1. अध्याय एक नज़र में
Paper I के भाग 6-9 — कार्य और आर्थिक जीवन, राजनीति और समाज, धर्म और समाज तथा नातेदारी व्यवस्थाएँ — चार बड़ी संस्थाओं का अध्ययन हैं। 2024 और 2025 में इनसे लगभग 20 भाग पूछे गए: गिग अर्थव्यवस्था, स्वचालन, सामंती बनाम पूँजीवादी कार्य-संगठन, अनौपचारिक क्षेत्र, औपचारिक कार्यस्थल में लैंगिक पूर्वाग्रह, घरेलू श्रम-विभाजन; नागरिक समाज, शक्ति-प्राधिकार, अभिजात सिद्धांत, दबाव समूह; जीववाद-प्रकृतिवाद, आधुनिकीकरण-धर्मनिरपेक्षीकरण, पंथ और संप्रदाय, मार्क्स-वेबर-दुर्खीम के धर्म-सिद्धांत, विज्ञान-धर्म; विवाह का "अनुष्ठानिक से व्यावसायिक" रूपांतरण, संतान-केंद्रित परिवार, विवाह की नई प्रवृत्तियाँ और क्वीयर नातेदारी।

2. कार्य और आर्थिक जीवन
विभिन्न समाजों में कार्य का सामाजिक संगठन
| समाज | कार्य-संगठन | श्रम-संबंध |
|---|---|---|
| दास समाज | बलपूर्वक श्रम, दास संपत्ति | स्वामी-दास; श्रमिक स्वयं वस्तु |
| सामंती समाज | भूमि से बँधा कृषि श्रम, शिल्प-गिल्ड | सामंत-भूदास (serf); बेगार, लगान, संरक्षण के बदले दायित्व |
| औद्योगिक/पूँजीवादी समाज | कारख़ाना, मशीन, विस्तृत श्रम-विभाजन | पूँजीपति-मज़दूर; "स्वतंत्र" वेतन-श्रम |
| उत्तर-औद्योगिक समाज | सेवा, ज्ञान, सूचना (डेनियल बेल, 1973) | पेशेवर, लचीला, अनुबंध, प्लेटफ़ॉर्म श्रम |
सामंती और पूँजीवादी समाजों में कार्य-संगठन के सिद्धांत (UPSC 2024)
| सिद्धांत | सामंती | पूँजीवादी |
|---|---|---|
| श्रम का स्वरूप | भूदास भूमि से बँधा, अस्वतंत्र; पारंपरिक दायित्व | "दोहरी स्वतंत्रता" (मार्क्स) — बंधन से मुक्त और उत्पादन-साधनों से भी "मुक्त" (वंचित); श्रम-शक्ति बिकाऊ |
| अधिशेष का निष्कर्षण | प्रत्यक्ष, अतिरिक्त-आर्थिक बल — बेगार, वस्तु-लगान | अप्रत्यक्ष, बाज़ार द्वारा — अधिशेष मूल्य (वेतन-अनुबंध के भीतर) |
| उत्पादन का उद्देश्य | उपयोग-मूल्य, जीविका, सामंत का उपभोग | विनिमय-मूल्य, लाभ, पूँजी-संचय |
| श्रम-विभाजन | सरल, शिल्प-आधारित, गिल्ड — पूरा उत्पाद एक कारीगर | विस्तृत, खंडित (एडम स्मिथ — पिन फ़ैक्टरी), टेलरवाद (1911), फ़ोर्डवाद (असेंबली लाइन) |
| समय-अनुशासन | कार्य-उन्मुख (task-oriented), ऋतु और प्रकृति के अनुसार | घड़ी-उन्मुख, समय = धन — ई.पी. थॉम्पसन ("Time, Work-Discipline and Industrial Capitalism", 1967) |
| स्थान | घर, खेत, कार्यशाला — कार्य और परिवार साथ | कारख़ाना/कार्यालय — घर और कार्य का पृथक्करण |
| संबंध | व्यक्तिगत, पितृसत्तात्मक, वंशानुगत, प्रथागत | अवैयक्तिक, अनुबंधात्मक, बाज़ार-निर्धारित |
| नियंत्रण | प्रथा, धर्म, सामंत की शक्ति | प्रबंधकीय पदानुक्रम, नौकरशाही, मशीन की गति |
भारतीय संदर्भ — जजमानी व्यवस्था और बंधुआ मज़दूरी में सामंती तत्व आज भी; "अर्ध-सामंतवाद" बहस (अमित भादुड़ी, उत्सा पटनायक — 1970 के दशक की "उत्पादन पद्धति बहस")।
औपचारिक और अनौपचारिक संगठन; अनौपचारिक क्षेत्र (UPSC 2025)
- अवधारणा — कीथ हार्ट (घाना, 1971-73 — "अनौपचारिक आय अवसर"); ILO की केन्या रिपोर्ट (1972) — छोटे पैमाने, आसान प्रवेश, पारिवारिक स्वामित्व, स्थानीय संसाधन, श्रम-प्रधान, अविनियमित; भारत में NCEUS (अर्जुन सेनगुप्ता आयोग) — लगभग 92% श्रमिक अनौपचारिक रोज़गार में (2007-09)।
- सिद्धांत — द्वैतवादी (आधुनिक क्षेत्र विस्तार से अनौपचारिक क्षेत्र समाप्त होगा — लुईस मॉडल), संरचनावादी (औपचारिक पूँजी अनौपचारिक श्रम का शोषण करती है — उप-अनुबंध, आउटसोर्सिंग — पोर्टेस, कास्टेल्स), क़ानूनवादी (हर्नांडो डी सोटो — नौकरशाही बाधाओं से बचने का तार्किक चुनाव)।
- विकासशील समाजों में समाजशास्त्रीय महत्व — (1) रोज़गार का प्रमुख स्रोत — भारत में 90% के आसपास कार्यबल; (2) प्रवासियों का "सुरक्षा जाल" — शहरों में प्रवेश-द्वार; (3) सामाजिक संबंधों में अंतर्निहित — जाति, नातेदारी, क्षेत्र नेटवर्क पर आधारित भर्ती और ऋण (हरिस-व्हाइट — "सामाजिक संस्थाओं द्वारा नियंत्रित अर्थव्यवस्था"); (4) स्त्रियों का केंद्रीय स्थान — घर-आधारित कार्य (बीड़ी, अगरबत्ती, सिलाई); SEWA (1972, इला भट्ट); (5) असुरक्षा — सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन, यूनियन का अभाव; (6) लचीलापन और उद्यमिता, पर "आवश्यकता-जनित" उद्यमिता; (7) औपचारिक क्षेत्र का अनौपचारीकरण — ठेका श्रम; (8) COVID-19 में प्रवासी संकट ने इसकी भेद्यता उजागर की।
- नीति — असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008, ई-श्रम पोर्टल (2021), सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020, PM-SYM पेंशन, PM SVANidhi (रेहड़ी-पटरी)।
गिग अर्थव्यवस्था (UPSC 2024)
- परिभाषा — अल्पकालिक, कार्य-आधारित ("gig"), प्लेटफ़ॉर्म-मध्यस्थ काम, जहाँ श्रमिक "स्वतंत्र ठेकेदार/साझेदार" कहलाते हैं — कैब, फ़ूड-डिलीवरी, ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स, फ़्रीलांस डिजिटल कार्य; सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 ने "गिग कामगार" और "प्लेटफ़ॉर्म कामगार" को पहली बार परिभाषित किया।
- आकार — NITI आयोग ("India's Booming Gig and Platform Economy", जून 2022): 2020-21 में लगभग 77 लाख गिग कामगार, 2029-30 तक लगभग 2.35 करोड़ होने का अनुमान।
