1. अध्याय एक नज़र में
Paper II के भाग B के शेष अंश — भारत में जनजातीय समुदाय, सामाजिक वर्ग (कृषक और औद्योगिक वर्ग-संरचना, मध्य वर्ग), नातेदारी व्यवस्थाएँ (वंश, परिवार, विवाह, पितृसत्ता) और धर्म और समाज (धार्मिक समुदाय, अल्पसंख्यकों की समस्याएँ) — इस अध्याय में हैं। 2024 में जनजातियों की परिभाषा की समस्याएँ और विकास की बाधाएँ, औद्योगिक वर्ग-संरचना में परिवर्तन, पितृसत्ता और असमानता, बदलती नातेदारी और पारिवारिक बंधन, विवाह का अध्ययन, धार्मिक समुदाय और सांस्कृतिक विविधता; 2025 में नया मध्य वर्ग, "औद्योगिक वर्ग-संरचना सामाजिक संरचना का प्रकार्य", मर्डॉक का नातेदारी में योगदान, औपनिवेशिक जनजातीय नीतियाँ, राष्ट्र-निर्माण में धर्म, और समलैंगिक विवाह व जनसंख्या गतिकी पूछे गए।

2. भारत में जनजातीय समुदाय
जनजाति की पहचान में परिभाषा-संबंधी समस्याएँ (UPSC 2024)
- (1) संवैधानिक परिभाषा का अभाव — अनु. 366(25) केवल "अनु. 342 के अंतर्गत अधिसूचित समुदाय" कहता है — प्रशासनिक श्रेणी, विश्लेषणात्मक नहीं।
- (2) लोकुर समिति (1965) के मानदंड — "आदिम लक्षण", "भौगोलिक अलगाव", "संपर्क में संकोच" — विकासवादी, अपमानजनक और आज अप्रासंगिक; राज्यों में असंगत प्रयोग।
- (3) जनजाति-जाति सातत्य (बेली, सिन्हा) — स्पष्ट सीमा नहीं; अनेक जनजातियाँ हिंदू या ईसाई, अनेक जातियाँ जनजातीय मूल की।
- (4) राज्य-विशिष्ट सूचियाँ — एक समुदाय एक राज्य में ST, दूसरे में नहीं (संथाल — असम में ST नहीं; गोंड — कुछ ज़िलों में अलग स्थिति)।
- (5) "मूलनिवासी" (indigenous) बहस — भारत सरकार का मत: "सभी भारतीय मूलनिवासी"; विर्जिनियस ज़ाक्सा (1999) — "आदिवासी" को मूलनिवासी मानने की वकालत।
- (6) आंद्रे बेते ("The Concept of Tribe with Special Reference to India", 1986) — "जनजाति" का यूरोपीय अर्थ (राज्यविहीन, सरल समाज) भारत पर लागू नहीं, जहाँ जनजातियाँ सदियों से राज्यों और सभ्यताओं से जुड़ी रहीं।
- (7) राजनीतिक माँगें — ST दर्जे की माँग (गुर्जर, मैतेई, असम के छह समुदाय), सूची में "अति-समावेशन" का विवाद।
- (8) आंतरिक विभेदीकरण — शिक्षित-सम्पन्न "जनजातीय अभिजात" (मीणा) बनाम PVTG।
जनजातीय विकास की प्रमुख बाधाएँ
- भूमि-अलगाव और विस्थापन (खनन, बाँध); वन-अधिकारों का अधूरा क्रियान्वयन (FRA); PESA का कमज़ोर कार्यान्वयन; स्वास्थ्य-पोषण संकट (नाटापन, सिकल सेल); शिक्षा में भाषा-अवरोध, ड्रॉपआउट; ऋणग्रस्तता, बिचौलिये; वामपंथी उग्रवाद और सुरक्षा-संकट; जनजातीय अभिजात द्वारा लाभों का क़ब्ज़ा; सांस्कृतिक रूप से असंवेदनशील, "ऊपर से" योजनाएँ; नौकरशाही और निधि का अल्प-उपयोग; पहचान और सांस्कृतिक क्षरण।
औपनिवेशिक जनजातीय नीतियों का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव (UPSC 2025)
- नीतियाँ — स्थायी बंदोबस्त (1793) और ज़मींदारी, वन अधिनियम (1865, 1878, 1927), आपराधिक जनजाति अधिनियम (1871), इनर लाइन (1873), अनुसूचित ज़िला अधिनियम (1874), "Excluded/Partially Excluded Areas" (1919, 1935), मिशनरी शिक्षा।
- प्रभाव — (1) भूमि-अलगाव — सामुदायिक भूमि का निजीकरण, "दिकू" (साहूकार, ज़मींदार, ठेकेदार) का प्रवेश; (2) वन-अधिकारों का हनन — झूम पर रोक, वनोपज पर कर, बेगार; (3) ऋणग्रस्तता और बंधुआ श्रम; (4) नक़दी अर्थव्यवस्था और बाज़ार-निर्भरता; (5) श्रम-प्रवासन — असम के चाय बागानों में संथाल-मुंडा-उराँव ("कुली"); (6) कलंक — "आपराधिक जनजातियाँ"; (7) धर्मांतरण और शिक्षा — पूर्वोत्तर और छोटानागपुर में ईसाई धर्म, साक्षरता, नया अभिजात वर्ग; (8) अलगाव — मुख्यधारा से दूरी, बाद की राष्ट्रीय एकता की चुनौतियाँ; (9) विद्रोह — पहाड़िया, कोल, संथाल हूल (1855), बिरसा उलगुलान (1899-1900), रम्पा (1922) → सुरक्षात्मक क़ानून (CNT 1908, SPT 1949)।
