UPSC Mains · Sociology · Paper II · अध्याय 9

भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं आंदोलन

Social Change and Movements in India

विकास योजना और मिश्रित अर्थव्यवस्था, हरित क्रांति, औद्योगीकरण-नगरीकरण; किसान, श्रमिक, महिला, दलित, जनजातीय और पर्यावरण आंदोलन।

Paper II 25 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

Paper II का भाग C — भारत में सामाजिक परिवर्तन: सामाजिक परिवर्तन की दृष्टियाँ (विकास योजना, मिश्रित अर्थव्यवस्था, संविधान-क़ानून, शिक्षा), ग्रामीण-कृषक रूपांतरण, औद्योगीकरण-नगरीकरण, राजनीति और समाज (राष्ट्र, लोकतंत्र, दल, दबाव समूह, अभिजात, विकेंद्रीकरण) और सामाजिक आंदोलन (किसान, श्रमिक, स्त्री, दलित-पिछड़ा, पर्यावरण, नृजातीयता)। 2024 में विकेंद्रीकरण, राजनीतिक अभिजात, किसान आंदोलन, पर्यावरण-विकास-जनजातीय पहचान की "त्रयी", दलित आंदोलनों की उत्पत्ति, सुधार आंदोलन, दबाव समूह, विकास योजना, नगरीकरण की प्रवृत्तियाँ, झुग्गियाँ और शिक्षा; 2025 में स्त्रियों के लिए सबसे प्रभावी सुधार आंदोलन, राजनीतिक लामबंदी के सामाजिक आधार, नगरीकरण और औद्योगीकरण, दलित पहचान-निर्माण और NEP-2020 पूछे गए।

समाजशास्त्र: आधुनिक भारतीय समाज इन्फ़ोग्राफ़िक
आधुनिक भारतीय समाज — नगरीकरण, औद्योगीकरण, शिक्षा, लोकतंत्र और नई पहचानें (NCERT आधारित infographic)।

2. सामाजिक परिवर्तन की दृष्टियाँ

  • संविधान और क़ानून — सामाजिक क्रांति का "उपकरण" (ग्रैनविल ऑस्टिन — The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation, 1966); मौलिक अधिकार, नीति-निदेशक तत्व, अस्पृश्यता उन्मूलन, भूमि सुधार, हिंदू विधि सुधार (1955-56), आरक्षण।
  • विकास योजना और मिश्रित अर्थव्यवस्था — योजना आयोग (1950); पंचवर्षीय योजनाएँ (1951-2017, 12 योजनाएँ); नेहरू-महालनोबिस मॉडल (दूसरी योजना — भारी उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र); मिश्रित अर्थव्यवस्था; 1991 का उदारीकरण; NITI आयोग (1 जनवरी 2015)।
  • शिक्षा — कोठारी आयोग (1964-66), NPE 1968, 1986, RTE अधिनियम 2009, NEP 2020।

भारत में विकास योजना की प्रासंगिकता (UPSC 2024)

  • योगदान — भारी उद्योग और सार्वजनिक क्षेत्र, हरित क्रांति, IIT-AIIMS जैसी संस्थाएँ, ग़रीबी-उन्मूलन कार्यक्रम (IRDP, NREGA), सामाजिक क्षेत्र पर ध्यान, क्षेत्रीय संतुलन के प्रयास।
  • सीमाएँ — केंद्रीकरण, नौकरशाही, "हिंदू वृद्धि दर" (राज कृष्णा का शब्द), लक्ष्यों की विफलता, क्षेत्रीय असमानता, "ऊपर से नीचे" योजना, सहभागिता का अभाव।
  • वर्तमान प्रासंगिकता — NITI आयोग के रूप में "सांकेतिक/रणनीतिक योजना" — सहकारी संघवाद, आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (2018), SDG इंडिया इंडेक्स, "विकसित भारत @2047" दृष्टि; जलवायु परिवर्तन, अवसंरचना, शहरीकरण, जनांकिकी जैसे दीर्घकालिक मुद्दों के लिए योजना अनिवार्य; बाज़ार-विफलताओं (स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण) में राज्य की भूमिका।
  • निष्कर्ष — "पंचवर्षीय योजना" का युग समाप्त, पर नियोजन का तर्क — समन्वय, दीर्घकालिक दृष्टि, सामाजिक न्याय — आज भी प्रासंगिक; प्रश्न "योजना या बाज़ार" नहीं, "कैसी योजना" का है।

शिक्षा — सामाजिक विकास की कुंजी (UPSC 2024) और NEP-2020 (UPSC 2025)

  • कुंजी क्यों — मानव पूँजी, सामाजिक गतिशीलता, स्त्री सशक्तिकरण (केरल मॉडल — साक्षरता, कम शिशु-मृत्यु, कम प्रजनन दर), स्वास्थ्य-जागरूकता, लोकतांत्रिक नागरिकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जाति-भेद में कमी (अंबेडकर — "शिक्षित बनो")।
  • NEP-2020 के प्रमुख प्रावधान — 5+3+3+4 संरचना; प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा; कम से कम कक्षा 5 तक (संभव हो तो 8 तक) मातृभाषा/स्थानीय भाषा में शिक्षा; मूलभूत साक्षरता-संख्याज्ञान (NIPUN भारत, 2021); कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा; बहु-विषयी उच्च शिक्षा, बहु-प्रवेश/निकास; उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात 2035 तक 50%; शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय GDP का 6% का लक्ष्य; NCERT-NTA सुधार; डिजिटल शिक्षा।
  • "शिक्षा ही सभी बुराइयों का रामबाण" — आलोचनात्मक परीक्षण — (1) शिक्षा आवश्यक है पर पर्याप्त नहीं — रोज़गार सृजन, भूमि सुधार, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा भी चाहिए; (2) शिक्षा असमानता का पुनरुत्पादन भी करती है (बोर्दियो) — निजीकरण, अंग्रेज़ी-विभाजन, कोचिंग-उद्योग; (3) शिक्षित बेरोज़गारी — डिग्री और रोज़गार की असंगति; (4) सीखने का संकट (ASER); (5) संरचनात्मक बुराइयाँ (जाति, पितृसत्ता, भ्रष्टाचार) शिक्षित लोगों में भी; (6) NEP के क्रियान्वयन की चुनौतियाँ — वित्त (6% लक्ष्य दशकों से अधूरा), शिक्षकों की कमी, भाषा-नीति पर राज्यों से विवाद, डिजिटल विभाजन, "केंद्रीकरण" की आशंका।
  • निष्कर्ष — शिक्षा सामाजिक विकास की "कुंजी" है, "रामबाण" नहीं — NEP-2020 की सफलता समता, वित्त और शिक्षक-गुणवत्ता पर निर्भर।

