1. अध्याय एक नज़र में
Paper II के भाग B — ग्रामीण और कृषक सामाजिक संरचना (भारतीय ग्राम का विचार और ग्राम अध्ययन, भू-स्वामित्व और भूमि सुधार का कृषि-संरचना पर प्रभाव) तथा जाति व्यवस्था (घुर्ये, श्रीनिवास, ड्यूमों, बेते के दृष्टिकोण; जाति की विशेषताएँ; अस्पृश्यता) — सबसे अधिक पूछे जाने वाले भागों में हैं। 2024 में बेते के अनुसार कृषक वर्ग-संरचना के आधार, कृषक संरचना की असमानताएँ, जाति व्यवस्था की निरंतरता, अस्पृश्यता के रूप और बंधुआ मज़दूरी; 2025 में बदलती कृषक वर्ग-संरचना, ग्राम अध्ययनों के अग्रदूत, भूमि का कृषकों से गैर-कृषक स्वामियों को हस्तांतरण, ग्रामीण उद्योगों का पतन और जातीय संघर्षों की रोकथाम।

2. भारतीय ग्राम और ग्राम अध्ययन
- भारतीय ग्राम का विचार — औपनिवेशिक प्रशासक (मेटकाफ़ — "छोटे गणराज्य", 1830), मार्क्स (एशियाई उत्पादन पद्धति), गांधी ("ग्राम स्वराज") बनाम अंबेडकर (ग्राम — "स्थानीयता का गड्ढा")।
ग्राम अध्ययनों के अग्रदूत और विभिन्न दृष्टिकोण (UPSC 2025)
- प्रारंभिक आर्थिक सर्वेक्षण — हेरोल्ड मान (Land and Labour in a Deccan Village, 1917 — पिंपला सौदागर, पुणे), गिल्बर्ट स्लेटर (Some South Indian Villages, 1918), राधाकमल मुखर्जी (लखनऊ — ग्रामीण अर्थशास्त्र)।
- समाजशास्त्रीय-मानवशास्त्रीय ग्राम अध्ययन (1950 का दशक) — स्वतंत्रता के बाद सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) और ब्रिटिश-अमेरिकी मानवशास्त्र के प्रभाव में; एम.एन. श्रीनिवास को प्रायः "ग्राम अध्ययन के अग्रदूत" माना जाता है — "India's Villages" (1955, संपादित) और रामपुरा अध्ययन; एस.सी. दुबे का "Indian Village" (1955) किसी भारतीय द्वारा लिखित पहला पूर्ण ग्राम-मोनोग्राफ़ माना जाता है।
| समाजशास्त्री | ग्राम | दृष्टिकोण / विशिष्टता |
|---|---|---|
| एम.एन. श्रीनिवास | रामपुरा (मैसूर) — The Remembered Village (1976) | संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक; प्रभु जाति, संस्कृतीकरण; "क्षेत्र-दृष्टि"; ग्राम एक "सामाजिक इकाई" पर बाहर से जुड़ा |
| एस.सी. दुबे | शमीरपेट (हैदराबाद) — Indian Village (1955); India's Changing Villages (1958) | बहु-विषयी दल; विकास-उन्मुख — सामुदायिक विकास का मूल्यांकन; ग्राम की "बहुस्तरीय" संरचना |
| मैकिम मैरियट | किशनगढ़ी (अलीगढ़) — Village India (1955) | सभ्यतागत; लघु-महान परंपरा, सार्वभौमीकरण-संकीर्णीकरण; जाति की "लेन-देन" (transactional) व्याख्या |
| आंद्रे बेते | श्रीपुरम (तंजावुर) — Caste, Class and Power (1965) | वेबेरियन; जाति-वर्ग-सत्ता की "संगति" से "विसरण" |
| एफ़.जी. बेली | बिसीपाड़ा (ओडिशा) — Caste and the Economic Frontier (1957) | संघर्ष और लेन-देन; बाज़ार और भूमि-ख़रीद से जातीय गतिशीलता |
| ऑस्कर लुईस | रामपुर (दिल्ली) — Village Life in Northern India (1958) | गुटबंदी, ग्राम से बाहर नातेदारी-संबंध |
| कैथलीन गफ़ | कुंबापेट्टई (तंजावुर) | मार्क्सवादी; कृषक वर्ग-शोषण |
- आलोचना — ग्राम को "स्वायत्त" और "स्थिर" मानना; उच्च-जातीय सूचनादाताओं पर निर्भरता; स्त्रियों-दलितों की आवाज़ कम; ऐतिहासिकता का अभाव; बाद में "ग्राम पुनः-अध्ययन" (re-studies) और क्षेत्रीय/राज्य-स्तरीय अध्ययनों की ओर बदलाव।
3. कृषक सामाजिक संरचना
