UPSC Mains · Public Administration · Paper I · अध्याय 6

संगठन, प्रशासनिक सुधार एवं ई-गवर्नेंस

Organisations, Administrative Reforms and E-Governance

सार्वजनिक उपक्रम, बोर्ड-आयोग, PPP; O&M, कार्य अध्ययन, MIS, PERT/CPM; ई-गवर्नेंस, सुशासन और प्रशासनिक सुधार की प्रक्रिया।

Paper I 16 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

Paper I के व्यावहारिक खंड इस अध्याय में हैं:

  • संगठन के रूप: मंत्रालय और विभाग, सार्वजनिक निगम, सरकारी कंपनियाँ, बोर्ड और आयोग, तदर्थ और सलाहकार निकाय; मुख्यालय और क्षेत्रीय कार्यालयों के संबंध; नियामक प्राधिकरण; सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP)।
  • प्रशासनिक सुधार की तकनीकें: संगठन और पद्धति (O&M), कार्य-अध्ययन और कार्य-प्रबंधन; ई-गवर्नेंस और सूचना प्रौद्योगिकी; प्रबंधन-सहायक उपकरण, जैसे नेटवर्क विश्लेषण, MIS, PERT और CPM।
  • प्रशासनिक सुधार: प्रक्रिया और बाधाएँ।

2025 में ई-गवर्नेंस का "ई-एडवोकेसी" मॉडल, NPM ढाँचे में PPP द्वारा बंद और खुले संगठन-मॉडलों की "एन्ट्रॉपी" को चुनौती, और प्रबंधन-सहायक उपकरणों की प्रभावशीलता पूछी गई। 2024 में CPM, ई-गवर्नेंस का भविष्य, मुख्यालय और क्षेत्रीय एजेंसियों के संबंध, और नियामक प्राधिकरणों की स्वतंत्रता आए।

2. संगठन के रूप

रूपविशेषताएँउदाहरण
विभागमंत्री के अधीन; संसद के प्रति प्रत्यक्ष उत्तरदायित्व; बजट से वित्त; गुलिक के चार आधारों पर गठन (उद्देश्य, प्रक्रिया, ग्राहक, स्थान)गृह मंत्रालय, रेल मंत्रालय (विभागीय उपक्रम)
सार्वजनिक निगमसंसद के विशेष अधिनियम से; अलग विधिक व्यक्तित्व; प्रबंधकीय स्वायत्तता और सार्वजनिक जवाबदेही का संयोजन (ब्रिटेन का "मॉरिसन मॉडल")भारतीय जीवन बीमा निगम (1956), भारतीय खाद्य निगम (1965)
सरकारी कंपनीकंपनी अधिनियम के अंतर्गत; सरकार की कम से कम 51% हिस्सेदारी (कंपनी अधिनियम 2013, धारा 2(45))SAIL, ONGC, BHEL
बोर्ड और आयोगबहु-सदस्यीय; अर्ध-न्यायिक या नियामक कार्यनिर्वाचन आयोग, केंद्रीय सतर्कता आयोग, रेलवे बोर्ड
तदर्थ और सलाहकार निकायकिसी विशेष विषय पर अल्पकालिकप्रशासनिक सुधार आयोग, वेतन आयोग, विशेषज्ञ समितियाँ

मुख्यालय और क्षेत्रीय एजेंसियों के संबंध (UPSC 2024)