- श्रम-बाज़ार पर प्रभाव — (1) लचीलापन और प्रवेश में आसानी — युवाओं, छात्रों, स्त्रियों के लिए अतिरिक्त आय; (2) औपचारिक रोज़गार का विस्थापन — स्थायी नौकरियों का "गिगीकरण"; (3) एल्गोरिदमिक प्रबंधन — रेटिंग, प्रोत्साहन, "डीएक्टिवेशन" से नियंत्रण (एलेक्स रोसेनब्लाट — Uberland, 2018); (4) आय की अनिश्चितता, लंबे घंटे, "10 मिनट डिलीवरी" का दबाव और सड़क सुरक्षा; (5) "प्रीकैरिएट" (गाय स्टैंडिंग) का विस्तार; (6) कौशल का ध्रुवीकरण।
- सामाजिक सुरक्षा पर प्रभाव — नियोक्ता-कर्मचारी संबंध न होने से PF, ESI, बीमा, मातृत्व लाभ, न्यूनतम वेतन से बाहर; "ग़लत वर्गीकरण" (misclassification) की बहस — UK सर्वोच्च न्यायालय (Uber, 2021) ने ड्राइवरों को "worker" माना।
- भारत में उपाय — सामाजिक सुरक्षा संहिता (प्लेटफ़ॉर्म के टर्नओवर का 1-2% योगदान से कल्याण कोष), राजस्थान प्लेटफ़ॉर्म-आधारित गिग कामगार (पंजीकरण और कल्याण) अधिनियम 2023, कर्नाटक का 2025 का अधिनियम, केंद्रीय बजट 2025-26 — ई-श्रम पर पंजीकरण, पहचान-पत्र, PM-JAY स्वास्थ्य कवरेज; नई श्रम संहिताएँ लागू (नवंबर 2025)।
प्रौद्योगिकी, स्वचालन और कार्य का स्वरूप (UPSC 2024)
- ऐतिहासिक बहस — लुडाइट आंदोलन (1811-16); मार्क्स — मशीन श्रमिक को "उपांग" बनाती है; ब्रेवरमैन (1974) — कौशल-ह्रास; ब्लॉनर (1964) — तकनीक के अनुसार अलगाव भिन्न; उत्तर-फ़ोर्डवाद — लचीला विशेषीकरण (पियोर और सेबल, 1984)।
- नया चरण — "चौथी औद्योगिक क्रांति" (क्लॉस श्वाब, 2016): AI, रोबोटिक्स, IoT; फ़्रे और ऑसबॉर्न (2013) — अमेरिका के लगभग 47% रोज़गार स्वचालन के उच्च जोखिम में; डेविड ऑटर — "रोज़गार ध्रुवीकरण" (मध्य-कौशल नियमित कार्य घटे; उच्च और निम्न कौशल बढ़े)।
- प्रभाव — (1) रोज़गार विस्थापन और नए कार्यों का सृजन; (2) कौशल का पुनर्गठन — "आजीवन सीखना"; (3) निगरानी — डिजिटल टेलरवाद, ज़ुबॉफ़ का "निगरानी पूँजीवाद"; (4) दूरस्थ और हाइब्रिड कार्य — कार्य-जीवन सीमा का धुंधलापन; (5) असमानता — पूँजी और उच्च-कौशल को लाभ; (6) लैंगिक प्रभाव — डेटा-एंट्री, BPO जैसे स्त्री-प्रधान क्षेत्रों पर ख़तरा; (7) भारत — जनांकिकीय लाभांश बनाम "रोज़गारहीन वृद्धि"; IT-सेवा क्षेत्र पर जनरेटिव AI का प्रभाव; कृषि में ड्रोन; श्रम-प्रधान विनिर्माण का महत्व।
- आलोचनात्मक मूल्यांकन — "तकनीकी निर्धारणवाद" से बचें — प्रभाव संस्थाओं (यूनियन, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा नीति) पर निर्भर; नीति — Skill India, सार्वभौमिक बुनियादी आय की बहस, AI-नैतिकता।
औपचारिक कार्यस्थल और लैंगिक पूर्वाग्रह (UPSC 2025)
- प्रमाण — लैंगिक वेतन-अंतर; "काँच की छत" (glass ceiling) और "काँच की चट्टान" (glass cliff — संकट के समय स्त्रियों को नेतृत्व); "मातृत्व दंड" बनाम "पितृत्व बोनस"; व्यावसायिक पृथक्करण (नर्सिंग, शिक्षण बनाम इंजीनियरिंग, प्रबंधन); प्रतीकवाद (tokenism) — रोज़ाबेथ मॉस कैंटर (Men and Women of the Corporation, 1977); यौन उत्पीड़न; "लंबे घंटों की संस्कृति"।
- भारत — विशाखा दिशानिर्देश (1997), POSH अधिनियम 2013; मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम 2017 — 26 सप्ताह, क्रेच; कंपनी अधिनियम 2013 — सूचीबद्ध कंपनियों में कम से कम एक स्त्री निदेशक; फिर भी वरिष्ठ प्रबंधन में स्त्रियों का कम हिस्सा।
- निष्कर्ष — औपचारिक कार्यस्थल "क़ानूनी रूप से" लिंग-तटस्थ, पर संरचना (पुरुष "आदर्श कर्मचारी" मानक — जोन एकर, "gendered organizations", 1990) और संस्कृति में पूर्वाग्रह बना है।
घरेलू श्रम का लैंगिक विभाजन (UPSC 2025)
- अवधारणा — घर के काम (भोजन, सफ़ाई, देखभाल) का स्त्रियों को "स्वाभाविक" रूप से आवंटन — अवैतनिक, अदृश्य, कम मूल्यवान; एन ओकली (The Sociology of Housework, 1974) — गृहकार्य एक "काम" है, एकाकी और नीरस; आर्ली हॉकशील्ड (The Second Shift, 1989) — कामकाजी स्त्रियों की "दूसरी पारी"; यंग और विलमॉट (The Symmetrical Family, 1973) — "समरूप परिवार" की ओर (आशावादी दृष्टि, आलोचना — ओकली)।
- क्या परिवर्तन हो रहा है? — हाँ (आंशिक) — शहरी शिक्षित दंपतियों में पुरुषों की सहभागिता, "सक्रिय पितृत्व", घरेलू सहायक, सुविधा-सेवाएँ (भोजन डिलीवरी), COVID-काल में घर पर साझा काम; नहीं (मूल रूप से) — भारत के समय-उपयोग सर्वेक्षण 2019 के अनुसार स्त्रियाँ अवैतनिक घरेलू सेवाओं पर प्रतिदिन लगभग 299 मिनट और पुरुष लगभग 97 मिनट देते हैं; कामकाजी स्त्रियों पर "दोहरा बोझ"; देखभाल का भार अन्य स्त्रियों (घरेलू कामगार — प्रायः दलित/प्रवासी) पर स्थानांतरित — "देखभाल की वैश्विक श्रृंखला" (हॉकशील्ड); "मातृत्व दंड"।
- निष्कर्ष — परिवर्तन "धीमा और वर्ग-विशिष्ट" है — "रुकी हुई क्रांति" (stalled revolution — हॉकशील्ड); नीतिगत उपाय — क्रेच, पितृत्व अवकाश, लचीला कार्य, सामाजिक मानदंडों में परिवर्तन।
3. राजनीति और समाज
- प्रमुख अवधारणाएँ — शक्ति, प्राधिकार, वैधता; राष्ट्र (कल्पित समुदाय — एंडरसन), राज्य (वेबर — वैध बल के प्रयोग का एकाधिकार), नागरिकता (टी.एच. मार्शल, 1950 — नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक अधिकारों का क्रमिक विकास), लोकतंत्र, विचारधारा।
शक्ति बनाम प्राधिकार; वेबर के प्राधिकार के प्रकार (UPSC 2024)
| प्रकार | वैधता का आधार | प्रशासन | उदाहरण | अस्थिरता |
|---|---|---|---|---|
| पारंपरिक | "सदा से ऐसा होता आया" — परंपरा की पवित्रता | व्यक्तिगत सेवक, संबंधी | राजा, कबीले का मुखिया, जाति पंचायत | परिवर्तन का विरोध |