आंद्रे बेते के अनुसार कृषक वर्ग-संरचना के आधार (UPSC 2024)
- कृति — Studies in Agrarian Social Structure (1974); Caste, Class and Power (1965)।
- मूल आधार — भूमि के साथ संबंध: (1) स्वामित्व (ownership), (2) नियंत्रण (control — काश्तकारी, पट्टा), (3) उपयोग (use — स्वयं खेती या दूसरों से करवाना); इनसे तीन प्रमुख श्रेणियाँ — भूस्वामी (स्वयं खेती न करने वाले और स्वयं खेती करने वाले), काश्तकार/बटाईदार, कृषि-मज़दूर।
- मुख्य तर्क — (1) कृषक वर्ग-संरचना केवल भूमि के आकार से नहीं, उत्पादन-संबंधों से तय; (2) जाति और वर्ग परस्पर संबद्ध पर समरूप नहीं — तंजावुर में ब्राह्मण भूस्वामी, गैर-ब्राह्मण काश्तकार, आदि-द्रविड़ मज़दूर (पारंपरिक संगति), पर अब विसरण; (3) क्षेत्रीय विविधता — कृषि-पारिस्थितिकी, सिंचाई, फ़सल-प्रणाली के अनुसार भिन्न संरचनाएँ; (4) मार्क्सवादी द्विभाजन (स्वामी-श्रमिक) भारतीय जटिलता के लिए अपर्याप्त; (5) प्रस्थिति (जाति) और सत्ता (राजनीति) भी कृषि संबंधों को प्रभावित करते हैं — वेबेरियन बहुआयामी दृष्टि।
- अन्य वर्गीकरण — डैनियल थॉर्नर (The Agrarian Prospect in India, 1956) — मालिक (लगान-जीवी भूस्वामी), किसान (कार्यकारी कृषक), मज़दूर (श्रम बेचने वाले) — आय-स्रोत, अधिकारों की प्रकृति और वास्तविक श्रम की मात्रा के आधार पर; उत्सा पटनायक — "श्रम-शोषण सूचकांक" (दूसरों के श्रम का उपयोग बनाम अपने श्रम की बिक्री); उत्पादन पद्धति बहस (EPW, 1969-75) — अर्ध-सामंतवाद बनाम पूँजीवाद।
भू-स्वामित्व और भूमि सुधार
- भूमि सुधार — (1) ज़मींदारी उन्मूलन (1950 के दशक — उ.प्र. अधिनियम 1950 आदि) — अधिकांशतः सफल, पर ज़मींदारों ने "स्वयं खेती" के नाम पर भूमि रखी; (2) काश्तकारी सुधार — लगान नियमन, स्वामित्व-अधिकार; ऑपरेशन बर्गा (प. बंगाल, 1978 — बटाईदारों का पंजीकरण) और केरल (1969-70) सफल; अन्यत्र "छिपी काश्तकारी"; (3) भूमि-सीमा (ceiling) — अधिशेष भूमि का पुनर्वितरण सीमित (बेनामी हस्तांतरण); (4) चकबंदी — पंजाब-हरियाणा में सफल; (5) भूदान (विनोबा भावे, 1951, पोचमपल्ली)।
- वर्तमान संरचना — कृषि जनगणना 2015-16: लगभग 86% जोतें सीमांत और लघु (2 हेक्टेयर से कम), पर कुल क्षेत्र का लगभग आधा; जोतों का निरंतर विखंडन।
"आधुनिक शक्तियों से कृषक वर्ग-संरचना बदल रही है" (UPSC 2025)
- हरित क्रांति (1960 का दशक के मध्य से) — HYV बीज, सिंचाई, उर्वरक, मशीनीकरण → पूँजीवादी किसान ("कुलक" — टी.जे. बायर्स), मज़दूर-किसान ध्रुवीकरण, क्षेत्रीय असमानता (पंजाब-हरियाणा बनाम पूर्वी भारत), मौसमी प्रवासन (बिहार से पंजाब)।
- मध्यवर्ती जातियों का उदय — भूमि सुधार और हरित क्रांति से जाट, यादव, कुर्मी, कम्मा, रेड्डी, वोक्कालिगा जैसी कृषक जातियाँ "प्रभु जातियाँ" और राजनीतिक शक्ति बनीं (चरण सिंह — किसान राजनीति)।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था का गैर-कृषिकरण — ग्रामीण परिवारों की आय में गैर-कृषि स्रोत बढ़े; "बहु-व्यवसायी" परिवार; छोटे किसान अंशकालिक मज़दूर।
- कृषि का स्त्रीकरण — पुरुष प्रवासन से स्त्रियाँ खेती में; पर भूमि-स्वामित्व कम।
- बाज़ार और कॉरपोरेट — अनुबंध खेती, कृषि-व्यवसाय, MSP बहस, किसान आंदोलन (2020-21) — कृषि क़ानून (2020) और उनका निरसन (नवंबर 2021)।
- कृषि संकट — ऋणग्रस्तता, किसान आत्महत्याएँ, जलवायु जोखिम, लागत-मूल्य असंतुलन।
