1. अध्याय एक नज़र में
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नव-स्वतंत्र देशों के प्रशासन को समझने के प्रयास से दो क्षेत्र उभरे: तुलनात्मक लोक प्रशासन और विकास प्रशासन। Paper I के इस अध्याय में ये विषय हैं:
- तुलनात्मक लोक प्रशासन: ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय कारक; विभिन्न देशों में प्रशासन; उपागम (नौकरशाही, संरचनात्मक-कार्यात्मक, पारिस्थितिक, राजनीतिक अर्थव्यवस्था); फ़्रेड रिग्स के मॉडल; वर्तमान स्थिति।
- विकास की गतिशीलता: विकास की अवधारणा; विकास प्रशासन का बदलता स्वरूप; "विकास-विरोधी सिद्धांत" (anti-development thesis); नौकरशाही और विकास; सशक्त राज्य बनाम बाज़ार की बहस; उदारीकरण का प्रभाव; महिला और विकास, स्वयं सहायता समूह आंदोलन; नागरिक समाज।
2025 में रिग्स का "इंडस्ट्रिया" मॉडल और उत्तर-आधुनिक प्रशासन, विकास में राज्य की भूमिका को अधिक महत्व देने की आलोचना, तुलनात्मक लोक प्रशासन के उपागम और सिद्धांत, नागरिक समाज, और "आर्थिक विकास अकेले महिला सशक्तीकरण के लिए पर्याप्त नहीं" पूछे गए। 2024 में विकास-विरोधी सिद्धांत, प्रशासन की पारिस्थितिकी, सामाजिक और ऐतिहासिक कारक, रिग्स के प्रिज़्मीय मॉडल की आलोचना, राज्य और बाज़ार का संतुलन, और विकासशील देशों की नौकरशाही आए।
2. तुलनात्मक लोक प्रशासन
- उद्भव: 1960 में अमेरिकन सोसाइटी फ़ॉर पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में "तुलनात्मक प्रशासन समूह" (Comparative Administration Group, CAG) बना, जिसके अध्यक्ष फ़्रेड रिग्स थे और जिसे फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन से वित्त मिला। संदर्भ: शीत युद्ध, विदेशी सहायता, नव-स्वतंत्र देशों में "आधुनिकीकरण"।
- उद्देश्य: सार्वभौम सिद्धांत की खोज; विभिन्न संस्कृतियों में प्रशासन की समझ; और विकासशील देशों के लिए नीतिगत सुझाव।
| उपागम | विचारक | मूल विचार |
|---|---|---|
| नौकरशाही उपागम | मैक्स वेबर, फ़ेरेल हेडी ("Public Administration: A Comparative Perspective", 1966) | विभिन्न देशों की नौकरशाहियों की तुलना; हेडी ने राजनीतिक व्यवस्थाओं का वर्गीकरण किया |
| संरचनात्मक-कार्यात्मक | फ़्रेड रिग्स, गैब्रियल आलमंड | संरचनाएँ और उनके कार्य; कार्यात्मक विशिष्टता |
| पारिस्थितिक | जॉन गॉस (1947), रिग्स ("The Ecology of Public Administration", 1961) | प्रशासन और उसके पर्यावरण का पारस्परिक संबंध |
| सामान्य तंत्र | डेविड ईस्टन का प्रभाव | निवेश, निर्गत, प्रतिपुष्टि |
| राजनीतिक अर्थव्यवस्था | वर्तमान | सत्ता, संसाधन, वर्ग, वैश्वीकरण और संस्थाओं का संबंध; नव-संस्थावाद |
प्रशासन की पारिस्थितिकी (UPSC 2024)
- जॉन गॉस (Reflections on Public Administration, 1947): प्रशासन को समझने के लिए उसके पर्यावरण के सात तत्व समझने होंगे: लोग, स्थान, भौतिक तकनीक, सामाजिक तकनीक, इच्छाएँ और विचार, आपदा, और व्यक्तित्व।
- रिग्स: प्रशासन अपने समाज की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचनाओं से "प्रभावित भी होता है और उन्हें प्रभावित भी करता है"।