  • भूमिकाएँ: मुख्यालय नीति, नियोजन, संसाधन-आवंटन, समन्वय और निगरानी करता है; क्षेत्रीय एजेंसियाँ क्रियान्वयन, जनता से संपर्क और स्थानीय सूचना का काम करती हैं।
  • संघर्ष के स्रोत: केंद्रीकरण बनाम विवेकाधिकार; मुख्यालय की ज़मीनी वास्तविकता से दूरी; क्षेत्रीय स्तर पर संसाधन और अधिकार की कमी; दोहरी निष्ठा (विभागीय मुख्यालय बनाम ज़िलाधीश; जेम्स फ़ेस्लर का "कार्यात्मक बनाम क्षेत्रीय" प्रशासन का भेद); और रिपोर्टिंग का बोझ।
  • प्रभावी संचार क्यों कुंजी है: दो-तरफ़ा संचार (ऊपर से निर्देश, नीचे से प्रतिपुष्टि) से नीतियाँ ज़मीनी अनुभव पर आधारित होती हैं (मौन ज्ञान); स्पष्ट दिशानिर्देश और प्रत्यायोजन से क्षेत्रीय स्तर पर आत्मविश्वास बढ़ता है; और विश्वास से निरीक्षण के स्थान पर सहयोग आता है।
  • आधुनिक उपकरण: वीडियो-कॉन्फ़्रेंसिंग, डैशबोर्ड और रीयल-टाइम निगरानी (PRAGATI, PM गति शक्ति), ई-ऑफ़िस, क्षेत्रीय दौरे और सम्मेलन। सावधानी: डिजिटल निगरानी से "सूक्ष्म-प्रबंधन" और क्षेत्रीय पहल का दमन न हो।
  • निष्कर्ष: स्वस्थ संबंध "नियंत्रण" से नहीं, "संचार, प्रत्यायोजन और विश्वास" से बनते हैं।

नियामक प्राधिकरण: स्वतंत्रता और बाहरी कारक (UPSC 2024)

  • उद्भव: उदारीकरण के बाद राज्य "प्रदाता" से "नियामक" बना। अमेरिका में स्वतंत्र नियामक आयोगों की परंपरा अंतरराज्यीय वाणिज्य आयोग (1887) से है।
  • भारत में: SEBI (1992), TRAI (1997), केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (1998), IRDAI (1999), भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI, 2003), PNGRB (2006), भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI, 2008)।
  • स्वतंत्रता और प्रभावशीलता के आधार: वैधानिक दर्जा, निश्चित कार्यकाल, विशेषज्ञता, अर्ध-न्यायिक शक्तियाँ और उपभोक्ता-संरक्षण।
  • बाहरी कारकों का प्रभाव:
    • नियामक कब्ज़ा (regulatory capture): जॉर्ज स्टिग्लर (1971) के अनुसार नियामक उन्हीं उद्योगों के हितों के अधीन हो सकते हैं जिन्हें वे नियंत्रित करते हैं।
    • नियुक्तियाँ: सरकार द्वारा; प्रायः सेवानिवृत्त अधिकारी; "सेवानिवृत्ति के बाद का पद" और "घूमता दरवाज़ा" (revolving door)।
    • वित्तीय निर्भरता सरकार पर।
    • नीति-निर्देश: कुछ क़ानूनों में सरकार को नीति-निर्देश देने का अधिकार।
    • क्षेत्राधिकार का अतिव्यापन (जैसे TRAI और CCI)।
    • न्यायिक अपीलों में देरी।
    • जवाबदेही की कमी: संसद के प्रति प्रत्यक्ष उत्तरदायित्व नहीं।
  • सुधार: स्वतंत्र और पारदर्शी चयन-प्रक्रिया, सेवानिवृत्ति के बाद "विश्राम-अवधि", स्वतंत्र वित्त (शुल्क-आधारित), संसदीय समिति द्वारा नियमित समीक्षा, नियामकों के लिए समान ढाँचा (वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग, यानी FSLRC, 2013 की संस्तुति), और नियामक प्रभाव आकलन।
  • निष्कर्ष: हाँ, नियामक प्रभावी हैं, पर उनकी स्वतंत्रता "विधिक" अधिक और "व्यावहारिक" कम है।

3. सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP)

