन, पारदर्शिता, मीडिया-साक्षरता।
13. Quick Revision Summary
- अवधारणा: उत्तरदायित्व, अनुक्रियाशीलता; आंतरिक और बाहरी नियंत्रण; फ़्राइडरिख़-फ़ाइनर बहस।
- विधायी: साधन, समितियाँ, अप्रभावशीलता के कारण और उपाय।
- न्यायिक: रिट, PIL, पुनर्विलोकन के आधार, प्राकृतिक न्याय।
- नागरिक: चार्टर, सेवा-गारंटी, RTI, सामाजिक अंकेक्षण, मीडिया, नागरिक समाज।
- प्रशासनिक विधि: डाइसी बनाम फ़्रांस; प्रत्यायोजित विधान; विवेक पर नियंत्रण; न्यायाधिकरण; नियंत्रण और संतुलन।