1. अध्याय एक नज़र में
Paper II का यह अध्याय शासन के उस स्तर पर है जहाँ नागरिक और राज्य सबसे निकट मिलते हैं:
- ज़िला प्रशासन: ज़िलाधीश (कलेक्टर) की बदलती भूमिका; विकास प्रबंधन और विधि-व्यवस्था के बीच संबंध; ज़िला प्रशासन और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण; ज़िलों का पुनर्गठन; क्षेत्रीय संगठन।
- ग्रामीण विकास: स्वतंत्रता के बाद की संस्थाएँ और एजेंसियाँ; ग्रामीण विकास कार्यक्रम; विकेंद्रीकरण और पंचायती राज; 73वाँ संविधान संशोधन; ग्राम सभा; विकेंद्रीकृत नियोजन।
- नगरीय स्थानीय शासन: नगर-शासन की रूपरेखा; 74वाँ संविधान संशोधन; वैश्विक और स्थानीय के बीच संबंध ("न्यू लोकलिज़्म"); नगरीय वित्त; महानगरीय शासन।
2025 में ज़िलाधीश के लिए टीम-भावना, MGNREGA और स्वच्छ भारत में क्षेत्रीय संगठनों का महत्व, ज़िलों के पुनर्गठन की राजनीति, विकेंद्रीकृत नियोजन और सामाजिक न्याय, "न्यू लोकलिज़्म", ग्राम सभा, निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की कठिनाइयाँ, और महानगरीय शासन पूछे गए। 2024 में विकेंद्रीकृत नियोजन, राज्य वित्त आयोग, ग्राम स्वराज की चुनौतियाँ, और नगरीय निकायों के वित्त आए।
2. ज़िला प्रशासन और ज़िलाधीश
- उद्भव: 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने कलेक्टर का पद बनाया, जिसका मूल कार्य राजस्व-संग्रह था। आगे मजिस्ट्रेट के अधिकार भी जुड़े।
- भूमिकाएँ: राजस्व (भू-अभिलेख, भू-राजस्व), ज़िला मजिस्ट्रेट (विधि-व्यवस्था, CrPC/BNSS के अंतर्गत प्रतिबंधात्मक शक्तियाँ), विकास (1952 के सामुदायिक विकास कार्यक्रम के बाद), आपदा-प्रबंधन (ज़िला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अध्यक्ष), ज़िला निर्वाचन अधिकारी, जनगणना, और विभागों के बीच समन्वय।
- बदलती भूमिका:
- न्यायपालिका और कार्यपालिका के पृथक्करण (अनुच्छेद 50; 1973 की CrPC) से न्यायिक भूमिका घटी; बड़े नगरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली।
- पंचायती राज (ज़िला परिषद) से विकास में निर्वाचित निकायों की भूमिका बढ़ी।
- प्रौद्योगिकी और डैशबोर्ड से निगरानी।
- आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (2018; 112 ज़िले), जिसमें ज़िलाधीश "परिवर्तन के अगुआ" के रूप में।
- संकट-प्रबंधक (कोविड-19)।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की 15वीं रिपोर्ट ("राज्य और ज़िला प्रशासन", 2009): ज़िलाधीश के राजस्व-न्यायिक कार्यों का भार घटाना, विकास में पंचायतों की भूमिका बढ़ाना, और ज़िलाधीश को समन्वयक बनाना।
ज़िलाधीश: पद-सोपान से टीम-भावना की ओर (UPSC 2025)
- क्यों आवश्यक: आज की समस्याएँ (कुपोषण, जल, स्वच्छता, आपदा) बहु-विभागीय हैं और कोई एक विभाग उन्हें हल नहीं कर सकता; निर्वाचित पंचायतें, नागरिक समाज और निजी क्षेत्र भी भागीदार हैं; और ज़मीनी कर्मचारियों (ASHA, आंगनवाड़ी, ग्राम सचिव) का मनोबल और पहल परिणाम तय करते हैं।
