1. अध्याय एक नज़र में
Paper I का भाग 10 — आधुनिक समाज में सामाजिक परिवर्तन — परिवर्तन के समाजशास्त्रीय सिद्धांत, विकास और निर्भरता, परिवर्तन के कारक, शिक्षा और परिवर्तन, विज्ञान-प्रौद्योगिकी और परिवर्तन, सामाजिक आंदोलन तथा हिंसा को समेटता है। 2024 में परिवर्तन के सिद्धांत और एकरेखीय सिद्धांत की सीमाएँ, वॉलरस्टीन का विश्व-व्यवस्था सिद्धांत, सामाजिक आंदोलनों में सोशल मीडिया, बहुसांस्कृतिक समाज, और ऑनलाइन शिक्षा पूछे गए; 2025 में शिक्षा-कौशल विकास, डिजिटल युग के सामाजिक आंदोलन, सतत विकास लक्ष्य (2015), तथा NGO और स्वयं सहायता समूहों की भूमिका।
2. सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत (UPSC 2024)
| सिद्धांत | विचारक | मुख्य विचार |
|---|---|---|
| शास्त्रीय विकासवादी (एकरेखीय) | कॉम्ट (तीन अवस्थाएँ), स्पेंसर (सैन्य → औद्योगिक; "survival of the fittest", 1864), मॉर्गन, दुर्खीम (यांत्रिक → सावयवी) | सभी समाज एक ही क्रम से सरल से जटिल की ओर; प्रगति अनिवार्य |
| चक्रीय | इब्न ख़ल्दून; ओस्वाल्ड स्पेंगलर (The Decline of the West, 1918 — सभ्यताएँ जन्म-विकास-पतन); आर्नोल्ड टॉयनबी (A Study of History — "चुनौती और प्रत्युत्तर", "सृजनात्मक अल्पसंख्यक"); पितिरिम सोरोकिन (Social and Cultural Dynamics, 1937 — भावात्मक/ideational, संवेदी/sensate, आदर्शवादी/idealistic संस्कृतियाँ); पैरेटो (अभिजात परिसंचरण) | परिवर्तन दोहराव वाला, उत्थान-पतन के चक्र |
| संघर्ष | मार्क्स (वर्ग-संघर्ष, द्वंद्व); राल्फ़ डेहरेनडॉर्फ़ (सत्ता-संघर्ष, 1959); लुईस कोज़र (The Functions of Social Conflict, 1956 — संघर्ष भी प्रकार्यात्मक) | परिवर्तन का स्रोत आंतरिक विरोधाभास और संघर्ष |
| प्रकार्यवादी / नव-विकासवादी | पार्सन्स ("Evolutionary Universals", 1964 — विभेदीकरण, अनुकूली उन्नयन, समावेशन, मूल्य-सामान्यीकरण); स्मेलसर (संरचनात्मक विभेदीकरण) | "गतिशील संतुलन"; धीमा, अनुकूली परिवर्तन |
| बहुरेखीय | जूलियन स्टीवर्ड; सहलिन्स-सर्विस (सामान्य/विशिष्ट विकास) | अनेक मार्ग, पर्यावरण के अनुसार |
| आधुनिकीकरण | डब्ल्यू.डब्ल्यू. रोस्टोव (The Stages of Economic Growth, 1960 — पारंपरिक समाज, उड़ान की पूर्व-शर्तें, उड़ान/take-off, परिपक्वता की ओर, उच्च जन-उपभोग); डेनियल लर्नर (1958); एलेक्स इंकेल्स (Becoming Modern, 1974 — "आधुनिक मनुष्य") | गरीब देश पश्चिम का अनुसरण करके विकसित होंगे; परंपरा बाधा |
| निर्भरता | राउल प्रेबिश; आंद्रे गुंडर फ़्रैंक ("अल्पविकास का विकास", 1966 — महानगर-उपग्रह); कार्डोसो-फ़लेत्तो ("आश्रित विकास", 1979); समीर अमीन | अल्पविकास पिछड़ेपन से नहीं, विश्व-पूँजीवाद में शोषणकारी जुड़ाव से |
| विश्व-व्यवस्था | इमैनुअल वॉलरस्टीन (1974) | नीचे विस्तार |
| वैश्वीकरण / बहुल आधुनिकताएँ | गिडेंस (समय-स्थान का संकुचन), अप्पादुरै, आइज़ेनस्टाट (2000) | अनेक रास्तों से आधुनिकता |
एकरेखीय सिद्धांत की सीमाएँ
- (1) नृजातिकेंद्रवाद और यूरोकेंद्रीयता — पश्चिमी समाज को "शिखर" मानना; (2) अनुभवजन्य साक्ष्य का अभाव — "आरामकुर्सी" अनुमान (बोआस की आलोचना); (3) प्रसार और संपर्क की उपेक्षा — समाज अवस्थाएँ "छलाँग" (leapfrog) कर सकते हैं (भारत में लैंडलाइन के बिना सीधे मोबाइल); (4) नियतिवाद और लक्ष्यवाद (teleology) — इतिहास का "पूर्वनिर्धारित" अंत; (5) प्रतिगमन — परिवर्तन उलट भी सकता है (ईरान 1979, सभ्यताओं का पतन); (6) बहुल मार्ग — जापान, चीन, भारत की आधुनिकताएँ भिन्न; (7) आंतरिक विविधता — एक ही समाज में पारंपरिक और आधुनिक साथ; (8) उपनिवेशवाद को वैधता — "सभ्य बनाने का मिशन"; (9) मूल्य-निर्णय — "सरल" और "पिछड़ा" अपमानजनक।
वॉलरस्टीन का विश्व-व्यवस्था सिद्धांत (UPSC 2024)
- कृति — The Modern World-System (खंड 1, 1974); विश्लेषण की इकाई "राष्ट्र-राज्य" नहीं, "विश्व-व्यवस्था"।