एकीकरण और स्वायत्तता
- तीन दृष्टियाँ — अलगाव (एल्विन — प्रारंभिक), आत्मसात्करण (घुर्ये), एकीकरण (नेहरू का पंचशील) — संविधान की पाँचवीं-छठी अनुसूचियाँ, PESA, FRA।
- स्वायत्तता आंदोलन — झारखंड (राज्य 2000), बोडोलैंड (BTR 2020), नागा, गोरखा; छठी अनुसूची की माँगें (लद्दाख)।
3. भारत में सामाजिक वर्ग
औद्योगिक वर्ग-संरचना
- वर्ग — (1) औद्योगिक पूँजीपति (टाटा, बिड़ला — पारसी, मारवाड़ी, गुजराती बनिया, चेट्टियार); (2) प्रबंधकीय-तकनीकी वर्ग; (3) संगठित श्रमिक (सार्वजनिक क्षेत्र, बड़े उद्योग); (4) असंगठित/अनौपचारिक श्रमिक (बहुसंख्यक); (5) ठेका और प्रवासी श्रमिक।
- ऐतिहासिक गठन — मॉरिस डी. मॉरिस (The Emergence of an Industrial Labor Force in India, 1965 — बंबई कपड़ा मिलें, "जॉबर" व्यवस्था); राजनारायण चंदावरकर (The Origins of Industrial Capitalism in India, 1994) — ग्रामीण संबंध बने रहे; ट्रेड यूनियनें — AITUC (1920), INTUC (1947), BMS (1955), CITU (1970) — दलों से संबद्ध।
"औद्योगिक वर्ग-संरचना भारतीय सामाजिक संरचना का प्रकार्य है" (UPSC 2025)
- सहमति के तर्क — (1) उद्यमिता जाति-आधारित — व्यापारी जातियों (मारवाड़ी, बनिया, चेट्टियार, पारसी) का औद्योगिक पूँजी पर वर्चस्व; जाति-नातेदारी नेटवर्क से पूँजी और विश्वास (थॉमस टिम्बर्ग — मारवाड़ी); (2) भर्ती — जॉबर, ठेकेदार, जाति-क्षेत्र नेटवर्क से; (3) श्रम-विभाजन में जाति — सफ़ाई, चमड़ा, निर्माण में दलित; प्रबंधन में उच्च जातियाँ; (4) ग्रामीण संबंध — श्रमिक गाँव से जुड़े, "किसान-श्रमिक"; (5) लिंग — स्त्रियाँ कम वेतन वाले कामों में; (6) क्षेत्र-भाषा — प्रवासी श्रमिकों का पृथक्करण; (7) यूनियन — जाति और क्षेत्रीय आधार पर विभाजित।
- असहमति/सीमाएँ — (1) आधुनिक शिक्षा और योग्यता — IIT-IIM से उभरा तकनीकी-प्रबंधकीय वर्ग; (2) आरक्षण — सार्वजनिक क्षेत्र में दलित-OBC का प्रवेश; (3) उदारीकरण (1991) — नए उद्यमी (IT, स्टार्टअप) — पर अब भी उच्च-जातीय वर्चस्व; (4) दलित उद्यमिता (DICCI, 2005); (5) बाज़ार और वैश्विक पूँजी — बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अपनी संरचनाएँ; (6) मार्क्सवादी दृष्टि — वर्ग का आधार उत्पादन-संबंध, जाति गौण।
- निष्कर्ष — आंशिक रूप से सहमत: भारतीय औद्योगिक वर्ग-संरचना "विशुद्ध वर्गीय" नहीं — जाति, नातेदारी, क्षेत्र और लिंग में "अंतर्निहित" (embedded); पर आधुनिकीकरण और नीति इस संबंध को धीरे-धीरे ढीला कर रहे हैं।
औद्योगिक वर्ग-संरचना में हाल के परिवर्तन (UPSC 2024)
- (1) अनौपचारीकरण — ठेका श्रम, "स्थायी अस्थायी" कर्मचारी; (2) सेवा-क्षेत्र — IT-BPO पेशेवर वर्ग, शहरी उपभोक्ता; (3) गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिक; (4) संगठित श्रम का ह्रास — यूनियन-सदस्यता घटी; (5) स्त्रियों का प्रवेश — वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली (तमिलनाडु); (6) प्रवासी श्रमिक — COVID-19 पलायन से दृश्यता; (7) नई श्रम संहिताएँ (नवंबर 2025 से प्रभावी) — लचीलापन बनाम श्रमिक सुरक्षा बहस; (8) स्वचालन — कौशल ध्रुवीकरण; (9) MSME का विस्तार; (10) नए कॉरपोरेट अभिजात — स्टार्टअप संस्थापक।
नया मध्य वर्ग (UPSC 2025)
| आधार | पुराना मध्य वर्ग | नया मध्य वर्ग |
|---|---|---|
| उदय | औपनिवेशिक काल — अंग्रेज़ी शिक्षा (बी.बी. मिश्रा, The Indian Middle Classes, 1961) | 1991 के उदारीकरण के बाद |
| व्यवसाय | सरकारी सेवा, वकील, शिक्षक, डॉक्टर, क्लर्क | निजी क्षेत्र, IT, वित्त, मीडिया, स्टार्टअप, सेवाएँ |