| करिश्माई | नेता के असाधारण गुण, अनुयायियों का विश्वास | शिष्य, अनुयायी | गांधी, बिरसा मुंडा, पैगंबर | अस्थायी; "नैत्यकीकरण" (routinisation) में बदलता |
| तार्किक-वैधानिक | अवैयक्तिक नियम और विधि | नौकरशाही | आधुनिक राज्य, निर्वाचित सरकार | "लौह पिंजरा" |
शक्ति और प्राधिकार में अंतर — शक्ति = प्रतिरोध के बावजूद इच्छा लागू करने की क्षमता (बल, दबाव); प्राधिकार = वैध शक्ति जिसे लोग स्वेच्छा से मानते हैं; प्राधिकार अधिक स्थायी और कम ख़र्चीला। वेबर के प्रकार "आदर्श प्रारूप" हैं — वास्तविकता में मिश्रित (एक करिश्माई नेता निर्वाचित पद पर)।
अभिजात सिद्धांत: पैरेटो, मोस्का, मिशेल्स (UPSC 2025)
| विचारक | मुख्य विचार |
|---|---|
| विल्फ़्रेडो पैरेटो (The Mind and Society, 1916) | हर समाज में अल्पसंख्यक अभिजात (शासक और गैर-शासक) और जनसमूह; अभिजात के प्रकार — "लोमड़ी" (चालाकी — "संयोजन की प्रवृत्ति") और "शेर" (बल — "समूह-स्थायित्व की प्रवृत्ति"); "अभिजात का परिसंचरण" — "इतिहास अभिजातों का कब्रिस्तान है"; मनोवैज्ञानिक आधार — "अवशेष" (residues) |
| गेटानो मोस्का (The Ruling Class, 1896; अंग्रेज़ी 1939) | हर समाज में "शासक वर्ग" (संगठित अल्पसंख्यक) और "शासित"; अल्पसंख्यक इसलिए शासन करता है क्योंकि वह संगठित है; "राजनीतिक सूत्र" (political formula) — शासन की वैधता की विचारधारा; "उप-अभिजात" (मध्य वर्ग) की भूमिका; बाद में लोकतंत्र के प्रति कुछ उदार |
| रॉबर्ट मिशेल्स (Political Parties, 1911) | "अल्पतंत्र का लौह नियम" — "जो संगठन कहता है, वह अल्पतंत्र कहता है"; जर्मन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी का अध्ययन — लोकतांत्रिक संगठन भी नेतृत्व के हाथों में केंद्रित हो जाते हैं (विशेषज्ञता, नौकरशाही, जनता की उदासीनता, नेताओं का पद से लगाव) |
- समानताएँ — (1) अल्पसंख्यक शासन अपरिहार्य; (2) मार्क्सवाद की आलोचना — वर्गहीन समाज असंभव, क्रांति केवल एक अभिजात को दूसरे से बदलती है; (3) उदार लोकतंत्र की "जन-शासन" धारणा पर संदेह; (4) "शास्त्रीय अभिजात सिद्धांत" — इटली-जर्मनी के संदर्भ।
- अंतर — आधार: पैरेटो — मनोवैज्ञानिक (अवशेष), मोस्का — संगठनात्मक-राजनीतिक, मिशेल्स — संगठनात्मक-नौकरशाही; परिवर्तन: पैरेटो — परिसंचरण, मोस्का — सामाजिक शक्तियों का संतुलन, मिशेल्स — संगठन का अनिवार्य परिणाम; लोकतंत्र के प्रति: पैरेटो सबसे निराशावादी (उसके विचार फ़ासीवाद से जोड़े गए), मोस्का अधिक संतुलित।
- आलोचना — (1) सत्ता-संरचना को "स्वाभाविक" मानना; (2) आर्थिक आधार की उपेक्षा (मार्क्सवादी); (3) बहुलवादी — रॉबर्ट डाल: अनेक प्रतिस्पर्धी अभिजात ("polyarchy"); सी. राइट मिल्स — संस्थागत "शक्ति अभिजात" (1956); (4) जोसेफ़ शुम्पीटर — "प्रतिस्पर्धी अभिजातवाद" — लोकतंत्र = अभिजातों के बीच वोट के लिए प्रतिस्पर्धा (1942)। भारत — राजनीतिक अभिजात का "वंशवाद", दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी (मिशेल्स की पुष्टि), पर OBC-दलित अभिजात का उदय (परिसंचरण)।
नागरिक समाज और लोकतंत्र (UPSC 2024)
- नागरिक समाज — राज्य, बाज़ार और परिवार के बीच का स्वैच्छिक क्षेत्र: NGO, संघ, यूनियन, मीडिया, धार्मिक-सांस्कृतिक संगठन, आंदोलन।
- विचारक — तोकविल (Democracy in America, 1835) — स्वैच्छिक संघ लोकतंत्र की पाठशाला; पुटनम (Making Democracy Work, 1993 — उत्तर बनाम दक्षिण इटली; नागरिक परंपरा और सामाजिक पूँजी); हैबरमास — "सार्वजनिक क्षेत्र" (1962); ग्राम्शी — नागरिक समाज आधिपत्य और प्रति-आधिपत्य का क्षेत्र; पार्थ चटर्जी (The Politics of the Governed, 2004) — भारत में अभिजात "नागरिक समाज" बनाम निर्धनों का "राजनीतिक समाज" (बातचीत, अनौपचारिक माँगें)।
- नागरिकता को सशक्त करने में भूमिका — (1) अधिकार-चेतना और भागीदारी (RTI आंदोलन — MKSS); (2) जवाबदेही — सामाजिक अंकेक्षण, जनहित याचिका; (3) हाशिये की आवाज़ (दलित, आदिवासी, स्त्री संगठन); (4) सामाजिक पूँजी और विश्वास; (5) सेवा-वितरण (स्वास्थ्य, शिक्षा); (6) बहुलवाद और सहिष्णुता का प्रशिक्षण।
- सीमाएँ — शहरी, अभिजात और अंग्रेज़ी-भाषी झुकाव; विदेशी निधि (FCRA विवाद); "असभ्य" नागरिक समाज (सांप्रदायिक संगठन — आशुतोष वार्ष्णेय, Ethnic Conflict and Civic Life, 2002 — अंतर-सामुदायिक संघ हिंसा रोकते हैं); राज्य से टकराव।
दबाव समूह (UPSC 2025)
- अर्थ — सत्ता प्राप्त किए बिना सार्वजनिक नीति को प्रभावित करने वाले संगठित समूह; राजनीतिक दल से भिन्न (दल सत्ता चाहते हैं)।
- प्रकार — हित-समूह (वर्गीय — FICCI, CII, ट्रेड यूनियन, किसान संगठन) और प्रचारात्मक/मुद्दा-समूह (पर्यावरण, मानवाधिकार); अंदरूनी बनाम बाहरी (व्यान ग्रांट); संस्थागत (नौकरशाही संघ), साहचर्यात्मक, अ-साहचर्यात्मक (जाति, धर्म), "अनोमिक" (दंगे) — आमंड-पॉवेल।
- लोकतंत्र के लिए आवश्यक — बहुलवाद (डाल), चुनावों के बीच भागीदारी, विशेषज्ञ जानकारी, अल्पसंख्यक हितों की अभिव्यक्ति, सरकार पर अंकुश; उदाहरण — सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 (MKSS), खाद्य सुरक्षा, वन अधिकार अधिनियम (अभियान), निर्भया के बाद क़ानूनी सुधार।
- लोकतंत्र के लिए ख़तरा — संसाधन-संपन्न समूहों का असमान प्रभाव, कॉरपोरेट लॉबीइंग और "नियामक क़ब्ज़ा", सामूहिक क्रिया की समस्या — मैनकर ओल्सन (The Logic of Collective Action, 1965 — छोटे संगठित हित बड़े असंगठित हितों पर भारी), जाति-धर्म आधारित संकीर्ण दबाव, हिंसक आंदोलन; भारत में लॉबीइंग का कोई क़ानूनी नियमन नहीं।