3. ग्रामीण और कृषक रूपांतरण

  • ग्रामीण विकास कार्यक्रम — सामुदायिक विकास कार्यक्रम (2 अक्टूबर 1952), बलवंतराय मेहता समिति (1957 — त्रि-स्तरीय पंचायती राज), सहकारी समितियाँ, IRDP (1978-80), जवाहर रोज़गार योजना, MGNREGA (2005), NRLM (2011), PMAY-G।
  • हरित क्रांति — लाभ (खाद्य आत्मनिर्भरता) और सामाजिक परिणाम (क्षेत्रीय-वर्गीय असमानता, पर्यावरण-क्षरण, पंजाब में भूजल और कैंसर-बेल्ट विमर्श)।
  • उदारीकरण का प्रभाव — कृषि में सार्वजनिक निवेश में कमी, बाज़ार-जोखिम, कृषि संकट और किसान आत्महत्याएँ, ग्रामीण गैर-कृषि रोज़गार में वृद्धि।
  • ग्रामीण उद्योगों का पतन — अध्याय 7 देखें।

4. औद्योगीकरण और नगरीकरण

भारत में नगरीय बस्तियों के विकास की हाल की प्रवृत्तियाँ (UPSC 2024)

  • आँकड़े (जनगणना 2011) — शहरी जनसंख्या 37.7 करोड़ (31.1%); कुल 7,933 नगर — 4,041 वैधानिक नगर और 3,892 "जनगणना नगर" (census towns — 2001 के 1,362 से तीव्र वृद्धि); 53 मिलियन-प्लस नगर।
  • प्रवृत्तियाँ — (1) जनगणना नगरों का उदय — "उपाश्रित/सबाल्टर्न नगरीकरण" (डेनिस, मुखोपाध्याय, ज़ेराह, 2012) — बड़े शहरों से अलग, छोटे क़स्बों में स्थानीय उद्यम से; (2) परि-नगरीकरण (peri-urbanisation) — शहरों की सीमा पर अनियोजित विस्तार; (3) महानगरीय क्षेत्र — NCR, मुंबई महानगर क्षेत्र; (4) शहरीकरण के तीन स्रोत — प्राकृतिक वृद्धि (सबसे बड़ा), ग्रामीण बस्तियों का शहरी में पुनर्वर्गीकरण, प्रवासन; (5) राज्य-असमानता — तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात अधिक शहरी; बिहार (~11%), हिमाचल कम; (6) स्मार्ट सिटी मिशन (2015 — 100 शहर), AMRUT (2015), PMAY-U (2015); (7) "छिपा शहरीकरण" — प्रशासनिक रूप से ग्रामीण पर व्यावसायिक-जनघनत्व में शहरी क्षेत्र।

नगरीकरण की प्रवृत्ति: क्या औद्योगीकरण ही एकमात्र पूर्व-शर्त है? (UPSC 2025)

  • शास्त्रीय दृष्टि — पश्चिम में औद्योगिक क्रांति और नगरीकरण साथ-साथ (मैनचेस्टर, बर्मिंघम); लुई विर्थ (1938) — "नगरीयता जीवन-पद्धति"।
  • नहीं — अन्य कारक — (1) सेवा-क्षेत्र — भारत में नगरीकरण का बड़ा भाग सेवा-आधारित (IT — बेंगलुरु, हैदराबाद); (2) प्रशासनिक केंद्र — राजधानियाँ (चंडीगढ़, गांधीनगर, नया रायपुर); (3) धार्मिक-तीर्थ नगर — वाराणसी, पुरी, तिरुपति; (4) व्यापार-परिवहन केंद्र; (5) "धक्का" प्रवासन — कृषि संकट, जलवायु, ग़रीबी से "अति-नगरीकरण" (over-urbanisation) — रोज़गार से पहले जनसंख्या; (6) प्राकृतिक वृद्धि और पुनर्वर्गीकरण; (7) शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाएँ — छात्र-नगर (कोटा); (8) प्राचीन नगर — औद्योगीकरण से पहले (हड़प्पा, पाटलिपुत्र, मुग़ल नगर)।
  • निष्कर्ष — औद्योगीकरण नगरीकरण का "एक" शक्तिशाली कारक है, "एकमात्र" पूर्व-शर्त नहीं; विकासशील देशों में नगरीकरण प्रायः औद्योगीकरण से "आगे" निकल जाता है — जिससे अनौपचारिक क्षेत्र और झुग्गियाँ बढ़ती हैं।

झुग्गियाँ: औद्योगीकरण-नगरीकरण की अभिव्यक्ति? (UPSC 2024)

  • तथ्य — जनगणना 2011: झुग्गी जनसंख्या लगभग 6.5 करोड़ (शहरी जनसंख्या का लगभग 17%); धारावी (मुंबई) प्रसिद्ध उदाहरण; माइक डेविस (Planet of Slums, 2006) — वैश्विक दक्षिण में "झुग्गियों का ग्रह"।
  • हाँ — अभिव्यक्ति — औद्योगिक-सेवा श्रम की माँग → प्रवासन → सस्ते आवास का अभाव → अनौपचारिक बस्तियाँ; कारख़ानों के पास बस्तियाँ (कानपुर, अहमदाबाद की चालें)।
  • पर पूर्ण व्याख्या नहीं — (1) नियोजन और आवास-नीति की विफलता — भूमि की ऊँची क़ीमतें, किराया नियंत्रण; (2) "धक्का" प्रवासन (ग्रामीण संकट); (3) अनौपचारिक क्षेत्र — कम आय; (4) जाति-धर्म आधारित पृथक्करण — दलित-मुस्लिम बस्तियाँ; (5) राजनीतिक संरक्षण — "वोट बैंक" और नियमितीकरण; (6) झुग्गियाँ "आशा की बस्तियाँ" भी — उद्यम, सामाजिक नेटवर्क, गतिशीलता (धारावी की अर्थव्यवस्था)।
  • नीति — राजीव आवास योजना, PMAY-U (2015), इन-सीटू पुनर्विकास, किफ़ायती किराया आवास परिसर (ARHC, 2020)।