- महत्व: एक देश के प्रशासनिक मॉडल को दूसरे देश में "प्रतिरोपित" (transplant) करना विफल हो सकता है। उदाहरण: पश्चिमी नौकरशाही मॉडल विकासशील देशों में औपचारिकता (formalism) बन गया। भारत में जाति, क्षेत्र, भाषा और औपनिवेशिक विरासत प्रशासनिक संस्कृति को आकार देते हैं।
सामाजिक और ऐतिहासिक कारक और अनुक्रियाशील शासन (UPSC 2024)
- ऐतिहासिक कारक: औपनिवेशिक विरासत (भारत में ICS से IAS तक नियंत्रण-उन्मुख संस्कृति), राज्य-निर्माण का क्रम, और क्रांतियाँ (फ़्रांस का केंद्रीकृत प्रशासन)।
- सामाजिक कारक: सामाजिक विविधता, पदानुक्रम (जाति), परिवार और नातेदारी (भाई-भतीजावाद), धार्मिक मूल्य, और साक्षरता।
- अनुक्रियाशील ढाँचे के लिए समझ क्यों आवश्यक: सुधार तभी सफल होते हैं जब वे स्थानीय संदर्भ के अनुकूल हों। उदाहरण: पंचायतों में स्त्रियों का आरक्षण (सामाजिक असमानता का उत्तर), जनजातीय क्षेत्रों के लिए PESA और छठी अनुसूची, और भाषायी राज्य। विश्व बैंक की "सर्वोत्तम प्रथाओं" के स्थान पर "सर्वोत्तम अनुकूलता" (best fit) और "समस्या-आधारित पुनरावृत्त अनुकूलन" (PDIA; मैट एंड्रयूज़ और साथी) की धारणा आई।
3. फ़्रेड रिग्स के मॉडल
- एग्रेरिया-इंडस्ट्रिया (1957): एग्रेरिया (कृषि-प्रधान, पारंपरिक समाज) और इंडस्ट्रिया (औद्योगिक, आधुनिक समाज) दो आदर्श-प्रारूप हैं; "ट्रांज़िशिया" दोनों के बीच की संक्रमणकालीन अवस्था है।
- संलयित, प्रिज़्मीय, विवर्तित (1964, "Administration in Developing Countries: The Theory of Prismatic Society"): प्रिज़्म की उपमा। सफ़ेद प्रकाश ("संलयित" यानी fused समाज, जहाँ एक संरचना अनेक कार्य करती है) प्रिज़्म से गुज़रकर इंद्रधनुष ("विवर्तित" यानी diffracted समाज, जहाँ हर कार्य के लिए विशिष्ट संरचना है) में बदलता है। बीच की अवस्था "प्रिज़्मीय" समाज है, जो विकासशील देशों का प्रतीक है।
| प्रिज़्मीय समाज की विशेषता | अर्थ |
|---|---|
| विषमरूपता (heterogeneity) | आधुनिक और पारंपरिक का सह-अस्तित्व (नगरों में आधुनिकता, गाँवों में परंपरा) |
| औपचारिकता (formalism) | जो लिखा है (क़ानून, नियम) और जो होता है, उसमें अंतर |
| अतिव्यापन (overlapping) | औपचारिक संरचनाएँ बनती हैं, पर पुराने कार्य और मानदंड जारी रहते हैं |
| "साला" (sala) मॉडल | प्रिज़्मीय समाज का प्रशासनिक कार्यालय: भाई-भतीजावाद, "क्लेक्ट" (clects, यानी सामुदायिक गुट जो आधुनिक संगठन का रूप लेते हैं), बहु-सामुदायिकता |
| "बाज़ार-कैंटीन" अर्थव्यवस्था | मूल्य-अनिश्चितता; व्यक्ति के अनुसार अलग मूल्य (रियायत या शोषण) |
| बहु-मानदंडता (polynormativism) | एक साथ अनेक, परस्पर-विरोधी मानदंड |
| सत्ता और नियंत्रण | औपचारिक सत्ता अधिक, वास्तविक नियंत्रण कम; नौकरशाही की प्रधानता |
प्रिज़्मीय मॉडल की आलोचना और उपयोगिता (UPSC 2024)
- आलोचना:
- "निराशावादी" (gloomy): प्रिज़्मीय समाज को नकारात्मक लक्षणों का पुंज बताना।
- जटिल और कठिन शब्दावली ("clects", "poly-communalism").