- निष्कर्ष — दबाव समूह "आवश्यक" हैं, पर पारदर्शिता, समान पहुँच और नियमन के बिना वे "ख़तरा" बन सकते हैं।

4. धर्म और समाज
धर्म के समाजशास्त्रीय सिद्धांत: मार्क्स, वेबर, दुर्खीम (UPSC 2025)
| पक्ष | मार्क्स | दुर्खीम | वेबर |
|---|---|---|---|
| धर्म क्या है | अधिरचना; "पीड़ित प्राणी की आह, हृदयहीन संसार का हृदय… जनता की अफ़ीम" (1844) | पवित्र वस्तुओं से जुड़े विश्वास-आचरण जो नैतिक समुदाय बनाते हैं | अर्थपूर्ण क्रिया का स्रोत; "विश्व-छवियाँ" |
| प्रकार्य/भूमिका | शोषण को वैधता, मिथ्या चेतना, सांत्वना — अलगाव का रूप | सामाजिक एकता, सामूहिक चेतना, नैतिक नियमन | सामाजिक परिवर्तन का कारक (प्रोटेस्टेंट नीति); तर्कसंगतिकरण |
| पद्धति | ऐतिहासिक भौतिकवाद | प्रकार्यवाद, अरुंटा का टोटमवाद | Verstehen, तुलनात्मक-ऐतिहासिक |
| भविष्य | वर्गहीन समाज में धर्म लुप्त | नए रूपों में बना रहेगा ("व्यक्ति का पंथ", नागरिक धर्म) | मोहभंग, "लौह पिंजरा" |
| आलोचना | धर्म की स्वायत्त और क्रांतिकारी भूमिका की उपेक्षा (मुक्ति धर्मशास्त्र, भक्ति आंदोलन) | एकता पर अति-बल, संघर्ष और बहुलता की उपेक्षा; छोटे समाज से सामान्यीकरण | भौतिक कारकों को कम आँकना (टॉनी) |
जीववाद और प्रकृतिवाद (UPSC 2024)
- जीववाद (Animism) — ई.बी. टायलर (Primitive Culture, 1871): धर्म की न्यूनतम परिभाषा — "आध्यात्मिक सत्ताओं में विश्वास"; उत्पत्ति — स्वप्न, मूर्च्छा, मृत्यु, छाया के अनुभवों से "आत्मा" (शरीर से अलग) का विचार → पूर्वज-आत्माएँ → पेड़-पौधों-पशुओं में आत्मा → देवता; विकासवादी क्रम — जीववाद → बहुदेववाद → एकेश्वरवाद।
- प्रकृतिवाद (Naturism) — मैक्स मूलर: धर्म का स्रोत प्रकृति की शक्तियाँ (सूर्य, आकाश, अग्नि, वर्षा, तूफ़ान) — उनकी विशालता और रहस्य से उत्पन्न भय-विस्मय; भाषा का "रोग" — प्राकृतिक घटनाओं का मानवीकरण (वैदिक देवता — इंद्र, अग्नि, वरुण, सूर्य); "अनंत" की अनुभूति।
- अंतर — स्रोत: आंतरिक मानसिक अनुभव (स्वप्न) बनाम बाह्य प्रकृति; पूज्य: आत्माएँ बनाम प्राकृतिक शक्तियाँ; विधि: नृवंशवर्णनात्मक तुलना बनाम भाषाशास्त्र (वैदिक ग्रंथ)।
- दुर्खीम की आलोचना (Elementary Forms) — दोनों "भ्रम" पर आधारित — धर्म जैसी स्थायी संस्था भ्रम पर नहीं टिक सकती; दोनों "पवित्र" की सामाजिक प्रकृति की उपेक्षा करते हैं; टोटमवाद अधिक मौलिक; अन्य आलोचना — मैरेट (animatism — अवैयक्तिक "माना" शक्ति, जीववाद से पहले), विकासवादी अनुमान, "आरामकुर्सी" मानवशास्त्र।
- भारतीय उदाहरण — जनजातीय "बोंगा" (मुंडा), सरना (पवित्र उपवन) — जीववाद/प्रकृति-पूजा; वैदिक प्रकृति-देवता — प्रकृतिवाद।
आधुनिकीकरण और धर्मनिरपेक्षीकरण (UPSC 2024)
- धर्मनिरपेक्षीकरण सिद्धांत — आधुनिकता (विज्ञान, शहरीकरण, नौकरशाही, बहुलवाद) के साथ धर्म का सामाजिक महत्व घटता है — वेबर (मोहभंग), ब्रायन विल्सन (Religion in Secular Society, 1966 — धार्मिक सोच, आचरण और संस्थाओं का सामाजिक महत्व घटना), पीटर बर्गर (The Sacred Canopy, 1967 — बहुलवाद "पवित्र छत्र" को तोड़ता है)।
- क्या दोनों साथ चलते हैं? — नहीं, आवश्यक रूप से नहीं: (1) बर्गर स्वयं (The Desecularization of the World, 1999) — विश्व पहले जितना ही "उग्र रूप से धार्मिक" है; (2) अमेरिका — आधुनिक पर अत्यधिक धार्मिक; (3) होसे कैसानोवा (Public Religions in the Modern World, 1994) — धर्मनिरपेक्षीकरण के तीन अर्थ: विभेदीकरण (धर्म का राज्य-विज्ञान से पृथक्करण — सही), पतन (विश्वास में कमी — असमान), निजीकरण (धर्म का निजी क्षेत्र में सिमटना — ग़लत; "सार्वजनिक धर्म" का पुनरुत्थान); (4) नॉरिस और इंगलहार्ट (Sacred and Secular, 2004) — "अस्तित्वगत सुरक्षा" (existential security) बढ़ने पर धार्मिकता घटती है, असुरक्षा में बढ़ती है; (5) चार्ल्स टेलर (A Secular Age, 2007) — धर्मनिरपेक्षता = विश्वास "विकल्पों में से एक" बनना; (6) भारत — आधुनिकीकरण (शिक्षा, तकनीक, शहरीकरण) के साथ धार्मिक उत्सवों, तीर्थ-पर्यटन, टीवी-डिजिटल धर्म, धार्मिक राजनीति का विस्तार; मीरा नंदा (The God Market, 2009) — नव-उदारवाद और धार्मिकता का गठजोड़; टी.एन. मदान — धर्मनिरपेक्षता "पश्चिमी आयात"।
- निष्कर्ष — आधुनिकीकरण धर्म का स्वरूप बदलता है (संस्थागत → व्यक्तिगत, स्थानीय → वैश्विक, अनुष्ठान → पहचान), पर उसे समाप्त नहीं करता; "बहुल आधुनिकताएँ" (शमुएल आइज़ेनस्टाट, 2000)।
पंथों और संप्रदायों का प्रसार (UPSC 2024)
- प्रकार — चर्च (बड़ा, समाज से समायोजित, जन्म से सदस्यता) और संप्रदाय/सेक्ट (छोटा, समाज-विरोधी, कठोर, स्वैच्छिक सदस्यता) — अर्न्स्ट ट्रॉल्श (1912); डिनॉमिनेशन (एच. रिचर्ड नीबूर, 1929); कल्ट — नवीन, करिश्माई, ढीला संगठन (स्टार्क और बेनब्रिज); रॉय वॉलिस (1984) — नए धार्मिक आंदोलन: विश्व-अस्वीकारी, विश्व-स्वीकारी (आत्म-विकास, सफलता — मानव क्षमता आंदोलन), विश्व-समायोजी।
- प्रसार के कारक — (1) सापेक्ष वंचना — निर्धन और हाशिये के लोगों को सम्मान, सहायता, समुदाय (भारत में डेरों का दलित-पिछड़े अनुयायी आधार); (2) एनोमी और तीव्र सामाजिक परिवर्तन — शहरीकरण, प्रवासन से समुदाय का टूटना; (3) अर्थ-संकट — उपभोक्तावाद और तनाव में आध्यात्मिक खोज (मध्यवर्गीय "गुरु" आंदोलन); (4) धार्मिक बाज़ार — "तर्कसंगत चयन" सिद्धांत (स्टार्क-फ़िन्के): बहुलवाद प्रतिस्पर्धा और नवाचार बढ़ाता है; (5) करिश्माई नेतृत्व और मीडिया-डिजिटल प्रचार; (6) स्वास्थ्य और उपचार — चमत्कारी चिकित्सा; (7) सामाजिक सेवाएँ — विद्यालय, अस्पताल, नशा-मुक्ति; (8) राजनीतिक संरक्षण — वोट-बैंक; (9) स्त्रियों को सहभागिता और सुरक्षा।
