1. अध्याय एक नज़र में
Paper II (भारतीय प्रशासन) की नींव यह अध्याय है:
- भारतीय प्रशासन का विकास: कौटिल्य का अर्थशास्त्र; मुग़ल प्रशासन; राजनीति और प्रशासन में ब्रिटिश विरासत, यानी सेवाओं का भारतीयकरण, राजस्व प्रशासन, ज़िला प्रशासन और स्थानीय स्वशासन।
- दार्शनिक और संवैधानिक ढाँचा: मुख्य विशेषताएँ और मूल्य; संविधानवाद; राजनीतिक संस्कृति; नौकरशाही और लोकतंत्र; नौकरशाही और विकास।
- सार्वजनिक उपक्रम: आधुनिक भारत में सार्वजनिक क्षेत्र; उपक्रमों के रूप; स्वायत्तता, जवाबदेही और नियंत्रण की समस्याएँ; उदारीकरण और निजीकरण का प्रभाव।
2025 में अर्थशास्त्र का "आजीविका का विज्ञान" होना, औपनिवेशिक विरासत, संवैधानिक मूल्यों का व्यवहार में पालन, और उदारीकरण के बाद सार्वजनिक उपक्रमों की दक्षता पूछे गए। 2024 में अर्थशास्त्र में सार्वजनिक सेवा की नैतिकता, मुग़ल प्रशासन का केंद्रीकृत स्वरूप, सार्वजनिक उपक्रमों की स्वायत्तता, राजनीतिक और स्थायी कार्यपालिका के संबंध, विनिवेश, और "नौकरशाही अधिनायकवाद" आए।
2. कौटिल्य का अर्थशास्त्र
- ग्रंथ: 15 अधिकरण (भाग); 1905 में आर. शामशास्त्री ने इसकी पांडुलिपि की पहचान की, 1909 में प्रकाशित किया और 1915 में अंग्रेज़ी अनुवाद दिया। रचना-काल पर बहस है (मौर्य काल बनाम बाद का संकलन)।
- प्रशासनिक संरचना: सप्तांग सिद्धांत (स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड, मित्र); मंत्रिपरिषद; लगभग तीस "अध्यक्ष" (विभागाध्यक्ष: कोषाध्यक्ष, सीताध्यक्ष यानी कृषि, पण्याध्यक्ष यानी व्यापार); समाहर्ता (राजस्व-संग्रह) और सन्निधाता (कोषाध्यक्ष); गुप्तचर-तंत्र; मंडल सिद्धांत (विदेश नीति)।
"अर्थशास्त्र का अर्थ है लोगों की आजीविका का अर्थशास्त्र" (UPSC 2025)
- परिभाषा (अंतिम अधिकरण): "मनुष्यों की आजीविका (वृत्ति) अर्थ है; मनुष्यों से युक्त भूमि भी अर्थ है; उस भूमि की प्राप्ति और रक्षा का साधन जो शास्त्र है, वही अर्थशास्त्र है।" अर्थात् यह केवल "धन" का नहीं, बल्कि जनता की आजीविका, राज्य की समृद्धि और शासन-कला का शास्त्र है।
- आजीविका पर बल: कृषि (बाँध और सिंचाई, बीज, सीता भूमि), व्यापार और बाज़ार का नियमन (मूल्य, माप-तौल, मिलावट पर दंड), श्रम और शिल्प (श्रेणियाँ), खनन, अकाल-राहत (अन्न-भंडार), और कमज़ोर वर्गों (अनाथ, वृद्ध, विधवाएँ) के भरण-पोषण का राजकीय दायित्व।
- कल्याणकारी दृष्टि: "प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजा के हित में उसका हित है" (प्रथम अधिकरण); "योगक्षेम", यानी प्राप्ति और सुरक्षा।
- सीमा: राज्य का अत्यधिक नियंत्रण (राज्य-एकाधिकार), कठोर दंड, गुप्तचरों का व्यापक उपयोग, और वर्ण-व्यवस्था की स्वीकृति।
- निष्कर्ष: कथन उचित है। अर्थशास्त्र आधुनिक "कल्याणकारी राज्य" और "राजनीतिक अर्थव्यवस्था" का प्राचीन पूर्वरूप है।
अर्थशास्त्र में सार्वजनिक सेवा की नैतिकता (UPSC 2024)