- टीम-आधारित नेतृत्व के उदाहरण: आकांक्षी ज़िलों में "अभिसरण" (convergence) बैठकें, संयुक्त लक्ष्य और डैशबोर्ड; कोविड-19 में ज़िला-स्तरीय कार्य-बल; चुनाव-प्रबंधन।
- सीमाएँ: विधि-व्यवस्था और आपदा जैसे क्षेत्रों में स्पष्ट कमान (पद-सोपान) भी आवश्यक है; टीम-भावना के लिए अधिकारों का प्रत्यायोजन और विश्वास चाहिए।
- निष्कर्ष: ज़िलाधीश को "शासक" से "सुविधाकर्ता, समन्वयक और टीम-नायक" बनना होगा, पर संकट में "कमांडर" की भूमिका भी निभानी होगी।
ज़िलों का पुनर्गठन: प्रशासनिक सुविधा या राजनीतिक-लोकलुभावन सुविधा? (UPSC 2025)
- प्रवृत्ति: 2011 की जनगणना में 640 ज़िले थे; अब इनकी संख्या 780 से अधिक है। उदाहरण: तेलंगाना (2014 में 10 ज़िलों से बढ़कर अब 33), आंध्र प्रदेश (2022 में 13 से 26), राजस्थान (2023 में 33 से 50; फिर दिसंबर 2024 में नई सरकार ने 9 नए ज़िले निरस्त किए)।
- प्रशासनिक तर्क: छोटे ज़िले होने से प्रशासन जनता के निकट आता है, ज़िला मुख्यालय तक दूरी घटती है, निगरानी बेहतर होती है, और विकास-केंद्र बनते हैं।
- राजनीतिक-लोकलुभावन तर्क: चुनाव से पहले घोषणाएँ; स्थानीय पहचान और माँगों को संतुष्ट करना; निर्वाचन क्षेत्रों का समीकरण; और सरकार बदलने पर पुनर्गठन का उलटना (राजस्थान, 2024), जो वैज्ञानिक मानदंडों की कमी दिखाता है।
- समस्याएँ: नए ज़िलों में अवसंरचना, कर्मचारी और कार्यालयों की कमी; प्रशासनिक लागत; अभिलेखों का विभाजन; और नियोजन-आँकड़ों में असंगति।
- सुधार: वस्तुनिष्ठ मानदंड (जनसंख्या, क्षेत्रफल, दूरी, विकास-सूचक), स्थायी "सीमा-पुनर्गठन आयोग", और व्यय-लाभ का आकलन।
- निष्कर्ष: अनेक राज्यों के अनुभव बताते हैं कि राजनीतिक विचार प्रायः प्रशासनिक सुविधा पर भारी पड़े। फिर भी छोटे ज़िलों के वास्तविक लाभ भी हैं, बशर्ते पुनर्गठन वैज्ञानिक हो।
क्षेत्रीय संगठन और क्रियान्वयन: MGNREGA और स्वच्छ भारत (UPSC 2025)
- MGNREGA (2005): ग्राम पंचायत (कार्यों की योजना और क्रियान्वयन; कम से कम 50% कार्य), ग्राम रोज़गार सेवक, ब्लॉक स्तर पर कार्यक्रम अधिकारी, तकनीकी सहायक, ज़िला कार्यक्रम समन्वयक (प्रायः ज़िलाधीश), सामाजिक अंकेक्षण इकाइयाँ, और NREGASoft तथा भू-टैगिंग।
- स्वच्छ भारत मिशन (2014): "स्वच्छाग्रही" (गाँव-स्तरीय प्रेरक), ब्लॉक समन्वयक, ज़िला जल और स्वच्छता मिशन, सामुदायिक लामबंदी (सामुदायिक नेतृत्व वाली पूर्ण स्वच्छता, यानी CLTS), और शौचालयों की जियो-टैगिंग।
- महत्व: अंतिम छोर तक सेवा-वितरण; स्थानीय अनुकूलन; व्यवहार-परिवर्तन (स्वच्छता); निगरानी और आँकड़े; शिकायत-निवारण; और सामुदायिक विश्वास।
- चुनौतियाँ: कर्मचारियों की कमी और कम मानदेय, भुगतान में देरी (MGNREGA), "लक्ष्य-पूर्ति" का दबाव (शौचालयों का निर्माण पर उपयोग नहीं), और भ्रष्टाचार।
3. पंचायती राज और 73वाँ संशोधन