- मुख्य विचार — 16वीं सदी ("दीर्घ सोलहवीं सदी") से एक पूँजीवादी विश्व-अर्थव्यवस्था (world-economy) — एक श्रम-विभाजन, अनेक राजनीतिक इकाइयाँ; तीन क्षेत्र — केंद्र (core) (उच्च-मूल्य, पूँजी-प्रधान, कुशल श्रम, सशक्त राज्य), परिधि (periphery) (कच्चा माल, सस्ता/बलात् श्रम, कमज़ोर राज्य), अर्ध-परिधि (semi-periphery) (मध्यवर्ती — "बफ़र", राजनीतिक स्थिरता, गतिशीलता संभव); असमान विनिमय से अधिशेष परिधि से केंद्र की ओर; प्रभुत्व-चक्र — डच (17वीं), ब्रिटिश (19वीं), अमेरिकी (20वीं सदी); कोंद्रातिएफ़ चक्र (आर्थिक उतार-चढ़ाव); व्यवस्था का "संरचनात्मक संकट"।
- विकास और निर्भरता के संदर्भ में — (1) विकास/अल्पविकास एक ही प्रक्रिया के दो पहलू — परिधि का अल्पविकास केंद्र के विकास का परिणाम; (2) देशों की स्थिति "जड़" नहीं — अर्ध-परिधि से ऊपर उठना संभव (दक्षिण कोरिया, ताइवान, चीन); (3) भारत — औपनिवेशिक काल में परिधि (कच्चा कपास निर्यात, विऔद्योगीकरण — दादाभाई नौरोजी का "धन-निष्कासन"), आज अर्ध-परिधि (IT सेवाएँ, विनिर्माण की ओर); (4) बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, वैश्विक मूल्य-शृंखलाएँ — केंद्र-परिधि संबंध का नया रूप।
- आलोचना — (1) आर्थिक निर्धारणवाद — संस्कृति, राज्य और स्थानीय एजेंसी की उपेक्षा (थेडा स्कॉकपोल); (2) पूर्वी एशियाई विकास — "विकासात्मक राज्य" ने परिधि से उठना संभव बनाया; (3) "केंद्र-परिधि" का मापन अस्पष्ट; (4) पूँजीवाद का प्रारंभ — रॉबर्ट ब्रेनर: उत्पादन-संबंधों (कृषि वर्ग-संरचना) को व्यापार से अधिक महत्व; (5) आंद्रे गुंडर फ़्रैंक (ReORIENT, 1998) — 1800 से पहले विश्व-अर्थव्यवस्था का केंद्र एशिया (चीन-भारत); (6) उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना — "पश्चिम" को ही इतिहास का कर्ता मानना।
- मूल्यांकन — वैश्विक असमानता, "ग्लोबल साउथ", व्यापार-युद्ध और आपूर्ति-शृंखला राजनीति को समझने में आज भी उपयोगी।
3. सामाजिक परिवर्तन के कारक
- भौतिक-जनांकिकीय — पर्यावरण, जनसंख्या; आर्थिक — उत्पादन पद्धति; प्रौद्योगिकीय — ऑगबर्न, मैकलुहान; सांस्कृतिक-वैचारिक — वेबर, धर्म, विचारधाराएँ; राजनीतिक — राज्य, क़ानून, नीति (भूमि सुधार); सामाजिक आंदोलन; शिक्षा; मीडिया; वैश्वीकरण।
विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सामाजिक परिवर्तन; ऑनलाइन शिक्षा (UPSC 2024)
- सैद्धांतिक दृष्टियाँ — प्रौद्योगिकीय निर्धारणवाद — ऑगबर्न (सांस्कृतिक विलंब, 1922), मार्शल मैकलुहान (Understanding Media, 1964 — "माध्यम ही संदेश है", "वैश्विक ग्राम"); प्रौद्योगिकी का सामाजिक निर्माण (SCOT) — पिंच और बिजकर (1984): समाज तय करता है कि प्रौद्योगिकी कैसे विकसित और प्रयुक्त हो; नेटवर्क समाज — मैनुअल कास्टेल्स (The Rise of the Network Society, 1996); मर्टन — विज्ञान का सामाजिक लोकाचार।
- भूमिकाएँ — उत्पादन (औद्योगिक/हरित/सूचना क्रांतियाँ), संचार और गतिशीलता, स्वास्थ्य-जनांकिकी (टीके, गर्भनिरोधक → प्रजनन दर में गिरावट), परिवार और लिंग-भूमिकाएँ, शासन (DBT, आधार), संस्कृति (वैश्विक मीडिया), नई असमानताएँ (डिजिटल विभाजन), नैतिक संकट (निगरानी, जीन-संपादन)।
- ऑनलाइन शिक्षा — बढ़ती प्रवृत्ति — SWAYAM (2017, MOOC), DIKSHA (2017), PM eVidya (2020), स्वयं प्रभा DTH चैनल; COVID-19 में विद्यालयों-विश्वविद्यालयों का ऑनलाइन स्थानांतरण; एड-टेक उद्योग; NEP 2020 में मिश्रित (blended) शिक्षा।
- मेरा मत (संतुलित) — लाभ: पहुँच (दूरस्थ क्षेत्र, कामकाजी, स्त्रियाँ), लचीलापन, कम लागत, बहुभाषी सामग्री, आजीवन सीखना; चुनौतियाँ: डिजिटल विभाजन (NSS 75वाँ दौर 2017-18 — केवल लगभग 24% परिवारों के पास इंटरनेट; ग्रामीण-स्त्री-दलित-आदिवासी बच्चे पीछे), "सीखने की हानि" (learning loss — ASER रिपोर्टें), सामाजिकता और मूल्य-शिक्षा का अभाव (दुर्खीम — विद्यालय समाजीकरण का स्थल), स्क्रीन-थकान, गुणवत्ता और प्रमाणन, एड-टेक का बाज़ारीकरण और उपभोक्ता शोषण, शिक्षकों की भूमिका का ह्रास; अतः ऑनलाइन शिक्षा कक्षा का पूरक हो सकती है, विकल्प नहीं — "मिश्रित मॉडल" और डिजिटल अवसंरचना (भारतनेट) के साथ।
4. शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन
| दृष्टिकोण | विचारक | शिक्षा की भूमिका |
|---|---|---|
| प्रकार्यवादी | दुर्खीम (Education and Sociology), पार्सन्स, डेविस-मूर | समाजीकरण, नैतिक एकता, सार्वभौमिक मूल्य, योग्यता-आधारित भूमिका-आवंटन |
