UPSC Mains · Sociology · Paper I · अध्याय 3

स्तरीकरण एवं गतिशीलता

Stratification and Mobility

समानता-असमानता, स्तरीकरण के सिद्धांत (प्रकार्यवादी, मार्क्सवादी, वेबेरियन); वर्ग, प्रस्थिति, लिंग, नृजातीयता; सामाजिक गतिशीलता के प्रकार।

Paper I 20 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

Paper I का भाग 5 — स्तरीकरण और गतिशीलता — समानता-असमानता, स्तरीकरण के सिद्धांत, वर्ग-प्रस्थिति-लिंग-नृजातीयता, निर्धनता-वंचना और सामाजिक गतिशीलता को समेटता है। 2024 में सामाजिक गतिशीलता और "बंद-खुले" मॉडल, प्रस्थिति-समूह के रूप में जाति, और सामाजिक पदानुक्रम में सत्ता के आयाम पूछे गए; 2025 में "क्या स्तरीकरण सिद्धांत लिंग-अंध है?", संरचनात्मक-प्रकार्यवाद और यथास्थिति, तथा दीर्घकालिक निर्धनता को समझने में क्षमता-वंचना बनाम सामाजिक पूँजी-वंचना।

इस अध्याय के भाग
  • समानता, असमानता, पदानुक्रम, बहिष्करण, निर्धनता और वंचना की अवधारणाएँ।
  • स्तरीकरण के सिद्धांत — प्रकार्यवादी, मार्क्सवादी, वेबेरियन, बोर्दियो।
  • आयाम — वर्ग, प्रस्थिति-समूह, लिंग, नृजातीयता और प्रजाति; अंतर्संबंधता।
  • सामाजिक गतिशीलता — प्रकार, स्रोत और कारण; खुली और बंद व्यवस्थाएँ।

2. मूल अवधारणाएँ

  • सामाजिक विभेदीकरण बनाम स्तरीकरण — विभेदीकरण = भिन्नता (आयु, लिंग, व्यवसाय); स्तरीकरण = इन भिन्नताओं का पदानुक्रमित, संस्थागत और पीढ़ीगत क्रम, जिससे धन, सत्ता और प्रतिष्ठा असमान रूप से बँटते हैं।
  • मेल्विन ट्यूमिन — स्तरीकरण की विशेषताएँ: सामाजिक (प्राकृतिक नहीं), प्राचीन, सार्वभौमिक, विविध रूप वाला, परिणामकारी (जीवन-अवसरों और जीवन-शैली पर प्रभाव)।
  • रूसो (Discourse on Inequality, 1755) — प्राकृतिक (आयु, शक्ति) बनाम सामाजिक/राजनीतिक असमानता (निजी संपत्ति से उत्पन्न); आंद्रे बेते (Inequality among Men, 1977) — असमानता के वितरणात्मक (धन, आय) और संबंधात्मक (पदानुक्रम, प्रभुत्व) पक्ष।
  • समानता के प्रकार — विधिक/औपचारिक समानता, अवसर की समानता, स्थिति (condition) की समानता, परिणाम की समानता; भारत का संविधान — अनु. 14-17, 38, 46 — "सारभूत समानता" (substantive equality) के लिए आरक्षण।
  • सामाजिक बहिष्करण — रेने लेनोइर (फ़्रांस, 1974) — कुछ समूहों का समाज की मुख्यधारा के अधिकारों, संसाधनों और संबंधों से वंचन; भारत में सुखदेव थोराट — जाति-आधारित बहिष्करण (बाज़ार, आवास, शिक्षा, धार्मिक स्थल)।

निर्धनता और वंचना

अवधारणाअर्थउदाहरण / माप
निरपेक्ष निर्धनतान्यूनतम उपभोग/कैलोरी से नीचेविश्व बैंक की अत्यंत निर्धनता रेखा (क्रय-शक्ति समता पर प्रतिदिन व्यय); तेंदुलकर (2009), रंगराजन (2014) समितियाँ
सापेक्ष निर्धनतासमाज के सामान्य जीवन-स्तर से वंचना — पीटर टाउनसेंड (Poverty in the United Kingdom, 1979)माध्य आय का 50-60%
बहुआयामी निर्धनतास्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन-स्तर के अनेक अभावUNDP-OPHI वैश्विक MPI (2010); भारत — NITI आयोग राष्ट्रीय MPI: 2013-14 में 29.17% से 2022-23 में 11.28% (लगभग 24.82 करोड़ लोग बाहर निकले — NITI चर्चा पत्र, जनवरी 2024)
दीर्घकालिक (Chronic) निर्धनतापाँच वर्ष या उससे अधिक, प्रायः पीढ़ीगतChronic Poverty Research Centre; भूमिहीन, दलित-आदिवासी, विकलांग, वृद्ध
सापेक्ष वंचनासंदर्भ-समूह से तुलना में अभाव का अनुभव (मर्टन, रनसिमन — 1966)आंदोलनों का स्रोत

क्षमता-वंचना बनाम सामाजिक पूँजी-वंचना (UPSC 2025)