  • मॉडल: BOT (निर्माण, संचालन, हस्तांतरण), BOOT (स्वामित्व सहित), DBFOT (रूपांकन, निर्माण, वित्त, संचालन, हस्तांतरण), संकर वार्षिकी मॉडल (HAM; सड़कें, 2016), और प्रबंधन अनुबंध।
  • भारत: व्यवहार्यता अंतराल वित्त (VGF, 2006), केलकर समिति (2015; PPP का पुनरावलोकन, जोखिम का उचित बँटवारा, स्वतंत्र नियामक, विवाद-समाधान), "स्विस चैलेंज" विधि, और राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (2021)।
  • लाभ: निजी पूँजी, दक्षता, नवाचार, जोखिम-साझेदारी, और समय पर परियोजनाएँ।
  • समस्याएँ: आक्रामक बोली, पुनर्वार्ता, जोखिम का असंतुलित बँटवारा, अनुबंधों का अधूरापन, "निजीकरण से लाभ, समाजीकरण से हानि", और 2010 के दशक में बुनियादी ढाँचे की ऋण-समस्याएँ (दोहरे बैलेंस-शीट की समस्या)।

PPP और बंद तथा खुले संगठन-मॉडलों की "एन्ट्रॉपी" (UPSC 2025)

  • एन्ट्रॉपी का अर्थ (तंत्र सिद्धांत): बंद तंत्र (जो पर्यावरण से ऊर्जा या सूचना नहीं लेता) धीरे-धीरे अव्यवस्था और क्षय की ओर जाता है। खुला तंत्र पर्यावरण से निवेश लेकर "नकारात्मक एन्ट्रॉपी" बनाए रखता है (कैट्ज़ और कान, 1966)।
  • बंद मॉडल (परंपरागत नौकरशाही): आत्म-निर्भर, नियम-केंद्रित, बाहरी प्रतिस्पर्धा से अलग। इसलिए जड़ता, अक्षमता और नवाचार की कमी, यानी एन्ट्रॉपी।
  • खुला मॉडल: पर्यावरण से संवाद, पर सरकारी संगठनों में संसाधन और कौशल की कमी से उसकी भी सीमाएँ हैं।
  • PPP कैसे चुनौती देता है:
    • संगठन की सीमाएँ तोड़कर बाहर से पूँजी, तकनीक और प्रबंधन-कौशल लाना, यानी "नकारात्मक एन्ट्रॉपी" का नया स्रोत।
    • प्रतिस्पर्धा और कार्य-निष्पादन अनुबंध से जड़ता पर प्रहार।
    • "संकर" संगठन, जो न पूरी तरह सरकारी हैं, न पूरी तरह निजी।
  • नई एन्ट्रॉपी: अनुबंध-प्रबंधन की जटिलता, सूचना-असमानता, पुनर्वार्ता, विवाद और जवाबदेही का धुंधलापन। इसलिए PPP स्वयं एक नए प्रकार की अव्यवस्था का स्रोत बन सकता है, जिसके लिए सशक्त नियामक और अनुबंध-प्रबंधन क्षमता चाहिए।
  • निष्कर्ष: PPP बंद और खुले, दोनों मॉडलों की सीमाओं के बीच एक "सेतु" है, पर उसकी सफलता राज्य की क्षमता पर निर्भर है। "दिशा देने" के लिए भी सक्षम राज्य चाहिए।