| वर्ष | चरण | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| 1952-53 | सामुदायिक विकास कार्यक्रम और राष्ट्रीय विस्तार सेवा | ब्लॉक स्तर; जन-सहभागिता की कमी |
| 1957 | बलवंत राय मेहता समिति | त्रि-स्तरीय पंचायती राज ("लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण") |
| 1959 | नागौर, राजस्थान (2 अक्टूबर) | पहली पंचायती राज व्यवस्था |
| 1977-78 | अशोक मेहता समिति | द्वि-स्तरीय (ज़िला परिषद और मंडल पंचायत); दलगत भागीदारी |
| 1985 | जी.वी.के. राव समिति | ज़िला को नियोजन की मूल इकाई; नौकरशाहीकरण की आलोचना |
| 1986 | एल.एम. सिंघवी समिति | संवैधानिक मान्यता की संस्तुति |
| 1992-93 | 73वाँ संशोधन | भाग IX; 24 अप्रैल 1993 से लागू; ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषय |
| 1996 | PESA | पाँचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में ग्राम सभा को विशेष अधिकार |
- 73वें संशोधन के प्रावधान: ग्राम सभा (अनुच्छेद 243A); त्रि-स्तरीय पंचायतें (20 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्यों में मध्यवर्ती स्तर वैकल्पिक); पाँच वर्ष का कार्यकाल; SC और ST के लिए आरक्षण; कम से कम एक-तिहाई सीटें स्त्रियों के लिए (21 राज्यों में 50%); राज्य वित्त आयोग (243I); राज्य निर्वाचन आयोग (243K); और ज़िला योजना समिति (243ZD, 74वें संशोधन से)।
- हाल की पहलें: ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP, 2015 से; "सबकी योजना सबका विकास" अभियान 2018 से), राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (2018; 2022 में पुनर्गठित), ई-ग्रामस्वराज, और स्वामित्व योजना (2020)।
ग्राम सभा और सामुदायिक सहभागिता (UPSC 2025)
- स्वरूप: गाँव की मतदाता-सूची के सभी व्यक्ति, यानी "प्रत्यक्ष लोकतंत्र" का मंच; पंचायत का "विधानमंडल" और "निगरानीकर्ता"।
- कार्य: लाभार्थियों का चयन, योजनाओं की स्वीकृति (GPDP), सामाजिक अंकेक्षण (MGNREGA), उपयोगिता-प्रमाणपत्र, और PESA तथा वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत भूमि-अधिग्रहण और वन-अधिकारों पर सहमति (नियमगिरि, 2013)।
- चुनौतियाँ: कम उपस्थिति (विशेषकर स्त्रियाँ और दलित), गणपूर्ति (कोरम) के अभाव में औपचारिक बैठकें, अभिजात वर्ग का प्रभुत्व, सूचना की कमी, और निर्णयों की उपेक्षा।
- सुधार: राष्ट्रीय पर्वों (26 जनवरी, 1 मई, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर) पर अनिवार्य बैठकें; "महिला सभा" और "बाल सभा"; डिजिटल सूचना; और निर्णयों पर अनुवर्ती कार्रवाई की समीक्षा।
निर्वाचित महिला प्रतिनिधि (UPSC 2025)
- स्थिति: पंचायतों में लगभग 31 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों में लगभग 46% स्त्रियाँ हैं, जो विश्व में सबसे बड़ा स्थानीय महिला नेतृत्व है।
- प्रभावी शासन में कठिनाइयाँ, विशेषकर वंचित पृष्ठभूमि की स्त्रियों के लिए:
- "प्रधान-पति" या "सरपंच-पति" की प्रथा, यानी परोक्ष (proxy) प्रतिनिधित्व।
- पितृसत्तात्मक मानदंड, गतिशीलता पर प्रतिबंध, और घरेलू भार।
- कम साक्षरता और प्रशिक्षण की कमी।
- जाति-आधारित भेदभाव और हिंसा (दलित सरपंचों को झंडा न फहराने देने जैसी घटनाएँ)।
- अधिकारियों और पुरुष सदस्यों का असहयोग।
- आरक्षित सीटों का हर कार्यकाल में बदलना, जिससे अनुभव का संचय नहीं होता।
- कुछ राज्यों में दो-संतान नियम और शैक्षिक योग्यता की शर्तें।
- सफलताएँ: शोध (चट्टोपाध्याय और डुफ़्लो, 2004; पश्चिम बंगाल और राजस्थान) बताता है कि महिला प्रधानों ने पेयजल जैसी स्त्रियों की प्राथमिकताओं में अधिक निवेश किया। केरल और बिहार में स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर नेतृत्व का विकास हुआ।
- उपाय: क्षमता-निर्माण (राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान), आरक्षण का दो कार्यकालों तक रोटेशन, परोक्ष प्रतिनिधित्व पर दंड (पंचायती राज मंत्रालय की सलाहकार समिति, 2023 के बाद की संस्तुतियाँ), महिला सभाएँ, SHG-संबद्धता, और सुरक्षा।
विकेंद्रीकृत नियोजन, आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय (UPSC 2024, 2025)
- अवधारणा: "नीचे से ऊपर" नियोजन, जो स्थानीय आवश्यकताओं, संसाधनों और प्राथमिकताओं पर आधारित हो। अनुच्छेद 243G (आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएँ) और ज़िला योजना समिति (243ZD) इसके आधार हैं।
- आर्थिक विकास में योगदान: संदर्भ-संवेदनशील योजनाएँ (जल, कृषि, आजीविका), संसाधनों का कुशल उपयोग, स्थानीय स्वामित्व से क्रियान्वयन बेहतर, और उत्तरदायित्व।
- सामाजिक न्याय में योगदान: SC, ST और स्त्रियों का प्रतिनिधित्व; स्थानीय स्तर पर अनुसूचित जाति उप-योजना और जनजातीय उप-योजना; और लाभार्थी-चयन में ग्राम सभा।
- सफल उदाहरण: केरल का जन योजना अभियान (1996; राज्य योजना का 35-40% स्थानीय निकायों को)।
- बाधाएँ:
- अपर्याप्त संसाधन: स्वयं के राजस्व-स्रोत बहुत कम; बँधे हुए (tied) अनुदानों पर निर्भरता।
- स्थानीय राजनीति: अभिजात वर्ग का कब्ज़ा; जाति-आधारित संरक्षण; और सामाजिक न्याय के लक्ष्य का विकृत होना।
- लाइन विभागों का प्रभुत्व और 3F का अपूर्ण हस्तांतरण।
- क्षमता की कमी और ज़िला योजना समितियों का निष्क्रिय होना।
- निष्कर्ष: विकेंद्रीकृत नियोजन "संदर्भ-संवेदनशील विकास" की ओर बदलाव है, पर संसाधनों और सशक्त संस्थाओं के बिना सामाजिक न्याय के लक्ष्य अधूरे रहते हैं।
राज्य वित्त आयोग (UPSC 2024)
- प्रावधान: अनुच्छेद 243I (पंचायतें) और 243Y (नगर निकाय); हर पाँच वर्ष में। कार्य: राज्य और स्थानीय निकायों के बीच करों का बँटवारा, स्थानीय निकायों को सौंपे जाने वाले कर, और सहायता-अनुदान की संस्तुति।
- महत्व: स्थानीय निकायों की वित्तीय स्वायत्तता की "संवैधानिक गारंटी"; और राज्य के भीतर समता।