- भूमि का गैर-कृषि उपयोग — शहरीकरण, अचल संपत्ति, SEZ।
- मूल्यांकन ("आलोचनात्मक") — परिवर्तन असमान और क्षेत्र-विशिष्ट; पुरानी असमानताएँ (जाति-आधारित भूमिहीनता — दलितों में सर्वाधिक) नए रूपों में बनी हैं; "पूँजीवादी रूपांतरण" अधूरा — अर्ध-सामंती तत्व (बंधुआ मज़दूरी) शेष।
कृषक सामाजिक संरचना से जुड़ी असमानताएँ (UPSC 2024)
- भूमि-स्वामित्व असमानता — छोटे-सीमांत किसानों का बहुसंख्यक होना, बड़े किसानों के पास अधिक क्षेत्र।
- जातिगत असमानता — दलित-आदिवासियों में भूमिहीनता अधिक; भूमि उच्च-मध्यवर्ती जातियों के पास।
- लैंगिक असमानता — स्त्रियाँ श्रम में आगे, स्वामित्व में बहुत पीछे (बीना अग्रवाल — A Field of One's Own, 1994); हिंदू उत्तराधिकार संशोधन (2005) के बाद भी व्यवहार में कम हिस्सा।
- ऋण और बाज़ार असमानता — संस्थागत ऋण तक असमान पहुँच, साहूकार, बिचौलिये; मंडी तक पहुँच।
- श्रम असमानता — न्यूनतम मज़दूरी से कम, मौसमी बेरोज़गारी, बंधुआ मज़दूरी।
- क्षेत्रीय असमानता — सिंचित बनाम वर्षा-आधारित क्षेत्र।
- प्रौद्योगिकी और ज्ञान — मशीनीकरण, सूचना तक पहुँच।
- सामाजिक-राजनीतिक असमानता — पंचायत, सहकारी समितियों पर प्रभु जाति का नियंत्रण।
भूमि का कृषकों से गैर-कृषक स्वामियों को हस्तांतरण (UPSC 2025)
- प्रक्रियाएँ — (1) शहरीकरण — नगर-परिधि की भूमि अचल संपत्ति डेवलपर्स, निवेशकों को; (2) प्रवासी स्वामी — पंजाब के NRI परिवार, बिहार-उ.प्र. के प्रवासी परिवार भूमि रखते हैं पर खेती पट्टे पर देते हैं — "अनुपस्थित स्वामित्व"; (3) भूमि निवेश-संपत्ति के रूप में — वेतनभोगी, व्यापारी, राजनेता; (4) उल्टी काश्तकारी (reverse tenancy) — छोटे किसान बड़े किसानों को भूमि देते हैं; (5) औद्योगिक-अवसंरचना परियोजनाएँ — SEZ, लैंड पूलिंग।
- सामाजिक परिवर्तन — (1) छिपी और अनौपचारिक काश्तकारी — मौखिक पट्टे, काश्तकार को ऋण, बीमा, PM-KISAN लाभ से वंचना (लाभ स्वामी को); (2) कृषक का "भू-स्वामी" से "काश्तकार/मज़दूर" बनना — असुरक्षा; (3) भूमि की "कृषि-पहचान" से "वित्तीय-संपत्ति" बनना — कृषि निवेश में कमी; (4) ग्रामीण शक्ति-संरचना में परिवर्तन — नए अनुपस्थित अभिजात; (5) भूमि-विवाद और मुक़दमेबाज़ी; (6) प्रवासन-स्त्रीकरण का चक्र; (7) पर्यावरण — कृषि-भूमि का कंक्रीटीकरण।
- नीति — मॉडल कृषि भूमि पट्टा अधिनियम (NITI आयोग, 2016) — काश्तकारों की औपचारिक पहचान; भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण (DILRMP), स्वामित्व योजना।
ग्रामीण उद्योगों के पतन के कारक (UPSC 2025)
- (1) औपनिवेशिक विऔद्योगीकरण — मशीन-निर्मित ब्रिटिश वस्तुएँ; (2) फ़ैक्टरी-उत्पादन और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था — सस्ते प्लास्टिक, धातु, कपड़ा; (3) जजमानी व्यवस्था का क्षरण — गारंटीशुदा माँग समाप्त; (4) पूँजी, ऋण और तकनीक का अभाव; (5) बाज़ार और विपणन — बिचौलिये, ब्रांडिंग का अभाव; (6) कच्चे माल — वन-प्रतिबंध (बाँस, लकड़ी), महँगाई; (7) रुचि और उपभोग-परिवर्तन — शहरी फ़ैशन; (8) युवाओं का पलायन — कम आय, निम्न सामाजिक प्रतिष्ठा (जाति-आधारित व्यवसायों से दूरी); (9) वैश्वीकरण — चीनी आयात (खिलौने, दीये); (10) नीतिगत — लघु उद्योगों के आरक्षण का अंत (2015 तक)।