| मार्क्सवादी | बाउल्स और गिंटिस (Schooling in Capitalist America, 1976 — "पत्राचार सिद्धांत"); अल्थूसर (विचारधारात्मक राज्य तंत्र) | पूँजीवादी श्रम-अनुशासन और असमानता का पुनरुत्पादन |
| सांस्कृतिक पुनरुत्पादन | बोर्दियो (Reproduction, 1970 — सांस्कृतिक पूँजी) | अभिजात रुचि-भाषा को "योग्यता" के रूप में पुरस्कृत करना |
| आलोचनात्मक/मुक्तिदायी | पाउलो फ़्रेरे (Pedagogy of the Oppressed, 1968 — "बैंकिंग शिक्षा" बनाम "चेतना-जागरण"); इवान इलिच (Deschooling Society, 1971) | शोषितों की चेतना और मुक्ति |
| प्रमाण-पत्रवाद | रैंडल कॉलिन्स (The Credential Society, 1979); रोनाल्ड डोर (The Diploma Disease, 1976) | डिग्री की "मुद्रास्फीति", कौशल के बिना प्रमाण-पत्र |
| भारतीय | फुले, अंबेडकर ("शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो"), गांधी (नई तालीम) | सामाजिक मुक्ति, आत्मनिर्भरता |
शिक्षा और कौशल विकास: परिवर्तन के कारक के रूप में (UPSC 2025)
- परिवर्तन का कारक — (1) सामाजिक गतिशीलता — दलित-पिछड़े वर्गों का उत्थान (आरक्षण + शिक्षा); (2) स्त्री सशक्तिकरण — स्त्री शिक्षा से विवाह-आयु, प्रजनन दर, शिशु-मृत्यु में गिरावट (केरल); (3) आधुनिक मूल्य — तर्कशीलता, लोकतंत्र, समानता; (4) आर्थिक विकास — मानव पूँजी (शुल्ट्ज़, बेकर), जनांकिकीय लाभांश; (5) कौशल विकास — Skill India मिशन (2015), PMKVY, ITI, NEP 2020 में व्यावसायिक शिक्षा का समावेश (कक्षा 6 से), PM विश्वकर्मा।
- सीमाएँ ("आलोचनात्मक विश्लेषण") — (1) शिक्षा असमानता का पुनरुत्पादन भी करती है (बोर्दियो, बाउल्स-गिंटिस) — निजी-सरकारी, अंग्रेज़ी-हिंदी माध्यम का विभाजन; (2) शिक्षित बेरोज़गारी — PLFS में शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी दर अधिक; (3) कौशल-रोज़गार असंगति — प्रशिक्षितों का कम प्लेसमेंट; (4) प्रमाण-पत्रवाद; (5) सीखने का संकट — ASER: कक्षा 5 के अनेक बच्चे कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाते; (6) संरचनात्मक बाधाएँ — जाति, लिंग, ग़रीबी के बिना हल किए शिक्षा अकेली पर्याप्त नहीं; (7) "शिक्षा ही सर्व-रोग निवारक" का मिथक — भूमि सुधार, स्वास्थ्य, रोज़गार सृजन भी आवश्यक।
- निष्कर्ष — शिक्षा और कौशल "आवश्यक पर पर्याप्त नहीं" — जब वे समतापूर्ण, गुणवत्तापूर्ण और रोज़गार-सृजन से जुड़े हों तभी परिवर्तनकारी।
5. सामाजिक आंदोलन
- परिभाषा — सामाजिक परिवर्तन लाने या रोकने के लिए अपेक्षाकृत संगठित, निरंतर सामूहिक प्रयास (हर्बर्ट ब्लूमर; चार्ल्स टिली — "विवादात्मक राजनीति")।
- प्रकार (डेविड एबरले, 1966) — परिवर्तनकारी (transformative) — पूरे समाज का क्रांतिकारी परिवर्तन; सुधारवादी — आंशिक; उद्धारक (redemptive) — व्यक्ति का पूर्ण परिवर्तन; वैकल्पिक — व्यक्ति का आंशिक परिवर्तन।
| सिद्धांत | विचारक | मुख्य विचार |
|---|---|---|
| सामूहिक व्यवहार / मूल्य-संवर्धित | नील स्मेलसर (Theory of Collective Behavior, 1962) | छह निर्धारक — संरचनात्मक अनुकूलता, तनाव, सामान्यीकृत विश्वास, प्रेरक घटना, लामबंदी, सामाजिक नियंत्रण |
| सापेक्ष वंचना | टेड गर (Why Men Rebel, 1970) | अपेक्षाओं और उपलब्धियों का अंतर |
| संसाधन लामबंदी | मैक्कार्थी और ज़ाल्ड (1977) | असंतोष हमेशा होता है — आंदोलन तब जब संसाधन (धन, नेतृत्व, संगठन) जुटें |
| राजनीतिक अवसर संरचना | टिली, सिडनी टैरो, डग मैकएडम | राज्य की खुलापन/दमन, अभिजात विभाजन |
| नए सामाजिक आंदोलन | एलेन टूरेन, अल्बर्टो मेलुची, क्लॉस ऑफ़े, हैबरमास | उत्तर-भौतिकवादी मुद्दे — पहचान, पर्यावरण, लिंग, शांति; मध्य वर्ग; विकेंद्रीकृत |
| फ़्रेमिंग | स्नो और बेनफ़ोर्ड | समस्या की व्याख्या, समाधान और प्रेरणा के "फ़्रेम" |
सोशल मीडिया और डिजिटल युग के आंदोलन (UPSC 2024, 2025)