- पश्चिमी पूर्वाग्रह: विवर्तित (पश्चिमी) समाज को आदर्श मानना।
- स्थिर (static) मॉडल, जो परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं समझाता।
- अनुभवजन्य परीक्षण कठिन; विकसित देशों में भी प्रिज़्मीय लक्षण (लॉबिंग, संरक्षणवाद) मिलते हैं।
- उपयोगिता: विकासशील देशों के प्रशासन की वास्तविकता (औपचारिकता, क़ानून और व्यवहार का अंतर) को समझने का पहला व्यवस्थित ढाँचा; पारिस्थितिक दृष्टि; तुलना के लिए अवधारणाएँ; और बाद के शोध (भ्रष्टाचार, अनौपचारिक संस्थाएँ, "संरक्षण राजनीति") के लिए आधार। भारत में ज़मीनी स्तर पर नियमों का "चयनात्मक" पालन औपचारिकता का उदाहरण है।
- निष्कर्ष: मॉडल त्रुटिपूर्ण है, पर तुलनात्मक लोक प्रशासन के शोध के लिए उपयोगी "प्रारंभ-बिंदु" बना हुआ है।
रिग्स का "इंडस्ट्रिया" और उत्तर-आधुनिक लोक प्रशासन (UPSC 2025)
- इंडस्ट्रिया की विशेषताएँ: कार्यात्मक विशिष्टता; बाज़ार-अर्थव्यवस्था; उपलब्धि-आधारित मानदंड; सार्वभौम नियम; और सबसे महत्वपूर्ण, विशिष्ट संरचनाओं के बीच गहरी परस्पर-निर्भरता (interdependence)। कोई इकाई अकेली काम नहीं कर सकती।
- उत्तर-आधुनिक लोक प्रशासन: चार्ल्स फ़ॉक्स और ह्यू मिलर (Postmodern Public Administration, 1995): विखंडन, बहुलता, संवाद (discourse), नेटवर्क, पदानुक्रम का क्षरण, और "एक सार्वभौम सत्य" का अस्वीकार।
- पूर्व-संकेत (precursor) क्यों:
- परस्पर-निर्भरता से नेटवर्क और अंतर-संगठनात्मक समन्वय की आवश्यकता, जो NPG और उत्तर-आधुनिक "नेटवर्क-शासन" का केंद्रीय तत्व है।
- बहुलता: अनेक विशिष्ट संरचनाएँ और हित, यानी विकेंद्रित सत्ता।
- बाज़ार और राज्य का सह-अस्तित्व।
- जटिलता और अनिश्चितता के कारण "एक केंद्र" से नियंत्रण असंभव।
- सीमाएँ: रिग्स स्वयं आधुनिकतावादी और संरचनात्मक-कार्यात्मक विचारक थे; उनका मॉडल "भव्य सिद्धांत" (grand theory) है, जिसे उत्तर-आधुनिकता अस्वीकार करती है। उत्तर-आधुनिकता भाषा, अर्थ और शक्ति पर केंद्रित है, संरचना पर नहीं।
- निष्कर्ष: इंडस्ट्रिया की परस्पर-निर्भरता उत्तर-आधुनिक प्रशासन के कुछ "संरचनात्मक" लक्षणों का पूर्वाभास देती है, पर दोनों की दार्शनिक नींव भिन्न है।
क्या तुलनात्मक लोक प्रशासन का सिद्धांत बन पाया? (UPSC 2025)
- विकास-क्रम: संस्थागत और कानूनी उपागम (संविधानों और संस्थाओं की तुलना), फिर नौकरशाही उपागम, फिर संरचनात्मक-कार्यात्मक और पारिस्थितिक उपागम (1960 का दशक), और फिर समकालीन राजनीतिक अर्थव्यवस्था और नव-संस्थावाद (डगलस नॉर्थ; "संस्थाएँ महत्वपूर्ण हैं")।
- "नहीं" के पक्ष में: मॉडल अनेक, पर सामान्य सिद्धांत नहीं; "बहुत मॉडल, कम सिद्धांत"; 1970 के दशक में फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन का वित्त बंद होने के बाद CAG का पतन (1971) और "आत्म-संदेह"; ली सिगेलमैन जैसे विद्वानों की आलोचना कि शोध अनुभवजन्य रूप से कमज़ोर था; पश्चिम-केंद्रितता।
- "आंशिक हाँ" के पक्ष में: हेडी ने "मध्यम-स्तर के सिद्धांतों" (middle-range theories) की बात की, जो बने। उदाहरण: नौकरशाही और राजनीतिक विकास (ला पालोम्बारा), विकासात्मक राज्य (चाल्मर्स जॉनसन), "स्थापित स्वायत्तता" (पीटर एवांस), NPM के प्रसार और नीति-हस्तांतरण पर अध्ययन।
- निष्कर्ष: कोई सार्वभौम सिद्धांत नहीं बना, पर इन उपागमों ने उपयोगी अवधारणाएँ और मध्यम-स्तर के सिद्धांत दिए, और तुलना के माध्यम से "संदर्भ के महत्व" को स्थापित किया।
4. विकास प्रशासन
- अवधारणा: "विकास प्रशासन" शब्द का प्रयोग पहली बार यू.एल. गोस्वामी ने 1955 में किया। इसे लोकप्रिय बनाया एडवर्ड वाइडनर और फ़्रेड रिग्स ने।