- समस्याएँ: आयोगों के गठन में देरी, रिपोर्टों पर कार्रवाई न होना, कमज़ोर आँकड़े, सदस्यों की विशेषज्ञता का अभाव, और राज्य सरकारों की अनिच्छा।
- सुधार: 15वें वित्त आयोग ने स्थानीय निकायों के अनुदानों को कुछ शर्तों से जोड़ा, जिनमें राज्य वित्त आयोगों का समय पर गठन और उनकी संस्तुतियों पर कार्रवाई भी शामिल है। साथ में समयबद्धता, स्थायी सचिवालय और कार्यवाही-रिपोर्ट का प्रकाशन आवश्यक है।
ग्राम स्वराज की भावना को साकार करने की चुनौतियाँ (UPSC 2024)
- गांधी की दृष्टि: आत्मनिर्भर, स्वशासित, सहभागी "ग्राम गणराज्य"।
- यात्रा: सामुदायिक विकास (1952) से 73वें संशोधन (1992) और PESA (1996) तक।
- चुनौतियाँ:
- 3F (कार्य, कोष, कर्मचारी) का अपूर्ण हस्तांतरण।
- नौकरशाही का प्रभुत्व: पंचायत सचिव पर राज्य का नियंत्रण।
- समानांतर निकाय, जैसे उपयोगकर्ता समितियाँ और विभागीय समितियाँ, जो पंचायतों को बायपास करते हैं।
- स्वयं के राजस्व की कमी।
- अभिजात वर्ग का कब्ज़ा और परोक्ष प्रतिनिधित्व।
- क्षमता की कमी और डिजिटल विभाजन।
- राज्य निर्वाचन आयोगों की कमज़ोरी और चुनावों में देरी।
- निष्कर्ष: संवैधानिक ढाँचा मौजूद है; ग्राम स्वराज के लिए "राजनीतिक इच्छाशक्ति, वित्तीय स्वायत्तता और जन-सहभागिता" की आवश्यकता है।
4. नगरीय स्थानीय शासन
- 74वाँ संशोधन (1992; 1 जून 1993 से लागू): भाग IXA; नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत; बारहवीं अनुसूची के 18 कार्य; वार्ड समितियाँ (3 लाख से अधिक जनसंख्या पर); महानगरीय योजना समिति (243ZE); और स्त्रियों तथा SC/ST के लिए आरक्षण।
- योजनाएँ: JNNURM (2005), AMRUT (2015), स्मार्ट सिटी मिशन (2015), PMAY-U, और स्वच्छ भारत मिशन-नगरीय।
नगरीय निकायों का वित्त (UPSC 2024)
- स्थिति: भारत में नगर निकायों का राजस्व GDP के 1% से भी कम है, जो ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका जैसे देशों से बहुत कम है (RBI की नगरपालिका वित्त रिपोर्टें)।
- कारण: संपत्ति कर का कमज़ोर संग्रह (पुराने मूल्यांकन, छूट, अपूर्ण कर-सूची); GST के बाद चुंगी और प्रवेश-कर जैसे कुछ स्थानीय कर समाप्त होना; राज्य सरकारों पर निर्भरता और अनियमित हस्तांतरण; उपयोगकर्ता-शुल्क की कमी; ऋण लेने की सीमित क्षमता; और राज्य वित्त आयोगों की कमज़ोरी।
- परिणाम: अवसंरचना (जल, जल-निकास, कचरा, परिवहन) की कमी; बाढ़ और प्रदूषण; और नगरों की आर्थिक क्षमता का दोहन न होना।
- उपाय: संपत्ति कर में सुधार (GIS-आधारित मानचित्रण); नगरपालिका बॉन्ड (पुणे, 2017; गाज़ियाबाद के हरित बॉन्ड, 2021); भूमि-मूल्य आधारित वित्त (land value capture); उपयोगकर्ता-शुल्क; GST में नगरों का हिस्सा; और 15वें वित्त आयोग तथा RBI की संस्तुतियों पर अमल।
महानगरीय शासन (UPSC 2025)
- महत्व: नगर राष्ट्रीय आय के बड़े हिस्से (अनुमानतः लगभग 60%) का उत्पादन करते हैं, जिनमें महानगर प्रमुख हैं।