4. प्रशासनिक सुधार की तकनीकें

  • संगठन और पद्धति (O&M): संगठन-संरचना और कार्य-प्रक्रियाओं में सुधार। भारत में 1954 में मंत्रिमंडल सचिवालय में O&M प्रभाग बना, जो बाद में प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG) में गया।
  • कार्य-अध्ययन: पद्धति-अध्ययन (कार्य करने का सर्वोत्तम तरीक़ा) और कार्य-मापन (समय-मानक); इसकी जड़ें टेलर में हैं।
  • कार्य-प्रबंधन: कार्यभार का आकलन और कर्मचारियों का युक्तिकरण।
उपकरणउद्भवउपयोग
गैंट चार्टहेनरी गैंट (1910 का दशक)कार्यों की समय-सारणी का दृश्य
PERTअमेरिकी नौसेना की पोलारिस मिसाइल परियोजना (1958)अनिश्चित अवधि वाली परियोजनाएँ; तीन समय-अनुमान: आशावादी (a), संभावित (m), निराशावादी (b); अपेक्षित समय = (a + 4m + b) ÷ 6
CPMड्यूपॉन्ट और रेमिंगटन रैंड (1957)निश्चित अवधि वाली परियोजनाएँ; समय और लागत का संतुलन
MIS-निर्णय के लिए नियमित, संगठित सूचना
संतुलित स्कोरकार्डकैपलन और नॉर्टन (1992)वित्तीय, ग्राहक, आंतरिक प्रक्रिया, सीखना और विकास
TQM, सिक्स सिग्मा, लीनगुणवत्ता आंदोलननिरंतर सुधार, त्रुटि-न्यूनीकरण
लागत-लाभ विश्लेषण, SWOT-परियोजना-मूल्यांकन, रणनीति

क्रांतिक पथ विधि (CPM) (UPSC 2024)

  • विधि: (1) परियोजना को गतिविधियों में बाँटना; (2) उनका क्रम और निर्भरता तय करना; (3) नेटवर्क आरेख बनाना; (4) हर गतिविधि की अवधि; (5) सबसे लंबा मार्ग, यानी "क्रांतिक पथ", ज्ञात करना, जो परियोजना की न्यूनतम कुल अवधि बताता है।
  • फ़्लोट (slack): जिन गतिविधियों में देरी की गुंजाइश है। क्रांतिक पथ की गतिविधियों का फ़्लोट शून्य होता है, यानी उनमें देरी से पूरी परियोजना में देरी होगी।
  • "क्रैशिंग": अतिरिक्त संसाधन लगाकर क्रांतिक गतिविधियों की अवधि घटाना (समय और लागत का समझौता)।
  • PERT से अंतर: CPM निश्चित (deterministic) अवधियों के लिए है (निर्माण-कार्य); PERT अनिश्चित (probabilistic) अवधियों के लिए (अनुसंधान और विकास)।
  • सार्वजनिक क्षेत्र में उपयोग: अवसंरचना परियोजनाएँ (सड़क, मेट्रो, बाँध), PM गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (2021; GIS-आधारित एकीकृत नियोजन), PRAGATI (2015) में परियोजनाओं की समीक्षा, और आपदा-राहत का नियोजन।
  • सीमाएँ: सटीक समय-अनुमान की आवश्यकता, संसाधनों की कमी का सीमित ध्यान, और राजनीतिक तथा भूमि-अधिग्रहण जैसी बाहरी बाधाएँ।

प्रबंधन-सहायक उपकरणों की प्रभावशीलता: उद्देश्य और उपयुक्तता (UPSC 2025)

  • कथन का अर्थ: कोई उपकरण स्वयं में "अच्छा" या "बुरा" नहीं है; उसकी प्रभावशीलता इस पर निर्भर है कि वह किस उद्देश्य के लिए और किस संदर्भ में प्रयुक्त होता है ("आकस्मिकता" दृष्टि)।
  • उदाहरण:
    • PERT अनुसंधान परियोजना (इसरो) के लिए उपयुक्त है, जहाँ अवधि अनिश्चित है; CPM सड़क-निर्माण के लिए।
    • संतुलित स्कोरकार्ड केवल वित्तीय लाभ के बजाय सेवा-गुणवत्ता मापने वाले संगठनों के लिए उपयुक्त है।
    • MIS तभी उपयोगी है जब आँकड़े सटीक हों और निर्णयकर्ता उनका उपयोग करें; अन्यथा "डेटा का बोझ"।
    • डैशबोर्ड से निगरानी आसान होती है, पर "संख्याओं के पीछे भागना" (गुडहार्ट का नियम: जब कोई माप लक्ष्य बन जाता है, तो वह अच्छा माप नहीं रहता) भी हो सकता है।
  • अनुपयुक्त प्रयोग के ख़तरे: निजी क्षेत्र के उपकरणों का बिना अनुकूलन के सार्वजनिक क्षेत्र में प्रयोग, जहाँ लक्ष्य बहुविध और मूल्य-आधारित हैं; और "उपकरण-केंद्रित" सोच, जिसमें साध्य के बजाय साधन महत्वपूर्ण बन जाता है।
  • निष्कर्ष: उपकरण का चयन समस्या की प्रकृति, संगठन की क्षमता और उद्देश्य के अनुसार होना चाहिए।