- विशेषताएँ: परिवर्तन-उन्मुख, लक्ष्य-उन्मुख (योजनाओं के लक्ष्य), नवाचार, ग्राहक या जन-केंद्रित, सहभागिता, लचीलापन, और समयबद्धता।
- दो पक्ष (रिग्स): "विकास का प्रशासन" (administration of development; विकास कार्यक्रमों का क्रियान्वयन) और "प्रशासन का विकास" (development of administration; प्रशासनिक क्षमता का निर्माण)। दोनों परस्पर-निर्भर हैं।
- बदलता स्वरूप: 1950-60 के दशक में राज्य-केंद्रित नियोजन; 1980-90 के दशक में बाज़ार और संरचनात्मक समायोजन; और 2000 के बाद सुशासन, मानव विकास (अमर्त्य सेन, "Development as Freedom", 1999), सहभागिता, सतत विकास लक्ष्य (SDG, 2015) और अधिकार-आधारित उपागम (भारत में MGNREGA, RTE, NFSA)।
विकास-विरोधी सिद्धांत (Anti-development thesis) (UPSC 2024)
- पृष्ठभूमि: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन के 1949 के "पॉइंट फ़ोर" भाषण में "अल्पविकसित क्षेत्रों" का उल्लेख, जिससे "विकास" का वैश्विक विमर्श शुरू हुआ।
- विचारक और कृतियाँ: आर्टुरो एस्कोबार (Encountering Development, 1995), वोल्फ़गैंग साक्स (The Development Dictionary, 1992), गुस्तावो एस्तेवा, और जेम्स फ़र्ग्यूसन (The Anti-Politics Machine, 1990; लेसोथो का अध्ययन)।
- मुख्य तर्क:
- "विकास" एक पश्चिमी विमर्श है, जो गैर-पश्चिमी समाजों को "पिछड़ा" घोषित करके उन पर पश्चिमी मॉडल थोपता है।
- विकास-परियोजनाओं ने पर्यावरण-विनाश, विस्थापन (बड़े बाँध) और पारंपरिक ज्ञान तथा आजीविका का क्षरण किया।
- विकास "राजनीति-विरोधी मशीन" है: वह राजनीतिक प्रश्नों (भूमि, शक्ति) को "तकनीकी समस्याओं" में बदल देता है और राज्य की नौकरशाही शक्ति का विस्तार करता है।
- विकल्प: स्थानीय, सामुदायिक, सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त और पर्यावरण-अनुकूल मार्ग ("उत्तर-विकास")।
- भारतीय प्रतिध्वनि: गांधी का "हिंद स्वराज" (1909), नर्मदा बचाओ आंदोलन, चिपको, और नियमगिरि।
- आलोचना: विकास के लाभों (स्वास्थ्य, जीवन-प्रत्याशा, साक्षरता) की उपेक्षा; स्थानीय समुदायों का रूमानीकरण; और व्यावहारिक विकल्पों का अभाव।
- प्रभाव: सहभागी विकास, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, पुनर्वास नीति (भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013), और सतत विकास की धारणा पर इसका प्रभाव।
विकासशील देशों में नौकरशाही (UPSC 2024)
- चुनौतियाँ:
- औपनिवेशिक विरासत: नियंत्रण और राजस्व-उन्मुखता; जनता से दूरी।
- प्रिज़्मीय लक्षण: औपचारिकता, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार।
- राजनीतिक प्रभुत्व या उसके विपरीत नौकरशाही का प्रभुत्व (जोसेफ़ ला पालोम्बारा, "Bureaucracy and Political Development", 1963)।
- क्षमता की कमी: विशेषज्ञता, तकनीक, प्रशिक्षण।
- लालफ़ीताशाही और प्रक्रिया-केंद्रितता।
- जवाबदेही का अभाव; और प्रतिनिधित्व का प्रश्न (समाज की विविधता का प्रतिबिंब)।
- सुधार के उपाय: परिणाम-उन्मुखता (कार्य-निष्पादन प्रबंधन), पार्श्व प्रवेश (भारत में 2018 से), डिजिटल शासन, नागरिक-केंद्रितता (चार्टर, सेवा-गारंटी), क्षमता-निर्माण (मिशन कर्मयोगी, 2020), नैतिकता और जवाबदेही (RTI, लोकपाल), विकेंद्रीकरण, और राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षा (निश्चित कार्यकाल, सिविल सेवा बोर्ड)।
- निष्कर्ष: विकासशील देशों में नौकरशाही "विकास का इंजन" भी है और "बाधा" भी। सुधार उसे अधिक अनुक्रियाशील, अनुकूलनशील और विकास-उन्मुख बना सकते हैं।
5. राज्य बनाम बाज़ार, उदारीकरण और नागरिक समाज