  • क्षमता-वंचना दृष्टिकोण — अमर्त्य सेन (Development as Freedom, 1999): निर्धनता केवल कम आय नहीं, बल्कि मूल्यवान "कार्यों" (functionings) — स्वस्थ रहना, शिक्षित होना, गरिमा से जीना — को प्राप्त करने की वास्तविक स्वतंत्रताओं (capabilities) का अभाव है; आय एक साधन है, साध्य नहीं; रूपांतरण कारक — एक ही आय से विकलांग, स्त्री या दूरस्थ ग्रामीण कम "क्षमता" पाते हैं; "हक़दारी" (entitlement — Poverty and Famines, 1981); मार्था नुसबौम की 10 केंद्रीय क्षमताएँ; मानव विकास सूचकांक (1990) और MPI इसी पर आधारित।
  • सामाजिक पूँजी-वंचना दृष्टिकोण — सामाजिक पूँजी = संबंधों के नेटवर्क, विश्वास और मानदंड जो सामूहिक क्रिया संभव बनाते हैं — पियर बोर्दियो (1986 — व्यक्ति/वर्ग का संसाधन), जेम्स कोलमैन (1988), रॉबर्ट पुटनम (Bowling Alone, 2000 — बंधनकारी (bonding), सेतुकारी (bridging); माइकल वूलकॉक — संपर्ककारी (linking) — सत्ता-संस्थाओं से संबंध); निर्धन लोग प्रायः केवल "बंधनकारी" पूँजी (जाति-नातेदारी) रखते हैं, "सेतुकारी" और "संपर्ककारी" पूँजी (नौकरी के संपर्क, अधिकारियों तक पहुँच, ऋण-नेटवर्क) से वंचित — मार्क ग्रैनोवेटर ("The Strength of Weak Ties", 1973)।
आधारक्षमता-वंचनासामाजिक पूँजी-वंचना
इकाईव्यक्ति की स्वतंत्रताएँसंबंध और नेटवर्क
निर्धनता का कारणस्वास्थ्य, शिक्षा, अधिकारों का अभाव; रूपांतरण बाधाएँबहिष्करण, विश्वास का अभाव, कमज़ोर संबंध
दीर्घकालिकता की व्याख्याक्षमताओं का पीढ़ीगत अभाव (कुपोषित माँ → नाटा बच्चा)नेटवर्क का पीढ़ीगत अभाव; "बंधनकारी" पूँजी से जाल में फँसना
नीतिसार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, अधिकार (RTE, NFSA)SHG, सहकारी समितियाँ, सामुदायिक संगठन (DAY-NRLM), ग्राम सभा
सीमाव्यक्तिवादी; सत्ता-संरचना पर कमसामाजिक पूँजी असमान रूप से बँटी — बहिष्करणकारी भी (जाति-नेटवर्क); "नकारात्मक" सामाजिक पूँजी (एलेहांद्रो पोर्टेस)

समन्वय — दीर्घकालिक निर्धनता का कारण दोनों का संयुक्त अभाव है; भारत में SHG आंदोलन (जैसे केरल का कुडुम्बश्री, 1998) सामाजिक पूँजी के माध्यम से क्षमताएँ बढ़ाने का उदाहरण है।

3. स्तरीकरण के सिद्धांत

संरचनात्मक-प्रकार्यवादी दृष्टिकोण

  • किंग्सले डेविस और विल्बर्ट मूर ("Some Principles of Stratification", 1945) — (1) हर समाज को महत्वपूर्ण पदों को योग्य लोगों से भरना होता है; (2) कुछ पद अधिक प्रकार्यात्मक रूप से महत्वपूर्ण और कुछ के लिए दुर्लभ प्रतिभा और लंबा प्रशिक्षण आवश्यक; (3) इसलिए उन्हें अधिक पुरस्कार (धन, प्रतिष्ठा) — स्तरीकरण "अचेतन रूप से विकसित युक्ति" और सार्वभौमिक तथा अपरिहार्य।
  • पार्सन्स — स्तरीकरण सामान्य मूल्यों के आधार पर व्यक्तियों का मूल्यांकनात्मक क्रम (ranking); अमेरिका में "उपलब्धि" का मूल्य।
  • मेल्विन ट्यूमिन की आलोचना (1953) — (1) "प्रकार्यात्मक महत्व" मापना असंभव (सफ़ाईकर्मी बनाम बैंकर — COVID में "आवश्यक श्रमिक"); (2) प्रतिभा का भंडार सीमित नहीं, स्तरीकरण स्वयं अवसर रोकता है; (3) प्रशिक्षण "बलिदान" नहीं; (4) पुरस्कार के अन्य रूप (आंतरिक संतोष); (5) स्तरीकरण असंतोष, शत्रुता और संघर्ष पैदा करता है — "दुष्प्रकार्यात्मक"; (6) उत्तराधिकार से पीढ़ीगत असमानता।

क्या प्रकार्यवादी दृष्टिकोण यथास्थिति का समर्थन करता है? (UPSC 2025)

  • हाँ — (1) असमानता को "आवश्यक" और "प्रकार्यात्मक" बताकर वैधता देता है; (2) सत्ता, शोषण और उत्तराधिकार की उपेक्षा; (3) सहमति (consensus) की धारणा — संघर्ष को "विकृति"; (4) मौजूदा पुरस्कार-संरचना को "योग्यता" का प्रतिबिंब मानना — माइकल यंग (The Rise of the Meritocracy, 1958 — व्यंग्य) और माइकल सैंडल (The Tyranny of Merit, 2020) — योग्यता-तंत्र भी नया अभिजात वर्ग बनाता है; (5) मार्क्सवादी — शासक वर्ग की विचारधारा।
  • प्रतिवाद — (1) प्रकार्यवाद "उपलब्धि" और खुली प्रतियोगिता पर ज़ोर देकर प्रदत्त (जन्म-आधारित) स्तरीकरण की आलोचना भी करता है; (2) पार्सन्स के "प्रतिमान चर" आधुनिकता = उपलब्धि; (3) मर्टन — दुष्प्रकार्य और विचलन; (4) शिक्षा और गतिशीलता को महत्व।
  • निष्कर्ष — प्रकार्यवाद असमानता की व्याख्या करते हुए उसका औचित्य भी प्रस्तुत करता है; इसलिए वह मूलतः "व्यवस्था-संरक्षक" (status quo) झुकाव रखता है, यद्यपि वह सीमित सुधार (योग्यता-आधारित गतिशीलता) स्वीकार करता है।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण

  • वर्ग = उत्पादन के साधनों से संबंध — बुर्जुआ (स्वामी) और सर्वहारा (श्रमिक); स्तरीकरण शोषण पर आधारित, विचारधारा द्वारा वैध; वर्ग-ध्रुवीकरण, वर्ग-चेतना, क्रांति।
  • नव-मार्क्सवादी — एरिक ओलिन राइट (1985) — "विरोधाभासी वर्ग स्थितियाँ" (प्रबंधक, पर्यवेक्षक — एक साथ शोषक और शोषित); निकोस पौलांत्ज़ास; हैरी ब्रेवरमैन — श्वेत-कॉलर का सर्वहाराकरण।

वेबेरियन दृष्टिकोण — वर्ग, प्रस्थिति, दल

आयामआधारव्यवस्थाउदाहरण
वर्ग (Class)बाज़ार-स्थिति — संपत्ति और कौशल; "जीवन-अवसर" (life chances)आर्थिकसंपत्तिवान, व्यावसायिक-कुशल वर्ग, श्रमिक
प्रस्थिति-समूह (Status group)सामाजिक सम्मान, जीवन-शैली, उपभोग, विवाह और सामाजिक संसर्ग पर प्रतिबंधसामाजिकजाति (सबसे "बंद" प्रस्थिति-समूह), कुलीन वर्ग
दल (Party)सत्ता प्राप्ति के लिए संगठित समूहराजनीतिकराजनीतिक दल, दबाव समूह

महत्व — बहुआयामी स्तरीकरण; ये तीनों परस्पर जुड़े पर स्वतंत्र (नव-धनाढ्य के पास धन पर प्रतिष्ठा नहीं); सामाजिक बंदीकरण (social closure) — फ़्रैंक पार्किन (1979) — बहिष्करण (ऊपर वाले नीचे वालों को रोकते हैं — योग्यता-प्रमाणपत्र, अंतर्विवाह) और अधिग्रहण/हड़पना (usurpation) (नीचे वाले ऊपर की ओर दबाव — आंदोलन)।

पियर बोर्दियो — पूँजी के रूप

  • आर्थिक, सांस्कृतिक (शिक्षा, रुचि, भाषा — मूर्त, वस्तुगत, संस्थागत), सामाजिक (नेटवर्क) और प्रतीकात्मक (सम्मान, वैधता) पूँजी; Distinction (1979) — "रुचि" (taste) वर्ग-भेद का चिह्न; हैबिटस — आत्मसात् स्वभाव; शिक्षा व्यवस्था द्वारा पुनरुत्पादन; प्रतीकात्मक हिंसा — प्रभुत्व को "स्वाभाविक" मान लेना।

4. स्तरीकरण के आयाम

प्रस्थिति-समूह के रूप में जाति का बदलता स्वरूप (UPSC 2024)

  • वेबर — जाति "बंद प्रस्थिति-समूह" का चरम रूप: अंतर्विवाह, सहभोज-निषेध, अनुष्ठानिक शुद्धता, वंशानुगत व्यवसाय; धर्म (कर्म-सिद्धांत) द्वारा वैधता।
  • परिवर्तन — (1) अनुष्ठानिक पदानुक्रम का क्षरण — अस्पृश्यता अपराध (अनु. 17), सहभोज-निषेध शहरों में कमज़ोर; (2) व्यवसाय से विच्छेद — शिक्षा, शहरीकरण, बाज़ार; (3) राजनीतिक दबाव समूह — रुडोल्फ़ ("जातीय संघ"), रजनी कोठारी (Caste in Indian Politics, 1970 — "जाति का राजनीतिकरण"); (4) आंद्रे बेते (Caste, Class and Power, 1965, श्रीपुरम — तंजावुर) — पहले जाति, वर्ग और सत्ता "संगत" (ब्राह्मण भूस्वामी और शासक) थे, अब ये "विसरित" (dispersed) हो गए; (5) दीपांकर गुप्ता (Interrogating Caste, 2000) — जाति का "क्षैतिजीकरण" — ऊर्ध्व पदानुक्रम के स्थान पर प्रतिस्पर्धी "पहचान-समूह"; हर जाति स्वयं को श्रेष्ठ मानती है; (6) वर्ग-विभाजन जाति के भीतर — "क्रीमी लेयर", दलित मध्य वर्ग; (7) निरंतरता — अंतर्विवाह (~95% विवाह जाति के भीतर — IHDS), आवासीय पृथक्करण, सम्मान-हत्या, डिजिटल वैवाहिक मंचों पर जाति-फ़िल्टर।
  • निष्कर्ष — जाति "अनुष्ठानिक प्रस्थिति-समूह" से "राजनीतिक-आर्थिक हित-समूह और पहचान" में बदल रही है — वेबर की भाषा में "प्रस्थिति" से "दल" की ओर।