श्रम-प्रवासन और अनौपचारिक क्षेत्र (UPSC 2024, 2025)

  • संबंध — हाँ, गहरा: (1) जनगणना 2011 — लगभग 45.4 करोड़ आंतरिक प्रवासी (जनसंख्या का ~37%, अधिकांश विवाह-प्रवासन; पर श्रम-प्रवासन तेज़ी से बढ़ा); (2) प्रवासी मुख्यतः अनौपचारिक क्षेत्र — निर्माण, ईंट भट्ठे, घरेलू काम, ठेला-रेहड़ी, कारख़ानों में ठेका श्रम; (3) चक्रीय/मौसमी प्रवासन — बिहार, उ.प्र., ओडिशा से; (4) सामाजिक नेटवर्क — जाति-क्षेत्र आधारित भर्ती, ठेकेदार; (5) अनौपचारिक क्षेत्र प्रवासियों का "प्रवेश-द्वार" और प्रवासी अनौपचारिक क्षेत्र का "ईंधन"।
  • प्रवासियों की प्रमुख समस्याएँ — सामाजिक सुरक्षा का अभाव, मज़दूरी-चोरी, असुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ, आवास (झुग्गी, कार्यस्थल पर), पहचान और दस्तावेज़ (राशन, मतदान), भाषा-भेदभाव और "बाहरी" के विरुद्ध हिंसा, बच्चों की शिक्षा का टूटना, स्वास्थ्य, स्त्री प्रवासियों का यौन शोषण, COVID-19 (2020) में पैदल पलायन — व्यवस्था की विफलता उजागर।
  • उपाय — अंतर-राज्यीय प्रवासी कामगार अधिनियम 1979 (अब व्यावसायिक सुरक्षा संहिता 2020 में समाहित), ई-श्रम पोर्टल (2021), "एक राष्ट्र एक राशन कार्ड", किफ़ायती किराया आवास, निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड।

5. राजनीति और समाज

शक्ति का विकेंद्रीकरण और लोकतंत्र (UPSC 2024)

  • विकेंद्रीकरण — निर्णय-शक्ति, संसाधनों और उत्तरदायित्व का केंद्र से स्थानीय स्तर तक हस्तांतरण — राजनीतिक, प्रशासनिक, वित्तीय।
  • भारत — बलवंतराय मेहता (1957), अशोक मेहता समिति (1978); 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन (1992, प्रभावी 1993) — पंचायतें और नगरपालिकाएँ; ग्यारहवीं (29 विषय) और बारहवीं (18 विषय) अनुसूचियाँ; स्त्रियों के लिए कम से कम एक-तिहाई आरक्षण (अनेक राज्यों में 50%); SC/ST आरक्षण; राज्य निर्वाचन और वित्त आयोग; PESA (1996)।
  • लोकतंत्र की जड़ों को सशक्त करने में भूमिका — (1) सहभागिता — लगभग 30 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि, जिनमें लगभग 14 लाख स्त्रियाँ; (2) हाशिये का सशक्तिकरण — दलित-आदिवासी-स्त्री नेतृत्व (चट्टोपाध्याय और डुफ़्लो, 2004 — स्त्री प्रधानों ने पेयजल जैसी प्राथमिकताओं पर अधिक निवेश किया); (3) जवाबदेही — ग्राम सभा, सामाजिक अंकेक्षण; (4) स्थानीय नियोजन — केरल का "जन योजना अभियान" (1996); (5) राजनीतिक प्रशिक्षण — नए नेतृत्व की पाठशाला।
  • चुनौतियाँ — "3F" (Funds, Functions, Functionaries) का अधूरा हस्तांतरण; राज्यों का नियंत्रण; "प्रधान-पति"; अभिजात और प्रभु जाति का क़ब्ज़ा; भ्रष्टाचार; ग्राम सभा की कमज़ोर भागीदारी; शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय दुर्बलता।

राजनीतिक अभिजात का बदलता स्वरूप (UPSC 2024)

  • स्वतंत्रता के बाद — उच्च-जातीय, अंग्रेज़ी-शिक्षित, वकील-बुद्धिजीवी, राष्ट्रीय आंदोलन से निकले; "कांग्रेस व्यवस्था" (रजनी कोठारी, 1964) — एक-दल प्रधानता।
  • परिवर्तन — (1) पिछड़े और दलित अभिजात — मंडल राजनीति (1990), BSP — क्रिस्टोफ़ जैफ़रलो (India's Silent Revolution, 2003 — "मौन क्रांति"); योगेंद्र यादव — "दूसरा लोकतांत्रिक उभार"; (2) क्षेत्रीय अभिजात — क्षेत्रीय दलों का उदय; (3) वंशवाद — राजनीतिक परिवार; (4) धन और आपराधिक पृष्ठभूमि — ADR विश्लेषण: 2024 लोकसभा के लगभग 46% सांसदों ने आपराधिक मामले घोषित किए और लगभग 93% करोड़पति; (5) व्यवसायी-उद्यमी नेता; (6) स्त्री प्रतिनिधित्व — 2024 लोकसभा में 74 स्त्रियाँ (~13.6%); नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023); (7) पेशेवर-तकनीकी नेता, सोशल मीडिया-कुशल नई पीढ़ी; (8) पंचायतों से नया ग्रामीण नेतृत्व।
  • व्याख्या — पैरेटो का "परिसंचरण" (नए समूहों का प्रवेश) और मिशेल्स का "लौह नियम" (दलों में अल्पतंत्र) — दोनों साथ-साथ।

राजनीतिक लामबंदी के सामाजिक आधार (UPSC 2025)

  • आधार — जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र, भाषा, जनजाति, लिंग, पीढ़ी।
  • पिछले 60-70 वर्षों में परिवर्तन — (1) 1950-60 का दशक — कांग्रेस का "छाता" (उच्च जाति + दलित + मुस्लिम), प्रभु जातियों द्वारा "वोट बैंक" (श्रीनिवास); (2) 1960-70 — मध्यवर्ती कृषक जातियाँ (चरण सिंह), भाषाई-क्षेत्रीय आंदोलन (DMK); (3) 1990 — मंडल (OBC), मंदिर (धार्मिक पहचान), बाज़ार (उदारीकरण) — "तीन M"; (4) दलित लामबंदी — BSP; (5) 2010 के बाद — कल्याणकारी योजनाओं के "लाभार्थी" (विशेषकर स्त्रियाँ) एक नया मतदाता-आधार; युवा और "आकांक्षी" मध्य वर्ग; सोशल मीडिया; अति-पिछड़े और महादलित जैसे उप-समूहों की लामबंदी; धार्मिक-राष्ट्रवादी पहचान; (6) स्त्री मतदान-दर का बढ़ना।
  • निष्कर्ष — लामबंदी के आधार "पहचान" से "पहचान + कल्याण + आकांक्षा" की ओर — पर जाति अब भी केंद्रीय।