राज्य और बाज़ार का संतुलन (UPSC 2024)
- राज्य-केंद्रित पक्ष: बाज़ार-विफलताएँ (सार्वजनिक वस्तुएँ, बाह्य प्रभाव, असमानता); पूर्वी एशिया का "विकासात्मक राज्य" (चाल्मर्स जॉनसन, "MITI and the Japanese Miracle", 1982; दक्षिण कोरिया, ताइवान); और पीटर एवांस का "स्थापित स्वायत्तता" (embedded autonomy, 1995), यानी राज्य समाज से जुड़ा हो पर निजी हितों के कब्ज़े से स्वतंत्र हो।
- बाज़ार-केंद्रित पक्ष: "राज्य-विफलता", जैसे लाइसेंस-राज और किराया-प्राप्ति (ऐन क्रूगर, 1974); "वॉशिंगटन सहमति" (जॉन विलियमसन, 1989): राजकोषीय अनुशासन, उदारीकरण, निजीकरण, विनियमन-मुक्ति।
- संतुलन: विश्व बैंक की विश्व विकास रिपोर्ट 1997 ("The State in a Changing World") के अनुसार राज्य की भूमिका को उसकी क्षमता के अनुरूप रखा जाए, और क्षमता बढ़ाई जाए; राज्य "प्रदाता" के बजाय "सुविधाकर्ता" और "नियामक" बने।
- विकासशील देशों के लिए क्यों आवश्यक: बाज़ार अधूरे हैं और संस्थाएँ कमज़ोर; ग़रीबी और असमानता अधिक है; इसलिए राज्य को अवसंरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा में सक्रिय रहना होगा, जबकि उत्पादन और व्यापार में बाज़ार को स्वतंत्रता देनी होगी।
- भारत: 1991 के सुधार; नियामक संस्थाएँ (SEBI, TRAI, CCI); DBT और JAM त्रिमूर्ति; PLI; और कोविड-19 के दौरान राज्य की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन।
क्या विकास में राज्य की भूमिका को अनुचित महत्व दिया गया है? (UPSC 2025)
- हाँ के पक्ष में:
- सार्वजनिक क्षेत्र की अक्षमता और घाटा।
- लाइसेंस-राज और भ्रष्टाचार।
- नौकरशाही की धीमी गति।
- लोक चयन सिद्धांत के अनुसार राज्य भी स्वार्थी अभिनेताओं से बना है।
- बाज़ार, नागरिक समाज और समुदायों की भूमिका की उपेक्षा।
- सोवियत मॉडल की विफलता।
- नहीं के पक्ष में: पूर्वी एशिया की सफलता राज्य-नेतृत्व से हुई; बाज़ार स्वयं राज्य-निर्मित संस्थाओं (संपत्ति-अधिकार, अनुबंध, नियमन) पर टिका है; 2008 का वित्तीय संकट और कोविड-19 ने राज्य की अनिवार्यता दिखाई; सामाजिक न्याय और समता बाज़ार से नहीं आती; और भारत में हरित क्रांति, इसरो, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (UPI, आधार) राज्य-नेतृत्व के उदाहरण हैं।
- निष्कर्ष: प्रश्न "कितना राज्य" का नहीं, "कैसा राज्य" (प्रभावी, जवाबदेह, सहभागी) का है।
उदारीकरण, NPM और व्यय का विरोधाभास (UPSC 2025)
- अपेक्षा: LPG और NPM का उद्देश्य सरकार के कार्यों और सार्वजनिक व्यय को सीमित करना था ("छोटी सरकार")।
- वास्तविकता: कार्य और व्यय, दोनों बढ़े।
- विरोधाभास के कारण:
- नियामक राज्य का उदय: बाज़ार के लिए नए नियामक, प्रतिस्पर्धा आयोग, उपभोक्ता संरक्षण।
- सामाजिक सुरक्षा की माँग: उदारीकरण से बढ़ी असमानता और असुरक्षा के उत्तर में कल्याण-योजनाएँ (MGNREGA, NFSA, PM-KISAN, आयुष्मान भारत)।
- अवसंरचना पर व्यय: बाज़ार की आवश्यकता के लिए पूँजीगत व्यय बढ़ा।
- अनुबंध और PPP का प्रबंधन स्वयं एक नई प्रशासनिक क्षमता माँगता है।
- लोकतांत्रिक माँगें और "अधिकार-आधारित" क़ानून।
- संकट (2008, कोविड-19) में राज्य का "अंतिम सहारा" बनना।
- वैगनर का नियम (आय बढ़ने के साथ सार्वजनिक व्यय का बढ़ना)।
- निष्कर्ष: राज्य "छोटा" नहीं हुआ, उसका "स्वरूप" बदला: प्रदाता से नियामक, सुविधाकर्ता और सामाजिक सुरक्षा-दाता की ओर।
विकास में नागरिक समाज (UPSC 2025)
- भूमिका: सेवा-वितरण (स्वास्थ्य, शिक्षा), अधिकार-पैरवी (RTI, भोजन का अधिकार अभियान), जवाबदेही (सामाजिक अंकेक्षण), नवाचार, और हाशिये के समूहों को आवाज़। अलेक्सी द तोक्विल और रॉबर्ट पुटनम (सामाजिक पूँजी) के विचार।