5. ई-गवर्नेंस

  • अर्थ: सरकारी सेवाओं, सूचना और प्रक्रियाओं में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग। प्रकार: G2C (सरकार से नागरिक), G2B (सरकार से व्यवसाय), G2G (सरकार से सरकार) और G2E (सरकार से कर्मचारी)।
  • भारत की यात्रा: राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP, 2006; 31 मिशन-मोड परियोजनाएँ), डिजिटल इंडिया (2015), आधार, डिजिलॉकर, UMANG (2017), CPGRAMS, सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM, 2016), भारतनेट, "डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना" (UPI, इंडिया स्टैक), भाषिणी (2022) और इंडिया AI मिशन (2024)।
ई-गवर्नेंस के मॉडलअर्थ
प्रसारण (broadcasting) मॉडलसरकारी सूचना का व्यापक प्रसार
महत्वपूर्ण प्रवाह (critical flow) मॉडलविशिष्ट, लक्षित सूचना संबंधित लोगों तक (जैसे भ्रष्टाचार की सूचना)
तुलनात्मक विश्लेषण मॉडलसर्वोत्तम प्रथाओं की तुलना से सुधार
ई-एडवोकेसी (लामबंदी और पैरवी) मॉडलनागरिक और नागरिक समाज द्वारा ऑनलाइन लामबंदी से नीति को प्रभावित करना
अंतःक्रियात्मक सेवा मॉडलसरकार और नागरिक के बीच दो-तरफ़ा सेवा और संवाद

ई-एडवोकेसी और नीति-निर्माण का लोकतंत्रीकरण (UPSC 2025)

  • कैसे: ऑनलाइन याचिकाएँ, अभियान, सोशल मीडिया, और सरकारी परामर्श-मंच (MyGov, 2014; मसौदा-नीतियों पर सार्वजनिक टिप्पणी)। इनसे नागरिक और हाशिये के समूह सीधे नीति-एजेंडा तक पहुँचते हैं।
  • उदाहरण: 2015 में "सेव द इंटरनेट" अभियान के दौरान TRAI को नेट-तटस्थता पर लाखों ईमेल प्रतिक्रियाएँ मिलीं, और 2016 में TRAI ने भेदभावपूर्ण डेटा-मूल्य निर्धारण पर रोक लगाई। मसौदा-नीतियों (जैसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति) पर बड़े पैमाने पर ऑनलाइन सुझाव भी इसके उदाहरण हैं।
  • लोकतंत्रीकरण: सहभागिता का विस्तार, पारदर्शिता, विविध आवाज़ें, और त्वरित प्रतिपुष्टि।
  • सीमाएँ: डिजिटल विभाजन (ग्रामीण, वृद्ध, निर्धन, स्त्रियाँ), "क्लिकटिविज़्म" (सतही सहभागिता), बॉट और संगठित अभियानों से हेरफेर, भ्रामक सूचना, और सरकार द्वारा सुझावों की उपेक्षा, यानी परामर्श का "औपचारिक" होना।
  • निष्कर्ष: ई-एडवोकेसी लोकतंत्रीकरण को "सुगम" बना सकती है, पर डिजिटल समावेशन और ग्रहणशील राज्य के बिना उसका लाभ सीमित है।