- जटिल संस्थागत संबंध:
- अनेक एजेंसियाँ: नगर निगम, विकास प्राधिकरण (DDA, MMRDA, BDA), जल बोर्ड, परिवहन निगम, पुलिस (राज्य या केंद्र के अधीन), और छावनी बोर्ड।
- अर्ध-सरकारी निकाय (parastatals), जो निर्वाचित निकायों के प्रति उत्तरदायी नहीं।
- महापौर का कमज़ोर पद (अप्रत्यक्ष चुनाव; कुछ राज्यों में एक वर्ष का कार्यकाल) और आयुक्त का प्रभुत्व।
- महानगरीय योजना समितियाँ अधिकांश स्थानों पर गठित ही नहीं हुईं।
- अनेक नगर निकायों में बँटा महानगरीय क्षेत्र (दिल्ली NCR में कई राज्य), जिससे समन्वय की कठिनाई।
- सुधार: सशक्त और प्रत्यक्ष निर्वाचित महापौर, निश्चित कार्यकाल, महानगरीय योजना समितियों का सक्रियकरण, एकीकृत महानगरीय परिवहन प्राधिकरण (UMTA), 74वें संशोधन का पूर्ण क्रियान्वयन, और नगर-स्तरीय आँकड़े तथा जवाबदेही।
"न्यू लोकलिज़्म" (UPSC 2025)
- अवधारणा: ब्रिटेन में 2000 के दशक की नीति-धारा (डैन कोरी और गेरी स्टोकर, 2002; ब्रिटेन का Localism Act, 2011)। केंद्र "राष्ट्रीय न्यूनतम मानक" और ढाँचा तय करता है, और स्थानीय निकायों, समुदायों और नागरिक समूहों को अधिकार, संसाधन और लचीलापन दिया जाता है।
- स्थानीय अभिनेताओं का सशक्तीकरण: स्थानीय निर्णय-स्वायत्तता, साझेदारी (स्थानीय निकाय, नागरिक समाज, निजी क्षेत्र), सामुदायिक अधिकार ("चुनौती का अधिकार", सामुदायिक संपत्ति), और नवाचार।
- भारत में: 73वें और 74वें संशोधन, GPDP, आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम (2023), स्थानीय आपदा-प्रबंधन योजनाएँ, और नगर-स्तरीय जलवायु कार्य-योजनाएँ।
- सीमाएँ: केंद्रीय मानकों के नाम पर नियंत्रण; संसाधनों के बिना उत्तरदायित्व ("अनुदान-रहित आदेश", unfunded mandates); और स्थानीय क्षमता तथा अभिजात वर्ग के कब्ज़े की समस्या।
5. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| ज़िलाधीश | 1772; ARC-II की 15वीं रिपोर्ट 2009 | आकांक्षी ज़िले 2018 |
| ज़िला-पुनर्गठन | 640 (2011) से 780 से अधिक | राजस्थान 2023 और 2024 |
| पंचायती राज | मेहता 1957; नागौर 1959; अशोक मेहता 1977 | सिंघवी 1986 |
| 73वाँ संशोधन | 24 अप्रैल 1993; 29 विषय; 243A, 243I, 243K | PESA 1996 |
| ग्राम सभा | चार अनिवार्य तिथियाँ | नियमगिरि 2013 |
| महिला प्रतिनिधि | लगभग 46%; 21 राज्यों में 50% | चट्टोपाध्याय-डुफ़्लो 2004 |
| विकेंद्रीकृत नियोजन | 243G, 243ZD; केरल 1996 | GPDP 2015 |
| 74वाँ संशोधन | 1 जून 1993; 18 कार्य; 243ZE | AMRUT, स्मार्ट सिटी 2015 |
| नगरीय वित्त | GDP के 1% से कम | नगरपालिका बॉन्ड: पुणे 2017 |
| न्यू लोकलिज़्म | कोरी और स्टोकर 2002; Localism Act 2011 | मानक केंद्र के, निर्णय स्थानीय |
6. चार्ट: पंचायती राज की त्रि-स्तरीय संरचना
7. Mind Map
- ज़िलाधीश की बदलती भूमिका
- पुनर्गठन, क्षेत्रीय संगठन
- समितियाँ, 73वाँ संशोधन
- ग्राम सभा, PESA
- महिला प्रतिनिधि