- राज्य की ग्रहणशीलता क्यों आवश्यक: पीटर एवांस (1996) के "राज्य-समाज सहक्रिया" (state-society synergy) के अनुसार नागरिक समाज के सुझाव तभी प्रभावी होते हैं जब राज्य की संस्थाएँ उन्हें नीति में शामिल करें। उदाहरण: RTI अधिनियम (MKSS और NCPRI के सुझाव), MGNREGA (नागरिक संगठनों का मसौदा), और केरल का जन योजना अभियान।
- जब राज्य ग्रहणशील न हो: टकराव, अविश्वास, और नागरिक संगठनों पर नियंत्रण (FCRA की सख़्ती)।
- सीमाएँ: नागरिक संगठनों की अपनी जवाबदेही, विदेशी वित्त पर निर्भरता, और अभिजात-प्रभुत्व।
- निष्कर्ष: नागरिक समाज और राज्य प्रतिद्वंद्वी नहीं, पूरक हैं; सहक्रिया ही विकास की कुंजी है।
6. महिला और विकास
- विचार-विकास: विकास में महिलाएँ (WID; एस्टर बोसरप, "Woman's Role in Economic Development", 1970), महिलाएँ और विकास (WAD), और जेंडर और विकास (GAD; 1980 का दशक; शक्ति-संबंधों पर बल)। नैला कबीर के अनुसार सशक्तीकरण के तीन आयाम हैं: संसाधन, कर्तृत्व (agency) और उपलब्धियाँ।
- स्वयं सहायता समूह आंदोलन: NABARD का SHG-बैंक संबद्धता कार्यक्रम (1992), केरल का कुदुंबश्री (1998), दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (2011), बिहार का जीविका, और "लखपति दीदी" (2023)।
आर्थिक विकास अकेले महिला सशक्तीकरण के लिए पर्याप्त नहीं (UPSC 2025)
- तर्क:
- आर्थिक वृद्धि के बावजूद भारत में स्त्री-श्रम भागीदारी लंबे समय तक कम रही (PLFS के अनुसार अब बढ़ी है, पर अवैतनिक देखभाल-कार्य का भार बना है)।
- सामाजिक मानदंड: पितृसत्ता, गतिशीलता पर प्रतिबंध, दहेज, घरेलू हिंसा (NFHS-5 के अनुसार लगभग 29% विवाहित स्त्रियों ने पति-हिंसा का अनुभव बताया)।
- संपत्ति और भूमि-अधिकार में कमी।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व: संसद में लगभग 14% (2024)।
- स्वास्थ्य और शिक्षा में अंतर; लिंगानुपात।
- आय पर नियंत्रण का अभाव: कमाने के बावजूद निर्णय पुरुषों के हाथ में।
- आवश्यक बहुआयामी उपाय: विधिक (घरेलू हिंसा अधिनियम 2005; हिंदू उत्तराधिकार संशोधन 2005), राजनीतिक (पंचायतों में आरक्षण; नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023, यानी 106वाँ संशोधन, जो परिसीमन के बाद लागू होगा), सामाजिक (बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ), सुरक्षा (वन-स्टॉप सेंटर), जेंडर बजटिंग (2005-06 से), और देखभाल-अवसंरचना (क्रेच)।
- निष्कर्ष: सशक्तीकरण "आय" से अधिक "कर्तृत्व" का प्रश्न है; आर्थिक विकास आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं।
7. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| CAG | 1960; रिग्स; फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन | पतन 1971 |
| पारिस्थितिकी | गॉस 1947 (7 तत्व); रिग्स 1961 | सर्वोत्तम अनुकूलता; PDIA |
| रिग्स | एग्रेरिया-इंडस्ट्रिया 1957; प्रिज़्मीय 1964 | साला, क्लेक्ट, औपचारिकता |
| हेडी | 1966; मध्यम-स्तर के सिद्धांत | - |
| विकास प्रशासन | गोस्वामी 1955; वाइडनर, रिग्स | विकास का प्रशासन बनाम प्रशासन का विकास |
| विकास-विरोधी | एस्कोबार 1995; साक्स 1992; फ़र्ग्यूसन 1990 | ट्रूमैन 1949 |
| नौकरशाही | ला पालोम्बारा 1963 | मिशन कर्मयोगी 2020 |
| राज्य-बाज़ार | जॉनसन 1982; एवांस 1995; विलियमसन 1989 | WDR 1997 |
| नागरिक समाज | एवांस 1996: सहक्रिया | RTI, MGNREGA |
| महिला | बोसरप 1970; WID से GAD; कबीर | 106वाँ संशोधन 2023 |
8. चार्ट: रिग्स का प्रिज़्म मॉडल
9. Mind Map
- CAG, उपागम
- पारिस्थितिकी, सिद्धांत की बहस