- भूमिका — (1) सूचना प्रसार और "द्वारपाल" (मुख्यधारा मीडिया) को दरकिनार करना; (2) तीव्र लामबंदी — कम लागत, विकेंद्रीकृत संगठन; (3) "संयोजक क्रिया" (connective action) — बेनेट और सेगरबर्ग (2012): संगठनों के बिना व्यक्तिगत "फ़्रेम" से जुड़ाव (#हैशटैग); (4) कास्टेल्स (Networks of Outrage and Hope, 2012) — इंटरनेट से "स्वायत्त संचार" और "आक्रोश-आशा" के नेटवर्क; (5) वैश्विक एकजुटता और प्रवासी समर्थन; (6) हाशिये की आवाज़ — दलित, स्त्री, आदिवासी कार्यकर्ताओं की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति; (7) दस्तावेज़ीकरण — पुलिस हिंसा के वीडियो, जवाबदेही।
- उदाहरण — अरब स्प्रिंग (2010-11), ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट (2011), #MeToo (2017 — "Me Too" वाक्यांश तराना बर्क, 2006), #BlackLivesMatter; भारत — अण्णा हज़ारे का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन (2011), निर्भया आंदोलन (2012), #MeTooIndia (2018), किसान आंदोलन (2020-21 — "ट्रॉली टाइम्स", सोशल मीडिया प्रकोष्ठ), CAA-विरोध (2019-20)।
- चुनौतियाँ — (1) "स्लैक्टिविज़्म" — क्लिक-आधारित सतही भागीदारी (एवजेनी मोरोज़ोव, The Net Delusion, 2011); माल्कम ग्लैडवेल (2010) — "कमज़ोर संबंध" जोखिम भरी क्रिया के लिए अपर्याप्त; (2) ज़ेनेप तुफ़ेकी (Twitter and Tear Gas, 2017) — तीव्र लामबंदी पर कमज़ोर संगठनात्मक क्षमता ("tactical freeze"), दीर्घकालिक रणनीति का अभाव; (3) ग़लत सूचना और ध्रुवीकरण, प्रतिध्वनि कक्ष, ट्रोलिंग; (4) राज्य निगरानी और दमन — इंटरनेट बंदी (भारत में विश्व में सर्वाधिक इंटरनेट बंदियों के मामले — Access Now रिपोर्टें), स्पाइवेयर, IT नियम; (5) एल्गोरिदमिक नियंत्रण — प्लेटफ़ॉर्म की नीतियाँ दृश्यता तय करती हैं; (6) डिजिटल विभाजन — ग्रामीण और निर्धन बाहर; (7) नेतृत्वहीनता — वार्ता और जवाबदेही कठिन; (8) प्रति-आंदोलन और ऑनलाइन उत्पीड़न (स्त्री कार्यकर्ताओं पर)।
- महत्व का आकलन — सफल डिजिटल आंदोलन वे हैं जो ऑनलाइन लामबंदी को ऑफ़लाइन संगठन (किसान यूनियनें) से जोड़ते हैं; सोशल मीडिया "उत्प्रेरक" है, "प्रतिस्थापक" नहीं।
हिंसा और सामाजिक परिवर्तन
- क्रांतियाँ (स्कॉकपोल — States and Social Revolutions, 1979 — राज्य-संकट + कृषक विद्रोह), जॉर्ज सोरेल (Reflections on Violence, 1908), फ़्रैंट्ज़ फ़ैनन (The Wretched of the Earth, 1961 — उपनिवेशवाद-विरोधी हिंसा), गांधी (अहिंसा — सत्याग्रह); राज्य-हिंसा, संरचनात्मक हिंसा (योहान गाल्टुंग, 1969)।
6. बहुसांस्कृतिक समाज (UPSC 2024)
- बहुसंस्कृतिवाद — अनेक नृजातीय, भाषाई, धार्मिक समूहों की पहचान को मान्यता और सम्मान देना — "आत्मसात्करण" (melting pot) के स्थान पर "सलाद कटोरा/मोज़ेक" (कनाडा की बहुसांस्कृतिक नीति, 1971)।
- सैद्धांतिक आधार — चार्ल्स टेलर ("The Politics of Recognition", 1992) — पहचान के लिए मान्यता आवश्यक, "ग़लत मान्यता" (misrecognition) हानि पहुँचाती है; विल किमलिका (Multicultural Citizenship, 1995) — अल्पसंख्यक अधिकारों के तीन प्रकार: बहु-नृजातीय अधिकार (प्रवासियों के लिए सांस्कृतिक छूट), स्वशासन अधिकार (राष्ट्रीय अल्पसंख्यक — क्यूबेक), विशेष प्रतिनिधित्व अधिकार; भीखू पारेख (Rethinking Multiculturalism, 2000) — अंतर-सांस्कृतिक संवाद।
- समायोजन के उपाय — (1) नृजातीय — स्वायत्त परिषदें, आरक्षण, भेदभाव-विरोधी क़ानून; (2) भाषाई — आधिकारिक भाषाओं की बहुलता, मातृभाषा में शिक्षा; (3) धार्मिक — धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत क़ानून, धार्मिक अवकाश, अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान; (4) संघवाद और विकेंद्रीकरण; (5) सांस्कृतिक नीति — विविध त्योहारों, कलाओं को सार्वजनिक मान्यता।
- भारत — "विविधता में एकता" — अनु. 25-30 (धार्मिक और अल्पसंख्यक सांस्कृतिक-शैक्षिक अधिकार), आठवीं अनुसूची (22 भाषाएँ), भाषाई राज्य (राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956), त्रिभाषा सूत्र, पाँचवीं-छठी अनुसूची, अनु. 371 (विशेष प्रावधान), व्यक्तिगत क़ानून; के.एस. सिंह की People of India परियोजना — 4,635 समुदाय।