| मूल्य | राष्ट्रवाद, सेवा, त्याग, मितव्ययिता ("नेहरूवादी") | उपभोक्तावाद, व्यक्तिवाद, उद्यमिता, वैश्विक आकांक्षा |
| राज्य से संबंध | राज्य पर निर्भर, राज्य-निर्माण में भागीदार | बाज़ार-उन्मुख; राज्य की दक्षता/भ्रष्टाचार पर आलोचनात्मक (2011 भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन) |
| सामाजिक संरचना | मुख्यतः उच्च जातियाँ, शहरी | अब भी उच्च-जातीय वर्चस्व, पर OBC-दलित और छोटे शहरों का प्रवेश ("नव-मध्य वर्ग") |
- विचारक — पवन वर्मा (The Great Indian Middle Class, 1998 — नैतिक-सामाजिक प्रतिबद्धता में गिरावट); लीला फ़र्नांडिस (India's New Middle Class, 2006 — उदारीकरण की "राजनीतिक परियोजना", उपभोग-आधारित पहचान); सतीश देशपांडे (Contemporary India, 2003 — मध्य वर्ग और जाति का संबंध; "सांस्कृतिक पूँजी" से जाति का अदृश्य होना)।
- विशेषताएँ — उपभोग और ब्रांड-संस्कृति, अंग्रेज़ी शिक्षा और कोचिंग, शहरी फ़्लैट-संस्कृति, डिजिटल-वैश्विक संपर्क, छोटा परिवार, स्त्री रोज़गार, धार्मिकता का नया रूप (गुरु, तीर्थ-पर्यटन), राजनीतिक मुखरता।
4. नातेदारी व्यवस्थाएँ
जी.पी. मर्डॉक का नातेदारी अध्ययन में योगदान (UPSC 2025)
- नातेदारी — रक्त (consanguinity) और विवाह (affinity) पर आधारित सामाजिक रूप से मान्य संबंधों की व्यवस्था।
- मर्डॉक — Social Structure (1949): लगभग 250 समाजों का सांख्यिकीय-तुलनात्मक अध्ययन; येल के Human Relations Area Files (HRAF, 1949) से जुड़े; (1) एकाकी परिवार सार्वभौमिक — चार कार्य (यौन, प्रजनन, आर्थिक, शैक्षिक); (2) नातेदारी शब्दावली के छह प्रकार — एस्किमो, हवाई, इरोक्वाइस, क्रो, ओमाहा, सूडानी; (3) निवास, वंश और शब्दावली के बीच सांख्यिकीय सह-संबंध — निवास-नियम बदलने पर वंश और फिर शब्दावली बदलती है; (4) प्राथमिक (8), द्वितीयक (33), तृतीयक (151) नातेदार; (5) Ethnographic Atlas (1967) — तुलनात्मक डेटाबेस।
- आलोचना — परिवार की सार्वभौमिकता पर प्रश्न (नायर, किबुत्ज़); संदर्भ से कटे "लक्षणों" की तुलना (गाल्टन की समस्या — प्रसार बनाम स्वतंत्र विकास); प्रकार्यवादी मान्यताएँ; पर अंतर-सांस्कृतिक सांख्यिकीय पद्धति का प्रवर्तन उनका स्थायी योगदान।
भारत में वंश, परिवार और विवाह
- क्षेत्रीय भिन्नता — इरावती कर्वे (Kinship Organisation in India, 1953) — उत्तर (गाँव बहिर्विवाह, दूर विवाह), दक्षिण (क्रॉस-कज़िन विवाह), पूर्व, मध्य क्षेत्र; मातृवंशी — नायर, खासी, गारो।
- परिवार — संयुक्त परिवार (मिताक्षरा-दायभाग), ए.एम. शाह (The Household Dimension of the Family in India, 1973 — "परिवार" और "गृहस्थी" का भेद), आई.पी. देसाई (कार्यात्मक संयुक्तता), पेट्रीशिया उबेरॉय (Family, Kinship and Marriage in India, 1993)।
बदलते नातेदारी प्रतिरूप और पारिवारिक बंधन (UPSC 2024)
- परिवर्तन — एकाकी परिवारों का विस्तार, परिवार के आकार में कमी, प्रवासन (आंतरिक और विदेश), वृद्धावस्था, देर से विवाह, विवाह-विच्छेद, अंतर्जातीय विवाह, स्त्रियों का रोज़गार, संपत्ति में बेटियों के अधिकार (2005)।
- क्या बंधन कमज़ोर हो रहे हैं? — हाँ (आंशिक): वृद्धों का एकाकीपन (वृद्धाश्रम, माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम 2007 की आवश्यकता), संपत्ति-विवाद, विस्तारित नातेदारी से दूरी, "परमाणु" मूल्य; नहीं (रूपांतरण): "दूर से निकटता" — व्हाट्सऐप पारिवारिक समूह, वीडियो कॉल; संकट (COVID) में पारिवारिक सहायता; त्योहार-विवाह में पुनर्मिलन; "कार्यात्मक संयुक्तता" (देसाई) — अलग रहकर भी आर्थिक-भावनात्मक दायित्व; प्रवासी "रेमिटेंस" परिवार; शहरी एकाकी परिवार भी नातेदारी नेटवर्क पर निर्भर (नौकरी, विवाह)।