- चयन में सत्यनिष्ठा: मंत्रियों और अधिकारियों की "उपधा" परीक्षा, यानी धर्म, अर्थ, काम और भय, इन चार प्रलोभनों से उनकी ईमानदारी की गुप्त जाँच। केवल "शुद्ध" पाए गए व्यक्तियों को संवेदनशील पद दिए जाते थे।
- भ्रष्टाचार की समझ: राजकीय धन के "अपहरण" के चालीस तरीक़ों का वर्णन। उपमा: जैसे जल में तैरती मछली कब पानी पीती है, पता नहीं चलता, वैसे ही सरकारी कार्य में लगे अधिकारी कब धन लेते हैं, जानना कठिन है।
- नियंत्रण: लेखा-परीक्षण, अधिकारियों का स्थानांतरण, गुप्तचर, कठोर दंड, और ईमानदारी पर पुरस्कार।
- राजधर्म: राजा का स्वयं अनुशासित (इंद्रिय-जय), परिश्रमी और प्रजा-हितैषी होना।
- सीमा: "मत्स्यन्याय" से बचने के लिए दंड पर बल; साध्य की प्राप्ति के लिए नैतिकता में लचीलापन (कूटनीति, छल), जिसके कारण तुलना मैकियावेली से की जाती है।
- निष्कर्ष: कथन आंशिक रूप से सही है। सार्वजनिक सेवा की नैतिकता अर्थशास्त्र की प्रमुख चिंता है, पर वह "नैतिक आदर्शवाद" से अधिक "व्यावहारिक नियंत्रण" पर आधारित है। आधुनिक सतर्कता-तंत्र (CVC, लोकपाल) से इसकी तुलना की जा सकती है।
3. मुग़ल प्रशासन: केंद्रीकृत स्वरूप (UPSC 2024)
| स्तर | प्रमुख अधिकारी | कार्य |
|---|---|---|
| केंद्र | बादशाह; वकील, वज़ीर या दीवान-ए-कुल (राजस्व और वित्त), मीर बख़्शी (सेना और मनसबदारी), ख़ान-ए-सामान (शाही परिवार और कारख़ाने), सद्र-उस-सुदूर (धार्मिक अनुदान), क़ाज़ी-उल-क़ुज़ात (न्याय) | सर्वोच्च सत्ता, नीति, नियुक्ति |
| सूबा (प्रांत) | सूबेदार (कार्यपालिका, सेना), दीवान (राजस्व; सीधे केंद्रीय दीवान के अधीन), बख़्शी, वाक़िआ-नवीस (समाचार-लेखक) | दोहरा नियंत्रण, ताकि सूबेदार बहुत शक्तिशाली न बने |
| सरकार (ज़िला) | फ़ौजदार (क़ानून-व्यवस्था), अमलगुज़ार (राजस्व) | - |
| परगना | शिक़दार, आमिल, क़ानूनगो | - |
| गाँव | मुक़द्दम, पटवारी | - |
- केंद्रीकरण के पक्ष में: बादशाह की निरंकुश सत्ता ("ज़िल्ल-ए-इलाही"); मनसबदारी (सम्राट द्वारा नियुक्ति, पदोन्नति और स्थानांतरण; पद वंशानुगत नहीं); जागीरों का नियमित स्थानांतरण; सूबों में शक्ति-विभाजन (सूबेदार और दीवान); वाक़िआ-नवीस और गुप्तचर-तंत्र; एकरूप राजस्व-व्यवस्था (ज़ब्त); और अकबर के समय सूबों का मानकीकरण (1580 में 12 सूबे)।
- सीमाएँ (विकेंद्रीकरण के तत्व): ज़मींदारों की स्थानीय शक्ति; राजपूतों की "वतन जागीर"; ग्राम-समुदायों की स्वायत्तता; दूरी और संचार की सीमाओं से वास्तविक नियंत्रण कम; और अठारहवीं शताब्दी में सूबेदारों का स्वतंत्र होना (उत्तराधिकारी राज्य)।
- निष्कर्ष: मुग़ल प्रशासन "स्वभाव से" केंद्रीकृत था, पर "व्यवहार में" स्थानीय शक्तियों के साथ समझौते पर टिका था। इसकी अनेक संस्थाएँ (परगना, क़ानूनगो, पटवारी, राजस्व-शब्दावली) ब्रिटिश और आधुनिक भारतीय प्रशासन में जारी रहीं।