- प्रमुख चुनौतियाँ — (1) सांप्रदायिकता और बहुसंख्यकवाद; (2) भाषाई टकराव — हिंदी-विरोध, "भूमिपुत्र" आंदोलन, प्रवासी श्रमिकों के विरुद्ध हिंसा; (3) नृजातीय संघर्ष — पूर्वोत्तर (मणिपुर 2023); (4) समान नागरिक संहिता बनाम व्यक्तिगत क़ानून — उत्तराखंड UCC (2024); (5) व्यक्तिगत अधिकार बनाम समूह अधिकार — सूज़न ओकिन ("Is Multiculturalism Bad for Women?", 1999) — समूह-अधिकार स्त्रियों के उत्पीड़न को ढक सकते हैं; (6) सामाजिक एकता की चिंता — ब्रायन बैरी (Culture and Equality, 2001), "समानांतर समाज" (यूरोप में अंगेला मर्केल, 2010 — "बहुसंस्कृतिवाद पूरी तरह विफल"); (7) पहचान की राजनीति और ध्रुवीकरण; (8) आर्थिक असमानता — सांस्कृतिक मान्यता बनाम पुनर्वितरण (नैन्सी फ़्रेज़र)।
- निष्कर्ष — सफल बहुसांस्कृतिक समाज के लिए "मान्यता + पुनर्वितरण + साझा नागरिकता" — तीनों आवश्यक; भारत का संविधान "अंतर के साथ समानता" का मॉडल प्रस्तुत करता है।
7. विकास, सतत विकास और नागरिक समाज
सतत विकास और SDG (UPSC 2025)
- परिभाषा — ब्रंटलैंड आयोग (Our Common Future, 1987): "ऐसा विकास जो भविष्य की पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने की क्षमता से समझौता किए बिना वर्तमान की आवश्यकताएँ पूरी करे"; तीन स्तंभ — आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरणीय; रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992) — एजेंडा 21; सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (MDG, 2000-2015)।
- सतत विकास लक्ष्य (2030 एजेंडा) — सितंबर 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंगीकृत ("Transforming our world"); UNDP इसके क्रियान्वयन का प्रमुख सहायक; 17 लक्ष्य, 169 लक्ष्यांक; मार्गदर्शक सिद्धांत — सार्वभौमिकता (सभी देशों पर), "किसी को पीछे न छोड़ें" (leave no one behind), एकीकृत और अविभाज्य; 5 P — People (निर्धनता, भूख, स्वास्थ्य, शिक्षा, लैंगिक समानता — SDG 1-5), Planet (जल, जलवायु, महासागर, स्थल — SDG 6, 12-15), Prosperity (ऊर्जा, रोज़गार, उद्योग, असमानता, शहर — SDG 7-11), Peace (शांतिपूर्ण-न्यायपूर्ण संस्थाएँ — SDG 16), Partnership (वैश्विक साझेदारी — SDG 17)।
- भारत — NITI आयोग का SDG इंडिया इंडेक्स (2018 से; 2023-24 में समग्र अंक 71); राज्य-स्तरीय स्थानीयकरण; कार्यक्रम — स्वच्छ भारत, जल जीवन मिशन, उज्ज्वला, PM आवास, राष्ट्रीय सौर मिशन, पोषण अभियान।
- समाजशास्त्रीय आलोचना — "विकास" की पश्चिमी अवधारणा (आर्टुरो एस्कोबार — Encountering Development, 1995; वोल्फ़गैंग साक्स), "हरित विकास" से विस्थापन, उपभोग-असमानता (वैश्विक उत्तर बनाम दक्षिण), "जलवायु न्याय", लक्ष्य-सूचकों का "टिक-बॉक्स" दृष्टिकोण।
NGO और स्वयं सहायता समूह: ज़मीनी परिवर्तन (UPSC 2025)
- NGO — स्वैच्छिक, गैर-लाभकारी, ग़ैर-सरकारी संगठन; भूमिकाएँ — सेवा-वितरण (प्रथम — शिक्षा, ASER सर्वेक्षण), अधिकार-आधारित वकालत (MKSS — RTI, MGNREGA सामाजिक अंकेक्षण), क्षमता-निर्माण, जनमत-निर्माण, नवाचार (बेयरफ़ुट कॉलेज — सौर "दादियाँ"), आपदा-राहत।
- स्वयं सहायता समूह — 10-20 (प्रायः स्त्री) सदस्यों का बचत-ऋण समूह; NABARD का SHG-बैंक लिंकेज कार्यक्रम (1992); DAY-NRLM (2011, "आजीविका") — लगभग 10 करोड़ ग्रामीण स्त्रियाँ लगभग 90 लाख SHG में; मॉडल — कुडुम्बश्री (केरल, 1998), JEEViKA (बिहार, 2006), SEWA; "लखपति दीदी" लक्ष्य।
- ज़मीनी परिवर्तन में योगदान — (1) वित्तीय समावेशन — साहूकारों से मुक्ति; (2) स्त्री सशक्तिकरण — आय, आत्मविश्वास, गतिशीलता, घरेलू निर्णय में भूमिका, पंचायत नेतृत्व; (3) सामाजिक पूँजी (पुटनम) — विश्वास, सामूहिक क्रिया; (4) सामाजिक मुद्दे — शराबबंदी (बिहार 2016 में जीविका दीदियों की भूमिका), बाल विवाह-विरोध, स्वच्छता; (5) सेवा-वितरण — सामुदायिक रसोई, COVID में मास्क-निर्माण; (6) लोकतांत्रिक भागीदारी — ग्राम सभा।
- सीमाएँ — (1) "NGO-करण" — आंदोलनों का पेशेवरीकरण और अराजनीतिकरण (सोनिया अल्वारेज़); दाता-निर्भरता; जवाबदेही-पारदर्शिता का अभाव; FCRA प्रतिबंध; (2) SHG में अभिजात क़ब्ज़ा, सबसे ग़रीब का बहिष्करण, ऋण-जाल (आंध्र प्रदेश माइक्रोफ़ाइनेंस संकट, 2010), स्त्रियों पर दोहरा बोझ, पुरुषों द्वारा ऋण-नियंत्रण; (3) संरचनात्मक कारणों (भूमि, जाति) पर सीमित प्रभाव।