- चिंताएँ — अंधविश्वास, शोषण, करिश्माई नेताओं के आपराधिक मामले, अनुयायियों पर नियंत्रण, कट्टरता; महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन अधिनियम (2013), कर्नाटक का 2017 का क़ानून।
आधुनिक समाज में विज्ञान और धर्म का संबंध (UPSC 2025)
- इयान बारबर के चार मॉडल — संघर्ष (गैलीलियो, विकासवाद बनाम सृष्टिवाद), स्वतंत्रता (स्टीफ़न जे गोल्ड — "गैर-अतिव्यापी क्षेत्र", NOMA, 1997: विज्ञान — "कैसे", धर्म — "क्यों"), संवाद, समन्वय।
- ऐतिहासिक संबंध — मर्टन (Science, Technology and Society in Seventeenth-Century England, 1938) — प्यूरिटनवाद ने विज्ञान को प्रोत्साहित किया; इस्लामी स्वर्णयुग; भारत में आर्यभट, आयुर्वेद।
- समकालीन उदाहरण — (1) संघर्ष — जलवायु परिवर्तन या टीकों का धार्मिक विरोध, पाठ्यक्रम-बहस; (2) सह-अस्तित्व — इसरो वैज्ञानिकों द्वारा प्रक्षेपण से पहले पूजा; डॉक्टर और देवता दोनों पर भरोसा (चिकित्सा बहुलवाद); (3) विज्ञान से धर्म की वैधता — योग-ध्यान के न्यूरोसाइंस अध्ययन, "वैज्ञानिक" वास्तु; (4) तकनीक का धर्म में उपयोग — ऑनलाइन दर्शन, ई-पूजा, धार्मिक ऐप; (5) नैतिक प्रश्न — IVF, जीन-संपादन, इच्छामृत्यु, अंगदान पर धार्मिक मत; (6) संविधान का अनु. 51A(h) — "वैज्ञानिक दृष्टिकोण" का विकास नागरिक कर्तव्य।
- निष्कर्ष — संबंध "शून्य-योग" नहीं; आधुनिक समाज में विज्ञान "प्रामाणिक ज्ञान" का प्रमुख स्रोत, धर्म "अर्थ और पहचान" का — दोनों के बीच संघर्ष, सहयोग और पुनर्व्याख्या साथ-साथ चलते हैं।
5. नातेदारी व्यवस्थाएँ
- परिवार, गृहस्थी, विवाह — परिवार के प्रकार (एकाकी, संयुक्त, विस्तारित), गृहस्थी (household — साथ रहने-खाने वाले) बनाम परिवार; विवाह के रूप (एक/बहु विवाह), नियम (अंतर्विवाह-बहिर्विवाह); वंश (lineage) और उद्गम (descent) — पितृ/मातृवंशी, द्विपक्षीय; पितृसत्ता और लैंगिक श्रम-विभाजन; समकालीन प्रवृत्तियाँ (विस्तार — मानवशास्त्र अध्याय 4 के समान)।
- पार्सन्स — परिवार के दो "मूलभूत और अपरिहार्य" कार्य (प्राथमिक समाजीकरण, वयस्क व्यक्तित्व का स्थिरीकरण) — अध्याय 2 देखें।
विवाह: "अनुष्ठानिक" से "व्यावसायिक" (UPSC 2024) और भारत में नई प्रवृत्तियाँ (UPSC 2025)
| पारंपरिक प्रथा | हाल की प्रवृत्ति |
|---|---|
| संस्कार — धार्मिक, अविच्छेद्य, "जन्म-जन्मांतर का बंधन" (के.एम. कपाड़िया — Marriage and Family in India, 1955: धर्म, प्रजा, रति) | अनुबंध और साथी-भाव (companionate marriage) की ओर; विवाह-विच्छेद की स्वीकार्यता (यद्यपि दर अब भी कम) |
| परिवार द्वारा तय (arranged), जाति-गोत्र नियम | "प्रेम-सह-तय" (love-cum-arranged) विवाह; सहमति का महत्व; अंतर्जातीय विवाह धीरे बढ़े (फिर भी लगभग 5%) |
| कम आयु में विवाह | विवाह की औसत आयु में वृद्धि; बाल विवाह में कमी (NFHS-5: 20-24 वर्ष की 23.3% स्त्रियों का विवाह 18 से पहले — NFHS-4 के 26.8% से कम) |
| नातेदारी-जाति नेटवर्क से जीवनसाथी | वैवाहिक वेबसाइटें और ऐप — पर जाति, धर्म, "रंग" के फ़िल्टर; NRI विवाह |
| सादे, समुदाय-आधारित अनुष्ठान | "वेडिंग इंडस्ट्री" — वेडिंग प्लानर, डेस्टिनेशन वेडिंग, प्री-वेडिंग शूट, सोशल मीडिया प्रदर्शन; उपभोक्तावादी "दिखावटी उपभोग" (वेबलेन, 1899) |
| दहेज़ — स्त्रीधन | दहेज़ का "उपहार" के रूप में बने रहना और बढ़ना; दहेज़-मृत्यु |
| विवाह अनिवार्य | देर से विवाह, एकल जीवन, लिव-इन (सर्वोच्च न्यायालय — इंद्रा सरमा, 2013 — कुछ संबंधों को घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत "विवाह की प्रकृति" का माना) |
- "व्यावसायिक" रूपांतरण के कारक — (1) बाज़ार और उपभोक्तावाद, नव-उदारवाद; (2) बढ़ता मध्य वर्ग और "प्रस्थिति-प्रदर्शन" (बोर्दियो — विशिष्टता); (3) मीडिया, बॉलीवुड, सोशल मीडिया; (4) विवाह-मेल का डिजिटलीकरण; (5) दहेज़ और हाइपरगैमी (ऊर्ध्व विवाह) का बाज़ारीकरण — विवाह "निवेश" और "गतिशीलता का साधन"; (6) धार्मिक अनुष्ठानों का संक्षिप्तीकरण और "उत्सव" की ओर बदलाव; (7) विवाह "जोड़ी के व्यक्तिगत चुनाव" और "पारिवारिक प्रतिष्ठा" दोनों का मंच।
- निरंतरता — जाति-अंतर्विवाह, माता-पिता की भूमिका, धार्मिक अनुष्ठान का केंद्रीय स्थान — अतः "अनुष्ठान" समाप्त नहीं, "व्यावसायिक" परत के साथ रूपांतरित।
संतान-केंद्रित (Filiocentric) परिवार (UPSC 2024)
- अर्थ — परिवार का भावनात्मक, आर्थिक और समय-निवेश बच्चों (विशेषकर उनकी शिक्षा और "भविष्य") पर केंद्रित; एकाकी और नवस्थानिक (neolocal) परिवार के साथ यह प्रवृत्ति बढ़ी।
- व्याख्या — (1) प्रजनन दर में गिरावट (भारत TFR 2.0, NFHS-5) — कम बच्चे, अधिक "गुणवत्ता" निवेश (गैरी बेकर — "quantity-quality trade-off"); (2) बाल्यावस्था की आधुनिक अवधारणा — फ़िलिप आरिए (Centuries of Childhood, 1960); विवियाना ज़ेलिज़र (Pricing the Priceless Child, 1985) — बच्चा "आर्थिक रूप से मूल्यहीन पर भावनात्मक रूप से अमूल्य"; (3) प्रतिस्पर्धी शिक्षा-अर्थव्यवस्था — कोचिंग संस्कृति, "निवेश" के रूप में बच्चा; मध्य वर्ग की गतिशीलता की चिंता; (4) एकाकी परिवार — दादा-दादी की केंद्रीयता घटी, दंपती-बच्चा त्रिकोण; (5) उपभोक्ता बाज़ार — बच्चों पर लक्षित विज्ञापन; (6) लोकतांत्रिक परिवार — गिडेंस का "शुद्ध संबंध" और बच्चों के अधिकार।