- पुनरुत्थान के प्रयास — KVIC (1956), ODOP (एक ज़िला एक उत्पाद — उ.प्र., 2018), GI टैग, PM विश्वकर्मा (2023), SFURTI क्लस्टर, ई-कॉमर्स (GeM, ONDC)।
बंधुआ मज़दूरी (UPSC 2024)
- अर्थ — ऋण या प्रथा के कारण बलपूर्वक, कम या बिना वेतन, आवागमन-स्वतंत्रता के बिना श्रम — प्रायः पीढ़ीगत।
- क़ानून — अनु. 23 (बलात् श्रम निषेध); बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम, 1976; बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984); पुनर्वास हेतु केंद्रीय योजना (2016 — ₹1-3 लाख सहायता); भारतीय न्याय संहिता के प्रावधान।
- निरंतरता के कारण — (1) ग़रीबी और ऋण-जाल — अग्रिम (peshgi) प्रणाली — ईंट भट्ठे, पत्थर खदानें, कृषि, कालीन, घरेलू काम; (2) जाति-संरचना — दलित-आदिवासी प्रवासी सर्वाधिक प्रभावित; (3) अंतर-राज्यीय प्रवासन — ठेकेदार, भाषा-अवरोध; (4) अनौपचारिक क्षेत्र और निरीक्षण का अभाव; (5) पहचान और अभियोजन में ढिलाई, ज़िला सतर्कता समितियाँ निष्क्रिय; (6) पुनर्वास में देरी — फिर से बंधन; (7) सामाजिक स्वीकृति — "परंपरा" के रूप में; (8) मानव तस्करी।
- पैमाना — Walk Free के ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स (2023) में भारत में लगभग 1.1 करोड़ लोग "आधुनिक दासता" (बलात् श्रम + बलात् विवाह) में आँके गए — अनुमान, सरकारी आँकड़े नहीं।
4. जाति व्यवस्था

जाति पर दृष्टिकोण
| विचारक | दृष्टिकोण | मुख्य विचार |
|---|---|---|
| जी.एस. घुर्ये (1932) | भारतविद्या-ऐतिहासिक | 6 विशेषताएँ; प्रजातीय-ब्राह्मणवादी उत्पत्ति |
| एम.एन. श्रीनिवास | संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक, क्षेत्र-दृष्टि | संस्कृतीकरण, प्रभु जाति (संख्या, आर्थिक, राजनीतिक शक्ति, अनुष्ठानिक स्थिति), वोट बैंक |
| लुई ड्यूमों (1966) | संरचनावादी | शुद्धता-अशुद्धता; पदानुक्रम = "समावेश" (encompassment); प्रस्थिति (ब्राह्मण) बनाम सत्ता (राजा) |
| आंद्रे बेते (1965) | वेबेरियन | जाति, वर्ग, सत्ता — संगति से विसरण |
| एफ़.जी. बेली | लेन-देन/संघर्ष | बाज़ार और भूमि से गतिशीलता; "बंद स्तरीकरण" |
| अंबेडकर (1916, 1936) | आलोचनात्मक | अंतर्विवाह का अनुकरण; "श्रमिकों का विभाजन", "श्रेणीबद्ध असमानता" |
| गेराल्ड बेरेमैन | तुलनात्मक | जाति और नस्ल में समानता |
| दीपांकर गुप्ता (2000) | उत्तर-संरचनात्मक | बहुल पदानुक्रम, जाति का "क्षैतिजीकरण" |
भारत में जाति व्यवस्था के बने रहने के कारक (UPSC 2024)
- (1) अंतर्विवाह — जाति-सीमाओं का मूल संरक्षक (~95% विवाह जाति के भीतर); (2) राजनीति — "वोट बैंक", जातिगत दल, टिकट-वितरण; (3) आरक्षण — जाति-पहचान का संस्थागत महत्व (विरोधाभास); (4) आर्थिक नेटवर्क — व्यवसाय, ऋण, नौकरी में जाति-आधारित "सामाजिक पूँजी" (मारवाड़ी, पटेल नेटवर्क); (5) धार्मिक-सांस्कृतिक वैधता — कर्म, शुद्धता के विचार; (6) आवासीय पृथक्करण — गाँव के "टोले", शहरों में भी; (7) भूमि-स्वामित्व असमानता; (8) पहचान और गर्व — जाति संघ, सोशल मीडिया; (9) सम्मान और नियंत्रण — स्त्रियों की यौनिकता पर नियंत्रण, सम्मान-हत्या; (10) नए मंच — वैवाहिक वेबसाइटें, जाति-आधारित सोशल मीडिया समूह।
- परिवर्तन के साथ निरंतरता — अनुष्ठानिक पदानुक्रम कमज़ोर, पर पहचान और हित-समूह के रूप में जाति सशक्त — "जाति का आधुनिक रूप"।