4. ब्रिटिश विरासत
| वर्ष | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 1772 | वारेन हेस्टिंग्स द्वारा ज़िला कलेक्टर का पद | ज़िला प्रशासन का आधार |
| 1793 | कॉर्नवालिस: स्थायी बंदोबस्त; सिविल सेवा का पुनर्गठन ("अनुबंधित सिविल सेवा") | "भारतीय सिविल सेवा के जनक" |
| 1853 | चार्टर अधिनियम: खुली प्रतियोगिता | योग्यता-आधारित भर्ती |
| 1861 | पुलिस अधिनियम, भारतीय परिषद अधिनियम | नियंत्रण-उन्मुख पुलिस (यह अधिनियम आज भी कई राज्यों में लागू है) |
| 1864 | सत्येंद्रनाथ टैगोर: ICS में पहले भारतीय | भारतीयकरण की शुरुआत |
| 1882 | रिपन का प्रस्ताव | "स्थानीय स्वशासन के जनक" |
| 1886-87 | एचिसन आयोग | इंपीरियल, प्रांतीय और अधीनस्थ सेवाएँ |
| 1907-09 | विकेंद्रीकरण पर शाही आयोग | ग्राम पंचायतों की संस्तुति |
| 1912-15 | इस्लिंगटन आयोग | भारतीयकरण का विस्तार |
| 1923-24 | ली आयोग | 15 वर्ष में 50:50 भारतीयकरण; 1926 में लोक सेवा आयोग |
| 1935 | भारत सरकार अधिनियम | संघीय लोक सेवा आयोग (1937); प्रांतीय आयोग |
- "इस्पाती ढाँचा": ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज (1922) ने ICS को ब्रिटिश शासन का "स्टील फ़्रेम" कहा। संविधान सभा में सरदार पटेल ने अखिल भारतीय सेवाओं का समर्थन किया (अनुच्छेद 312)।
औपनिवेशिक विरासत और स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक समस्याएँ (UPSC 2025)
- कथन का अर्थ: ईस्ट इंडिया कंपनी के "राइटर" (लिपिक) और "फ़ैक्टर" (व्यापारी) कलेक्टर, मजिस्ट्रेट, गवर्नर और सिविल सेवक बन गए। यानी प्रशासन की जड़ें "व्यापारिक लाभ" और "राजस्व-संग्रह" में थीं, जनसेवा में नहीं।
- विरासत से जुड़ी समस्याएँ:
- नियंत्रण और राजस्व-उन्मुखता: "शासक-प्रजा" मानसिकता; जनता से दूरी।
- गोपनीयता: शासकीय गुप्त बात अधिनियम (1923)।
- पदानुक्रम और लालफ़ीताशाही: फ़ाइल-संस्कृति, प्रक्रिया-केंद्रितता।
- सामान्यज्ञ (generalist) का प्रभुत्व: विशेषज्ञता की उपेक्षा।
- औपनिवेशिक क़ानून: पुलिस अधिनियम 1861; राजद्रोह की धारा (IPC 124A), जिसे 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने निलंबित किया और भारतीय न्याय संहिता (2023) में हटाया गया, पर उसकी धारा 152 के समान प्रावधानों पर बहस है।
- ज़िलाधीश की अत्यधिक शक्ति और केंद्रीकरण।
- प्रति-तर्क: विरासत में सकारात्मक तत्व भी थे: योग्यता-आधारित भर्ती, अखिल भारतीय सेवाएँ, विधि का शासन, लिखित अभिलेख, और राष्ट्रीय एकता का प्रशासनिक ढाँचा। समस्याओं के कुछ कारण स्वतंत्रता के बाद के भी हैं: राजनीतिकरण, भ्रष्टाचार, सुधारों में देरी।
- सुधार की दिशा: नागरिक-केंद्रित प्रशासन (RTI, सेवा-गारंटी), पुलिस सुधार (प्रकाश सिंह, 2006), पुराने क़ानूनों की समाप्ति (2014 के बाद 1,500 से अधिक अप्रचलित क़ानून निरस्त), तीन नई आपराधिक संहिताएँ (1 जुलाई 2024 से लागू), और मिशन कर्मयोगी।