दबाव समूह और निर्णय-निर्माण (UPSC 2024)

  • भारतीय दबाव समूह — व्यावसायिक (FICCI 1927, ASSOCHAM 1920, CII), श्रमिक संघ (AITUC, INTUC, BMS, CITU), किसान संगठन (भारतीय किसान यूनियन — महेंद्र सिंह टिकैत, शेतकरी संगठन — शरद जोशी), पेशेवर (IMA, बार काउंसिल), जातीय संघ, छात्र संगठन, धार्मिक संगठन, मुद्दा-आधारित (NBA, MKSS)।
  • निर्णय-निर्माण में भूमिका — नीति-निर्माण से पहले परामर्श (बजट-पूर्व बैठकें), संसदीय समितियों को ज्ञापन, जनमत-निर्माण, मीडिया-अभियान, आंदोलन-धरना, न्यायालय (जनहित याचिका), चुनावी समर्थन; सफलताएँ — RTI (2005), MGNREGA (2005), FRA (2006), कृषि क़ानूनों का निरसन (2021)।
  • चिंताएँ — असमान प्रभाव (कॉरपोरेट), लॉबीइंग का अविनियमन, दलों से संबद्धता, हिंसक आंदोलन।

6. आधुनिक भारत में सामाजिक आंदोलन

समाजशास्त्र: सामाजिक परिवर्तन इन्फ़ोग्राफ़िक
भारत में सामाजिक परिवर्तन और आंदोलन — किसान, श्रमिक, स्त्री, दलित, पर्यावरण और जनजातीय आंदोलन (NCERT आधारित infographic)।

किसान आंदोलन

चरणआंदोलन
औपनिवेशिकनील विद्रोह (1859-60), दक्कन दंगे (1875), चंपारण (1917), खेड़ा (1918), बारदोली (1928), अखिल भारतीय किसान सभा (1936), तेभागा (1946-47), तेलंगाना (1946-51)
स्वतंत्रता के बादनक्सलबाड़ी (1967) — भूमिहीन किसानों का सशस्त्र विद्रोह
"नए किसान आंदोलन" (1970-80)शेतकरी संगठन (शरद जोशी, 1979 — "भारत बनाम इंडिया"), भारतीय किसान यूनियन (महेंद्र सिंह टिकैत — 1988 का मेरठ धरना), कर्नाटक राज्य रैयत संघ — लाभकारी मूल्य, बिजली दरें; धनी-मध्यम किसानों का नेतृत्व (टॉम ब्रास, डी.एन. धनागरे)
2020-21तीन कृषि क़ानूनों (सितंबर 2020) के विरुद्ध — संयुक्त किसान मोर्चा; 26 नवंबर 2020 से दिल्ली सीमाओं पर धरना; क़ानून निरसन (प्रधानमंत्री की घोषणा 19 नवंबर 2021; निरसन अधिनियम दिसंबर 2021)

हाल के किसान आंदोलन का आकलन (UPSC 2024)

  • विशेषताएँ और सफलता — (1) लगभग एक वर्ष तक शांतिपूर्ण, अनुशासित धरना; (2) संगठनात्मक एकता — 40 से अधिक संगठनों का गठबंधन; (3) सामुदायिक संसाधन — लंगर, गुरुद्वारे, ग्राम-आधारित रोटेशन (संसाधन लामबंदी); (4) सोशल मीडिया — "ट्रॉली टाइम्स", प्रवासी समर्थन; (5) नीतिगत सफलता — क़ानूनों का निरसन; (6) स्त्रियों और युवाओं की भागीदारी; (7) जाति-धर्म से ऊपर "किसान पहचान" (जाट-सिख-मुस्लिम सहयोग — पश्चिमी उ.प्र.)।
  • सीमाएँ — (1) मुख्यतः पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उ.प्र. के MSP-लाभार्थी, अपेक्षाकृत समृद्ध किसान; (2) भूमिहीन मज़दूर, दलित, छोटे किसान, स्त्री-कृषक के मुद्दे गौण; (3) MSP की क़ानूनी गारंटी की माँग अनसुलझी; (4) कृषि संकट (ऋण, जलवायु, भूजल) के व्यापक प्रश्न अनुत्तरित; (5) ध्रुवीकरण और 26 जनवरी 2021 की घटनाएँ।
  • समाजशास्त्रीय महत्व — कृषक पहचान का पुनरुत्थान, लोकतंत्र में "परामर्श" का प्रश्न, नागरिक समाज की शक्ति, "नए" और "पुराने" आंदोलनों का मिश्रण।

पर्यावरण आंदोलन, विकास और जनजातीय पहचान की "त्रयी" (UPSC 2024)