अस्पृश्यता: आज भी प्रचलित रूप (UPSC 2024)
- क़ानून — अनु. 17; अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955 — 1976 में नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम; SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 (2015, 2018 संशोधन); हाथ से मैला उठाने वालों का नियोजन प्रतिषेध अधिनियम 2013।
- अध्ययन — घनश्याम शाह, हर्ष मंदर, सुखदेव थोराट, सतीश देशपांडे, अमिता बाविस्कर — "Untouchability in Rural India" (2006, 11 राज्यों के 565 गाँव); नवसर्जन ट्रस्ट का गुजरात अध्ययन (2010, 1,589 गाँव — 98 प्रकार की अस्पृश्यता); IHDS-II (2011-12) — लगभग 27% परिवारों ने किसी रूप में अस्पृश्यता मानने की बात स्वीकारी (थोराट और जोशी, 2015)।
- प्रचलित रूप — (1) धार्मिक — मंदिर-प्रवेश निषेध, अलग पूजा-स्थल, धार्मिक जुलूसों में भेदभाव; (2) जल-स्रोत — अलग कुएँ, हैंडपंप, तालाब; (3) भोजन और बर्तन — ढाबों पर "दो-गिलास प्रथा", अलग बर्तन, मध्याह्न भोजन में अलग बैठाना या दलित रसोइयों का बहिष्कार; (4) सेवाएँ — नाई, धोबी, दुकानों पर सेवा से इनकार; (5) आवास — अलग बस्तियाँ, शहरों में किराये पर मकान से इनकार; (6) सामाजिक — दलित दूल्हे के घोड़ी चढ़ने पर हिंसा, विवाह-भोज में भेदभाव; (7) शवदाह — अलग श्मशान; (8) व्यावसायिक — हाथ से मैला उठाना, सीवर सफ़ाई में मौतें; (9) शैक्षिक — कक्षा में अलग बैठाना, उच्च शिक्षा में भेदभाव; (10) डिजिटल — ऑनलाइन जातिवादी अपमान; "छिपी रंगभेद नीति" (hidden apartheid)।
जातीय संघर्षों की रोकथाम के उपाय (UPSC 2025)
- (1) क़ानून का कठोर क्रियान्वयन — अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत विशेष न्यायालय, समयबद्ध जाँच, गवाह-सुरक्षा; (2) भूमि सुधार और भूमिहीनों को भूमि — आर्थिक निर्भरता घटाना; (3) शिक्षा — समावेशी पाठ्यक्रम, भेदभाव-विरोधी प्रकोष्ठ (रोहित वेमुला प्रकरण, 2016 के बाद उच्च शिक्षा में बहस); (4) अंतर्जातीय विवाह प्रोत्साहन और सुरक्षा (शक्ति वाहिनी, 2018 — सम्मान-हत्या रोकने के दिशानिर्देश); (5) पुलिस-प्रशासन में संवेदनशीलता और प्रतिनिधित्व; (6) स्थानीय शांति समितियाँ और अंतर-जातीय संवाद; (7) सोशल मीडिया पर घृणा-भाषण की निगरानी; (8) आर्थिक अवसर — गैर-कृषि रोज़गार, उद्यमिता (DICCI); (9) आरक्षण का युक्तिकरण — उप-वर्गीकरण (सर्वोच्च न्यायालय, अगस्त 2024 — SC/ST में उप-वर्गीकरण वैध, पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह); (10) राजनीतिक संस्कृति — जाति-आधारित लामबंदी पर नैतिक अंकुश; (11) नागरिक समाज और मीडिया।
- औचित्य — जातीय संघर्ष के मूल में भौतिक असमानता + प्रस्थिति-अपमान + राजनीतिक प्रतिस्पर्धा; अतः केवल क़ानून नहीं, आर्थिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक — तीनों स्तरों पर उपाय।
5. Master Summary Table
| विषय | मुख्य विचारक / तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| ग्राम अध्ययन | मान 1917; स्लेटर 1918; श्रीनिवास, दुबे, मैरियट (1955); बेते 1965; बेली 1957; लुईस 1958 | रामपुरा, शमीरपेट, किशनगढ़ी, श्रीपुरम, बिसीपाड़ा |
| कृषक वर्ग | बेते 1974; थॉर्नर 1956; पटनायक | स्वामित्व-नियंत्रण-उपयोग; मालिक-किसान-मज़दूर |
| भूमि सुधार | ज़मींदारी उन्मूलन; ऑपरेशन बर्गा 1978; भूदान 1951 | 86% लघु-सीमांत जोतें |