- निष्कर्ष: औपनिवेशिक विरासत अनेक समस्याओं की "जड़" है, पर एकमात्र कारण नहीं; स्वतंत्र भारत ने उसे बदलने में भी देर की।
5. संवैधानिक ढाँचा, नौकरशाही और लोकतंत्र
- मूल्य: प्रस्तावना (न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व; संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य), संसदीय प्रणाली, संघवाद, मौलिक अधिकार, नीति-निदेशक तत्व, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएँ।
- संविधानवाद: सीमित सरकार; मूल ढाँचे का सिद्धांत (केशवानंद भारती, 1973)।
- राजनीतिक संस्कृति: गेब्रियल आलमंड और सिडनी वर्बा (The Civic Culture, 1963) के अनुसार संकीर्ण (parochial), अधीनस्थ (subject) और सहभागी (participant) संस्कृतियाँ होती हैं; भारत में तीनों का मिश्रण है।
संवैधानिक मूल्यों का व्यवहार में पालन (UPSC 2025)
- सशक्त ढाँचा: 73वें और 74वें संशोधन (विकेंद्रीकरण), RTI और लोकपाल (जवाबदेही), स्वतंत्र संस्थाएँ (CAG, निर्वाचन आयोग), और न्यायिक पुनर्विलोकन।
- व्यवहार की "वास्तविक परीक्षा":
- संस्थाएँ: स्थानीय निकायों को "3F" (कार्य, कोष, कर्मचारी) का अपूर्ण हस्तांतरण; राज्य निर्वाचन आयोगों और राज्य वित्त आयोगों की कमज़ोरी; रिक्तियाँ (सूचना आयोग)।
- नागरिक समाज: सामाजिक अंकेक्षण, जन-आंदोलन, मीडिया।
- नागरिक: मतदान और ग्राम सभा में भागीदारी, कर्तव्य (अनुच्छेद 51A), और विधि का पालन।
- डॉ. आंबेडकर की चेतावनी (25 नवंबर 1949): संविधान कितना भी अच्छा हो, यदि उसे लागू करने वाले बुरे हों तो वह बुरा सिद्ध होगा; और राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र में बदलना होगा।
- निष्कर्ष: संविधान "ढाँचा" देता है, पर उसे "जीवंत" बनाना संस्थाओं, नागरिक समाज और नागरिकों की "संवैधानिक नैतिकता" पर निर्भर है।
राजनीतिक और स्थायी कार्यपालिका के बदलते संबंध (UPSC 2024)
- आदर्श: मंत्री नीति तय करता है और जवाबदेह होता है; सिविल सेवक निष्पक्ष सलाह देता है ("निर्भीक और स्पष्ट" परामर्श) और क्रियान्वयन करता है; तटस्थता, गुमनामी और स्थायित्व।
- बदलाव:
- 1969-70 के दशक में "प्रतिबद्ध नौकरशाही" (committed bureaucracy) की धारणा; आपातकाल (1975-77) और उसके बाद शाह आयोग।
- बार-बार के स्थानांतरण (अशोक खेमका जैसे अधिकारियों के उदाहरण), और राजनीतिक संरक्षण तथा निष्ठा के आधार पर पदस्थापन।
- प्रधानमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री कार्यालय का केंद्रीकरण।
- पार्श्व प्रवेश (2018) और विशेषज्ञों की भूमिका।
- परिणाम-आधारित और मिशन-मोड प्रशासन।
- प्रशासन पर प्रभाव: नकारात्मक: तटस्थता का क्षरण, निर्णय-भय ("नीतिगत पक्षाघात"), कम मनोबल, अल्पकालिक कार्यकाल से निरंतरता की कमी। सकारात्मक: राजनीतिक नेतृत्व से गति और जवाबदेही, और लक्ष्य-आधारित क्रियान्वयन।