वर्ग

  • पुराना और नया मध्य वर्ग (सी. राइट मिल्स — White Collar, 1951); "अधोवर्ग" (underclass — विलियम जूलियस विल्सन, 1987); वैश्विक "प्रीकैरिएट" (गाय स्टैंडिंग, 2011 — अनिश्चित रोज़गार वाला वर्ग)।
  • भारत — कृषक वर्ग, औद्योगिक वर्ग, नया मध्य वर्ग (अध्याय 8)।

लिंग और स्तरीकरण: क्या स्तरीकरण सिद्धांत लिंग-अंध है? (UPSC 2025)

  • "पारंपरिक दृष्टिकोण" की समस्याएँ — (1) परिवार स्तरीकरण की इकाई और उसकी स्थिति पुरुष मुखिया के व्यवसाय से तय (पार्सन्स, जॉन गोल्डथॉर्प — 1983 में इसका बचाव); (2) स्त्री की स्थिति पति/पिता से "व्युत्पन्न"; (3) घरेलू और देखभाल का अवैतनिक श्रम "काम" नहीं गिना गया; (4) मार्क्स और वेबर दोनों ने वर्ग को सार्वजनिक/बाज़ार क्षेत्र से जोड़ा।
  • नारीवादी आलोचना — जोन एकर ("Women and Social Stratification: A Case of Intellectual Sexism", 1973) — "बौद्धिक लिंगवाद"; क्रिस्टीन डेल्फ़ी — "घरेलू उत्पादन पद्धति" में पत्नी का शोषण; सिल्विया वॉल्बी (Theorizing Patriarchy, 1990) — पितृसत्ता की छह संरचनाएँ (घरेलू उत्पादन, वैतनिक कार्य, राज्य, हिंसा, यौनिकता, सांस्कृतिक संस्थाएँ); दोहरा श्रम-बाज़ार, "काँच की छत", लैंगिक वेतन-अंतर।
  • अंतर्संबंधता (Intersectionality) — किम्बर्ली क्रेनशॉ (1989) — लिंग, जाति/नस्ल, वर्ग एक साथ काम करते हैं; भारत — शर्मिला रेगे ("दलित नारीवादी दृष्टिबिंदु", 1998), उमा चक्रवर्ती ("ब्राह्मणवादी पितृसत्ता", 1993) — जाति की शुद्धता स्त्री की यौनिकता के नियंत्रण पर टिकी; लीला दुबे — "बीज और खेत" का रूपक।
  • भारतीय तथ्य — स्त्री श्रम-शक्ति भागीदारी (PLFS 2023-24, सामान्य स्थिति) लगभग 41.7%, पुरुषों से बहुत कम; समय-उपयोग सर्वेक्षण (2019, 2024) — स्त्रियाँ अवैतनिक घरेलू-देखभाल कार्य पर पुरुषों से कई गुना अधिक समय देती हैं; भूमि-स्वामित्व में बहुत कम हिस्सा।
  • निष्कर्ष — शास्त्रीय स्तरीकरण सिद्धांत मुख्यतः लिंग-अंध थे; नारीवादी और अंतर्संबंधात्मक दृष्टियों ने व्यक्ति को इकाई बनाने, अवैतनिक श्रम को गिनने और पितृसत्ता को स्वतंत्र स्तरीकरण-तंत्र मानने का सुधार किया है।

नृजातीयता और प्रजाति

  • प्रजाति — शारीरिक लक्षणों पर आधारित सामाजिक निर्माण; रंगभेद (दक्षिण अफ़्रीका 1948-94), अमेरिका की "जिम क्रो" व्यवस्था; संस्थागत नस्लवाद (स्टोकली कारमाइकल-हैमिल्टन, 1967); W.E.B. डु बोइस — "दोहरी चेतना"।
  • नृजातीयता — साझा संस्कृति-पहचान; नृजातीय स्तरीकरण — प्रवासी, अल्पसंख्यक; भारत में पूर्वोत्तर के लोगों के साथ भेदभाव (बेज़बरुआ समिति, 2014)।

5. सत्ता और सामाजिक पदानुक्रम (UPSC 2024)

  • स्टीवन ल्यूक्स — सत्ता के तीन आयाम (Power: A Radical View, 1974): (1) निर्णय-निर्माण (रॉबर्ट डाल — Who Governs?, 1961 — खुले संघर्ष में कौन जीतता है); (2) अ-निर्णय (non-decision) (बैक्रैक और बैराट्ज़, 1962 — एजेंडा-नियंत्रण, कुछ मुद्दे उठने ही नहीं दिए जाते); (3) वैचारिक/तीसरा आयाम — लोगों की इच्छाओं और धारणाओं को ही ऐसा ढालना कि वे अपने वास्तविक हितों के विरुद्ध व्यवस्था स्वीकार करें।
  • अन्य दृष्टियाँ — वेबर (वैधता — प्राधिकार); ग्राम्शी (आधिपत्य — सहमति + बल); सी. राइट मिल्स (The Power Elite, 1956 — सैन्य, कॉरपोरेट, राजनीतिक अभिजात का गठजोड़); फ़ूको (Discipline and Punish, 1975 — "अनुशासनात्मक सत्ता", निगरानी, पैनॉप्टिकॉन; "जैव-सत्ता"; सत्ता हर जगह, ज्ञान-सत्ता); बोर्दियो (प्रतीकात्मक हिंसा)।
  • पदानुक्रम के निर्माण और अनुरक्षण में सत्ता के आयाम — (1) आर्थिक — संपत्ति, भूमि, पूँजी पर नियंत्रण (जजमानी, बंधुआ मज़दूरी); (2) राजनीतिक — क़ानून, राज्य, बल; (3) वैचारिक-धार्मिक — कर्म, शुद्धता, "योग्यता" के मिथक; (4) सांस्कृतिक-प्रतीकात्मक — भाषा, रुचि, ज्ञान (अंग्रेज़ी शिक्षा); (5) शारीरिक/हिंसा — जातीय अत्याचार, लैंगिक हिंसा; (6) ज्ञान-सत्ता — जनगणना वर्गीकरण, औपनिवेशिक नृवंशवर्णन; (7) डिजिटल — डेटा और एल्गोरिदम का स्वामित्व।
  • प्रतिरोध — जेम्स स्कॉट (Weapons of the Weak, 1985 — दैनिक प्रतिरोध), आंदोलन, आरक्षण, संवैधानिक अधिकार।