| परिवर्तन | हरित क्रांति; मध्यवर्ती जातियाँ; स्त्रीकरण; कृषि क़ानून 2020-21 | अधूरा पूँजीवादी रूपांतरण |
| भूमि हस्तांतरण | अनुपस्थित स्वामित्व; उल्टी काश्तकारी; मॉडल पट्टा अधिनियम 2016 | छिपी काश्तकारी |
| बंधुआ मज़दूरी | अनु. 23; 1976 अधिनियम; बंधुआ मुक्ति मोर्चा 1984 | पेशगी, ईंट भट्ठे |
| जाति | घुर्ये, श्रीनिवास, ड्यूमों, बेते, बेली, अंबेडकर, गुप्ता | निरंतरता के 10 कारक |
| अस्पृश्यता | अनु. 17; PCR 1955/1976; PoA 1989; शाह और साथी 2006; नवसर्जन 2010; IHDS-II | 10 रूप |
6. चार्ट: थॉर्नर का कृषक वर्ग-वर्गीकरण
7. Mind Map
- छोटा गणराज्य
- ग्राम अध्ययन
- ग्रामीण उद्योग
- बेते, थॉर्नर
- भूमि सुधार
- हरित क्रांति
- भूमि, जाति, लिंग
- बंधुआ मज़दूरी
- भूमि हस्तांतरण
- 4 दृष्टिकोण
- निरंतरता
- संघर्ष-रोकथाम
- क़ानून
- अध्ययन
- 10 रूप
8. महत्वपूर्ण One-liners
- "Land and Labour in a Deccan Village" (1917) — हेरोल्ड मान; "Some South Indian Villages" (1918) — गिल्बर्ट स्लेटर।
- "Indian Village" (1955, शमीरपेट) — एस.सी. दुबे; "India's Villages" (1955) — श्रीनिवास (सं.)।
- "Studies in Agrarian Social Structure" (1974) — आंद्रे बेते।
- "The Agrarian Prospect in India" (1956), मालिक-किसान-मज़दूर — डैनियल थॉर्नर।
- "A Field of One's Own" (1994) — बीना अग्रवाल।
- ऑपरेशन बर्गा — प. बंगाल, 1978; भूदान — विनोबा भावे, 1951।
- बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम — 1976।
- "Untouchability in Rural India" (2006) — शाह, मंदर, थोराट, देशपांडे, बाविस्कर।
- SC/ST में उप-वर्गीकरण वैध — सर्वोच्च न्यायालय, अगस्त 2024।
- KVIC — 1956; ODOP — उत्तर प्रदेश, 2018।
9. टिप्स एवं ट्रिक्स
- हर उत्तर में एक ग्राम अध्ययन (रामपुरा, श्रीपुरम) + एक क़ानून + एक आँकड़ा (कृषि जनगणना, IHDS)।
- "Discuss with illustrations" — कम से कम 4-5 ठोस उदाहरण।
- उपाय-प्रश्नों में क़ानूनी + आर्थिक + शैक्षिक + राजनीतिक + सांस्कृतिक — पाँच स्तर।
बेते का आधार — "स्वामित्व-नियंत्रण-उपयोग (SNU)"; श्रीनिवास की प्रभु जाति — "संख्या-धन-सत्ता-अनुष्ठान"।
10. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
आंद्रे बेते के अनुसार भारत में कृषक वर्ग-संरचना के आधार क्या हैं? विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: बेते (Caste, Class and Power, 1965; Studies in Agrarian Social Structure, 1974) — कृषक संरचना का वेबेरियन, बहुआयामी विश्लेषण।
आधार: भूमि के स्वामित्व, नियंत्रण और उपयोग के संबंध → भूस्वामी (गैर-कृषक/कृषक), काश्तकार/बटाईदार, कृषि-मज़दूर।
विश्लेषण: (1) उत्पादन-संबंध, न कि केवल भूमि का आकार; (2) जाति-वर्ग संबंध — तंजावुर में ब्राह्मण-गैर-ब्राह्मण-आदि-द्रविड़; संगति से विसरण; (3) क्षेत्रीय विविधता; (4) मार्क्सवादी द्विभाजन की सीमा; (5) सत्ता और प्रस्थिति का प्रभाव।
तुलना: थॉर्नर (मालिक-किसान-मज़दूर), पटनायक (श्रम-शोषण सूचकांक), उत्पादन पद्धति बहस।
समकालीन प्रासंगिकता: हरित क्रांति, मध्यवर्ती जातियों का उदय, अनुपस्थित स्वामित्व — बेते की बहुआयामी दृष्टि आज भी उपयोगी।
निष्कर्ष: बेते ने दिखाया कि भारत में कृषक वर्ग, जाति और सत्ता परस्पर गुँथे हैं पर समरूप नहीं — यही भारतीय ग्रामीण स्तरीकरण की जटिलता है।