- सुधार: टी.एस.आर. सुब्रमण्यन बनाम भारत संघ (2013) के निर्देश: सिविल सेवा बोर्ड, न्यूनतम कार्यकाल, और मौखिक निर्देशों को लिखित रूप में दर्ज करना। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने लोक सेवा क़ानून और "सिविल सेवा मूल्यों" की संस्तुति की।
नौकरशाही अधिनायकवाद (UPSC 2024)
- अवधारणा: गिलेर्मो ओ'डॉनेल ("Modernization and Bureaucratic-Authoritarianism", 1973) ने यह शब्द दिया। संदर्भ: 1960-70 के दशक का लैटिन अमेरिका (ब्राज़ील 1964, अर्जेंटीना 1966 और 1976, चिली 1973, उरुग्वे)।
- विशेषताएँ:
- सेना और तकनीकी विशेषज्ञ नौकरशाहों (technocrats) का गठबंधन, जो "संस्था" के रूप में शासन करता है, किसी एक करिश्माई नेता के रूप में नहीं।
- लोकप्रिय क्षेत्र (मज़दूर, ट्रेड यूनियन, वामपंथी दल) का राजनीति से बहिष्कार; दमन।
- "विराजनीतिकरण": राजनीतिक प्रश्नों को "तकनीकी" समस्याएँ बताना।
- औद्योगीकरण को "गहरा" करने के लिए विदेशी पूँजी और घरेलू बड़े पूँजीपतियों से गठबंधन।
- "व्यवस्था" और "विकास" के नाम पर वैधता।
- कारण (ओ'डॉनेल): आयात-प्रतिस्थापन के "आसान चरण" के बाद आर्थिक संकट, लोकप्रिय क्षेत्र का राजनीतिक दबाव, और अभिजात वर्ग का भय।
- अन्य उदाहरण: दक्षिण कोरिया (पार्क चुंग-ही) और इंडोनेशिया (सुहार्तो) के "विकासात्मक अधिनायकवाद" से तुलना।
- प्रासंगिकता: लोकतंत्र में भी "तकनीकी शासन" (technocracy) और सहभागिता के बीच संतुलन का प्रश्न।
6. सार्वजनिक उपक्रम
- विकास: औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1948 और 1956 (अनुसूची A में 17 उद्योग राज्य के लिए आरक्षित); "अर्थव्यवस्था की ऊँचाइयों पर नियंत्रण" (commanding heights); कल्याणकारी और समाजवादी दृष्टि।
- रूप: विभागीय उपक्रम (रेलवे), वैधानिक निगम, और सरकारी कंपनियाँ।
- दर्जा: नवरत्न (1997), मिनीरत्न (1997) और महारत्न (2009), जिनसे निवेश और निर्णय में अधिक स्वायत्तता मिलती है।
- समझौता ज्ञापन (MoU) प्रणाली: अर्जुन सेनगुप्ता समिति (1984) की संस्तुति पर 1988 से; सरकार और उपक्रम के बीच लक्ष्य और स्वायत्तता का समझौता।
"सार्वजनिक उपक्रमों की स्वायत्तता एक मिथक है" (UPSC 2024)
- मिथक के पक्ष में:
- संबंधित मंत्रालय के निर्देश और "प्रशासनिक मंत्रालय" का नियंत्रण।
- शीर्ष नियुक्तियाँ सरकार द्वारा (लोक उद्यम चयन बोर्ड, यानी PESB, और मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति)।
- बहु-स्तरीय जवाबदेही: CAG, सार्वजनिक उपक्रम समिति (COPU), CVC, RTI, संसदीय प्रश्न।
- सामाजिक उद्देश्य (मूल्य-नियंत्रण, रोज़गार, क्षेत्रीय संतुलन), जो वाणिज्यिक निर्णयों पर हावी।
- सरकार के लिए लाभांश और विनिवेश का दबाव।
- "4C" का भय: CBI, CVC, CAG और न्यायालय, जिससे प्रबंधकों में निर्णय-भय।