- निष्कर्ष — NGO और SHG "ग्राम-स्तरीय परिवर्तन के उत्प्रेरक" हैं — राज्य और बाज़ार के बीच सेतु; पर टिकाऊ परिवर्तन के लिए इन्हें अधिकार-आधारित राजनीति और सार्वजनिक सेवाओं से जोड़ना आवश्यक।
8. Master Summary Table
| विषय | मुख्य विचारक / तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| विकासवादी | कॉम्ट, स्पेंसर, मॉर्गन | एकरेखीय — 9 सीमाएँ |
| चक्रीय | स्पेंगलर 1918; टॉयनबी; सोरोकिन 1937 | चुनौती-प्रत्युत्तर; sensate-ideational |
| संघर्ष | मार्क्स; डेहरेनडॉर्फ़ 1959; कोज़र 1956 | संघर्ष के प्रकार्य |
| आधुनिकीकरण | रोस्टोव 1960 (5 चरण); इंकेल्स 1974 | take-off |
| निर्भरता | फ़्रैंक 1966; कार्डोसो-फ़लेत्तो 1979 | अल्पविकास का विकास |
| विश्व-व्यवस्था | वॉलरस्टीन 1974 | केंद्र, अर्ध-परिधि, परिधि |
| प्रौद्योगिकी | ऑगबर्न; मैकलुहान 1964; पिंच-बिजकर 1984; कास्टेल्स 1996 | निर्धारणवाद बनाम SCOT |
| शिक्षा | दुर्खीम; बाउल्स-गिंटिस 1976; बोर्दियो 1970; फ़्रेरे 1968; कॉलिन्स 1979 | पुनरुत्पादन बनाम मुक्ति |
| आंदोलन | स्मेलसर 1962; गर 1970; मैक्कार्थी-ज़ाल्ड 1977; टूरेन-मेलुची | NSM, संसाधन लामबंदी |
| डिजिटल आंदोलन | कास्टेल्स 2012; बेनेट-सेगरबर्ग 2012; तुफ़ेकी 2017; मोरोज़ोव 2011 | connective action, slacktivism |
| बहुसंस्कृतिवाद | टेलर 1992; किमलिका 1995; पारेख 2000; ओकिन 1999 | मान्यता + पुनर्वितरण |
| SDG | ब्रंटलैंड 1987; 2030 एजेंडा (2015): 17/169 | 5 P; SDG इंडिया इंडेक्स |
| NGO-SHG | NABARD 1992; DAY-NRLM 2011; कुडुम्बश्री 1998 | NGO-करण |
9. चार्ट: वॉलरस्टीन की विश्व-व्यवस्था
10. Mind Map
- विकासवादी, चक्रीय
- संघर्ष, प्रकार्यवादी
- आधुनिकीकरण-निर्भरता
- केंद्र-परिधि
- असमान विनिमय
- आलोचनाएँ
- पुनरुत्पादन बनाम मुक्ति
- कौशल विकास
- ऑनलाइन शिक्षा
- 5 सिद्धांत
- सोशल मीडिया
- हिंसा
- बहुसंस्कृतिवाद
- SDG (5 P)
- NGO, SHG
11. महत्वपूर्ण One-liners
- "The Decline of the West" (1918) — स्पेंगलर; "चुनौती और प्रत्युत्तर" — टॉयनबी; "Social and Cultural Dynamics" (1937) — सोरोकिन।
- "The Stages of Economic Growth" (1960) — रोस्टोव; "अल्पविकास का विकास" — आंद्रे गुंडर फ़्रैंक।
- "The Modern World-System" (1974) — वॉलरस्टीन।
- "The Functions of Social Conflict" (1956) — लुईस कोज़र।
- "Schooling in Capitalist America" (1976) — बाउल्स और गिंटिस; "Pedagogy of the Oppressed" (1968) — पाउलो फ़्रेरे।
- "माध्यम ही संदेश है" (1964) — मार्शल मैकलुहान।
- "Theory of Collective Behavior" (1962) — नील स्मेलसर; संसाधन लामबंदी (1977) — मैक्कार्थी और ज़ाल्ड।
- "Networks of Outrage and Hope" (2012) — मैनुअल कास्टेल्स; "Twitter and Tear Gas" (2017) — ज़ेनेप तुफ़ेकी।
- "Multicultural Citizenship" (1995) — विल किमलिका; "The Politics of Recognition" (1992) — चार्ल्स टेलर।
- "Our Common Future" (1987) — ब्रंटलैंड आयोग; SDG — 17 लक्ष्य, 169 लक्ष्यांक (सितंबर 2015)।
12. टिप्स एवं ट्रिक्स
- सिद्धांत-प्रश्नों में तुलनात्मक तालिका + एक भारतीय उदाहरण (भारत: परिधि → अर्ध-परिधि; हरित क्रांति; IT क्रांति)।
- आंदोलन-प्रश्नों में 2-3 सिद्धांत + भारतीय और वैश्विक उदाहरण + चुनौतियाँ।
- SDG प्रश्न में "5 P" की तालिका और SDG इंडिया इंडेक्स का उल्लेख।
रोस्टोव के 5 चरण — "पारंपरिक → पूर्व-शर्त → उड़ान → परिपक्वता → जन-उपभोग"; किमलिका के अधिकार — "बहु-नृजातीय, स्वशासन, प्रतिनिधित्व"; SDG — "People, Planet, Prosperity, Peace, Partnership"।
SDG किसी "UNDP रिपोर्ट" से नहीं, सितंबर 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव (2030 एजेंडा) से आए — UNDP क्रियान्वयन में सहायक है।
13. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न सिद्धांतों की विवेचना कीजिए। सामाजिक परिवर्तन के एकरेखीय सिद्धांत की सीमाओं को स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: सामाजिक परिवर्तन — सामाजिक संरचना, संस्थाओं और संबंधों में समय के साथ परिवर्तन।