- परिणाम — "गहन पालन-पोषण" (intensive parenting — शेरॉन हेज़, 1996), बच्चों पर दबाव, माता-पिता (विशेषकर माताओं) पर बोझ, वृद्धों की उपेक्षा, एकल संतान की चुनौतियाँ।
क्वीयर नातेदारी (UPSC 2025)
- अवधारणा — LGBTQIA+ लोगों द्वारा रक्त और विषमलैंगिक विवाह से परे बनाए गए नातेदारी संबंध — केथ वेस्टन (Families We Choose, 1991 — "चुने हुए परिवार"); जूडिथ बटलर ("Is Kinship Always Already Heterosexual?", 2002); डेविड श्नाइडर — नातेदारी "प्रतीकों की व्यवस्था" (1968) — जिसने "जैविक" आधार पर प्रश्न उठाया।
- पारंपरिक नातेदारी को चुनौती — (1) विषमलैंगिक विवाह को नातेदारी का आधार मानने पर प्रश्न; (2) जैविक संबंध बनाम देखभाल/चुनाव — "वास्तविक" नाते का आधार प्रेम और दायित्व; (3) लैंगिक भूमिकाओं (पति/पत्नी, पिता/माता) का विघटन; (4) सहायक प्रजनन तकनीक, सरोगेसी, गोद — माता-पिता होने के नए रूप; (5) मित्र-नेटवर्क देखभाल के आधार (HIV संकट में)।
- भारतीय उदाहरण — हिजड़ा समुदाय की गुरु-चेला नातेदारी (घराना, "दूध-बेटी", नातेदारी शब्दावली — गायत्री रेड्डी, With Respect to Sex, 2005; सेरेना नंदा, Neither Man nor Woman, 1990); NALSA निर्णय (2014) — "तीसरा लिंग"; नवतेज जौहर (2018) — धारा 377 के अंतर्गत सहमति से समलैंगिक संबंध अपराध-मुक्त; सुप्रियो चक्रवर्ती (अक्टूबर 2023) — सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने से इनकार किया (संसद का विषय), केंद्र द्वारा अधिकारों पर विचार हेतु समिति; ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019; कई दंपतियों द्वारा "प्रतीकात्मक" विवाह और सहमति-पत्र।
- निष्कर्ष — क्वीयर नातेदारी दिखाती है कि नातेदारी "प्राकृतिक" नहीं, सामाजिक-सांस्कृतिक निर्माण है; यह पारंपरिक व्यवस्था को अस्वीकार भी करती है और उसकी भाषा (माँ, बेटी, बहन) अपनाकर पुनर्परिभाषित भी।
6. Master Summary Table
| क्षेत्र | मुख्य अवधारणा / विचारक | याद रखें |
|---|---|---|
| कार्य | थॉम्पसन 1967; ब्रेवरमैन 1974; बेल 1973; हार्ट 1971-73 | सामंती बनाम पूँजीवादी; अनौपचारिक क्षेत्र |
| गिग / स्वचालन | NITI 2022 (77 लाख → 2.35 करोड़); फ़्रे-ऑसबॉर्न 2013; ऑटर | सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 |
| लिंग और कार्य | ओकली 1974; हॉकशील्ड 1989; कैंटर 1977; एकर 1990 | POSH 2013, TUS 2019 |
| सत्ता | वेबर (3 प्राधिकार); मार्शल 1950 (नागरिकता) | शक्ति ≠ प्राधिकार |
| अभिजात | पैरेटो, मोस्का, मिशेल्स; डाल, मिल्स, शुम्पीटर | लौह नियम, परिसंचरण |
| नागरिक समाज | तोकविल, पुटनम, हैबरमास, ग्राम्शी, चटर्जी | राजनीतिक समाज |
| दबाव समूह | ग्रांट; ओल्सन 1965; आमंड-पॉवेल | आवश्यक बनाम ख़तरा |
| धर्म | मार्क्स, दुर्खीम, वेबर; टायलर, मूलर | जीववाद बनाम प्रकृतिवाद |
| धर्मनिरपेक्षीकरण | विल्सन, बर्गर, कैसानोवा, नॉरिस-इंगलहार्ट, टेलर | विभेदीकरण, पतन, निजीकरण |
| पंथ-संप्रदाय | ट्रॉल्श, नीबूर, वॉलिस, स्टार्क-बेनब्रिज | वंचना, एनोमी, धार्मिक बाज़ार |
| नातेदारी | कपाड़िया; आरिए; ज़ेलिज़र; वेस्टन; रेड्डी | व्यावसायीकरण, संतान-केंद्रित, क्वीयर |
7. चार्ट: वेबर — शक्ति से प्राधिकार तक
8. Mind Map
- सामंती बनाम पूँजीवादी
- अनौपचारिक, गिग
- स्वचालन, लिंग
- शक्ति-प्राधिकार
- अभिजात सिद्धांत
- नागरिक समाज, दबाव समूह
- मार्क्स-दुर्खीम-वेबर
- जीववाद-प्रकृतिवाद
- धर्मनिरपेक्षीकरण, पंथ
- बारबर के 4 मॉडल
- NOMA
- विवाह का व्यावसायीकरण
- संतान-केंद्रित परिवार
- क्वीयर नातेदारी
9. महत्वपूर्ण One-liners
- "Time, Work-Discipline and Industrial Capitalism" (1967) — ई.पी. थॉम्पसन।
- "अनौपचारिक क्षेत्र" शब्द — कीथ हार्ट (घाना अध्ययन); ILO केन्या रिपोर्ट — 1972।
- "The Second Shift" (1989) — आर्ली हॉकशील्ड; "The Sociology of Housework" (1974) — एन ओकली।
- "अल्पतंत्र का लौह नियम" — रॉबर्ट मिशेल्स (Political Parties, 1911)।
- "अभिजात का परिसंचरण", शेर-लोमड़ी — पैरेटो; "राजनीतिक सूत्र" — मोस्का।
- "The Logic of Collective Action" (1965) — मैनकर ओल्सन।
- "The Politics of the Governed" (2004), राजनीतिक समाज — पार्थ चटर्जी।
- जीववाद — टायलर (1871); प्रकृतिवाद — मैक्स मूलर।
- "Public Religions in the Modern World" (1994) — होसे कैसानोवा; "Sacred and Secular" (2004) — नॉरिस और इंगलहार्ट।
- "Families We Choose" (1991) — केथ वेस्टन; "Pricing the Priceless Child" (1985) — विवियाना ज़ेलिज़र।
10. टिप्स एवं ट्रिक्स
- 2024-25 में UPSC ने कई प्रश्न "राय" वाले पूछे — उत्तर में स्पष्ट पक्ष लें, फिर दोनों ओर के तर्क दें और संतुलित निष्कर्ष लिखें।
- नई अर्थव्यवस्था (गिग, AI) के उत्तरों में आँकड़े + क़ानून + सिद्धांत (मार्क्स/ब्रेवरमैन) तीनों जोड़ें।
- धर्म के उत्तर में कम से कम एक भारतीय उदाहरण — डेरे, भक्ति, इसरो पूजा, सरना।
कैसानोवा का धर्मनिरपेक्षीकरण — "विभेद-पतन-निजी (VPN)"; बारबर — "संघर्ष-स्वतंत्र-संवाद-समन्वय"; अभिजात — "पैरेटो = मनोविज्ञान, मोस्का = संगठन, मिशेल्स = पार्टी"।
11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