- विपक्ष में: नवरत्न और महारत्न को निवेश और संयुक्त उपक्रम में अधिकार; MoU प्रणाली; सूचीबद्ध कंपनियों में स्वतंत्र निदेशक और SEBI के मानदंड; और कुछ उपक्रमों (ONGC, NTPC) की सफलता।
- संतुलन: "जवाबदेही के साथ स्वायत्तता"; "पेशेवर बोर्ड" और "होल्डिंग कंपनी" मॉडल (सिंगापुर की टेमासेक जैसा), जिसका सुझाव विभिन्न समितियों ने दिया।
उदारीकरण, दक्षता और विनिवेश (UPSC 2024, 2025)
- दक्षता बढ़ाने में उदारीकरण की भूमिका: निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा (दूरसंचार, विमानन, बैंकिंग), शेयर-बाज़ार में सूचीबद्धता से अनुशासन, MoU और प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन, और प्रौद्योगिकी का आधुनिकीकरण।
- बहस: कई उपक्रमों का प्रदर्शन सुधरा (उदाहरण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पुनर्पूँजीकरण के बाद लाभ में लौटना), पर कुछ प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए (BSNL और MTNL; 2019 और 2022 में पुनरुद्धार पैकेज)। सफलता का संबंध स्वायत्तता और प्रबंधन की गुणवत्ता से अधिक है, केवल उदारीकरण से नहीं।
- विनिवेश: 1991 से; विनिवेश विभाग (1999) और 2016 से DIPAM; रणनीतिक बिक्री (BALCO 2001, VSNL 2002, जनवरी 2022 में एयर इंडिया का टाटा समूह को हस्तांतरण); 2022 में LIC का IPO; और नई सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम नीति (2021), जिसमें "रणनीतिक" क्षेत्रों में न्यूनतम उपस्थिति और "गैर-रणनीतिक" क्षेत्रों से निकास की बात है।
- विनिवेश के लाभ: राजकोषीय संसाधन, दक्षता, बाज़ार-अनुशासन, सरकार का "प्रमुख कार्यों" पर ध्यान, और घाटे वाले उपक्रमों का बोझ कम होना।
- विनिवेश के दोष: रणनीतिक परिसंपत्तियों का खोना, कम मूल्यांकन ("परिवार के गहने बेचना"), रोज़गार और आरक्षण पर प्रभाव, सामाजिक उद्देश्यों की उपेक्षा, सांठगांठ के आरोप, और राजस्व-लक्ष्यों का प्रायः पूरा न होना।
- निष्कर्ष: सार्वजनिक उपक्रम दशकों तक कल्याणवाद की आधारशिला रहे। विनिवेश को "राजस्व जुटाने" के बजाय "दक्षता और सामाजिक लक्ष्यों के संतुलन" के रूप में देखना चाहिए।
7. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| अर्थशास्त्र | 15 अधिकरण; शामशास्त्री 1909 | "वृत्ति" (आजीविका); योगक्षेम |
| नैतिकता | उपधा परीक्षा; 40 तरीक़े | मछली की उपमा |
| मुग़ल | दीवान, मीर बख़्शी, सद्र; सूबा, सरकार, परगना | वाक़िआ-नवीस; 1580 में 12 सूबे |
| ब्रिटिश | 1772, 1793, 1853, 1864, 1882 | ली आयोग; लोक सेवा आयोग 1926 |
| विरासत | OSA 1923; पुलिस अधिनियम 1861 | नई संहिताएँ 1 जुलाई 2024 |
| संविधान | केशवानंद 1973; आलमंड-वर्बा 1963 | आंबेडकर 25 नवंबर 1949 |
| कार्यपालिका-संबंध | प्रतिबद्ध नौकरशाही; शाह आयोग | टी.एस.आर. सुब्रमण्यन 2013 |
| नौकरशाही अधिनायकवाद | ओ'डॉनेल 1973 | ब्राज़ील 1964, चिली 1973 |