भारत में ग्राम अध्ययनों का अग्रदूत किसे कहा जाता है? कुछ भारतीय समाजशास्त्रियों के ग्राम अध्ययनों में योगदान का सोदाहरण वर्णन कीजिए। उनके दृष्टिकोण एक-दूसरे से कैसे भिन्न हैं?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अग्रदूत: प्रारंभिक आर्थिक सर्वेक्षण — हेरोल्ड मान (1917), गिल्बर्ट स्लेटर (1918); समाजशास्त्रीय ग्राम अध्ययनों के अग्रदूत — एम.एन. श्रीनिवास (India's Villages, 1955; रामपुरा); एस.सी. दुबे का Indian Village (1955) — भारतीय द्वारा प्रथम पूर्ण मोनोग्राफ़।
योगदान (तालिका): श्रीनिवास (प्रभु जाति, संस्कृतीकरण), दुबे (बहु-विषयी, विकास-मूल्यांकन), मैरियट (सभ्यतागत, सार्वभौमीकरण), बेते (वेबेरियन स्तरीकरण), बेली (लेन-देन, आर्थिक सीमांत), लुईस (गुटबंदी), गफ़ (मार्क्सवादी)।
भिन्नताएँ: सैद्धांतिक ढाँचा (प्रकार्यवाद, सभ्यतागत, वेबेरियन, मार्क्सवादी); इकाई (ग्राम बनाम क्षेत्र-सभ्यता); केंद्र (संरचना बनाम परिवर्तन बनाम संघर्ष); अनुप्रयुक्त बनाम सैद्धांतिक।
आलोचना: ग्राम की स्वायत्तता का मिथक, उच्च-जातीय सूचनादाता, स्त्री-दलित आवाज़ का अभाव।
निष्कर्ष: 1950 के ग्राम अध्ययनों ने भारतीय समाजशास्त्र को अनुभवजन्य आधार दिया; उनकी विविधता भारतीय ग्राम की जटिलता का प्रतिबिंब है।
भारत में आज भी प्रचलित अस्पृश्यता के विभिन्न रूप कौन-से हैं? उपयुक्त उदाहरणों सहित विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: अनु. 17 और PCR/PoA क़ानूनों के बावजूद अस्पृश्यता बनी है — शाह और साथी (2006, 565 गाँव), नवसर्जन (2010, 98 रूप), IHDS-II (~27% परिवार)।
रूप: धार्मिक (मंदिर-प्रवेश), जल-स्रोत, भोजन-बर्तन (दो-गिलास, मध्याह्न भोजन), सेवाएँ (नाई, दुकान), आवास (टोले, शहरी किराया), सामाजिक (दलित दूल्हे की घोड़ी), शवदाह, व्यावसायिक (मैला उठाना, सीवर मौतें), शैक्षिक, डिजिटल।
कारण: शुद्धता-अशुद्धता की धारणा, आर्थिक निर्भरता, प्रभु जाति का वर्चस्व, क़ानून का कमज़ोर क्रियान्वयन।
उपाय: क़ानून, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता, जागरूकता, सामाजिक आंदोलन (दलित संगठन), मीडिया।
निष्कर्ष: अस्पृश्यता "खुले" से "छिपे" रूपों में बदली है — "छिपी रंगभेद नीति" से लड़ने के लिए सामाजिक चेतना और कठोर क़ानूनी क्रियान्वयन दोनों आवश्यक।
"आधुनिक शक्तियों के कारण कृषक वर्ग-संरचना में परिवर्तन हो रहे हैं।" आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
पारंपरिक संरचना: ज़मींदार-काश्तकार-मज़दूर; जाति-वर्ग संगति (बेते, थॉर्नर)।
आधुनिक शक्तियाँ और परिवर्तन: भूमि सुधार (ज़मींदारी उन्मूलन, ऑपरेशन बर्गा); हरित क्रांति (पूँजीवादी किसान, ध्रुवीकरण); मध्यवर्ती जातियों का उदय; गैर-कृषिकरण और बहु-व्यवसायी परिवार; प्रवासन और कृषि का स्त्रीकरण; बाज़ार-कॉरपोरेट और कृषि क़ानून बहस; अनुपस्थित स्वामित्व और उल्टी काश्तकारी; कृषि संकट।
आलोचनात्मक पक्ष: परिवर्तन असमान और क्षेत्र-विशिष्ट; दलितों में भूमिहीनता बनी; अर्ध-सामंती तत्व (बंधुआ मज़दूरी); स्त्रियों का स्वामित्व कम; जोतों का विखंडन — "कृषि का किसानीकरण" (छोटे किसानों की बहुलता), न कि पूर्ण पूँजीवादी रूपांतरण।
निष्कर्ष: कृषक वर्ग-संरचना बदल रही है, पर पुराने और नए तत्वों का मिश्रण — "अधूरा रूपांतरण"।