ई-गवर्नेंस का भविष्य: उभरती प्रवृत्तियाँ (UPSC 2024)

  • प्रवृत्तियाँ:
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग (चैटबॉट, पूर्वानुमान-विश्लेषण, कर-चोरी का पता, कृषि-परामर्श)।
    • भाषा-प्रौद्योगिकी (भाषिणी), जिससे बहुभाषी सेवाएँ संभव।
    • मोबाइल-प्रथम और "अदृश्य" सेवाएँ (स्वचालित पात्रता, जैसे पेंशन का स्वतः आरंभ)।
    • ब्लॉकचेन (भूमि अभिलेख, प्रमाणपत्र)।
    • क्लाउड (मेघराज) और खुले API।
    • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का वैश्विक निर्यात (G20, 2023)।
    • "संपूर्ण सरकार" (whole-of-government) डेटा-एकीकरण।
  • लाभ: दक्षता, सुगमता, लागत में कमी, भ्रष्टाचार में कमी (DBT से "लीकेज" घटना), और प्रमाण-आधारित नीति।
  • चुनौतियाँ: डिजिटल विभाजन, साइबर सुरक्षा, निजता (के.एस. पुट्टस्वामी, 2017 में निजता मौलिक अधिकार; डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023), एल्गोरिदमिक पक्षपात और जवाबदेही, बहिष्करण-त्रुटियाँ (प्रमाणीकरण विफल होने पर लाभ से वंचित), और क्षमता की कमी।
  • निष्कर्ष: भविष्य का ई-गवर्नेंस "प्रौद्योगिकी-केंद्रित" नहीं, "नागरिक-केंद्रित और अधिकार-आधारित" होना चाहिए।

6. प्रशासनिक सुधार: प्रक्रिया और बाधाएँ

  • प्रक्रिया: समस्या की पहचान, अध्ययन (आयोग या समिति), संस्तुति, राजनीतिक स्वीकृति, क्रियान्वयन, मूल्यांकन।
  • बाधाएँ: राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, नौकरशाही का प्रतिरोध (यथास्थिति में निहित स्वार्थ), संसाधन, संस्तुतियों का "ठंडे बस्ते" में जाना, और खंडित दृष्टि (समग्र के बजाय टुकड़ों में सुधार)।
  • सफलता की शर्तें: शीर्ष-स्तरीय नेतृत्व, हितधारकों की सहभागिता, चरणबद्ध क्रियान्वयन, प्रौद्योगिकी, और परिणामों की निगरानी। भारत में सुधारों का विस्तार Paper II के अध्याय में है।

7. Master Summary Table

विषयमुख्य तथ्ययाद रखें
सार्वजनिक निगममॉरिसन मॉडल; LIC 1956स्वायत्तता और जवाबदेही
सरकारी कंपनीकंपनी अधिनियम 2013, धारा 2(45)51%
मुख्यालय-क्षेत्रफ़ेस्लर: कार्यात्मक बनाम क्षेत्रीयPRAGATI, गति शक्ति
नियामकSEBI 1992, TRAI 1997, CCI 2003स्टिग्लर 1971; FSLRC 2013
PPPBOT, DBFOT, HAM 2016; VGF 2006केलकर 2015
एन्ट्रॉपीकैट्ज़ और कान 1966नकारात्मक एन्ट्रॉपी
O&Mभारत 1954DARPG
PERTपोलारिस 1958; (a + 4m + b) ÷ 6अनिश्चित अवधि
CPMड्यूपॉन्ट 1957क्रांतिक पथ पर फ़्लोट शून्य
ई-गवर्नेंसNeGP 2006; डिजिटल इंडिया 20155 मॉडल; पुट्टस्वामी 2017