| सार्वजनिक उपक्रम | IPR 1956; MoU 1988; रत्न-दर्जे 1997, 2009 | PESB; 4C |
| विनिवेश | DIPAM 2016; एयर इंडिया 2022 | नई PSE नीति 2021 |
8. चार्ट: भारतीय प्रशासन का विकास-क्रम
9. Mind Map
- अर्थशास्त्र
- आजीविका, नैतिकता
- मुग़ल ढाँचा
- केंद्रीकरण की सीमाएँ
- ICS, आयोग
- विरासत और समस्याएँ
- मूल्य, संविधानवाद
- नौकरशाही और लोकतंत्र
- स्वायत्तता
- उदारीकरण, विनिवेश
10. महत्वपूर्ण One-liners
- अर्थशास्त्र का प्रकाशन: आर. शामशास्त्री (1909)।
- अधिकारियों की गुप्त ईमानदारी-परीक्षा: उपधा।
- मुग़ल सूबों में समाचार-लेखक: वाक़िआ-नवीस।
- ज़िला कलेक्टर का पद: वारेन हेस्टिंग्स (1772)।
- ICS में पहले भारतीय: सत्येंद्रनाथ टैगोर (1864)।
- "स्थानीय स्वशासन के जनक": लॉर्ड रिपन (1882)।
- "स्टील फ़्रेम": लॉयड जॉर्ज (1922)।
- भारत में पहला लोक सेवा आयोग: 1926 (ली आयोग की संस्तुति)।
- "नौकरशाही अधिनायकवाद": गिलेर्मो ओ'डॉनेल (1973)।
- सार्वजनिक उपक्रमों में MoU प्रणाली: 1988 (अर्जुन सेनगुप्ता समिति)।
11. टिप्स एवं ट्रिक्स
- कौटिल्य और मुग़ल प्रशासन के प्रश्नों में आधुनिक प्रासंगिकता (CVC, ज़िला प्रशासन) अवश्य जोड़ें।
- ब्रिटिश विरासत के प्रश्नों में सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों पक्ष दें।
- सार्वजनिक उपक्रमों पर नवीनतम उदाहरण (एयर इंडिया 2022, PSE नीति 2021) दें।
उपधा के चार प्रलोभन: "ध-अ-का-भ" (धर्म, अर्थ, काम, भय)। ब्रिटिश आयोग: "ए-इ-ली" (एचिसन 1886, इस्लिंगटन 1912, ली 1923)।
12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
"स्वतंत्र भारत की अनेक प्रशासनिक समस्याओं के लिए औपनिवेशिक विरासत उत्तरदायी है, क्योंकि कंपनी के एजेंट और व्यापारी मजिस्ट्रेट, गवर्नर और सिविल सेवक बन गए।" विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अर्थ: व्यापार और राजस्व से उत्पन्न प्रशासन।
समस्याएँ: नियंत्रण-उन्मुखता, गोपनीयता, लालफ़ीताशाही, सामान्यज्ञ, औपनिवेशिक क़ानून, ज़िलाधीश की शक्ति।
प्रति-तर्क: सकारात्मक विरासत; स्वतंत्रता के बाद के कारण।
सुधार: RTI, प्रकाश सिंह, निरस्त क़ानून, नई संहिताएँ, कर्मयोगी।
निष्कर्ष: जड़, पर एकमात्र कारण नहीं।
यद्यपि संविधान विकेंद्रीकृत और जवाबदेह शासन के लिए सशक्त ढाँचा देता है, वास्तविक परीक्षा इसमें है कि संस्थाएँ, नागरिक समाज और नागरिक व्यवहार में संवैधानिक मूल्यों को कैसे बनाए रखते हैं। परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
ढाँचा: 73वाँ और 74वाँ संशोधन, RTI, संस्थाएँ, पुनर्विलोकन।
व्यवहार: संस्थाएँ (3F, SEC, SFC, रिक्तियाँ), नागरिक समाज, नागरिक (51A)।
आंबेडकर की चेतावनी; संवैधानिक नैतिकता।
भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण ने सार्वजनिक उपक्रमों को अपनी दक्षता बढ़ाने के लिए बाध्य किया है, पर इन सुधारों के प्रभाव बहस का विषय रहे हैं। विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