- विकेंद्रीकृत नियोजन, ग्राम स्वराज
- राज्य वित्त आयोग
- नगरीय वित्त
- 74वाँ संशोधन, महानगर
- न्यू लोकलिज़्म
8. महत्वपूर्ण One-liners
- त्रि-स्तरीय पंचायती राज की संस्तुति: बलवंत राय मेहता समिति (1957)।
- पहली पंचायती राज व्यवस्था: नागौर, राजस्थान (2 अक्टूबर 1959)।
- द्वि-स्तरीय व्यवस्था की संस्तुति: अशोक मेहता समिति (1977-78)।
- पंचायतों को संवैधानिक दर्जे की संस्तुति: एल.एम. सिंघवी समिति (1986)।
- ग्राम सभा: अनुच्छेद 243A।
- राज्य वित्त आयोग: अनुच्छेद 243I और 243Y।
- महानगरीय योजना समिति: अनुच्छेद 243ZE।
- बारहवीं अनुसूची में कार्य: 18।
- पहला आधुनिक नगरपालिका बॉन्ड (स्मार्ट सिटी के बाद): पुणे (2017)।
- "राज्य और ज़िला प्रशासन" रिपोर्ट: ARC-II की 15वीं रिपोर्ट (2009)।
9. टिप्स एवं ट्रिक्स
- हर उत्तर में अनुच्छेद संख्या (243A, 243G, 243I, 243ZD, 243ZE) दें।
- राज्यों के उदाहरण (केरल, राजस्थान, तेलंगाना, बिहार) से उत्तर को ठोस बनाएँ।
- चुनौतियों के साथ 3F का ढाँचा हमेशा उपयोगी है।
पंचायती राज की समितियाँ: "ब-अ-जी-सिं" (बलवंत 1957, अशोक 1977, जी.वी.के. राव 1985, सिंघवी 1986)। ग्राम सभा की तिथियाँ: "26-1-15-2" (26 जनवरी, 1 मई, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर)।
10. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
विभिन्न राज्यों का अनुभव बताता है कि ज़िलों का पुनर्गठन प्रशासनिक सुविधा से अधिक राजनीतिक-लोकलुभावन सुविधा से प्रेरित रहा। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
प्रवृत्ति: 640 से 780 से अधिक; तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान।
प्रशासनिक बनाम राजनीतिक तर्क।
समस्याएँ और सुधार: वस्तुनिष्ठ मानदंड, स्थायी आयोग।
भारत में विकेंद्रीकृत नियोजन संदर्भ-संवेदनशील विकास की ओर बदलाव का संकेत है, पर अपर्याप्त संसाधन और स्थानीय राजनीति सामाजिक न्याय के लक्ष्यों की प्राप्ति को जटिल बनाते हैं। टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
अवधारणा: 243G, 243ZD; केरल।
संदर्भ-संवेदनशीलता के लाभ।
बाधाएँ: संसाधन, अभिजात कब्ज़ा, लाइन विभाग, क्षमता।
भारत में स्थानीय शासन में अनेक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि, विशेषकर वंचित पृष्ठभूमि से, प्रायः प्रभावी ढंग से शासन करने में कठिनाई का सामना करती हैं। परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
स्थिति: लगभग 46%।
कठिनाइयाँ: परोक्ष प्रतिनिधित्व, पितृसत्ता, साक्षरता, जाति-भेद, असहयोग, रोटेशन, दो-संतान नियम।
सफलताएँ: चट्टोपाध्याय-डुफ़्लो; SHG।
उपाय।
महानगर राष्ट्रीय संपदा का बड़ा भाग उत्पन्न करते हैं, पर उनका शासन जटिल संस्थागत संबंधों से भरा है। स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
महत्व: राष्ट्रीय आय में योगदान।