- निष्कर्ष — पारिवारिक बंधन "कमज़ोर" से अधिक "पुनर्गठित" — संरचना बदली है, भावनात्मक-नैतिक दायित्व नए रूपों में जारी।
विवाह का समाजशास्त्रीय अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है? बदलते प्रतिरूपों के निहितार्थ (UPSC 2024)
- महत्व — (1) समूहों के बीच गठबंधन (लेवी-स्ट्रॉस); (2) जाति का पुनरुत्पादन — अंतर्विवाह (अंबेडकर, 1916); (3) प्रजनन और वैधता; (4) संपत्ति और उत्तराधिकार; (5) लैंगिक संबंध और पितृसत्ता — स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण; (6) सामाजिक गतिशीलता — हाइपरगैमी; (7) सामाजिक परिवर्तन का सूचक — विवाह-आयु, अंतर्जातीय विवाह, तलाक़।
- बदलते प्रतिरूप — विवाह-आयु में वृद्धि, बाल विवाह में कमी, प्रेम-सह-तय विवाह, अंतर्जातीय-अंतर्धार्मिक विवाह (धीमी वृद्धि), ऑनलाइन वैवाहिक मंच, दहेज़ का बने रहना, तलाक़-पुनर्विवाह, लिव-इन, एकल जीवन, विवाह का व्यावसायीकरण।
- निहितार्थ — (1) प्रजनन दर में गिरावट; (2) स्त्री-स्वायत्तता और शिक्षा में वृद्धि; (3) जाति-सीमाओं में धीमा क्षरण, पर प्रतिक्रिया (सम्मान-हत्या, "लव जिहाद" विमर्श और धर्मांतरण-विरोधी क़ानून); (4) परिवार-संरचना और वृद्धों की देखभाल पर प्रभाव; (5) विषम लिंगानुपात वाले क्षेत्रों में "विवाह-संकट" और स्त्री-तस्करी/"मोल की बहुएँ"; (6) क़ानूनी परिवर्तन — घरेलू हिंसा अधिनियम 2005, विशेष विवाह अधिनियम पर बहस।
समलैंगिक विवाह और जनसंख्या गतिकी (UPSC 2025)
- क़ानूनी स्थिति — नवतेज जौहर (2018) — सहमति से समलैंगिक संबंध अपराध नहीं; सुप्रियो चक्रवर्ती (अक्टूबर 2023) — सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता नहीं दी (विधायिका का विषय); इसलिए भारत में समलैंगिक "विवाह" क़ानूनी रूप से पंजीकृत नहीं होते।
- क्या ये जनसंख्या गतिकी के लिए "उत्तरदायी" हैं? — आलोचनात्मक उत्तर: नहीं, उल्लेखनीय रूप से नहीं: (1) LGBTQ+ जनसंख्या का अनुपात छोटा और विश्वसनीय आँकड़े उपलब्ध नहीं (जनगणना 2011 में "अन्य" लिंग श्रेणी में लगभग 4.9 लाख लोग); (2) भारत में प्रजनन दर में गिरावट (TFR 2.0) के मुख्य कारक — स्त्री शिक्षा, शहरीकरण, गर्भनिरोधक, विवाह-आयु में वृद्धि, आर्थिक लागत — समलैंगिकता नहीं; (3) समलैंगिक व्यक्ति अब भी सामाजिक दबाव में प्रायः विषमलैंगिक विवाह करते हैं; (4) सहायक प्रजनन और गोद — सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम 2021 और ART अधिनियम 2021 समलैंगिक दंपतियों को इन सेवाओं से बाहर रखते हैं।
- जनांकिकीय-समाजशास्त्रीय प्रासंगिकता — (1) परिवार-विविधता — "चुने हुए परिवार", गृहस्थी के नए रूप (जनगणना वर्गीकरण की चुनौती); (2) वृद्धावस्था देखभाल — संतानहीन वृद्ध और सामाजिक सुरक्षा; (3) स्वास्थ्य-आँकड़े — HIV कार्यक्रम, मानसिक स्वास्थ्य; (4) उत्तराधिकार और नामांकन अधिकार।
- निष्कर्ष — समलैंगिक विवाह भारत की जनसंख्या के आकार-वृद्धि के लिए उत्तरदायी नहीं; उसका महत्व "जनसंख्या की मात्रा" में नहीं, "परिवार और नातेदारी की संरचना" और अधिकारों की बहस में है।
पितृसत्ता और असमानताएँ (UPSC 2024)
- अवधारणा — पुरुष-प्रभुत्व की सामाजिक व्यवस्था — गर्डा लर्नर (The Creation of Patriarchy, 1986); सिल्विया वॉल्बी (छह संरचनाएँ, 1990); डेनिज़ कंडियोटी ("Bargaining with Patriarchy", 1988); उमा चक्रवर्ती ("ब्राह्मणवादी पितृसत्ता", 1993)।