8. चार्ट: CPM नेटवर्क और क्रांतिक पथ

1 2 3 4 5 A: 4 दिनB: 5 दिनE: 3 दिन C: 3 दिनD: 2 दिन क्रांतिक पथ: 1-2-4-5 (4 + 5 + 3 = 12 दिन) 1-3-4 = 5 दिन, यानी 4 दिन का फ़्लोट
एक काल्पनिक अभ्यास-उदाहरण (परीक्षा-अभ्यास हेतु): मार्ग 1-2-4 में 9 दिन और 1-3-4 में 5 दिन लगते हैं, इसलिए क्रांतिक पथ 1-2-4-5 है, जिसकी कुल अवधि 12 दिन है। मार्ग C और D में 4 दिन का फ़्लोट है।

9. Mind Map

संगठन, तकनीकें, ई-गवर्नेंस
संगठन
  • विभाग, निगम, कंपनी
  • मुख्यालय-क्षेत्र
नियमन
  • नियामक प्राधिकरण
  • नियामक कब्ज़ा
PPP
  • मॉडल, केलकर
  • एन्ट्रॉपी
तकनीकें
  • O&M, कार्य-अध्ययन
  • PERT, CPM, MIS
ई-गवर्नेंस
  • 5 मॉडल, ई-एडवोकेसी
  • भविष्य, चुनौतियाँ

10. महत्वपूर्ण One-liners

  • सार्वजनिक निगम का शास्त्रीय मॉडल: मॉरिसन मॉडल (ब्रिटेन)।
  • "नियामक कब्ज़ा" का सिद्धांत: जॉर्ज स्टिग्लर (1971)।
  • PPP के पुनरावलोकन पर समिति: विजय केलकर (2015)।
  • भारत में O&M प्रभाग: 1954।
  • PERT का उद्भव: पोलारिस परियोजना (1958)।
  • CPM का उद्भव: ड्यूपॉन्ट (1957)।
  • संतुलित स्कोरकार्ड: कैपलन और नॉर्टन (1992)।
  • राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना: 2006।
  • सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM): 2016।
  • निजता को मौलिक अधिकार: के.एस. पुट्टस्वामी (2017)।

11. टिप्स एवं ट्रिक्स

इस अध्याय के उत्तरों में
  • CPM और PERT के प्रश्नों में छोटा नेटवर्क आरेख अवश्य बनाएँ।
  • ई-गवर्नेंस में भारतीय योजनाएँ (वर्ष सहित) और न्यायिक निर्णय (पुट्टस्वामी) दोनों दें।
  • नियामकों पर उत्तर में "विधिक बनाम व्यावहारिक स्वतंत्रता" का भेद करें।
याद रखने की तरकीब

ई-गवर्नेंस के 5 मॉडल: "प्र-म-तु-ए-अं" (प्रसारण, महत्वपूर्ण प्रवाह, तुलनात्मक, एडवोकेसी, अंतःक्रियात्मक)। PERT: "a + 4m + b, छह से भाग"।

12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2025 · Paper I · 2(c)

नवीन लोक प्रबंधन के ढाँचे में "सार्वजनिक-निजी भागीदारी" संगठन के बंद और खुले मॉडलों की एन्ट्रॉपी को चुनौती देती है। विश्लेषण कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

एन्ट्रॉपी: तंत्र सिद्धांत; कैट्ज़ और कान।

बंद और खुले मॉडल की सीमाएँ।

PPP की चुनौती: बाहरी संसाधन, प्रतिस्पर्धा, संकर संगठन।

नई एन्ट्रॉपी: अनुबंध, पुनर्वार्ता, जवाबदेही; केलकर।

निष्कर्ष: सेतु, पर सक्षम राज्य आवश्यक।

Q2UPSC 2025 · Paper I · 8(c)

प्रबंधन-सहायक उपकरणों की प्रभावशीलता उपकरणों और तकनीकों के उद्देश्य और उपयुक्तता पर निर्भर करती है। उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