  • प्रमुख आंदोलन — चिपको (1973, गढ़वाल — सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट, गौरा देवी), साइलेंट वैली (केरल, 1970-80 — 1984 में राष्ट्रीय उद्यान), अप्पिको (कर्नाटक, 1983), नर्मदा बचाओ आंदोलन (1985 से), झारखंड वन आंदोलन, कोयल-कारो, नियमगिरि (2013), हसदेव अरण्य।
  • त्रयी का विश्लेषण — (1) विकास — बाँध, खनन, उद्योग "राष्ट्रीय हित" के नाम पर — पर लागत स्थानीय, लाभ दूर; (2) पर्यावरण — वन, नदी, जैव-विविधता का विनाश; (3) जनजातीय पहचान — भूमि-वन-नदी जनजातीय संस्कृति, धर्म (नियम राजा, सरना) और जीविका का आधार; अतः विकास-परियोजनाओं का विरोध पर्यावरण-रक्षा और पहचान-रक्षा दोनों बन जाता है।
  • सैद्धांतिक दृष्टियाँ — रामचंद्र गुहा (The Unquiet Woods, 1989 — चिपको: किसान प्रतिरोध की परंपरा); गाडगिल और गुहा (This Fissured Land, 1992; Ecology and Equity, 1995 — "पारिस्थितिकी तंत्र-जन" (ecosystem people) बनाम "सर्वभक्षी" (omnivores) बनाम "पारिस्थितिक शरणार्थी"); गुहा-मार्टिनेज़-अलियर — "निर्धनों का पर्यावरणवाद" (environmentalism of the poor, 1997) — पश्चिमी "विलासी" पर्यावरणवाद से भिन्न, जीविका-आधारित; अमिता बाविस्कर (1995) — "आदिवासी पर्यावरणवाद" का रोमानीकरण भी एक ख़तरा।
  • तनाव — "हरित" संरक्षण (बाघ अभयारण्य) से भी आदिवासी विस्थापन; आदिवासी पहचान का "पर्यावरण-रक्षक" के रूप में स्टीरियोटाइप; विकास की आकांक्षा बनाम संरक्षण।
  • निष्कर्ष — यह त्रयी "किसका विकास, किस क़ीमत पर" का प्रश्न उठाती है — FRA, PESA और सहभागी नियोजन इसके समाधान के रास्ते।

दलित आंदोलन: सामाजिक-ऐतिहासिक उत्पत्ति (UPSC 2024) और पहचान-निर्माण (UPSC 2025)

  • उत्पत्ति के सामाजिक कारक — अस्पृश्यता और जाति-उत्पीड़न; औपनिवेशिक शिक्षा, ईसाई मिशनरी, सेना में भर्ती (महार रेजिमेंट), शहरी रोज़गार — नई गतिशीलता; जनगणना वर्गीकरण से जाति-चेतना; राष्ट्रीय आंदोलन और सुधार आंदोलन।
  • ऐतिहासिक चरण — (1) सुधार-धार्मिक — ज्योतिबा फुले (सत्यशोधक समाज, 1873), श्री नारायण गुरु (SNDP, 1903), अय्यंकाली (साधु जन परिपालन संघम, 1907), आदि-धर्म (पंजाब, 1926 — मंगू राम), आदि-हिंदू आंदोलन (उ.प्र., 1920 का दशक); (2) अंबेडकर युग — बहिष्कृत हितकारिणी सभा (1924), महाड सत्याग्रह (1927), कालाराम मंदिर सत्याग्रह (1930), पूना पैक्ट (1932), इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (1936), शेड्यूल्ड कास्ट्स फ़ेडरेशन (1942), संविधान, नागपुर में बौद्ध धर्मांतरण (14 अक्टूबर 1956); (3) दलित पैंथर्स (1972 — नामदेव ढसाल, जे.वी. पवार; दलित साहित्य); (4) राजनीतिक — BAMCEF (1978), BSP (1984 — कांशीराम, मायावती); (5) समकालीन — भीम आर्मी (2015), भीमा कोरेगाँव, रोहित वेमुला प्रकरण (2016), दलित उद्यमिता (DICCI)।
  • पहचान-निर्माण में भूमिका — (1) नामकरण — "अछूत" → "दलित" (उत्पीड़ित, गर्व और प्रतिरोध की पहचान); (2) वैकल्पिक इतिहास और प्रतीक — भीमा कोरेगाँव, बुद्ध, अंबेडकर की प्रतिमाएँ, जयंती-उत्सव; (3) धर्म — नवयान बौद्ध धर्म; (4) साहित्य-कला — दलित आत्मकथाएँ (ओमप्रकाश वाल्मीकि — जूठन, 1997), दलित रैप; (5) राजनीतिक चेतना — "बहुजन" पहचान (कांशीराम); (6) संवैधानिक नागरिकता — "संविधान" स्वयं पहचान का प्रतीक; (7) अंतरराष्ट्रीय — नस्लवाद-विरोधी संघर्षों से जुड़ाव (डरबन 2001)।
  • विचारक — एलेनोर ज़ेलियट (From Untouchable to Dalit, 1992), गेल ऑमवेट (Dalits and the Democratic Revolution, 1994), गोपाल गुरु, आनंद तेलतुंबडे।
  • आलोचना/चुनौतियाँ — आंतरिक विभाजन (उप-जाति, उप-वर्गीकरण बहस), "दलित अभिजात", राजनीतिक विखंडन, पहचान-राजनीति बनाम वर्ग-राजनीति।

स्त्री आंदोलन और सुधार आंदोलन (UPSC 2024, 2025)

  • पूर्व-स्वतंत्रता सुधार आंदोलनों के प्रमुख योगदान — सती-उन्मूलन (1829), विधवा पुनर्विवाह (1856), बालिका शिक्षा (फुले दंपती 1848, बेथ्यून स्कूल 1849), बाल-विवाह विरोध (Age of Consent 1891, शारदा अधिनियम 1929), जाति-विरोध (सत्यशोधक, SNDP, आत्म-सम्मान), धार्मिक तर्कवाद (ब्रह्म समाज, आर्य समाज), मुस्लिम आधुनिक शिक्षा (अलीगढ़), राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि; स्त्री संगठन — भारत महिला परिषद (1904), अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (1927)।
  • स्त्रियों की स्थिति में सबसे प्रभावी सुधार आंदोलन (मत) — फुले-अंबेडकर धारा को सबसे प्रभावी माना जा सकता है — कारण: (1) स्त्री शिक्षा को सार्वभौमिक (सभी जातियों की लड़कियों के लिए) बनाया — सावित्रीबाई फुले प्रथम भारतीय महिला शिक्षिका; (2) विधवा-आश्रम, भ्रूण-हत्या प्रतिबंधक गृह (1863); (3) जाति और पितृसत्ता को एक साथ चुनौती; (4) अंबेडकर का हिंदू कोड बिल (1951) — तलाक़, संपत्ति, एकविवाह के अधिकार, जिसकी परिणति 1955-56 के क़ानूनों में; (5) संवैधानिक समानता। (विकल्प के रूप में ब्रह्म समाज/विद्यासागर को भी तर्क सहित चुना जा सकता है — पर उनका प्रभाव मुख्यतः उच्च-जातीय, शहरी बंगाल तक सीमित।)
  • स्वतंत्रता के बाद स्त्री आंदोलन — "Towards Equality" रिपोर्ट (1974), मथुरा बलात्कार मामला (1979) → बलात्कार क़ानून संशोधन (1983), दहेज़-विरोधी आंदोलन, शाहबानो (1985), चिपको में स्त्रियाँ, शराब-विरोधी आंदोलन (आंध्र 1992), निर्भया (2012), #MeToo (2018)।