6. सामाजिक गतिशीलता

  • परिभाषा — व्यक्तियों या समूहों का एक सामाजिक स्थिति से दूसरी में जाना — पितिरिम सोरोकिन (Social Mobility, 1927)।
प्रकारअर्थउदाहरण
ऊर्ध्व (Vertical) — ऊर्ध्वगामी/अधोगामीपदानुक्रम में ऊपर-नीचेकिसान का बेटा IAS अधिकारी
क्षैतिज (Horizontal)समान स्तर पर परिवर्तनएक कंपनी से दूसरी में समान पद
अंतः-पीढ़ीगत (Intra-generational)एक व्यक्ति के जीवनकाल मेंक्लर्क से प्रबंधक
अंतर-पीढ़ीगत (Inter-generational)माता-पिता की तुलना में संतानमज़दूर का बेटा इंजीनियर
संरचनात्मक (Structural)अर्थव्यवस्था की संरचना बदलने से (सेवा क्षेत्र का विस्तार)IT क्रांति से मध्य वर्ग का विस्तार
विनिमय/परिसंचरण (Exchange)संरचना स्थिर, कुछ ऊपर-कुछ नीचे—
व्यक्तिगत बनाम समूह गतिशीलताव्यक्ति या पूरा समुदायसंस्कृतीकरण (समूह), शिक्षा (व्यक्ति)
  • प्रायोजित बनाम प्रतियोगी गतिशीलता — राल्फ़ टर्नर (1960): ब्रिटेन — अभिजात चुनकर "प्रायोजित"; अमेरिका — खुली "प्रतियोगिता"।
  • प्रमुख अध्ययन — डेविड ग्लास (ब्रिटेन, 1954); लिपसेट और बेंडिक्स (Social Mobility in Industrial Society, 1959 — औद्योगिक समाजों में गतिशीलता दर समान); ब्लाउ और डंकन (The American Occupational Structure, 1967 — "प्रस्थिति-प्राप्ति" मॉडल: शिक्षा पिता के व्यवसाय से अधिक निर्णायक); गोल्डथॉर्प (ऑक्सफ़ोर्ड गतिशीलता अध्ययन, 1980 — "निरपेक्ष" गतिशीलता बढ़ी, पर "सापेक्ष" अवसर असमान); "ग्रेट गैट्सबी वक्र" (एलन क्रूगर, 2012) — अधिक असमान समाजों में कम अंतर-पीढ़ीगत गतिशीलता।
  • गतिशीलता के कारक — शिक्षा (सबसे प्रमुख), औद्योगीकरण-नगरीकरण, आरक्षण, प्रवासन, विवाह, राजनीतिक भागीदारी, संस्कृतीकरण-पश्चिमीकरण, प्रौद्योगिकी; बाधाएँ — जन्म, लिंग, भाषा, सांस्कृतिक पूँजी, भेदभाव, क्षेत्र।
  • भारत — IHDS और अन्य अध्ययनों के अनुसार शैक्षिक गतिशीलता बढ़ी, पर व्यावसायिक गतिशीलता सीमित; दलित उद्यमिता (DICCI) और दलित मध्य वर्ग का उदय; "शिक्षा-रोज़गार असंगति" (शिक्षित बेरोज़गारी)।

"बंद" और "खुली" स्तरीकरण व्यवस्थाओं का वर्गीकरण — आलोचनात्मक परीक्षण (UPSC 2024)

आधारबंद व्यवस्था (जाति, एस्टेट, दास-प्रथा)खुली व्यवस्था (वर्ग)
स्थितिप्रदत्त — जन्म सेअर्जित — योग्यता, प्रयास
गतिशीलताबहुत कम या असंभवअधिक संभव
विवाहअंतर्विवाह अनिवार्यस्वतंत्र
वैधताधर्म, परंपराबाज़ार, योग्यता
  • आलोचना — (1) यह आदर्श-प्रारूप है; वास्तविक व्यवस्थाएँ सातत्य पर हैं; (2) जाति पूरी तरह बंद नहीं — संस्कृतीकरण, राजपूतीकरण, समूह-गतिशीलता (श्रीनिवास, सिन्हा, लिंच); (3) वर्ग पूरी तरह खुला नहीं — उत्तराधिकार, सांस्कृतिक पूँजी (बोर्दियो), सामाजिक बंदीकरण (पार्किन), अभिजात विद्यालय, ग्रेट गैट्सबी वक्र; (4) गतिशीलता की प्रकृति — जाति में समूह-आधारित "स्थितिगत" गतिशीलता, वर्ग में व्यक्तिगत; (5) अंतर्संबंध — भारत में जाति और वर्ग एक-दूसरे में गुँथे (बेते, शर्मा); (6) पश्चिमी पूर्वाग्रह — वर्ग को "आधुनिक-श्रेष्ठ" और जाति को "पारंपरिक-पिछड़ा" मानना; (7) लिंग जैसे आयाम इस द्विभाजन में छूट जाते हैं।
  • निष्कर्ष — "बंद-खुला" वर्गीकरण उपयोगी विश्लेषणात्मक उपकरण है, पर इसे निरपेक्ष श्रेणियों के बजाय अधिक-कम खुलेपन के पैमाने के रूप में समझना चाहिए।