अर्थ: आकस्मिकता दृष्टि।

उदाहरण: PERT बनाम CPM, स्कोरकार्ड, MIS, डैशबोर्ड और गुडहार्ट।

अनुपयुक्त प्रयोग के ख़तरे।

निष्कर्ष: समस्या, क्षमता और उद्देश्य के अनुसार चयन।

Q3UPSC 2024 · Paper I · 2(c)

नियामक प्राधिकरण सेवा-वितरण गतिविधियों के नियंत्रण के लिए स्वतंत्र और प्रभावी हैं, पर बाहरी कारकों के अधीन हैं। क्या आप सहमत हैं? कारण दीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

उद्भव और उदाहरण।

स्वतंत्रता के आधार।

बाहरी कारक: कब्ज़ा (स्टिग्लर), नियुक्ति, वित्त, नीति-निर्देश, अतिव्यापन, अपील, जवाबदेही।

सुधार: FSLRC, विश्राम-अवधि, संसदीय समीक्षा।

Q4UPSC 2024 · Paper I · 6(b)

सरकारी सेवाओं को कुशल और सुलभ बनाने के लिए ई-गवर्नेंस का भविष्य उभरती प्रवृत्तियों से आकार ले रहा है। विश्लेषण कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

यात्रा: NeGP से DPI तक।

प्रवृत्तियाँ: AI, भाषिणी, अदृश्य सेवाएँ, ब्लॉकचेन, क्लाउड, DPI का निर्यात।

लाभ और चुनौतियाँ: विभाजन, साइबर, निजता (पुट्टस्वामी, DPDP), एल्गोरिदम।

निष्कर्ष: नागरिक-केंद्रित और अधिकार-आधारित।

Q5UPSC 2025 · Paper I · 5(a) · 10 अंक

ई-गवर्नेंस का ई-एडवोकेसी मॉडल लोक नीति-निर्माण के लोकतंत्रीकरण को सुगम बना सकता है। विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर

मॉडल: ऑनलाइन लामबंदी और पैरवी।

उदाहरण: नेट-तटस्थता (2015-16), MyGov।

सीमाएँ: डिजिटल विभाजन, क्लिकटिविज़्म, हेरफेर, औपचारिक परामर्श।

Q6UPSC 2024 · Paper I · 5(c) · 10 अंक

क्रांतिक पथ विधि (CPM) परियोजना-प्रबंधन की एक तकनीक है जिसका उपयोग परियोजनाओं के प्रभावी नियोजन और प्रबंधन के लिए होता है। विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर

विधि: पाँच चरण; फ़्लोट; क्रैशिंग; आरेख।

PERT से अंतर।

उपयोग: अवसंरचना, गति शक्ति, PRAGATI।

सीमाएँ।

Q7UPSC 2024 · Paper I · 1(d) · 10 अंक

मुख्यालय और क्षेत्रीय एजेंसियों के स्वस्थ संबंध प्रभावी संचार पर पनपते हैं। टिप्पणी कीजिए।

मॉडल उत्तर

भूमिकाएँ और संघर्ष के स्रोत (फ़ेस्लर)।

संचार: दो-तरफ़ा, प्रत्यायोजन, विश्वास।

उपकरण और सूक्ष्म-प्रबंधन का ख़तरा।

13. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • संगठन: विभाग, निगम, कंपनी, बोर्ड, तदर्थ निकाय; मुख्यालय-क्षेत्र संबंध।
  • नियामक: भारतीय नियामक; स्वतंत्रता बनाम बाहरी कारक; सुधार।
  • PPP: मॉडल, लाभ, समस्याएँ, केलकर; एन्ट्रॉपी का विश्लेषण।
  • तकनीकें: O&M, कार्य-अध्ययन, गैंट, PERT, CPM, MIS, स्कोरकार्ड; उपयुक्तता का सिद्धांत।
  • ई-गवर्नेंस: प्रकार, यात्रा, 5 मॉडल, ई-एडवोकेसी, भविष्य, चुनौतियाँ; सुधार की प्रक्रिया और बाधाएँ।