श्रमिक, पिछड़ा वर्ग, नृजातीयता और पहचान आंदोलन

  • श्रमिक — बंबई कपड़ा मिल हड़ताल (1982, दत्ता सामंत), संगठित से अनौपचारिक श्रम आंदोलन (SEWA), गिग श्रमिक संघ।
  • पिछड़ा वर्ग — दक्षिण का गैर-ब्राह्मण आंदोलन (जस्टिस पार्टी, 1916), मंडल आंदोलन (1990)।
  • नृजातीय-पहचान — भाषाई राज्य (आंध्र 1953), झारखंड, गोरखालैंड, असम आंदोलन (1979-85), बोडो।

7. Master Summary Table

विषयमुख्य तथ्य / विचारकयाद रखें
योजनायोजना आयोग 1950; NITI 2015; आकांक्षी ज़िले 2018"कैसी योजना"
शिक्षाकोठारी 1964-66; RTE 2009; NEP 2020 (5+3+3+4, GER 50%, 6% GDP)कुंजी, रामबाण नहीं
नगरीकरण2011: 31.1%; 7,933 नगर; 3,892 जनगणना नगर; झुग्गी ~6.5 करोड़सबाल्टर्न नगरीकरण
प्रवासन2011: ~45.4 करोड़; ई-श्रम 2021; ONORCअनौपचारिक क्षेत्र से संबंध
विकेंद्रीकरण73-74वाँ संशोधन 1992; 29/18 विषय; PESA 19963F, प्रधान-पति
अभिजातकोठारी 1964; जैफ़रलो 2003; ADR 2024परिसंचरण + लौह नियम
किसानतेभागा, तेलंगाना, नक्सलबाड़ी; शेतकरी 1979; BKU; 2020-21निरसन दिसंबर 2021
पर्यावरणचिपको 1973; साइलेंट वैली; NBA 1985; गुहा, गाडगिलनिर्धनों का पर्यावरणवाद
दलितफुले 1873; अंबेडकर 1924-1956; दलित पैंथर्स 1972; BSP 1984पहचान-निर्माण के 7 आयाम
स्त्री1829, 1856, 1891, 1929; Towards Equality 1974; मथुरा 1979फुले-अंबेडकर धारा

8. चार्ट: पर्यावरण-विकास-जनजातीय पहचान की त्रयी

विकास पर्यावरण जनजातीय पहचान बाँध, खनन → वन-नदी विनाश विस्थापन, संस्कृति-क्षरण पवित्र वन-नदी = जीविका + धर्म चिपको · NBA · नियमगिरि
विकास-परियोजनाओं का विरोध पर्यावरण-रक्षा और जनजातीय पहचान-रक्षा — दोनों बन जाता है ("निर्धनों का पर्यावरणवाद")।

9. Mind Map

भारत में सामाजिक परिवर्तन
दृष्टियाँ
  • संविधान, योजना
  • शिक्षा, NEP 2020
नगरीकरण
  • जनगणना नगर
  • झुग्गियाँ, प्रवासन
  • अनौपचारिक क्षेत्र
राजनीति
  • विकेंद्रीकरण
  • अभिजात, लामबंदी
  • दबाव समूह
आंदोलन-1
  • किसान 2020-21
  • पर्यावरण त्रयी
आंदोलन-2
  • दलित — उत्पत्ति, पहचान
  • स्त्री, सुधार
  • नृजातीय

10. महत्वपूर्ण One-liners

  • सामुदायिक विकास कार्यक्रम — 2 अक्टूबर 1952; बलवंतराय मेहता समिति — 1957।
  • NITI आयोग — 1 जनवरी 2015; आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम — 2018।
  • "कांग्रेस व्यवस्था" (1964) — रजनी कोठारी; "India's Silent Revolution" (2003) — क्रिस्टोफ़ जैफ़रलो।
  • "Planet of Slums" (2006) — माइक डेविस; "सबाल्टर्न नगरीकरण" — डेनिस, मुखोपाध्याय, ज़ेराह (2012)।
  • चिपको — 1973; नर्मदा बचाओ आंदोलन — 1985; "The Unquiet Woods" (1989) — रामचंद्र गुहा।
  • "पारिस्थितिकी तंत्र-जन बनाम सर्वभक्षी" — गाडगिल और गुहा।
  • महाड सत्याग्रह — 1927; पूना पैक्ट — 1932; बौद्ध धर्मांतरण — 14 अक्टूबर 1956।
  • दलित पैंथर्स — 1972; BSP — 1984; "From Untouchable to Dalit" — एलेनोर ज़ेलियट।
  • "Towards Equality" — 1974; मथुरा मामला — 1979।
  • कृषि क़ानून निरसन अधिनियम — दिसंबर 2021।

11. टिप्स एवं ट्रिक्स

Paper II परिवर्तन-आंदोलन प्रश्न
  • आंदोलन-प्रश्नों में — पृष्ठभूमि → चरण (समय-रेखा) → सिद्धांत (संसाधन लामबंदी, NSM) → उपलब्धि → सीमा।
  • "What is your assessment" — स्पष्ट मूल्यांकन वाक्य से प्रारंभ करें।
  • नगरीकरण-प्रवासन में जनगणना 2011 के आँकड़े अनिवार्य।
याद रखने की तरकीब

1990 की राजनीति — "तीन M: मंडल, मंदिर, मार्केट"; विकेंद्रीकरण की चुनौती — "3F: Funds, Functions, Functionaries"; शहरीकरण के स्रोत — "प्राकृतिक वृद्धि, पुनर्वर्गीकरण, प्रवासन"।

12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2024 · Paper II · 7(a)

पर्यावरण आंदोलन, विकास और जनजातीय पहचान के बीच की "त्रयी" का विश्लेषण कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: भारत में विकास-परियोजनाएँ प्रायः वन-नदी क्षेत्रों में — जहाँ आदिवासी रहते हैं।

त्रयी: विकास (बाँध, खनन — स्थानीय लागत, दूर लाभ); पर्यावरण (वन-नदी विनाश); जनजातीय पहचान (भूमि-वन-नदी = जीविका + धर्म + संस्कृति)।