7. Master Summary Table

विषयमुख्य विचारक / कृतियाद रखें
असमानतारूसो 1755; बेते 1977; ट्यूमिनप्राकृतिक बनाम सामाजिक
निर्धनताटाउनसेंड 1979; सेन 1981, 1999; NITI MPI29.17% → 11.28%
सामाजिक पूँजीबोर्दियो 1986; कोलमैन 1988; पुटनम 2000; ग्रैनोवेटर 1973bonding, bridging, linking
प्रकार्यवादडेविस-मूर 1945; पार्सन्सआलोचक — ट्यूमिन 1953
मार्क्सवादीमार्क्स; राइट 1985; ब्रेवरमैनविरोधाभासी वर्ग स्थिति
वेबेरियनवर्ग, प्रस्थिति, दल; पार्किन 1979सामाजिक बंदीकरण
बोर्दियोDistinction 19794 पूँजियाँ, हैबिटस
जाति-प्रस्थितिबेते 1965; कोठारी 1970; गुप्ता 2000क्षैतिजीकरण
लिंगएकर 1973; वॉल्बी 1990; क्रेनशॉ 1989; रेगे; चक्रवर्तीअंतर्संबंधता
सत्ताल्यूक्स 1974; डाल 1961; मिल्स 1956; फ़ूको 1975तीन आयाम
गतिशीलतासोरोकिन 1927; ब्लाउ-डंकन 1967; गोल्डथॉर्प; टर्नर 1960ग्रेट गैट्सबी वक्र

8. चार्ट: वेबर का बहुआयामी स्तरीकरण

वर्गबाज़ार-स्थितिजीवन-अवसर प्रस्थितिसम्मानजीवन-शैली (जाति) दलसत्ता, संगठन संगति ↔ विसरण
वेबर: वर्ग, प्रस्थिति और दल परस्पर जुड़े पर स्वतंत्र आयाम हैं; बेते के अनुसार भारत में इनकी "संगति" से "विसरण" की ओर परिवर्तन हुआ।

9. Mind Map

स्तरीकरण एवं गतिशीलता
अवधारणाएँ
  • असमानता, बहिष्करण
  • निर्धनता, वंचना
  • सेन बनाम पुटनम
सिद्धांत
  • डेविस-मूर, ट्यूमिन
  • मार्क्स, वेबर
  • बोर्दियो, पार्किन
आयाम
  • वर्ग, प्रस्थिति (जाति)
  • लिंग, नृजातीयता
  • अंतर्संबंधता
सत्ता
  • ल्यूक्स के 3 आयाम
  • ग्राम्शी, फ़ूको
गतिशीलता
  • प्रकार
  • बंद-खुली व्यवस्था
  • ब्लाउ-डंकन, गोल्डथॉर्प

10. महत्वपूर्ण One-liners

  • "Some Principles of Stratification" (1945) — डेविस और मूर; आलोचना (1953) — मेल्विन ट्यूमिन।
  • "Development as Freedom" (1999) — अमर्त्य सेन; "Bowling Alone" (2000) — रॉबर्ट पुटनम।
  • "The Strength of Weak Ties" (1973) — मार्क ग्रैनोवेटर।
  • "Distinction" (1979), सांस्कृतिक पूँजी — पियर बोर्दियो।
  • सामाजिक बंदीकरण (बहिष्करण/अधिग्रहण) — फ़्रैंक पार्किन (1979)।
  • "Caste, Class and Power" (1965) — आंद्रे बेते; "Caste in Indian Politics" (1970) — रजनी कोठारी।
  • "Women and Social Stratification: A Case of Intellectual Sexism" (1973) — जोन एकर।
  • "Power: A Radical View" (1974) — स्टीवन ल्यूक्स; "The Power Elite" (1956) — सी. राइट मिल्स।
  • "Social Mobility" (1927) — पितिरिम सोरोकिन; "The American Occupational Structure" (1967) — ब्लाउ और डंकन।
  • प्रायोजित बनाम प्रतियोगी गतिशीलता — राल्फ़ टर्नर (1960)।

11. टिप्स एवं ट्रिक्स

स्तरीकरण के उत्तर
  • हर उत्तर में तीनों दृष्टियाँ — प्रकार्यवादी, मार्क्सवादी, वेबेरियन — और अंत में नारीवादी/अंतर्संबंधात्मक दृष्टि।
  • भारतीय आँकड़े — NITI MPI, PLFS स्त्री श्रम-भागीदारी, IHDS अंतर्जातीय विवाह।
  • "Critically examine" — पहले व्याख्या, फिर कम से कम 4 आलोचनाएँ, अंत में संतुलित निष्कर्ष।
याद रखने की तरकीब

ल्यूक्स — "निर्णय → अ-निर्णय → विचार" (1D, 2D, 3D); पुटनम-वूलकॉक — "बंधन, सेतु, संपर्क"; बोर्दियो — "आर्थिक-सांस्कृतिक-सामाजिक-प्रतीकात्मक"।