- प्रिज़्मीय, साला
- इंडस्ट्रिया और उत्तर-आधुनिकता
- विकास प्रशासन
- विकास-विरोधी सिद्धांत
- नौकरशाही, राज्य-बाज़ार
- LPG का विरोधाभास, नागरिक समाज
- WID से GAD तक
- SHG, बहुआयामी सशक्तीकरण
10. महत्वपूर्ण One-liners
- तुलनात्मक प्रशासन समूह (CAG) की स्थापना: 1960 (अध्यक्ष: फ़्रेड रिग्स)।
- प्रशासन की पारिस्थितिकी के सात तत्व: जॉन गॉस (1947)।
- "The Theory of Prismatic Society": रिग्स (1964)।
- "विकास प्रशासन" शब्द का पहला प्रयोग: यू.एल. गोस्वामी (1955)।
- "Encountering Development": आर्टुरो एस्कोबार (1995)।
- "स्थापित स्वायत्तता": पीटर एवांस (1995)।
- "वॉशिंगटन सहमति" शब्द: जॉन विलियमसन (1989)।
- "Woman's Role in Economic Development": एस्टर बोसरप (1970)।
- कुदुंबश्री की शुरुआत: केरल (1998)।
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम: 106वाँ संशोधन (2023)।
11. टिप्स एवं ट्रिक्स
- रिग्स के प्रश्नों में प्रिज़्म का आरेख और भारतीय उदाहरण (औपचारिकता, क्लेक्ट) अवश्य दें।
- "राज्य बनाम बाज़ार" जैसे प्रश्नों में दोनों पक्ष रखकर "कैसा राज्य" पर निष्कर्ष दें।
- महिला-विकास के प्रश्नों में आँकड़े (NFHS-5, PLFS, संसद में प्रतिनिधित्व) और क़ानून दोनों जोड़ें।
रिग्स के समाज: "सं-प्रि-वि" (संलयित, प्रिज़्मीय, विवर्तित)। गॉस के 7 तत्व: "लो-स्था-भौ-सा-इ-आ-व्य"।
12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
एफ़.डब्ल्यू. रिग्स की "इंडस्ट्रिया", यानी परस्पर-निर्भर अर्थव्यवस्था, उत्तर-आधुनिक लोक प्रशासन की कुछ विशेषताओं की पूर्व-सूचक है। विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
इंडस्ट्रिया: विशिष्टता, बाज़ार, उपलब्धि, परस्पर-निर्भरता।
उत्तर-आधुनिक प्रशासन: फ़ॉक्स और मिलर; विखंडन, संवाद, नेटवर्क।
पूर्व-सूचक क्यों: परस्पर-निर्भरता से नेटवर्क; बहुलता; बाज़ार और राज्य; जटिलता।
सीमाएँ: आधुनिकतावादी, भव्य सिद्धांत; भिन्न दार्शनिक नींव।
निष्कर्ष: संरचनात्मक लक्षणों का पूर्वाभास, दार्शनिक निरंतरता नहीं।
विकास-प्रक्रिया में राज्य की भूमिका और उत्तरदायित्व को अधिक महत्व और अनुचित प्राथमिकता दी गई है। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
हाँ के पक्ष में: अक्षमता, लाइसेंस-राज, क्रूगर, लोक चयन, सोवियत मॉडल।
नहीं के पक्ष में: पूर्वी एशिया, संस्थाएँ, 2008 और कोविड, समता, इसरो और UPI।
निष्कर्ष: "कितना राज्य" नहीं, "कैसा राज्य"।
उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण और नवीन लोक प्रबंधन का उद्देश्य सरकार के कार्यों को सीमित करना और सार्वजनिक व्यय घटाना था। फिर भी कार्य और व्यय, दोनों बढ़े हैं। इस विरोधाभास की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अपेक्षा बनाम वास्तविकता।
कारण: नियामक राज्य, सामाजिक सुरक्षा, अवसंरचना, अनुबंध-प्रबंधन, अधिकार-आधारित क़ानून, संकट, वैगनर का नियम।
निष्कर्ष: राज्य का स्वरूप बदला, आकार नहीं घटा।
तुलनात्मक लोक प्रशासन के अध्ययन का आधार संस्थागत उपागम से समकालीन राजनीतिक-आर्थिक प्रक्रिया उपागम तक विकसित हुआ है। क्या इन सभी उपागमों ने तुलनात्मक लोक प्रशासन के सिद्धांत के विकास को संभव बनाया है? अपने उत्तर का औचित्य दीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
विकास-क्रम: संस्थागत, नौकरशाही, संरचनात्मक-कार्यात्मक और पारिस्थितिक, राजनीतिक अर्थव्यवस्था और नव-संस्थावाद।
नहीं: बहुत मॉडल, CAG का पतन, सिगेलमैन, पश्चिम-केंद्रितता।
आंशिक हाँ: मध्यम-स्तर के सिद्धांत (ला पालोम्बारा, जॉनसन, एवांस)।
निष्कर्ष: सार्वभौम सिद्धांत नहीं, उपयोगी अवधारणाएँ हाँ।