आंदोलन: चिपको, साइलेंट वैली, अप्पिको, NBA, कोयल-कारो, नियमगिरि, हसदेव।

सिद्धांत: गुहा (किसान प्रतिरोध), गाडगिल-गुहा (ecosystem people), गुहा-मार्टिनेज़-अलियर (निर्धनों का पर्यावरणवाद), बाविस्कर (रोमानीकरण की आलोचना)।

तनाव: संरक्षण से विस्थापन; स्टीरियोटाइप; विकास-आकांक्षा।

समाधान: FRA-PESA, ग्राम सभा की सहमति, सहभागी नियोजन, लाभ-साझेदारी।

निष्कर्ष: यह त्रयी विकास को "न्यायपूर्ण और सतत" बनाने की माँग है — "किसका विकास, किस क़ीमत पर"।

Q2UPSC 2024 · Paper II · 7(c)

आधुनिक भारत में दलित आंदोलनों की सामाजिक और ऐतिहासिक उत्पत्ति का पता लगाइए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

सामाजिक कारक: अस्पृश्यता-उत्पीड़न; औपनिवेशिक शिक्षा, मिशनरी, सेना-शहरी रोज़गार से गतिशीलता; जनगणना से जाति-चेतना।

ऐतिहासिक चरण: सुधार-धार्मिक (फुले 1873, नारायण गुरु 1903, अय्यंकाली 1907, आदि-धर्म 1926, आदि-हिंदू); अंबेडकर युग (1924 सभा, महाड 1927, कालाराम 1930, पूना पैक्ट 1932, ILP 1936, SCF 1942, संविधान, 1956 धर्मांतरण); दलित पैंथर्स (1972); BAMCEF-BSP (1978, 1984); समकालीन (भीम आर्मी, रोहित वेमुला)।

विचारक: ज़ेलियट, ऑमवेट, गुरु, तेलतुंबडे।

निष्कर्ष: दलित आंदोलन "सुधार" से "अधिकार" और "पहचान" से "सत्ता" की यात्रा है — भारतीय लोकतंत्र का सबसे गहरा सामाजिक रूपांतरण।

Q3UPSC 2025 · Paper II · 6(b)

भारत में नगरीकरण की प्रवृत्ति की विवेचना कीजिए। क्या आप सोचते हैं कि औद्योगीकरण ही नगरीकरण की एकमात्र पूर्व-शर्त है? अपने तर्क दीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

प्रवृत्ति: 2011 — 31.1%; 7,933 नगर; जनगणना नगरों की वृद्धि (सबाल्टर्न नगरीकरण); परि-नगरीकरण; महानगरीय क्षेत्र; राज्य-असमानता; स्रोत — प्राकृतिक वृद्धि, पुनर्वर्गीकरण, प्रवासन; मिशन (स्मार्ट सिटी, AMRUT, PMAY-U)।

औद्योगीकरण एकमात्र पूर्व-शर्त नहीं: सेवा-क्षेत्र (IT), प्रशासनिक राजधानियाँ, धार्मिक नगर, व्यापार-परिवहन केंद्र, "धक्का" प्रवासन और अति-नगरीकरण, शिक्षा-नगर (कोटा), प्राचीन पूर्व-औद्योगिक नगर।

परिणाम: रोज़गार से आगे जनसंख्या — अनौपचारिक क्षेत्र, झुग्गियाँ।

निष्कर्ष: औद्योगीकरण "एक" कारक, "एकमात्र" नहीं — भारत का नगरीकरण बहु-कारकीय और सेवा-प्रधान।

Q4UPSC 2025 · Paper II · 7(b)

"शैक्षिक विकास ही देश की सभी बुराइयों और दोषों का एकमात्र रामबाण है।" NEP-2020 के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

शिक्षा का महत्व: मानव पूँजी, गतिशीलता, स्त्री सशक्तिकरण (केरल), स्वास्थ्य, लोकतांत्रिक नागरिकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण।

NEP-2020: 5+3+3+4; ECCE; मातृभाषा; NIPUN; व्यावसायिक शिक्षा; बहु-विषयी उच्च शिक्षा; GER 50% (2035); 6% GDP।

"एकमात्र रामबाण" की आलोचना: रोज़गार-सृजन, भूमि सुधार, स्वास्थ्य भी आवश्यक; असमानता का पुनरुत्पादन (बोर्दियो); शिक्षित बेरोज़गारी; सीखने का संकट (ASER); संरचनात्मक बुराइयाँ शिक्षितों में भी; NEP क्रियान्वयन — वित्त, शिक्षक, भाषा-विवाद, डिजिटल विभाजन।

निष्कर्ष: शिक्षा "आवश्यक कुंजी" है, "एकमात्र रामबाण" नहीं — NEP की सफलता समता और समन्वित सामाजिक नीति पर निर्भर।

Q5UPSC 2024 · Paper II · 4(b)

शक्ति के विकेंद्रीकरण से आप क्या समझते हैं? भारत में लोकतंत्र की जड़ों को सशक्त करने में इसकी क्या भूमिका है? विस्तार से बताइए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

अर्थ: निर्णय-शक्ति, संसाधन, उत्तरदायित्व का स्थानीय स्तर तक हस्तांतरण — राजनीतिक, प्रशासनिक, वित्तीय।

भारत: बलवंतराय मेहता, अशोक मेहता; 73-74वाँ संशोधन; 11वीं-12वीं अनुसूची; आरक्षण; राज्य निर्वाचन-वित्त आयोग; PESA।

भूमिका: व्यापक सहभागिता (~30 लाख प्रतिनिधि, ~14 लाख स्त्रियाँ); हाशिये का सशक्तिकरण (चट्टोपाध्याय-डुफ़्लो 2004); जवाबदेही (ग्राम सभा, सामाजिक अंकेक्षण); स्थानीय नियोजन (केरल 1996); नेतृत्व की पाठशाला।

चुनौतियाँ: 3F; राज्य नियंत्रण; प्रधान-पति; अभिजात क़ब्ज़ा; भ्रष्टाचार।

निष्कर्ष: विकेंद्रीकरण ने भारतीय लोकतंत्र को "प्रतिनिधिक" से "सहभागी" बनाने की नींव रखी — पूर्ण वित्तीय-प्रशासनिक हस्तांतरण से ही यह पूर्ण होगा।