- क्या पितृसत्ता असमानताओं को समझने की "कुंजी" है? — हाँ: (1) लिंगानुपात — जन्म-लिंगानुपात असंतुलन, "लापता स्त्रियाँ" (अमर्त्य सेन); (2) श्रम — स्त्री श्रम-भागीदारी कम, अवैतनिक कार्य; (3) संपत्ति — भूमि में कम हिस्सा; (4) हिंसा — घरेलू हिंसा, दहेज़-मृत्यु; (5) राजनीति — कम प्रतिनिधित्व (नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 — 33% आरक्षण, परिसीमन के बाद लागू); (6) जाति से अंतर्संबंध — जाति-शुद्धता स्त्री-नियंत्रण पर टिकी (चक्रवर्ती, अंबेडकर); (7) वर्ग — घरेलू कामगार, कृषि-मज़दूर स्त्रियाँ।
- सीमा — केवल पितृसत्ता "एकमात्र" कुंजी नहीं — जाति, वर्ग, क्षेत्र, धर्म के साथ अंतर्संबंधता (क्रेनशॉ, शर्मिला रेगे) आवश्यक; मातृवंशी समाज (खासी) में भी पुरुष-प्रभुत्व के रूप।
5. धर्म और समाज
धार्मिक समुदाय और भारत की सांस्कृतिक विविधता (UPSC 2024)
- जनसांख्यिकी (जनगणना 2011) — हिंदू 79.8%, मुस्लिम 14.2%, ईसाई 2.3%, सिख 1.7%, बौद्ध 0.7%, जैन 0.4%; अधिसूचित अल्पसंख्यक — मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी, जैन (2014); राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (वैधानिक, 1992)।
- योगदान — (1) स्थापत्य — मंदिर, इंडो-इस्लामिक (ताज, क़ुतुब), गुरुद्वारे, चर्च, बौद्ध स्तूप-विहार; (2) संगीत-कला — भक्ति और सूफ़ी परंपराएँ, क़व्वाली, गुरबाणी कीर्तन, हिंदुस्तानी संगीत का घराना-संस्कृति; (3) भाषा-साहित्य — उर्दू, पंजाबी (गुरमुखी), पाली, सिख-भक्ति साहित्य; (4) भोजन — मुग़लई, सिख लंगर (सामुदायिक सहभोज), जैन शाकाहार; (5) त्योहार — दीपावली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व, बुद्ध पूर्णिमा, नवरोज़ — साझा उत्सव; (6) शिक्षा-स्वास्थ्य — मिशनरी विद्यालय-अस्पताल, अलीगढ़, खालसा कॉलेज; (7) उद्यम और परोपकार — पारसी (टाटा), जैन व्यापारी; (8) समन्वय — सूफ़ी दरगाहें (अजमेर), कबीर, गुरु नानक; (9) सामाजिक सुधार — अंबेडकर का नवयान बौद्ध धर्म (1956), सिख धर्म की समतावादी परंपरा; (10) जनजातीय धर्म — सरना, डोनी-पोलो, सेंग खासी।
- चुनौतियाँ — सांप्रदायिकता, पृथक्करण (आवासीय "घेटो"), अल्पसंख्यकों का सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन (सच्चर समिति, 2006 — मुस्लिमों पर), धर्मांतरण-विवाद, घृणा-भाषण।
राष्ट्र-निर्माण और धर्म (UPSC 2025)
- राष्ट्र-निर्माण — विविध समूहों को साझा राजनीतिक पहचान, निष्ठा, संस्थाओं और नागरिकता में एकीकृत करने की प्रक्रिया — "कल्पित समुदाय" (एंडरसन); भारत में संविधान, लोकतंत्र, संघवाद, आर्थिक विकास, सांस्कृतिक नीति के माध्यम से।
- धर्म की सकारात्मक भूमिका — (1) राष्ट्रीय आंदोलन में लामबंदी — गांधी की धार्मिक भाषा ("राम राज्य", सत्याग्रह), विवेकानंद, गणेशोत्सव (तिलक), ख़िलाफ़त-असहयोग एकता (1920); (2) नैतिक मूल्य — अहिंसा, सेवा, सहिष्णुता; (3) सांस्कृतिक एकता — तीर्थ-भूगोल (चार धाम, शक्तिपीठ) — घुर्ये, एन.के. बोस; (4) समन्वयवादी परंपराएँ — "गंगा-जमुनी तहज़ीब"; (5) धार्मिक संस्थाओं की सेवा — शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा-राहत (गुरुद्वारा लंगर)।
- नकारात्मक भूमिका — (1) सांप्रदायिकता (बिपन चंद्र) और विभाजन (1947); (2) बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यकों में असुरक्षा; (3) धार्मिक पहचान पर आधारित राजनीतिक लामबंदी, दंगे; (4) अलगाववादी आंदोलनों में धार्मिक तत्व।
- भारतीय समाधान — धर्मनिरपेक्ष संविधान (सर्वधर्म-समभाव, "सैद्धांतिक दूरी" — राजीव भार्गव); अल्पसंख्यक अधिकार (अनु. 29-30); टी.एन. मदान और आशीष नंदी की आलोचना — धर्मनिरपेक्षता "आयातित", भारतीय परंपरा की सहिष्णुता पर भरोसा; अंबेडकर — धर्म का सामाजिक लोकतंत्र से संबंध।
- निष्कर्ष — धर्म राष्ट्र-निर्माण में "दोधारी तलवार" है; समावेशी नागरिकता, संवैधानिक नैतिकता और समन्वयवादी परंपराएँ इसे एकता का साधन बना सकती हैं।