"गिग" अर्थव्यवस्था की अवधारणा को परिभाषित कीजिए और श्रम-बाज़ार तथा श्रमिकों के सामाजिक सुरक्षा जाल पर इसके प्रभाव की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
परिभाषा: प्लेटफ़ॉर्म-मध्यस्थ, अल्पकालिक, कार्य-आधारित रोज़गार; श्रमिक "साझेदार"; सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 की परिभाषाएँ; NITI (2022) — 77 लाख (2020-21) से 2.35 करोड़ (2029-30 अनुमान)।
श्रम-बाज़ार पर प्रभाव: लचीलापन और आसान प्रवेश; युवाओं-स्त्रियों के लिए आय; औपचारिक नौकरियों का गिगीकरण; एल्गोरिदमिक नियंत्रण (रोसेनब्लाट); आय-अनिश्चितता, लंबे घंटे; प्रीकैरिएट (स्टैंडिंग); मार्क्सवादी दृष्टि — "नया अलगाव", नियंत्रण का छिपा रूप।
सामाजिक सुरक्षा पर प्रभाव: नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के अभाव में PF, ESI, बीमा, मातृत्व लाभ से बाहर; ग़लत वर्गीकरण बहस (UK Uber 2021)।
उपाय: सामाजिक सुरक्षा संहिता (प्लेटफ़ॉर्म योगदान), राजस्थान अधिनियम 2023, कर्नाटक 2025, बजट 2025-26 (ई-श्रम, PM-JAY), श्रम संहिताएँ (नवंबर 2025); यूनियनीकरण (IFAT जैसे संगठन)।
निष्कर्ष: गिग अर्थव्यवस्था अवसर है, पर "लचीलापन" श्रमिक पर जोखिम का स्थानांतरण न बने — "लचीली सुरक्षा" (flexicurity) मॉडल आवश्यक।
मोस्का, मिशेल्स और पैरेटो के अभिजात सिद्धांतों में आप क्या समानताएँ और अंतर पहचानेंगे? उनके मुख्य मुद्दों की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: 19वीं-20वीं सदी के मोड़ पर "शास्त्रीय अभिजात सिद्धांत" — मार्क्सवाद और उदार लोकतंत्र दोनों की आलोचना।
पैरेटो: अभिजात-जनसमूह; शेर और लोमड़ी; अवशेष; अभिजात का परिसंचरण। मोस्का: संगठित शासक वर्ग; राजनीतिक सूत्र; उप-अभिजात। मिशेल्स: अल्पतंत्र का लौह नियम; SPD अध्ययन; संगठन → अल्पतंत्र।
समानताएँ: अल्पसंख्यक शासन अपरिहार्य; वर्गहीन समाज असंभव; जन-शासन का मिथक; यथार्थवादी/निराशावादी दृष्टि।
अंतर: आधार (मनोवैज्ञानिक / संगठनात्मक-राजनीतिक / नौकरशाही-संगठन); परिवर्तन की व्याख्या (परिसंचरण / सामाजिक शक्तियों का संतुलन / संगठनात्मक अनिवार्यता); लोकतंत्र के प्रति रुख।
मुख्य मुद्दे और आलोचना: आर्थिक आधार की उपेक्षा; बहुलवाद (डाल); शक्ति अभिजात (मिल्स); प्रतिस्पर्धी अभिजातवाद (शुम्पीटर); भारत — वंशवादी दल, आंतरिक लोकतंत्र की कमी; पर OBC-दलित अभिजात का उदय (परिसंचरण)।
निष्कर्ष: अभिजात सिद्धांत लोकतंत्र की सीमाओं का यथार्थवादी विश्लेषण देते हैं; पर लोकतांत्रिक संस्थाएँ अभिजातों को जवाबदेह और परिवर्तनीय बना सकती हैं।
क्या आधुनिकीकरण और धर्मनिरपेक्षीकरण आवश्यक रूप से साथ-साथ चलते हैं? अपने विचार दीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
धर्मनिरपेक्षीकरण थीसिस: वेबर (मोहभंग), विल्सन (1966), बर्गर (1967) — आधुनिकता के साथ धर्म का सामाजिक महत्व घटता है।
पक्ष में साक्ष्य: पश्चिमी यूरोप में चर्च-उपस्थिति में गिरावट; राज्य, शिक्षा, विज्ञान का धर्म से पृथक्करण।
विपक्ष (मेरा मत — "नहीं"): बर्गर (1999) — विसेक्युलराइज़ेशन; अमेरिका; कैसानोवा — विभेदीकरण हुआ पर निजीकरण नहीं; नॉरिस-इंगलहार्ट — अस्तित्वगत असुरक्षा; टेलर — विश्वास का "विकल्प" बनना; इस्लामी, पेंटेकोस्टल पुनरुत्थान; भारत — आधुनिकता के साथ धार्मिक उत्सव, तीर्थ-पर्यटन, डिजिटल धर्म, धार्मिक राजनीति (नंदा, मदान)।
स्पष्टीकरण: आधुनिकीकरण धर्म का "रूप" बदलता है — व्यक्तिगत आध्यात्मिकता, पहचान-धर्म, बाज़ार-धर्म; "बहुल आधुनिकताएँ" (आइज़ेनस्टाट)।
निष्कर्ष: दोनों का संबंध "आवश्यक" नहीं, "संदर्भ-निर्भर" है — धर्मनिरपेक्षीकरण एक सार्वभौमिक नियम नहीं, यूरोपीय ऐतिहासिक अनुभव है।
समकालीन समाज में पंथों और संप्रदायों के प्रसार की घटना को आप कैसे समझते हैं? इस प्रवृत्ति के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अवधारणाएँ: चर्च-संप्रदाय (ट्रॉल्श), डिनॉमिनेशन (नीबूर), कल्ट (स्टार्क-बेनब्रिज), नए धार्मिक आंदोलनों के तीन प्रकार (वॉलिस)।
कारक: सापेक्ष वंचना; एनोमी और तीव्र परिवर्तन; अर्थ-संकट और उपभोक्तावाद; धार्मिक बाज़ार (तर्कसंगत चयन); करिश्माई नेतृत्व; मीडिया-डिजिटल प्रसार; उपचार और कल्याण सेवाएँ; राजनीतिक संरक्षण; पहचान और सम्मान (दलित-पिछड़े अनुयायियों के लिए डेरों का समतावादी संदेश); मध्य वर्ग के लिए "विश्व-स्वीकारी" आध्यात्मिकता।
भारतीय संदर्भ: पंजाब-हरियाणा के डेरे, शहरी गुरु-आंदोलन, योग-आध्यात्मिकता का वैश्विक बाज़ार; अंधश्रद्धा-निर्मूलन क़ानून (महाराष्ट्र 2013)।
चिंताएँ: शोषण, अपराध, अंधविश्वास, लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रभाव।
निष्कर्ष: पंथों का प्रसार आधुनिकता की असुरक्षाओं और अधूरी सामाजिक आवश्यकताओं का सूचक है — धर्मनिरपेक्षीकरण के "पतन" नहीं, "रूपांतरण" का प्रमाण।
जीववाद की अवधारणा की विवेचना कीजिए और इसे प्रकृतिवाद से अलग कीजिए।
मॉडल उत्तर
जीववाद (टायलर, 1871): आध्यात्मिक सत्ताओं में विश्वास; स्वप्न-मृत्यु से आत्मा का विचार; पूर्वज और प्रकृति में आत्माएँ; विकासवादी क्रम।
प्रकृतिवाद (मैक्स मूलर): प्राकृतिक शक्तियों की विशालता से भय-विस्मय; मानवीकरण, "भाषा का रोग"; वैदिक देवता।
अंतर: स्रोत (आंतरिक मानसिक अनुभव बनाम बाह्य प्रकृति), पूज्य (आत्माएँ बनाम शक्तियाँ), पद्धति (नृवंशवर्णन बनाम भाषाशास्त्र)।
आलोचना: दुर्खीम — दोनों भ्रम-आधारित, सामाजिक "पवित्र" की उपेक्षा; मैरेट — animatism; विकासवादी अनुमान।
उदाहरण: मुंडा "बोंगा", सरना (जीववाद); इंद्र-अग्नि-वरुण (प्रकृतिवाद)।