सिद्धांत (तालिका): विकासवादी (कॉम्ट, स्पेंसर, मॉर्गन, दुर्खीम), चक्रीय (स्पेंगलर, टॉयनबी, सोरोकिन, पैरेटो), संघर्ष (मार्क्स, डेहरेनडॉर्फ़, कोज़र), प्रकार्यवादी (पार्सन्स — विकासवादी सार्वभौमिक), बहुरेखीय (स्टीवर्ड), आधुनिकीकरण (रोस्टोव), निर्भरता-विश्व-व्यवस्था (फ़्रैंक, वॉलरस्टीन), बहुल आधुनिकताएँ।
एकरेखीय सिद्धांत की सीमाएँ: यूरोकेंद्रीयता; साक्ष्य का अभाव; प्रसार की उपेक्षा; छलाँग (मोबाइल क्रांति); नियतिवाद-लक्ष्यवाद; प्रतिगमन (ईरान 1979); बहुल मार्ग (जापान, चीन); आंतरिक विविधता; उपनिवेशवाद का औचित्य; मूल्य-निर्णय।
भारतीय उदाहरण: परंपरा और आधुनिकता का सह-अस्तित्व (योगेंद्र सिंह); संयुक्त परिवार का अनुकूलन; जाति का राजनीतिकरण — कोई सीधी रेखा नहीं।
निष्कर्ष: परिवर्तन बहुदिशीय, संदर्भ-निर्भर और कर्ता-सापेक्ष है — आधुनिक समाजशास्त्र "बहुल आधुनिकताओं" की ओर बढ़ा है।
विभिन्न राष्ट्रों के विकास और निर्भरता के संदर्भ में इमैनुअल वॉलरस्टीन के विश्व-व्यवस्था सिद्धांत का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
सिद्धांत: इकाई — विश्व-व्यवस्था; दीर्घ 16वीं सदी से पूँजीवादी विश्व-अर्थव्यवस्था; केंद्र-अर्ध-परिधि-परिधि; असमान विनिमय; प्रभुत्व-चक्र (डच, ब्रिटिश, अमेरिकी); कोंद्रातिएफ़ चक्र।
विकास-निर्भरता: विकास और अल्पविकास एक ही प्रक्रिया; परिधि का दोहन; अर्ध-परिधि से गतिशीलता संभव; भारत — औपनिवेशिक परिधि (धन-निष्कासन, विऔद्योगीकरण) से आज की अर्ध-परिधि; वैश्विक मूल्य-शृंखलाएँ।
शक्ति: वैश्विक असमानता की व्यवस्थित व्याख्या; राष्ट्र-केंद्रित आधुनिकीकरण सिद्धांत की आलोचना; ऐतिहासिक दृष्टि।
आलोचना: आर्थिक निर्धारणवाद, संस्कृति और राज्य की उपेक्षा (स्कॉकपोल); पूर्वी एशियाई विकासात्मक राज्य; मापन की अस्पष्टता; ब्रेनर — उत्पादन-संबंध; फ़्रैंक का ReORIENT — एशिया-केंद्रित अतीत; उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना।
निष्कर्ष: विश्व-व्यवस्था सिद्धांत "संरचनात्मक असमानता" का शक्तिशाली मानचित्र है, पर राष्ट्रों की "एजेंसी" और राज्य-नीति को जोड़कर ही विकास की पूर्ण व्याख्या संभव।
समकालीन सामाजिक आंदोलनों में सोशल मीडिया की भूमिका को रेखांकित कीजिए और इसकी चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: सूचना-प्रसार, द्वारपालों को दरकिनार करना, तीव्र-विकेंद्रीकृत लामबंदी, संयोजक क्रिया (बेनेट-सेगरबर्ग), आक्रोश-आशा के नेटवर्क (कास्टेल्स), वैश्विक एकजुटता, हाशिये की आवाज़, दस्तावेज़ीकरण।
उदाहरण: अरब स्प्रिंग, #MeToo, BLM; भारत — 2011 भ्रष्टाचार-विरोध, निर्भया 2012, किसान आंदोलन 2020-21, CAA-विरोध।
चुनौतियाँ: स्लैक्टिविज़्म (मोरोज़ोव, ग्लैडवेल); तुफ़ेकी — संगठनात्मक कमज़ोरी; ग़लत सूचना, ध्रुवीकरण; निगरानी, इंटरनेट बंदी; एल्गोरिदमिक नियंत्रण; डिजिटल विभाजन; नेतृत्वहीनता; ऑनलाइन उत्पीड़न।
सैद्धांतिक संबंध: संसाधन लामबंदी (कम लागत), NSM (पहचान-मुद्दे), राजनीतिक अवसर (राज्य-प्रतिक्रिया)।
निष्कर्ष: सोशल मीडिया आंदोलनों का "उत्प्रेरक" है; टिकाऊ सफलता ऑफ़लाइन संगठन से ही आती है।
एक बहुसांस्कृतिक समाज नृजातीय, भाषाई और धार्मिक — सभी प्रकार की विविधताओं को किस प्रकार समायोजित करता है? इसकी प्रमुख चुनौतियों की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
बहुसंस्कृतिवाद: मान्यता और सम्मान (टेलर), समूह-अधिकार (किमलिका — 3 प्रकार), अंतर-सांस्कृतिक संवाद (पारेख); आत्मसात्करण बनाम मोज़ेक।
समायोजन के उपाय: नृजातीय (स्वायत्तता, आरक्षण), भाषाई (बहुभाषी नीति, मातृभाषा शिक्षा), धार्मिक (स्वतंत्रता, व्यक्तिगत क़ानून, अल्पसंख्यक संस्थान), संघवाद; भारत — अनु. 25-30, आठवीं अनुसूची, भाषाई राज्य, छठी अनुसूची, अनु. 371।
चुनौतियाँ: सांप्रदायिकता-बहुसंख्यकवाद; भाषाई-क्षेत्रीय टकराव; नृजातीय संघर्ष (मणिपुर); UCC बहस; व्यक्ति बनाम समूह अधिकार (ओकिन); सामाजिक एकता की चिंता (बैरी, यूरोप का अनुभव); पहचान-राजनीति; आर्थिक असमानता (फ़्रेज़र)।
निष्कर्ष: मान्यता, पुनर्वितरण और साझा संवैधानिक नागरिकता — तीनों का संतुलन ही बहुसांस्कृतिक समाज को स्थायी बनाता है।
सतत विकास से आप क्या समझते हैं? 2015 की सतत विकास लक्ष्य रिपोर्ट में प्रस्तावित सतत विकास के तत्वों की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