सरकार के प्रयासों के बावजूद भारत में बंधुआ मज़दूरी अब भी जारी है। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
प्रयास: अनु. 23; 1976 अधिनियम; बंधुआ मुक्ति मोर्चा (1984); 2016 पुनर्वास योजना; ज़िला सतर्कता समितियाँ।
जारी रहने के कारण: ग़रीबी-ऋण (पेशगी); जाति (दलित-आदिवासी); अंतर-राज्यीय प्रवासन और ठेकेदार; अनौपचारिक क्षेत्र (ईंट भट्ठे, खदानें); पहचान-अभियोजन में ढिलाई; पुनर्वास में देरी; सामाजिक स्वीकृति; तस्करी।
उपाय: सर्वेक्षण, समयबद्ध पुनर्वास, प्रवासी पंजीकरण (ई-श्रम), सामाजिक सुरक्षा, NGO-सहयोग।
"भूमि का कृषक से गैर-कृषक स्वामियों को हस्तांतरण भारतीय समाज में रूपांतरण ला रहा है।" उपयुक्त उदाहरण देकर अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
मॉडल उत्तर
प्रक्रियाएँ: शहरीकरण और अचल संपत्ति; प्रवासी/NRI स्वामी (पंजाब, बिहार); भूमि निवेश-संपत्ति; उल्टी काश्तकारी; परियोजनाएँ (SEZ, लैंड पूलिंग)।
रूपांतरण: छिपी काश्तकारी और लाभों से वंचना; कृषक का मज़दूर बनना; भूमि का वित्तीयकरण; नई ग्रामीण शक्ति-संरचना; विवाद; स्त्रीकरण; कृषि-भूमि का ह्रास।
नीति: मॉडल कृषि भूमि पट्टा अधिनियम (2016), भूमि अभिलेख डिजिटलीकरण।
आपके अनुसार भारत में जाति व्यवस्था के बने रहने के लिए कौन-से कारक उत्तरदायी हैं? स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर
कारक: अंतर्विवाह; राजनीति और वोट बैंक; आरक्षण (पहचान का संस्थाकरण); आर्थिक नेटवर्क; धार्मिक-सांस्कृतिक वैधता; आवासीय पृथक्करण; भूमि-असमानता; पहचान-गर्व और जाति संघ; सम्मान और स्त्री-नियंत्रण; डिजिटल वैवाहिक मंच।
स्वरूप-परिवर्तन: अनुष्ठानिक पदानुक्रम कमज़ोर, पर हित-समूह और पहचान के रूप में सशक्त (बेते, गुप्ता)।
निष्कर्ष: जाति आधुनिक संस्थाओं (लोकतंत्र, बाज़ार) के भीतर स्वयं को पुनर्गठित कर टिकी है।
भारत में कृषक सामाजिक संरचना से जुड़ी असमानताओं के विभिन्न रूपों की पहचान कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: कृषक संरचना — भूमि, श्रम, पूँजी और सत्ता के संबंध (बेते, थॉर्नर)।
रूप: भूमि-स्वामित्व (86% लघु-सीमांत जोतें); जाति (दलित भूमिहीनता); लिंग (बीना अग्रवाल — स्वामित्व का अभाव); ऋण-बाज़ार; श्रम (कम मज़दूरी, बंधुआ); क्षेत्रीय (सिंचित बनाम वर्षा-आधारित); प्रौद्योगिकी-ज्ञान; सामाजिक-राजनीतिक (पंचायत-सहकारिता पर प्रभु जाति)।
स्रोत: औपनिवेशिक भू-राजस्व, अधूरे भूमि सुधार, हरित क्रांति की असमानता, जाति-पितृसत्ता।
उपाय: भूमि-पुनर्वितरण, स्त्री भूमि-अधिकार, काश्तकार पहचान, FPO, सार्वभौमिक ऋण-पहुँच।
निष्कर्ष: कृषक असमानता बहुआयामी है — इसे केवल आर्थिक नहीं, जाति-लिंग-सत्ता के अंतर्संबंध के रूप में समझना आवश्यक।
11. Quick Revision Summary
- ग्राम — मेटकाफ़, मार्क्स, गांधी-अंबेडकर; ग्राम अध्ययन (मान, स्लेटर, श्रीनिवास, दुबे, मैरियट, बेते, बेली, लुईस, गफ़) और आलोचना; ग्रामीण उद्योगों का पतन (10 कारक)।
- कृषक संरचना — बेते (SNU), थॉर्नर, पटनायक; भूमि सुधार; आधुनिक परिवर्तन (हरित क्रांति, मध्यवर्ती जातियाँ, स्त्रीकरण); असमानताओं के 8 रूप; भूमि हस्तांतरण; बंधुआ मज़दूरी।
- जाति — घुर्ये, श्रीनिवास, ड्यूमों, बेते, बेली, अंबेडकर, गुप्ता; निरंतरता के 10 कारक; अस्पृश्यता (क़ानून, अध्ययन, 10 रूप); संघर्ष-रोकथाम के 11 उपाय।