धर्म को समझने में मार्क्स, वेबर और दुर्खीम के सिद्धांत किस प्रकार भिन्न हैं? स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
मार्क्स: अधिरचना; "जनता की अफ़ीम"; मिथ्या चेतना और सांत्वना; शोषण का वैधीकरण; वर्गहीन समाज में लुप्त।
दुर्खीम: पवित्र-अपवित्र; टोटमवाद; समाज की आत्म-पूजा; सामूहिक उत्साह; एकता और नैतिक नियमन; धर्म शाश्वत (नए रूप)।
वेबर: अर्थपूर्ण क्रिया; विश्व-छवियाँ; प्रोटेस्टेंट नीति — परिवर्तन का कारक; विश्व-धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन; तर्कसंगतिकरण और मोहभंग।
तुलना: प्रकार्य (संघर्ष/वैधता बनाम एकता बनाम परिवर्तन); पद्धति (भौतिकवाद बनाम प्रकार्यवाद बनाम Verstehen); स्तर (वर्ग बनाम समाज बनाम व्यक्ति-अर्थ); भविष्य।
आलोचनाएँ (तालिका अनुसार) और भारतीय उदाहरण — भक्ति आंदोलन (प्रतिरोध — मार्क्सवादी दृष्टि की सीमा), कुंभ (दुर्खीमवादी एकता), जैन-पारसी व्यापारी नीति (वेबर)।
निष्कर्ष: तीनों दृष्टियाँ परस्पर पूरक — धर्म एक साथ सत्ता, एकता और अर्थ का स्रोत है।
क्या दबाव समूह लोकतंत्र के लिए ख़तरा हैं या उसका आवश्यक तत्व? उपयुक्त उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
परिभाषा और प्रकार: नीति-प्रभावक संगठित समूह; हित बनाम प्रचारात्मक; अंदरूनी बनाम बाहरी; आमंड-पॉवेल वर्गीकरण।
आवश्यक तत्व: बहुलवाद (डाल); चुनावों के बीच भागीदारी; विशेषज्ञता; हाशिये की आवाज़; उदाहरण — RTI (MKSS), खाद्य सुरक्षा, FRA, किसान संगठन।
ख़तरा: असमान प्रभाव, कॉरपोरेट लॉबीइंग, नियामक क़ब्ज़ा; ओल्सन — संगठित अल्पसंख्यक हित; संकीर्ण जाति-धर्म दबाव; हिंसक आंदोलन; भारत में लॉबीइंग अविनियमित।
निष्कर्ष: दबाव समूह लोकतंत्र के "आवश्यक" अंग हैं; पारदर्शिता (लॉबीइंग प्रकटीकरण), समान पहुँच और सशक्त संस्थाएँ उन्हें "ख़तरा" बनने से रोकती हैं।
क्वीयर नातेदारी पारंपरिक नातेदारी व्यवस्था को किस प्रकार चुनौती देती है? उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए।
मॉडल उत्तर
अवधारणा: रक्त और विषमलैंगिक विवाह से परे चुने हुए नाते — वेस्टन (1991), बटलर (2002), श्नाइडर।
चुनौतियाँ: विषमलैंगिक विवाह का आधार; जैविकता बनाम देखभाल; लैंगिक भूमिकाएँ; सहायक प्रजनन और गोद; मित्र-नेटवर्क।
उदाहरण: हिजड़ा गुरु-चेला घराने (रेड्डी, नंदा); NALSA 2014, नवतेज जौहर 2018, सुप्रियो चक्रवर्ती 2023 (विवाह मान्यता से इनकार), ट्रांसजेंडर अधिनियम 2019।
निष्कर्ष: क्वीयर नातेदारी नातेदारी को "प्राकृतिक" नहीं, सामाजिक निर्माण सिद्ध करती है — पारंपरिक भाषा को अपनाकर उसके अर्थ बदलती है।
आधुनिक परिवार केवल एकाकी और नवस्थानिक ही नहीं, बल्कि संतान-केंद्रित भी हो गए हैं। आप इस प्रवृत्ति की व्याख्या कैसे करते हैं?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अवधारणाएँ: एकाकी (दंपती + बच्चे), नवस्थानिक (विवाह के बाद नया निवास), संतान-केंद्रित (बच्चों पर भावनात्मक-आर्थिक निवेश का केंद्रीकरण)।
व्याख्या: घटती प्रजनन दर (TFR 2.0) और बेकर का गुणवत्ता-मात्रा विनिमय; आरिए — बाल्यावस्था की आधुनिक अवधारणा; ज़ेलिज़र — "अमूल्य" बच्चा; प्रतिस्पर्धी शिक्षा और गतिशीलता की चिंता (कोचिंग संस्कृति); एकाकी परिवार में दादा-दादी की घटती भूमिका; बाज़ार; लोकतांत्रिक परिवार (गिडेंस) और बाल अधिकार।
परिणाम: गहन पालन-पोषण (हेज़), बच्चों और माताओं पर दबाव, वृद्धों की उपेक्षा।
भारतीय संदर्भ: शहरी मध्य वर्ग में स्पष्ट; ग्रामीण और संयुक्त परिवारों में "वृद्ध-केंद्रित" मूल्य भी शेष।
निष्कर्ष: संतान-केंद्रिकता आर्थिक, जनांकिकीय और सांस्कृतिक परिवर्तनों का संयुक्त परिणाम है — यह पारिवारिक संबंधों के "भावनात्मकीकरण" का संकेत है।
लोकतंत्र को नागरिकता की नींव सुदृढ़ करने के लिए नागरिक समाज की जीवंत संस्कृति की आवश्यकता है। टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
नागरिक समाज: राज्य-बाज़ार-परिवार के बीच स्वैच्छिक क्षेत्र; तोकविल, पुटनम, हैबरमास, ग्राम्शी।
नागरिकता से संबंध: मार्शल के नागरिक-राजनीतिक-सामाजिक अधिकारों का संरक्षण और विस्तार; अधिकार-चेतना (RTI — MKSS), जवाबदेही (सामाजिक अंकेक्षण), हाशिये की आवाज़, सामाजिक पूँजी, सहिष्णुता।
सीमाएँ: अभिजात झुकाव (चटर्जी — "राजनीतिक समाज"), "असभ्य" नागरिक समाज, राज्य से टकराव; वार्ष्णेय — अंतर-सामुदायिक संघ हिंसा रोकते हैं।
निष्कर्ष: जीवंत, समावेशी नागरिक समाज औपचारिक नागरिकता को "सक्रिय नागरिकता" में बदलता है।
12. Quick Revision Summary
- कार्य — सामंती बनाम पूँजीवादी (8 सिद्धांत, थॉम्पसन); अनौपचारिक क्षेत्र (हार्ट, ILO, NCEUS, 3 सिद्धांत); गिग (NITI 2022, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020); स्वचालन (श्वाब, फ़्रे-ऑसबॉर्न, ऑटर); कार्यस्थल लैंगिक पूर्वाग्रह (कैंटर, POSH); घरेलू श्रम (ओकली, हॉकशील्ड, TUS 2019)।
- राजनीति — शक्ति बनाम प्राधिकार (वेबर); अभिजात (पैरेटो, मोस्का, मिशेल्स); नागरिक समाज (तोकविल से चटर्जी); दबाव समूह (ओल्सन)।
- धर्म — मार्क्स-दुर्खीम-वेबर तुलना; जीववाद-प्रकृतिवाद; धर्मनिरपेक्षीकरण (कैसानोवा — VPN); पंथ-संप्रदाय (वॉलिस); विज्ञान-धर्म (बारबर, NOMA)।
- नातेदारी — विवाह का व्यावसायीकरण और नई प्रवृत्तियाँ (कपाड़िया, NFHS-5); संतान-केंद्रित परिवार (आरिए, ज़ेलिज़र); क्वीयर नातेदारी (वेस्टन, रेड्डी, 2014-2018-2023 निर्णय)।