विकास-प्रक्रिया में नागरिक समाज की प्रभावशीलता तभी है जब राज्य की संस्थाएँ नागरिक समाज संगठनों के सुझावों के प्रति ग्रहणशील हों। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: सेवा, पैरवी, जवाबदेही; तोक्विल, पुटनम।
सहक्रिया: एवांस 1996; RTI, MGNREGA, केरल।
ग्रहणशीलता न हो तो: टकराव, FCRA।
सीमाएँ और निष्कर्ष।
रिग्स के प्रिज़्मीय मॉडल की अत्यधिक निराशावादी और तकनीकी रूप से जटिल होने के लिए आलोचना की गई है, फिर भी यह तुलनात्मक लोक प्रशासन के शोध के लिए उपयोगी प्रारंभ-बिंदु बना हुआ है। विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
मॉडल: संलयित, प्रिज़्मीय, विवर्तित; प्रिज़्मीय की विशेषताएँ (तालिका); आरेख।
आलोचना: निराशावाद, शब्दावली, पश्चिमी पूर्वाग्रह, स्थिरता।
उपयोगिता: औपचारिकता की समझ, पारिस्थितिक दृष्टि, बाद का शोध; भारतीय उदाहरण।
राज्य के हस्तक्षेप और बाज़ार की स्वतंत्रता के बीच संतुलन विकासशील देशों की आवश्यकता है। टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
राज्य: बाज़ार-विफलता; जॉनसन, एवांस।
बाज़ार: क्रूगर, वॉशिंगटन सहमति।
संतुलन: WDR 1997; सुविधाकर्ता और नियामक।
भारत: 1991, नियामक, DBT, PLI।
विकासशील देशों में नौकरशाही अनेक चुनौतियों का सामना करती है, और उनसे निपटने से वह अधिक अनुक्रियाशील, अनुकूलनशील और विकास-आवश्यकताओं के अनुरूप बनेगी। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
चुनौतियाँ: औपनिवेशिक विरासत, प्रिज़्मीय लक्षण, ला पालोम्बारा, क्षमता, लालफ़ीताशाही, जवाबदेही।
उपाय: परिणाम-प्रबंधन, पार्श्व प्रवेश, डिजिटल, नागरिक-केंद्रितता, कर्मयोगी, नैतिकता, विकेंद्रीकरण, कार्यकाल।
निस्संदेह सामाजिक और ऐतिहासिक कारक प्रशासनिक व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, पर साथ ही इन प्रभावों की समझ अनुक्रियाशील शासन-ढाँचे के निर्माण के लिए आवश्यक है। परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
ऐतिहासिक और सामाजिक कारक (भारत और विश्व के उदाहरण)।
अनुक्रियाशील ढाँचा: आरक्षण, PESA, भाषायी राज्य; सर्वोत्तम अनुकूलता, PDIA।
विकास-विरोधी सिद्धांत परंपरागत विकास-मॉडलों पर एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण है। टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
विचारक: एस्कोबार, साक्स, फ़र्ग्यूसन; ट्रूमैन 1949।
तर्क: पश्चिमी विमर्श, विस्थापन, राजनीति-विरोधी मशीन, उत्तर-विकास।
आलोचना और प्रभाव।
लोक प्रशासन के अध्ययन में उसकी पारिस्थितिकी को शामिल करना आवश्यक है। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
गॉस: सात तत्व। रिग्स: पारस्परिक प्रभाव।
महत्व: प्रतिरोपण की विफलता; भारतीय उदाहरण।
आर्थिक विकास अकेले महिला विकास और सशक्तीकरण का पर्याप्त घटक नहीं है। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
अवधारणा: WID से GAD; कबीर।
तर्क: सामाजिक मानदंड, हिंसा (NFHS-5), संपत्ति, प्रतिनिधित्व, आय पर नियंत्रण।
बहुआयामी उपाय: क़ानून, 106वाँ संशोधन, जेंडर बजटिंग, देखभाल-अवसंरचना।
13. Quick Revision Summary
- तुलनात्मक: CAG, उपागम, पारिस्थितिकी, सामाजिक-ऐतिहासिक कारक, सिद्धांत की बहस।
- रिग्स: एग्रेरिया-इंडस्ट्रिया, प्रिज़्मीय मॉडल, साला, आलोचना, इंडस्ट्रिया और उत्तर-आधुनिकता।
- विकास: विकास प्रशासन, बदलता स्वरूप, विकास-विरोधी सिद्धांत, नौकरशाही।
- राज्य और बाज़ार: विकासात्मक राज्य, वॉशिंगटन सहमति, संतुलन, LPG का विरोधाभास, नागरिक समाज।
- महिला: WID, WAD, GAD; SHG आंदोलन; बहुआयामी सशक्तीकरण।