6. Master Summary Table
| विषय | मुख्य विचारक / तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| जनजाति परिभाषा | अनु. 342, 366(25); लोकुर 1965; बेते 1986; ज़ाक्सा 1999 | 8 समस्याएँ |
| औपनिवेशिक नीति | 1793, 1871, 1873, 1878, 1935; CNT 1908 | दिकू, भूमि-अलगाव |
| औद्योगिक वर्ग | मॉरिस 1965; चंदावरकर 1994; टिम्बर्ग | जॉबर, जाति-आधारित उद्यमिता |
| मध्य वर्ग | बी.बी. मिश्रा 1961; वर्मा 1998; फ़र्नांडिस 2006; देशपांडे 2003 | पुराना बनाम नया |
| नातेदारी | मर्डॉक 1949, 1967; कर्वे 1953; शाह 1973; उबेरॉय 1993 | 6 शब्दावली प्रकार; HRAF |
| विवाह-परिवार | देसाई (कार्यात्मक संयुक्तता); नवतेज 2018; सुप्रियो 2023 | बंधन — पुनर्गठित |
| पितृसत्ता | लर्नर 1986; वॉल्बी 1990; कंडियोटी 1988; चक्रवर्ती 1993 | अंतर्संबंधता |
| धर्म | जनगणना 2011; NCM 1992; सच्चर 2006; भार्गव, मदान, नंदी | दोधारी तलवार |
7. चार्ट: भारतीय औद्योगिक वर्ग-संरचना में सामाजिक अंतर्निहितता
8. Mind Map
- परिभाषा की समस्याएँ
- औपनिवेशिक नीति
- विकास-बाधाएँ
- औद्योगिक वर्ग
- सामाजिक अंतर्निहितता
- नया मध्य वर्ग
- मर्डॉक
- बदलते बंधन
- विवाह, समलैंगिक विवाह
- लर्नर, वॉल्बी
- ब्राह्मणवादी पितृसत्ता
- सांस्कृतिक विविधता
- राष्ट्र-निर्माण
- अल्पसंख्यक
9. महत्वपूर्ण One-liners
- "The Concept of Tribe with Special Reference to India" (1986) — आंद्रे बेते।
- "The Emergence of an Industrial Labor Force in India" (1965) — मॉरिस डी. मॉरिस।
- "The Indian Middle Classes" (1961) — बी.बी. मिश्रा; "The Great Indian Middle Class" (1998) — पवन वर्मा।
- "India's New Middle Class" (2006) — लीला फ़र्नांडिस।
- "Social Structure" (1949) — जी.पी. मर्डॉक; Ethnographic Atlas — 1967।
- "Kinship Organisation in India" (1953) — इरावती कर्वे; "Family, Kinship and Marriage in India" (1993) — पेट्रीशिया उबेरॉय।
- "The Creation of Patriarchy" (1986) — गर्डा लर्नर; "Bargaining with Patriarchy" (1988) — डेनिज़ कंडियोटी।
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम — 2023 (106वाँ संविधान संशोधन, 33% आरक्षण)।
- सच्चर समिति रिपोर्ट — 2006; राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम — 1992।
- सुप्रियो चक्रवर्ती निर्णय — अक्टूबर 2023।
10. टिप्स एवं ट्रिक्स
- "Do you agree" वाले प्रश्नों में आंशिक सहमति का संतुलित ढाँचा — पक्ष, विपक्ष, निष्कर्ष।
- असामान्य प्रश्नों (जैसे समलैंगिक विवाह और जनसंख्या) में आलोचनात्मक रहें — प्रश्न की मान्यता को तथ्यों से जाँचें।
- वर्ग-प्रश्नों में जाति-लिंग का अंतर्संबंध अवश्य दिखाएँ।
मर्डॉक के परिवार-कार्य — "यौन-प्रजनन-आर्थिक-शैक्षिक"; मर्डॉक शब्दावली — "एस्कि-हवाई-इरो-क्रो-ओमा-सूडा"।
11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
भारत में जनजातियों की पहचान में निहित परिभाषा-संबंधी समस्याएँ क्या हैं? भारत में जनजातीय विकास की मुख्य बाधाओं की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
परिभाषा-समस्याएँ: संवैधानिक परिभाषा का अभाव (अनु. 342); लोकुर मानदंडों की सीमाएँ; जनजाति-जाति सातत्य; राज्य-विशिष्ट सूचियाँ; मूलनिवासी बहस (ज़ाक्सा); बेते — यूरोपीय अवधारणा की अनुपयुक्तता; ST दर्जे की राजनीतिक माँगें; आंतरिक विभेदीकरण।
विकास-बाधाएँ: भूमि-अलगाव और विस्थापन; FRA-PESA का कमज़ोर क्रियान्वयन; स्वास्थ्य-पोषण संकट; शिक्षा में भाषा-अवरोध; ऋण-बिचौलिये; उग्रवाद; अभिजात क़ब्ज़ा; असंवेदनशील योजनाएँ; निधि का अल्प-उपयोग; सांस्कृतिक क्षरण।