परिभाषा: ब्रंटलैंड (1987) — अंतर-पीढ़ीगत न्याय; आर्थिक-सामाजिक-पर्यावरणीय स्तंभ; रियो 1992, MDG।
2030 एजेंडा (सितंबर 2015, संयुक्त राष्ट्र महासभा; UNDP सहायक): 17 लक्ष्य, 169 लक्ष्यांक; सिद्धांत — सार्वभौमिकता, "किसी को पीछे न छोड़ें", एकीकृत-अविभाज्य।
तत्व (5 P): People (SDG 1-5), Planet (6, 12-15), Prosperity (7-11), Peace (16), Partnership (17)।
भारत: SDG इंडिया इंडेक्स (2018 से; 2023-24 — 71); स्वच्छ भारत, जल जीवन मिशन, सौर मिशन, पोषण अभियान।
समाजशास्त्रीय आलोचना: विकास की पश्चिमी अवधारणा (एस्कोबार), हरित विस्थापन, उत्तर-दक्षिण उपभोग असमानता, जलवायु न्याय, सूचक-केंद्रितता।
निष्कर्ष: SDG विकास को "वृद्धि" से "मानव कल्याण और ग्रहीय सीमाओं" की ओर ले जाने का वैश्विक ढाँचा है; सफलता स्थानीयकरण और सामाजिक न्याय पर निर्भर।
NGO और स्वयं सहायता समूह जैसे नागरिक समाज संगठन ज़मीनी स्तर के सामाजिक परिवर्तनों में किस प्रकार योगदान करते हैं? विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अवधारणाएँ: NGO — सेवा, वकालत, नवाचार; SHG — बचत-ऋण समूह; NABARD लिंकेज (1992), DAY-NRLM (2011), कुडुम्बश्री, जीविका, SEWA।
योगदान: वित्तीय समावेशन; स्त्री सशक्तिकरण और नेतृत्व; सामाजिक पूँजी (पुटनम); सामाजिक सुधार (बिहार शराबबंदी में जीविका दीदियाँ, बाल-विवाह विरोध); अधिकार-आधारित परिवर्तन (MKSS — RTI, सामाजिक अंकेक्षण); शिक्षा (प्रथम — ASER); नवाचार (बेयरफ़ुट कॉलेज); आपदा-राहत।
सीमाएँ: NGO-करण (अल्वारेज़), दाता-निर्भरता, जवाबदेही; SHG में अभिजात क़ब्ज़ा, ऋण-जाल (आंध्र 2010), दोहरा बोझ; संरचनात्मक कारणों पर सीमित प्रभाव।
निष्कर्ष: ये संगठन राज्य और समुदाय के बीच सेतु हैं — टिकाऊ परिवर्तन के लिए इन्हें अधिकार-आधारित नीतियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जोड़ना आवश्यक।
शिक्षा और कौशल विकास किस सीमा तक सामाजिक परिवर्तन के कारक हो सकते हैं? आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर
कारक के रूप में: गतिशीलता, स्त्री सशक्तिकरण (केरल), आधुनिक मूल्य, मानव पूँजी, जनांकिकीय लाभांश; Skill India (2015), PMKVY, NEP 2020 व्यावसायिक शिक्षा।
सीमाएँ: असमानता का पुनरुत्पादन (बोर्दियो, बाउल्स-गिंटिस); शिक्षित बेरोज़गारी; कौशल-रोज़गार असंगति; प्रमाण-पत्रवाद (कॉलिन्स, डोर); सीखने का संकट (ASER); संरचनात्मक बाधाएँ।
निष्कर्ष: शिक्षा "आवश्यक पर पर्याप्त नहीं" — समता, गुणवत्ता और रोज़गार-सृजन के साथ ही परिवर्तनकारी।
सामाजिक परिवर्तन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिकाओं का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। "ऑनलाइन" शिक्षा और अध्यापन में उनकी बढ़ती प्रवृत्ति पर आपका क्या मत है?
मॉडल उत्तर
भूमिका: उत्पादन, संचार, स्वास्थ्य-जनांकिकी, परिवार, शासन, संस्कृति में परिवर्तन; दृष्टियाँ — निर्धारणवाद (ऑगबर्न, मैकलुहान) बनाम सामाजिक निर्माण (पिंच-बिजकर), नेटवर्क समाज (कास्टेल्स); नई असमानताएँ और नैतिक प्रश्न।
ऑनलाइन शिक्षा पर मत: पहुँच, लचीलापन, कम लागत (SWAYAM, DIKSHA, PM eVidya) — पर डिजिटल विभाजन (NSS 2017-18 — ~24% परिवारों में इंटरनेट), सीखने की हानि, समाजीकरण का अभाव (दुर्खीम), एड-टेक का बाज़ारीकरण; अतः मिश्रित मॉडल — पूरक, विकल्प नहीं।
14. Quick Revision Summary
- सिद्धांत — विकासवादी, चक्रीय, संघर्ष, प्रकार्यवादी, बहुरेखीय, आधुनिकीकरण (रोस्टोव), निर्भरता (फ़्रैंक), विश्व-व्यवस्था (वॉलरस्टीन), बहुल आधुनिकताएँ; एकरेखीय की 9 सीमाएँ।
- कारक — प्रौद्योगिकी (निर्धारणवाद बनाम SCOT), ऑनलाइन शिक्षा; शिक्षा (प्रकार्यवादी, मार्क्सवादी, बोर्दियो, फ़्रेरे, कॉलिन्स); कौशल विकास।
- आंदोलन — एबरले के प्रकार; स्मेलसर, गर, मैक्कार्थी-ज़ाल्ड, टिली-टैरो, NSM, फ़्रेमिंग; डिजिटल आंदोलन — भूमिका और 8 चुनौतियाँ; हिंसा (स्कॉकपोल, फ़ैनन, गाल्टुंग)।
- बहुसंस्कृतिवाद — टेलर, किमलिका, पारेख; भारत के प्रावधान; 8 चुनौतियाँ।
- विकास — ब्रंटलैंड, SDG (17/169, 5 P), SDG इंडिया इंडेक्स; NGO-SHG (योगदान और सीमाएँ)।