12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2024 · Paper I · 2(c)

सामाजिक गतिशीलता क्या है? सामाजिक स्तरीकरण के "बंद" और "खुले" मॉडलों के वर्गीकरण का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

गतिशीलता: सोरोकिन (1927) — सामाजिक स्थितियों के बीच आवागमन; प्रकार — ऊर्ध्व/क्षैतिज, अंतः/अंतर-पीढ़ीगत, संरचनात्मक/विनिमय, व्यक्तिगत/समूह; टर्नर — प्रायोजित/प्रतियोगी।

बंद-खुला वर्गीकरण: बंद (जाति, एस्टेट, दास) — प्रदत्त, अंतर्विवाह, धार्मिक वैधता, कम गतिशीलता; खुला (वर्ग) — अर्जित, योग्यता, अधिक गतिशीलता (तालिका)।

आलोचना: (1) आदर्श-प्रारूप, वास्तविकता सातत्य; (2) जाति में गतिशीलता — संस्कृतीकरण, राजपूतीकरण, नाडार-जाटव उदाहरण; (3) वर्ग में बाधाएँ — उत्तराधिकार, सांस्कृतिक पूँजी (बोर्दियो), बंदीकरण (पार्किन), ग्रेट गैट्सबी वक्र, गोल्डथॉर्प — सापेक्ष अवसर असमान; (4) भारत में जाति-वर्ग का गुँथाव (बेते); (5) यूरोकेंद्रित पूर्वाग्रह; (6) लिंग की उपेक्षा।

भारतीय संदर्भ: आरक्षण, शिक्षा और शहरीकरण से दलित-OBC की गतिशीलता; फिर भी अंतर्विवाह और व्यावसायिक पृथक्करण।

निष्कर्ष: "बंद-खुला" वर्गीकरण को द्विभाजन नहीं, "खुलेपन का पैमाना" मानना अधिक यथार्थवादी है।

Q2UPSC 2025 · Paper I · 3(a)

दीर्घकालिक निर्धनता को समझने में क्षमता-वंचना दृष्टिकोण की सामाजिक पूँजी-वंचना दृष्टिकोण से तुलना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: दीर्घकालिक निर्धनता — लंबी अवधि और पीढ़ीगत अभाव; आय-आधारित माप इसकी जटिलता नहीं पकड़ते।

क्षमता-वंचना (सेन): निर्धनता = मूल्यवान कार्यों को प्राप्त करने की वास्तविक स्वतंत्रता का अभाव; रूपांतरण कारक; हक़दारी; HDI, MPI; दीर्घकालिकता — स्वास्थ्य-शिक्षा अभाव का पीढ़ीगत चक्र (कुपोषित माँ → नाटा बच्चा → कम उत्पादकता)।

सामाजिक पूँजी-वंचना (बोर्दियो, कोलमैन, पुटनम, वूलकॉक): नेटवर्क, विश्वास, संपर्क का अभाव; केवल बंधनकारी पूँजी, सेतुकारी-संपर्ककारी का अभाव; ग्रैनोवेटर — कमज़ोर संबंधों की शक्ति; दीर्घकालिकता — बहिष्करण और "नेटवर्क-ग़रीबी" का पीढ़ीगत हस्तांतरण।

तुलना: इकाई (व्यक्ति बनाम संबंध), कारण, नीति (RTE, NFSA बनाम SHG, NRLM), सीमाएँ (व्यक्तिवाद बनाम सामाजिक पूँजी की असमानता और नकारात्मक पक्ष — पोर्टेस; बोर्दियो का वर्ग-आधारित दृष्टिकोण)।

भारतीय उदाहरण: NITI MPI में गिरावट (क्षमता-विस्तार); कुडुम्बश्री और JEEViKA (बिहार) — सामाजिक पूँजी से ऋण, आय और सशक्तिकरण।

निष्कर्ष: दोनों पूरक हैं — क्षमताएँ "क्या" अभाव है बताती हैं, सामाजिक पूँजी "क्यों" बना रहता है; प्रभावी नीति दोनों को जोड़ती है।

Q3UPSC 2025 · Paper I · 1(e) · 10 अंक

क्या सामाजिक स्तरीकरण सिद्धांत लिंग-अंध है? स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर

हाँ (पारंपरिक सिद्धांत): परिवार इकाई, पुरुष मुखिया का व्यवसाय निर्णायक (पार्सन्स, गोल्डथॉर्प); स्त्री की व्युत्पन्न स्थिति; अवैतनिक श्रम की अनदेखी; मार्क्स-वेबर का बाज़ार-केंद्रित वर्ग।

नारीवादी सुधार: एकर (1973) — "बौद्धिक लिंगवाद"; डेल्फ़ी; वॉल्बी — पितृसत्ता की 6 संरचनाएँ; क्रेनशॉ — अंतर्संबंधता; भारत — रेगे, चक्रवर्ती, दुबे।

तथ्य: स्त्री श्रम-भागीदारी कम (PLFS ~41.7%), अवैतनिक कार्य का बोझ (समय-उपयोग सर्वेक्षण), संपत्ति में कम हिस्सा।

निष्कर्ष: शास्त्रीय सिद्धांत लिंग-अंध थे; आज व्यक्ति-आधारित, अंतर्संबंधात्मक विश्लेषण ने यह कमी काफ़ी हद तक दूर की है।