जटिलता: अनेक एजेंसियाँ, अर्ध-सरकारी निकाय, कमज़ोर महापौर, MPC का अभाव, बहु-राज्यीय क्षेत्र।
सुधार: सशक्त महापौर, MPC, UMTA, 74वें संशोधन का पूर्ण क्रियान्वयन।
"राज्य और स्थानीय निकायों के बीच वित्त के वितरण में राज्य वित्त आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण है।" विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
प्रावधान: 243I, 243Y; कार्य।
महत्व और समस्याएँ।
सुधार: 15वें वित्त आयोग की शर्तें, समयबद्धता, सचिवालय।
स्थानीय शासन के रूपांतरण की यात्रा लंबी रही है। ग्राम स्वराज की भावना को साकार करने की चुनौतियों का परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
गांधी की दृष्टि और यात्रा (तालिका)।
चुनौतियाँ: 3F, नौकरशाही, समानांतर निकाय, राजस्व, कब्ज़ा, क्षमता, निर्वाचन आयोग।
निष्कर्ष।
स्थानीय वित्त के प्रबंधन में वित्तीय संसाधनों और स्वतंत्रता की कमी नगरीय क्षेत्रों के आर्थिक और सामाजिक विकास में बाधक है। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
स्थिति: GDP के 1% से कम।
कारण: संपत्ति कर, GST, निर्भरता, शुल्क, ऋण, SFC।
परिणाम और उपाय (GIS, बॉन्ड, भूमि-मूल्य वित्त)।
विकेंद्रीकृत नियोजन आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय को बढ़ाता है। विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
आर्थिक और सामाजिक योगदान; केरल।
सीमाएँ: संसाधन, राजनीति।
समकालीन समय में ज़िलाधीश को पदानुक्रमित संरचनाओं की तुलना में टीम-भावना को प्राथमिकता देनी चाहिए। टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
क्यों: बहु-विभागीय समस्याएँ, भागीदार, ज़मीनी कर्मचारी।
उदाहरण: आकांक्षी ज़िले, कोविड।
सीमा: संकट में स्पष्ट कमान।
MGNREGA और स्वच्छ भारत मिशन जैसी परियोजनाओं के क्रियान्वयन को बेहतर बनाने में क्षेत्रीय संगठनों के महत्व का परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर
संरचना: MGNREGA और SBM के क्षेत्रीय स्तर।
महत्व: अंतिम छोर, अनुकूलन, व्यवहार-परिवर्तन, निगरानी।
चुनौतियाँ।
"न्यू लोकलिज़्म" स्थानीय अभिनेताओं को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विस्तार से बताइए।
मॉडल उत्तर
अवधारणा: कोरी और स्टोकर; Localism Act 2011।
सशक्तीकरण और भारतीय उदाहरण।
सीमाएँ: अनुदान-रहित आदेश, क्षमता।
ग्राम सभा का उद्देश्य सामुदायिक सहभागिता को सुनिश्चित करना है। स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर
स्वरूप और कार्य; PESA, FRA।
चुनौतियाँ और सुधार (अनिवार्य बैठकें, महिला सभा)।
11. Quick Revision Summary
- ज़िला: ज़िलाधीश की भूमिकाएँ और बदलाव; टीम-भावना; पुनर्गठन; क्षेत्रीय संगठन।
- पंचायती राज: समितियों का क्रम; 73वाँ संशोधन; ग्राम सभा; महिला प्रतिनिधि; विकेंद्रीकृत नियोजन; राज्य वित्त आयोग; ग्राम स्वराज।
- नगरीय: 74वाँ संशोधन; नगरीय वित्त; महानगरीय शासन; न्यू लोकलिज़्म।