उपाय: अधिकार-आधारित विकास, ग्राम सभा-केंद्रित नियोजन, मातृभाषा शिक्षा, PM-JANMAN और धरती आबा का सहभागी क्रियान्वयन।
निष्कर्ष: परिभाषा की अस्पष्टता और विकास की बाधाएँ परस्पर जुड़ी हैं — "प्रशासनिक श्रेणी" को "सामाजिक न्याय" के उपकरण में बदलना ही चुनौती है।
"औद्योगिक वर्ग-संरचना भारतीय समाज की सामाजिक संरचना का एक प्रकार्य है।" क्या आप इस कथन से सहमत हैं? विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: औद्योगिक वर्ग — पूँजीपति, प्रबंधक, संगठित-असंगठित श्रमिक।
सहमति: जाति-आधारित उद्यमिता (मारवाड़ी, पारसी, चेट्टियार — टिम्बर्ग); जॉबर-ठेकेदार भर्ती (मॉरिस, चंदावरकर); श्रम-विभाजन में जाति; ग्रामीण संबंध; लिंग; क्षेत्र-भाषा; विभाजित यूनियनें।
असहमति: आधुनिक शिक्षा और योग्यता; आरक्षण; 1991 के बाद नए उद्यमी; DICCI; वैश्विक पूँजी; मार्क्सवादी — उत्पादन-संबंध प्राथमिक।
निष्कर्ष: आंशिक सहमति — औद्योगिक वर्ग सामाजिक संरचना में "अंतर्निहित" (ग्रैनोवेटर/पोलान्यी), पर आधुनिकीकरण और नीति से यह संबंध ढीला हो रहा है।
भारतीय नए मध्य वर्ग की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। यह पुराने मध्य वर्ग से किस प्रकार भिन्न है?
मॉडल उत्तर
विशेषताएँ: उदारीकरण-जनित, निजी क्षेत्र-IT-सेवाएँ, उपभोक्तावाद, अंग्रेज़ी शिक्षा, वैश्विक आकांक्षा, छोटा परिवार, स्त्री रोज़गार, धार्मिकता का नया रूप, राजनीतिक मुखरता; छोटे शहरों और OBC-दलित का प्रवेश।
भिन्नता (तालिका): उदय, व्यवसाय, मूल्य (त्याग बनाम उपभोग), राज्य से संबंध, सामाजिक संरचना।
विचारक: मिश्रा (1961), वर्मा (1998), फ़र्नांडिस (2006), देशपांडे (2003)।
निष्कर्ष: नया मध्य वर्ग "उपभोग और बाज़ार" से परिभाषित, पुराना "राज्य और राष्ट्र" से — पर दोनों में उच्च-जातीय वर्चस्व की निरंतरता।
नातेदारी क्या है? नातेदारी व्यवस्था के अध्ययन में जी.पी. मर्डॉक के योगदान को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर
नातेदारी: रक्त और विवाह पर आधारित सामाजिक रूप से मान्य संबंध; वंश, निवास, शब्दावली, व्यवहार।
मर्डॉक का योगदान: Social Structure (1949) — ~250 समाजों का सांख्यिकीय-तुलनात्मक अध्ययन (HRAF); एकाकी परिवार की सार्वभौमिकता और 4 कार्य; शब्दावली के 6 प्रकार; निवास-वंश-शब्दावली का सह-संबंध; प्राथमिक/द्वितीयक/तृतीयक नातेदार; Ethnographic Atlas (1967)।
आलोचना: सार्वभौमिकता (नायर, किबुत्ज़), गाल्टन की समस्या, संदर्भहीन तुलना।
निष्कर्ष: मर्डॉक ने नातेदारी अध्ययन को अंतर-सांस्कृतिक, सांख्यिकीय आधार दिया।
राष्ट्र-निर्माण से आप क्या समझते हैं? राष्ट्र-निर्माण में धर्म की क्या भूमिका है? अपने उत्तर को विस्तार से समझाइए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
राष्ट्र-निर्माण: विविध समूहों को साझा राजनीतिक पहचान और संस्थाओं में एकीकृत करना; कल्पित समुदाय (एंडरसन); भारत — संविधान, लोकतंत्र, संघवाद, विकास।
सकारात्मक भूमिका: राष्ट्रीय आंदोलन में लामबंदी (गांधी, तिलक, ख़िलाफ़त-असहयोग); नैतिक मूल्य; तीर्थ-भूगोल और सांस्कृतिक एकता (घुर्ये, बोस); समन्वयवाद; सेवा संस्थाएँ।
नकारात्मक भूमिका: सांप्रदायिकता (बिपन चंद्र), विभाजन 1947, बहुसंख्यकवाद, दंगे, अलगाववाद।
भारतीय समाधान: धर्मनिरपेक्ष संविधान (भार्गव — सैद्धांतिक दूरी), अनु. 25-30; मदान-नंदी की आलोचना; अंबेडकर।
निष्कर्ष: धर्म दोधारी तलवार — समावेशी नागरिकता और संवैधानिक नैतिकता से ही वह एकता का स्रोत बनता है।
समाजशास्त्र में विवाह का अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है? भारतीय समाज के लिए बदलते विवाह-प्रतिरूपों के निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