दक्षता के कारक: प्रतिस्पर्धा, सूचीबद्धता, MoU, रत्न-दर्जे।
बहस: बैंकों का पुनरुद्धार बनाम BSNL; स्वायत्तता और प्रबंधन की भूमिका।
निष्कर्ष: उदारीकरण आवश्यक, पर पर्याप्त नहीं।
राजनीतिक और स्थायी कार्यपालिका के बीच बदलते संबंधों को देखते हुए प्रशासन पर उनके प्रभाव का परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
आदर्श: तटस्थता, गुमनामी, स्थायित्व।
बदलाव: प्रतिबद्ध नौकरशाही, आपातकाल, स्थानांतरण, PMO, पार्श्व प्रवेश।
प्रभाव: नकारात्मक और सकारात्मक।
सुधार: 2013 का निर्णय, ARC-II।
सार्वजनिक उपक्रम दशकों से भारत में कल्याणवाद की आधारशिला रहे हैं। वर्तमान विनिवेश परिदृश्य के गुण-दोषों का मूल्यांकन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: IPR 1956; कल्याणवाद।
विनिवेश: DIPAM; एयर इंडिया, LIC; PSE नीति 2021।
गुण और दोष।
निष्कर्ष: दक्षता और सामाजिक लक्ष्यों का संतुलन।
नौकरशाही अधिनायकवाद की अवधारणा गैर-लोकतांत्रिक शासन के मॉडलों में से एक है। स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
ओ'डॉनेल (1973); लैटिन अमेरिका।
विशेषताएँ: सेना और टेक्नोक्रैट, बहिष्कार, विराजनीतिकरण, विदेशी पूँजी, वैधता।
कारण और तुलना (पार्क, सुहार्तो); लोकतंत्र में प्रासंगिकता।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अर्थ है लोगों की आजीविका का अर्थशास्त्र। टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
परिभाषा: "वृत्ति" अर्थ है।
आजीविका: कृषि, व्यापार, श्रम, अकाल, कल्याण।
सीमा: राज्य-नियंत्रण, कठोर दंड।
"सार्वजनिक सेवाओं में नैतिकता कौटिल्य के अर्थशास्त्र की मुख्य चिंता रही है।" कथन का परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर
उपधा; 40 तरीक़े; नियंत्रण; राजधर्म।
सीमा: व्यावहारिक नियंत्रण, कूटनीति।
"मुग़ल प्रशासन स्वभाव से केंद्रीकृत था।" विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर
पक्ष: बादशाह, मनसबदारी, स्थानांतरण, दोहरा नियंत्रण, वाक़िआ-नवीस।
सीमाएँ: ज़मींदार, वतन जागीर, ग्राम।
निरंतरता: परगना, पटवारी।
"सार्वजनिक उपक्रमों की स्वायत्तता एक मिथक है।" विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर
मिथक: मंत्रालय, नियुक्तियाँ, बहु-जवाबदेही, सामाजिक उद्देश्य, 4C।
विपक्ष: रत्न-दर्जे, MoU, स्वतंत्र निदेशक।
संतुलन: जवाबदेही के साथ स्वायत्तता; होल्डिंग कंपनी।
13. Quick Revision Summary
- कौटिल्य: संरचना, आजीविका, नैतिकता, सीमाएँ।
- मुग़ल: तीन स्तर, केंद्रीकरण और उसकी सीमाएँ, निरंतरता।
- ब्रिटिश: समय-रेखा, भारतीयकरण, विरासत और सुधार।
- संविधान: मूल्य, संविधानवाद, राजनीतिक संस्कृति, कार्यपालिका-संबंध, नौकरशाही अधिनायकवाद।
- सार्वजनिक उपक्रम: रूप, दर्जे, MoU, स्वायत्तता, उदारीकरण, विनिवेश।