Q4UPSC 2025 · Paper I · 5(b) · 10 अंक

क्या सामाजिक स्तरीकरण पर संरचनात्मक-प्रकार्यवादी परिप्रेक्ष्य यथास्थिति को बढ़ावा देता है? अपने उत्तर के कारण दीजिए।

मॉडल उत्तर

परिप्रेक्ष्य: डेविस-मूर (1945) — प्रकार्यात्मक महत्व और दुर्लभ प्रतिभा के लिए असमान पुरस्कार; पार्सन्स — सामान्य मूल्यों पर क्रम।

यथास्थिति के पक्ष में तर्क: असमानता का वैधीकरण; सत्ता-शोषण-उत्तराधिकार की उपेक्षा; सहमति की धारणा; "योग्यता" का मिथक (यंग, सैंडल); ट्यूमिन — दुष्प्रकार्य।

प्रतिवाद: उपलब्धि और प्रतियोगिता पर बल — जन्म-आधारित स्तरीकरण की आलोचना; मर्टन का दुष्प्रकार्य।

निष्कर्ष: हाँ, मूलतः — यह परिप्रेक्ष्य असमानता की व्याख्या को उसके औचित्य में बदल देता है, यद्यपि सीमित सुधारवादी संभावना रखता है।

Q5UPSC 2024 · Paper I · 1(b) · 10 अंक

प्रस्थिति-समूह के रूप में जाति के बदलते स्वरूप का विश्लेषण कीजिए।

मॉडल उत्तर

वेबर: जाति — बंद प्रस्थिति-समूह: सम्मान, जीवन-शैली, अंतर्विवाह, सहभोज-निषेध, धार्मिक वैधता।

परिवर्तन: अनुष्ठानिक पदानुक्रम का क्षरण; व्यवसाय से विच्छेद; जातीय संघ और राजनीतिकरण (रुडोल्फ़, कोठारी); जाति-वर्ग-सत्ता का विसरण (बेते — श्रीपुरम); क्षैतिजीकरण (गुप्ता); जाति के भीतर वर्ग-विभाजन।

निरंतरता: अंतर्विवाह, पृथक्करण, सम्मान-हत्या, डिजिटल वैवाहिक फ़िल्टर।

निष्कर्ष: जाति "प्रस्थिति" से "दल" और "पहचान" की ओर — वेबर के तीनों आयामों में फैली एक बदलती संस्था।

Q6UPSC 2024 · Paper I · 7(c)

किसी समाज में सामाजिक पदानुक्रमों के निर्माण और अनुरक्षण में सत्ता के आयामों की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: पदानुक्रम केवल भिन्नता नहीं, सत्ता-संबंधों से निर्मित और पुनरुत्पादित होते हैं।

सैद्धांतिक आयाम: वेबर (शक्ति बनाम प्राधिकार); ल्यूक्स के तीन आयाम (डाल — निर्णय, बैक्रैक-बैराट्ज़ — अ-निर्णय, वैचारिक); ग्राम्शी (आधिपत्य); मिल्स (शक्ति अभिजात); फ़ूको (अनुशासनात्मक सत्ता, ज्ञान-सत्ता); बोर्दियो (प्रतीकात्मक हिंसा)।

व्यावहारिक आयाम: आर्थिक (भूमि, पूँजी — बंधुआ मज़दूरी), राजनीतिक-क़ानूनी, वैचारिक-धार्मिक (कर्म, शुद्धता), सांस्कृतिक (भाषा, शिक्षा), शारीरिक हिंसा (अत्याचार), ज्ञान (जनगणना वर्गीकरण), डिजिटल (डेटा)।

भारतीय उदाहरण: जाति-पदानुक्रम में भूमि-स्वामित्व + शुद्धता का विचार + अत्याचार; पितृसत्ता में संपत्ति + मानदंड + हिंसा।

प्रतिरोध: स्कॉट — "कमज़ोरों के हथियार"; दलित-स्त्री आंदोलन; संवैधानिक अधिकार।

निष्कर्ष: पदानुक्रम बल से अधिक "सहमति" से टिकते हैं — इसलिए परिवर्तन के लिए आर्थिक-राजनीतिक सुधार के साथ वैचारिक-सांस्कृतिक परिवर्तन भी आवश्यक है।

13. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • अवधारणाएँ — विभेदीकरण बनाम स्तरीकरण; रूसो, बेते; समानता के प्रकार; बहिष्करण (लेनोइर, थोराट); निर्धनता (निरपेक्ष, सापेक्ष, बहुआयामी, दीर्घकालिक); NITI MPI।
  • सेन बनाम सामाजिक पूँजी — क्षमताएँ, रूपांतरण; bonding-bridging-linking; ग्रैनोवेटर; समन्वय।
  • सिद्धांत — डेविस-मूर बनाम ट्यूमिन (यथास्थिति बहस); मार्क्स, राइट; वेबर (वर्ग-प्रस्थिति-दल), पार्किन; बोर्दियो।
  • आयाम — जाति (प्रस्थिति → दल, बेते, गुप्ता); वर्ग (मिल्स, स्टैंडिंग); लिंग (एकर, वॉल्बी, क्रेनशॉ, रेगे); प्रजाति-नृजातीयता।
  • सत्ता — ल्यूक्स, डाल, मिल्स, ग्राम्शी, फ़ूको, स्कॉट।
  • गतिशीलता — सोरोकिन; प्रकार; टर्नर; ब्लाउ-डंकन, गोल्डथॉर्प, क्रूगर; बंद-खुला मॉडल की आलोचना।