Q6UPSC 2024 · Paper II · 5(e) · 10 अंक

भारत में हाल के किसान आंदोलन के बारे में आपका क्या आकलन है? विस्तार से बताइए।

मॉडल उत्तर

पृष्ठभूमि: सितंबर 2020 के तीन कृषि क़ानून; संयुक्त किसान मोर्चा; 26 नवंबर 2020 से दिल्ली सीमाओं पर धरना; निरसन (घोषणा 19 नवंबर 2021, अधिनियम दिसंबर 2021)।

सफलता: शांतिपूर्ण-अनुशासित, संगठनात्मक एकता, सामुदायिक संसाधन (लंगर), सोशल मीडिया, नीतिगत सफलता, स्त्री-युवा भागीदारी, जाति-धर्म से ऊपर किसान पहचान।

सीमाएँ: मुख्यतः MSP-लाभार्थी क्षेत्र-वर्ग; भूमिहीन-दलित-छोटे किसान गौण; MSP गारंटी अनसुलझी; व्यापक कृषि संकट अनुत्तरित।

आकलन: लोकतांत्रिक प्रतिरोध की बड़ी सफलता, पर कृषि-संरचना के गहरे प्रश्न शेष।

Q7UPSC 2024 · Paper II · 5(d) · 10 अंक

भारत में राजनीतिक अभिजात के बदलते स्वरूप की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर

प्रारंभिक: उच्च-जातीय, अंग्रेज़ी-शिक्षित, राष्ट्रीय आंदोलन से; कांग्रेस व्यवस्था (कोठारी)।

परिवर्तन: OBC-दलित अभिजात (जैफ़रलो — मौन क्रांति; यादव — दूसरा लोकतांत्रिक उभार); क्षेत्रीय अभिजात; वंशवाद; धन और आपराधिक पृष्ठभूमि (ADR — 2024 में ~46% आपराधिक मामले, ~93% करोड़पति); व्यवसायी; स्त्री प्रतिनिधित्व (2024 — 74, ~13.6%; 2023 अधिनियम); पंचायतों से नया नेतृत्व।

व्याख्या: पैरेटो का परिसंचरण + मिशेल्स का लौह नियम।

Q8UPSC 2025 · Paper II · 7(c)

भारत में दलित आंदोलनों ने उनके पहचान-निर्माण को किस प्रकार सुगम बनाया है? विश्लेषण कीजिए।

मॉडल उत्तर

पहचान-निर्माण: नामकरण ("दलित" — गर्व-प्रतिरोध); वैकल्पिक इतिहास-प्रतीक (भीमा कोरेगाँव, अंबेडकर प्रतिमाएँ); नवयान बौद्ध धर्म; दलित साहित्य (जूठन) और कला; बहुजन राजनीतिक चेतना (कांशीराम); संविधान को पहचान-प्रतीक बनाना; अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव (डरबन 2001)।

चुनौतियाँ: आंतरिक विभाजन, उप-वर्गीकरण बहस, दलित अभिजात, पहचान बनाम वर्ग-राजनीति।

निष्कर्ष: दलित आंदोलनों ने "कलंकित पहचान" को "गर्वपूर्ण राजनीतिक पहचान" में बदला — सामाजिक लोकतंत्र की दिशा में निर्णायक कदम।

Q9UPSC 2025 · Paper II · 1(c) · 10 अंक

आपके अनुसार किस सामाजिक सुधार आंदोलन ने स्त्रियों की स्थिति के उत्थान में सबसे प्रभावी भूमिका निभाई है? स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर

मत — फुले-अंबेडकर धारा: सावित्रीबाई-ज्योतिबा फुले — सभी जातियों की बालिकाओं के लिए विद्यालय (1848), भ्रूण-हत्या प्रतिबंधक गृह (1863), विधवा-आश्रय; जाति और पितृसत्ता को एक साथ चुनौती; अंबेडकर — हिंदू कोड बिल (1951) → 1955-56 के क़ानून; संवैधानिक समानता।

तुलना: ब्रह्म समाज-विद्यासागर (सती, विधवा पुनर्विवाह) — महत्वपूर्ण पर मुख्यतः उच्च-जातीय शहरी बंगाल तक सीमित; आर्य समाज — स्त्री शिक्षा, पर धार्मिक पुनरुत्थानवादी ढाँचा।

निष्कर्ष: फुले-अंबेडकर धारा का प्रभाव सबसे व्यापक और संरचनात्मक — इसने स्त्री-मुक्ति को जाति-मुक्ति से जोड़ा।

Q10UPSC 2024 · Paper II · 5(c) · 10 अंक

क्या झुग्गियाँ भारत में औद्योगीकरण और नगरीकरण की अभिव्यक्तियाँ हैं? स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर

हाँ: श्रम-माँग → प्रवासन → सस्ते आवास का अभाव → अनौपचारिक बस्तियाँ; 2011 — ~6.5 करोड़ झुग्गीवासी; माइक डेविस।

पूर्ण व्याख्या नहीं: नियोजन-आवास नीति की विफलता, "धक्का" प्रवासन, अनौपचारिक आय, जाति-धर्म आधारित पृथक्करण, राजनीतिक संरक्षण; झुग्गियाँ "आशा की बस्तियाँ" भी (धारावी)।

नीति: PMAY-U, इन-सीटू पुनर्विकास, ARHC (2020)।

13. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • दृष्टियाँ — संविधान (ऑस्टिन), योजना (1950-2015, NITI — प्रासंगिकता), शिक्षा (कुंजी, NEP-2020 — रामबाण नहीं)।
  • ग्रामीण — CDP 1952, PRIs, हरित क्रांति, उदारीकरण।
  • नगरीकरण — 2011 आँकड़े, जनगणना नगर, स्रोत; औद्योगीकरण एकमात्र शर्त नहीं; झुग्गियाँ; प्रवासन-अनौपचारिक क्षेत्र और प्रवासियों की समस्याएँ।
  • राजनीति — विकेंद्रीकरण (73-74वाँ, 3F); अभिजात (कोठारी → जैफ़रलो, ADR); लामबंदी के आधार (3 M, लाभार्थी); दबाव समूह।
  • आंदोलन — किसान (औपनिवेशिक से 2020-21); पर्यावरण-विकास-जनजाति त्रयी; दलित (उत्पत्ति, चरण, पहचान); स्त्री और सुधार (फुले-अंबेडकर धारा); श्रमिक, पिछड़ा, नृजातीय।