महत्व: गठबंधन (लेवी-स्ट्रॉस), जाति-पुनरुत्पादन (अंबेडकर), प्रजनन-वैधता, संपत्ति, पितृसत्ता, गतिशीलता, परिवर्तन-सूचक।
बदलते प्रतिरूप: विवाह-आयु में वृद्धि, प्रेम-सह-तय, अंतर्जातीय (धीमी वृद्धि), ऑनलाइन मंच, दहेज़, तलाक़, लिव-इन, एकल जीवन, व्यावसायीकरण।
निहितार्थ: प्रजनन दर में गिरावट; स्त्री-स्वायत्तता; जाति-सीमाओं का धीमा क्षरण और प्रतिक्रिया; परिवार और वृद्ध-देखभाल; विषम लिंगानुपात क्षेत्रों में विवाह-संकट; क़ानूनी परिवर्तन।
निष्कर्ष: विवाह भारतीय समाज का "दर्पण" है — उसके परिवर्तन परंपरा और आधुनिकता के बीच निरंतर समझौते को दर्शाते हैं।
क्या पितृसत्ता भारतीय समाज की विभिन्न असमानताओं को समझने की कुंजी है? विस्तार से बताइए।
मॉडल उत्तर
पितृसत्ता: लर्नर, वॉल्बी, कंडियोटी, चक्रवर्ती।
कुंजी के रूप में: लिंगानुपात ("लापता स्त्रियाँ" — सेन), श्रम-भागीदारी, संपत्ति, हिंसा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व (2023 अधिनियम), जाति-शुद्धता से संबंध, वर्ग।
सीमा: एकमात्र कुंजी नहीं — जाति, वर्ग, क्षेत्र, धर्म का अंतर्संबंध (क्रेनशॉ, रेगे)।
निष्कर्ष: पितृसत्ता "एक" प्रमुख कुंजी है, जो अंतर्संबंधात्मक दृष्टि के साथ ही पूर्ण चित्र देती है।
समलैंगिक विवाह भारत में जनसंख्या गतिकी के लिए किस प्रकार उत्तरदायी हैं? विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
क़ानूनी स्थिति: नवतेज (2018) — अपराध-मुक्ति; सुप्रियो (2023) — विवाह को क़ानूनी मान्यता नहीं।
आलोचनात्मक मूल्यांकन: उल्लेखनीय जनांकिकीय प्रभाव नहीं — LGBTQ+ अनुपात छोटा, आँकड़े सीमित (जनगणना 2011 — "अन्य" ~4.9 लाख); प्रजनन-गिरावट के मुख्य कारक शिक्षा, शहरीकरण, गर्भनिरोधक, विवाह-आयु; सामाजिक दबाव में विषमलैंगिक विवाह; सरोगेसी और ART अधिनियम 2021 समलैंगिक दंपतियों को बाहर रखते हैं।
प्रासंगिकता: परिवार-विविधता, वृद्ध-देखभाल, स्वास्थ्य कार्यक्रम, उत्तराधिकार अधिकार।
निष्कर्ष: समलैंगिक विवाह जनसंख्या "आकार" के लिए उत्तरदायी नहीं; उसका महत्व परिवार-संरचना और अधिकारों की बहस में है।
धार्मिक समुदाय भारत की सांस्कृतिक विविधता में किस प्रकार योगदान करते हैं?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
जनसांख्यिकी: जनगणना 2011; छह अधिसूचित अल्पसंख्यक; NCM (1992)।
योगदान: स्थापत्य, संगीत-कला (भक्ति-सूफ़ी, कीर्तन), भाषा-साहित्य (उर्दू, गुरमुखी, पाली), भोजन (लंगर, मुग़लई, जैन), त्योहार, शिक्षा-स्वास्थ्य संस्थाएँ, उद्यम-परोपकार (पारसी, जैन), समन्वय (अजमेर, कबीर, नानक), सामाजिक सुधार (नवयान बौद्ध 1956), जनजातीय धर्म।
चुनौतियाँ: सांप्रदायिकता, पृथक्करण, अल्पसंख्यक पिछड़ापन (सच्चर), धर्मांतरण-विवाद।
निष्कर्ष: भारत की सांस्कृतिक समृद्धि उसकी धार्मिक बहुलता से अविभाज्य है — "विविधता में एकता" का सबसे जीवंत आधार।
12. Quick Revision Summary
- जनजाति — परिभाषा की 8 समस्याएँ; विकास-बाधाएँ; औपनिवेशिक नीतियाँ और 9 प्रभाव; एकीकरण-स्वायत्तता।
- वर्ग — औद्योगिक वर्ग (मॉरिस, चंदावरकर); सामाजिक संरचना का प्रकार्य — आंशिक सहमति; 10 हालिया परिवर्तन; पुराना बनाम नया मध्य वर्ग।
- नातेदारी — मर्डॉक (1949, HRAF, 6 प्रकार); कर्वे, शाह, उबेरॉय; बदलते बंधन — "पुनर्गठित"; विवाह का अध्ययन और निहितार्थ; समलैंगिक विवाह — जनसंख्या पर नगण्य प्रभाव।
- पितृसत्ता — लर्नर, वॉल्बी, कंडियोटी, चक्रवर्ती; अंतर्संबंधता।
- धर्म — सांस्कृतिक विविधता में 10 योगदान; राष्ट्र-निर्माण में सकारात्मक-नकारात्मक भूमिका; धर्मनिरपेक्षता बहस।